प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंदौर में दाऊदी बोहरा मुसलमानों की भूरि-भूरि प्रशंसा की तो कई लोगों की भृकुटियां तन गईं. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में बमुश्किल दो महीने का वक्त बचा है. प्रधानमंत्री के इस कदम की तुलना 2011 में उनके अहमदाबाद में सद्भाव और शांति के लिए हुए उपवास के साथ भी की जा रही है, जहां उन्होंने एक मौलाना द्वारा पेश की गई जालीदार टोपी पहनने से मना कर दिया था.
इस बार चीजें अलग थीं. प्रधानमंत्री 14 सितंबर को इंदौर में न सिर्फ बोहरा मुसलमानों के आध्यात्मिक प्रमुख सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन से व्यक्तिगत रूप से मिलने गए, बल्कि उन्होंने दुनिया को बताया कि इस्माइली शिया संप्रदाय के लिए उनके मन में कितना आदर है.
उसके बाद मोदी नंगे पांव पास ही स्थित सैफी मस्जिद परिसर पहुंचे और बाद में उन्होंने वहां लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ''इस समुदाय के साथ उनका लगाव बहुत पुराना है. समुदाय ने उन्हें जितना समर्थन दिया है उससे वह अभिभूत हैं और इसी कारण इंदौर खिंचे चले आए.''
बोहरा समुदाय को अपने 'परिवार' जैसा बताते हुए उन्होंने कहा कि वे टेलीविजन पर लाइव प्रसारित हो रहे इस कार्यक्रम का उपयोग दुनिया को ''शांति, विकास और सद्भाव के लिए बोहराओं के योगदान' से परिचित कराने के अवसर के रूप में करना चाहते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि गैर-बोहरा समुदाय में से सिर्फ प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके सुरक्षा दस्ते को ही उस स्थल पर आने की अनुमति दी गई थी. शेष लोग बोहरा समुदाय के वरिष्ठ पुरुष सदस्य थे.
बोहराओं और बहुसंख्यक मुस्लिम सुन्नी समुदाय के बीच संबंधों में लंबे समय से तनाव चला आ रहा है और इंदौर में नरेंद्र मोदी के आने से सुन्नी समुदाय के बीच उनके लिए नाराजगी और बढ़ी ही होगी. बोहराओं की संख्या दुनिया भर में बमुश्किल 10 लाख बताई जाती है और उनमें से सबसे बड़ा बोहरा समाज गुजरात के व्यापारियों का है.
मध्य प्रदेश में इनकी संख्या एक लाख से अधिक नहीं होगी और बोहरा मुसलमान छह से भी कम विधानसभा क्षेत्रों के चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. लेकिन समुदाय आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध है.
तो प्रधानमंत्री मोदी आखिर वहां क्यों गए? वैसे तो मोदी ने कहा कि सैयदना के साथ उनके पुराने संबंध हैं और यह यात्रा उन संबंधों को आगे बढ़ाने का प्रयास है, लेकिन मोदी ने इससे पहले भी कई बार आगे बढ़कर मुसलमानों के बीच के छोटे गुटों के साथ रिश्ते बनाने की पहल की है. मसलन, पाकिस्तानी-कनाडाई बरलेवी नेता ताहिर-उल-कादरी के लिए उनका समर्थन, जिन्हें सुन्नी देवबंदियों के मुकाबले ज्यादा उदारवादी माना जाता है.
कुछ मुसलमान नेता प्रधानमंत्री के इंदौर दौरे को मध्य प्रदेश के मुस्लिम वोटरों में चुनावों के पहले फूट डालने की कोशिश बता रहे हैं. मुस्लिम पॉलिटिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के तसलीम अहमद रहमानी कहते हैं, ''अगर प्रधानमंत्री वाकई समावेशी बनना चाहते हैं तो उन्हें देवबंद और इमामबाड़ा जाना चाहिए. राज्य के मुसलमान बहुत सोच-समझकर वोट करेंगे.''
बहरहाल, प्रधानमंत्री का इंदौर दौरा भले ही सियासी न हो, पर इससे चुनावी समीकरणों पर असर साफ दिखेगा.
***

