छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में हमेशा कांटे का मुकाबला हुआ है. साल 2003 के चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट प्रतिशत में सिर्फ 2.55 फीसदी का अंतर था. फिर 2013 के चुनावों में यह अंतर और सिमटकर महज 0.75 फीसदी का रह गया. इस बार बसपा और पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) में गठजोड़ की आश्चर्यजनक घोषणा ने चुनावी जंग को और पेचीदा बना दिया है. आखिर छत्तीसगढ़ की राजनैतिक पार्टियों के लिए इस नए सियासी तालमेल के क्या मायने हैं? देश में सबसे लंबी अवधि तक किसी राज्य के भाजपाई मुख्यमंत्री बन चुके रमन सिंह वहां लगातार चैथी बार वापसी करने की जुगत में हैं.
यह किसी से छिपा नहीं है कि कांग्रेस खुद बसपा से तालमेल बनाने की कोशिश कर रही थी. उधर, सत्तारूढ़ भाजपा भी इस घटनाक्रम को बेहद नजदीक से देख रही थी क्योंकि राज्य की कुल 90 सीटों वाली विधानसभा में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित दस सीटों में से फिलहाल नौ उसकी के कब्जे में हैं. इस तालमेल की जानकारी लखनऊ में देते हुए मायावती ने 20 सितंबर को कहा कि उन्होंने इस बारे में काफी सोच-विचार कर फैसला लिया है.

गठजोड़ में 35 सीटें बसपा को मिली हैं और 55 जेसीसी को. जोगी मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे. मायावती की इस बात का मतलब यह है कि वे उसी पुराने तर्क के आधार पर चल रही हैं कि कांग्रेस से तालमेल की स्थिति में बसपा का वोट तो कांग्रेस को हस्तांतरित हो जाता है पर कांग्रेस का वोट बसपा के हाथ नहीं लगता.
ऐसे में बसपा की कीमत पर कांग्रेस फायदा उठा लेती है. लेकिन जेसीसी के साथ गठबंधन में अनुसूचित जातियों का वोट उसको मिलने की संभावना तगड़ी है क्योंकि जोगी की सतनामी समुदाय में करीब भगवान जैसी हैसियत है. यह राज्य में अनुसूचित जातियों का सबसे बड़ा समुदाय है.
सतनामियों का मध्य छत्तीसगढ़ की 14 विधानसभा सीटों में खासा तगड़ा जोर है और वहां उनके 20-25 फीसदी वोट हैं. इसके अलावा आधा दर्जन अन्य सीटों में भी उनकी बढिय़ा संक्चया है.
इन सीटों पर इस समुदाय का पूरा समर्थन मिल जाए और फिर कच्छी तथा मल्लाह जैसे छोटे समुदाय भी साथ आ जाएं तो बसपा-जेसीसी उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित हो सकती है. कांग्रेस की सेंधमारी करके उसके नेताओं को अपने यहां ले जाने से जेसीसी के हालात कुछ समय से खराब हैं.
ऐसे में बसपा से तालमेल उसके लिए संजीवनी सरीखा है. अब मध्य छत्तीसगढ़ में टिकटों के बंटवारे में उनकी अहम भूमिका हो सकती है और फिर शायद त्रिशंकु विधानसभा निर्वाचित होने की स्थिति में चुनावों के बाद भी.
अजित जोगी के बेटे अमित जोगी का कहना है, "मायावती जी जानती हैं कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस डूबता हुआ जहाज है. सिर्फ जेसीसी ही भाजपा का विकल्प हो सकती है.'' जोगी के साथ जाने के बसपा के फैसले से भौचक कांग्रेस अब अनुसूचित जातियों को अपने साथ लाने की योजना पर काम कर रही है.
पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि अनुसूचित जाति के वोटरों की अच्छी संख्या वाले मध्य छत्तीसगढ़ की 14 सीटों में से जोगी 4-5 सीट जीत सकते हैं पर इसका असली नुक्सान भाजपा को होगा क्योंकि इस समय 10 आरक्षित सीटों में से 9 सीटें उसी के पास हैं. विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव का दावा है, "कांग्रेस और भाजपा का वोट प्रतिशत मिलाकर 82 फीसदी है. उस पर इस गठबंधन का कोई फर्क नहीं पड़ेगा.
चुनाव में कांग्रेस और भाजपा में सीधी जंग होगी.'' राज्य कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने 20 सितंबर को तीखी टिप्पणी की, "बसपा पर सीबीआइ और ईडी के दबाव के कारण यह गठजोड़ हुआ है. बसपा भाजपा के कहने पर उम्मीदवार खड़ी करती रही है. अब भाजपा की "बी'' टीम जोगी से तालमेल करने से बसपा बेनकाब हो गई है.''
मध्य छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जातियों वाली सीटों पर कायम इस अनिश्चितता के कारण भाजपा के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि वह राज्य के उत्तर और दक्षिण में जनजातीय सीटों पर अपनी मजबूती बढ़ाए. उत्तर में उसके लिए स्थिति उतनी आसान नहीं होगी क्योंकि सरगुजा के तत्कालीन शाही परिवार से आने वाले सिंहदेव उस इलाके में काफी रसूख रखते हैं.
इसलिए भाजपा उम्मीद लगा रही है कि वह दक्षिण में सीटों की मौजूदा बाजी को पलट दे, जहां इस समय कांग्रेस के पास आठ और भाजपा के पास चार सीटें हैं. रमन सिंह सरकार ने 13 लाख जनजातीय परिवारों को केंद्रित करके ही हाल में यह फैसला लिया कि वह सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर के दक्षिण जिलों में तेंदु पत्ता तोडऩे वालों को बोनस की राशि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) से न देकर नकद देगी. राज्य के उत्तरी और दक्षिणी इलाकों में भाजपा तथा कांग्रेस में सीधी टक्कर होगी.
भाजपा अनुसूचित जातियों के वोट भी बांटने की कोशिश कर सकती है. यह काम मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं. सतनामियों में भी कई सारे संप्रदाय हैं, जैसे कि कबीरपंथी. उनके नेता प्रकाश मुनि नाम साहिब के रमन सिंह से अच्छे रिश्ते हैं. सितंबर के पहले सप्ताह में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी उनसे मुलाकात की थी. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक का कहना है, "भाजपा 65 सीटें जीतने की योजना पर काम कर रही है. यह गठबंधन कांग्रेस के लिए झटका है, भाजपा को इससे कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है.''
भाजपा बेरोजगारी के मुद्दे पर मुश्किल में घिर सकती है. जेसीसी ने इसे बड़ा मुद्दा बना रखा है और जोगी ने तो युवाओं के लिए शैक्षणिक योग्यता आधारित बेरोजगारी भत्ते का वादा किया है. छत्तीसगढ़ी सम्मान को सामने रखते हुए उन्होंने मूल निवासियों के लिए भी अलग से नौकरियां देने की घोषणा की है. उधर, पिछले चुनावों में भाजपा का समर्थन करने वाले पिछड़े वर्ग के लोग, खास तौर पर कुर्मी, इस बार पलटी मार सकते हैं क्योंकि वे अपने नेता बघेल के लिए मुख्यमंत्री बनने के इसे "अभी नहीं तो कभी नहीं'' वाले मौके के तौर पर देख रहे हैं.
बहरहाल, इंडिया टुडे के राजनैतिक स्टॉक एक्सचेंज में करीब 41 फीसदी की रेटिंग के साथ रमन सिंह मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे लोकप्रिय दावेदार बने हुए हैं. कुल 21 फीसदी रेटिंग के साथ बघेल उनके सबसे निकट प्रतिद्वंद्वी हैं.
रमन सिंह की महत्वाकांक्षी संचार क्रांति योजना से उन्हें व्यापक समर्थन मिल सकता है जिसमें वे 55 लाख लोगों को वॉयस और डेटा कनेक्शन के साथ स्मार्टफोन उपलब्ध करा रहे हैं. कुछ अन्य तोहफे भी बांटे जा रहे हैं, जैसे कि जनजातीय इलाकों में प्रेशर कुकर और टिफिन बॉक्स. धान पर न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊपर 300 रुपए प्रति क्विंटल का बोनस करीब 16 लाख किसानों को पहले ही वितरित किया जा चुका है.
इन बातों के बावजूद, भाजपा के हर चुनाव प्रचार अभियान की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही छत्तीसगढ़ में भी पार्टी के मुख्य प्रचारक रहेंगे, खास तौर पर रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग व रायगढ़ की शहरी सीटों पर, जहां 2013 के चुनावों में पार्टी को खासी बढ़त हासिल हुई थी. पार्टी का दावा है कि उसके वोट प्रतिशत में 2-3 फीसदी अंकों का इजाफा होगा. पर फिलहाल तो यह दूर की कौड़ी नजर आ रही है.
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