scorecardresearch

क्यों पंजाब बन रहा है एक सूखता हुआ सूबा

पंजाब में सिंचाई के लिए पानी की कुल खपत का तकरीबन 80 फीसदी धान की खेती के लिए इस्तेमाल होता है. और राज्य में उगाई गई धान की लगभग पूरी फसल केंद्रीय खाद्यान्न पूल में भेज दी जाती है. लेकिन भूमिगत जल के दोहन से यहां के जल संसाधनों पर भारी खतरा पैदा हो गया है. पंजाब के कई हिस्सों में भूजल खतरनाक स्तर तक नीचे चला गया है. 

बारिश बेअसर अमृतसर के बाहरी इलाके में धान का खेत
बारिश बेअसर अमृतसर के बाहरी इलाके में धान का खेत
अपडेटेड 28 अगस्त , 2018

पड़ोसी हरियाणा के साथ सतलज-यमुना लिंक नहर के निर्माण पर जारी अपनी सतत लड़ाई के बीच पंजाब बहुत बड़े जलसंकट की ओर बढ़ रहा है. चंडीगढ़ स्थित सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल ऐंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट (सीआरआरआइडी) का एक अध्ययन बताता है कि प्राकृतिक और कृत्रिम स्रोतों से हर साल जितना भूजल रिचार्ज होता है, उसका औसतन करीब एक-तिहाई राज्य भर में लगे लाखों ट्यूबवेल के जरिए निकाल लिया जाता है.

'भारत में गहराता जल संकटः कृषि में उन्नत राज्य से सबक' शीर्षक वाली रिपोर्ट को सीआरआरआइडी के आर.एस. घुमान और राजीव शर्मा ने तैयार किया है. यह बताती है कि राज्य के लगभग सभी जिलों में भूजल दोहन की प्रवृत्ति एक जैसी है और इसके कारण भूजल तालिका में तेजी से गिरावट आई है. वास्तव में दक्षिणी दोआबा के जिलों—संगरूर और मोगा तथा जलंधर और कपूरथला जैसे मध्य दोआबा के जिलों में तो किसान भूजल रिचार्ज की मात्रा से दो गुना अधिक पानी निकाल लेते हैं.

किसान अपनी जरूरत का 77 फीसदी पानी जमीन के नीचे से खींचकर निकालते हैं. नदियों और नहरों से तो वे अपनी सिंचाई जरूरत का मात्र 23 फीसदी पानी प्राप्त करते हैं. 1971 के केवल 1,92,000 ट्यूबवेल के मुकाबले आज पंजाब में 14.1 लाख ट्यूबवेल हैं. अध्ययन में कहा गया है कि अधिक दोहन के कारण भूजल में छह से 22 मीटर की गिरावट आई है जो खतरनाक है. राज्य के 138 प्रशासनिक ब्लॉक में से सौ तो पहले से ही 'अत्यधिक शोषित', 'चिंताजनक या डार्क जोन' और 'बीमार या ग्रे जोन' क्षेत्रों में आते हैं और यहां सिंचाई के लिए अतिरिक्त ट्यूबवेल लगाने की संभावनाएं बहुत कम हैं. किसानों को पानी खींचने के लिए भारी पंपसेट लगाने पड़ रहे हैं जिसने खेती को और खर्चीला बना दिया है.

पंजाब में सिंचाई के लिए पानी की कुल खपत का तकरीबन 80 फीसदी धान की खेती के लिए इस्तेमाल होता है. और राज्य में उगाई गई धान की लगभग पूरी फसल केंद्रीय खाद्यान्न पूल में भेज दी जाती है. रिपोर्ट कहती है कि इस प्रकार पंजाब चावल के रूप में अपने राज्य की भूसंपदा देश के अन्य राज्यों को स्थानांतरित कर रहा है. यह खतरनाक स्थिति पंजाब को जल्द ही एक रेगिस्तान में बदल सकती है, बावजूद इसके राज्य में एक के बाद एक सत्ता में आई हर सरकार, जल नियमन नीति विकसित करने में नाकाम रही है.

रिपोर्ट कहती है कि राज्य को धान की खेती बंद कर देनी चाहिए. सीआरआरआइडी के स्कॉलर्स के इस अध्ययन रिपोर्ट को जारी करने के कुछ ही समय बाद 1 अगस्त को, अमरिंदर सिंह सरकार ने उन 1,50,000 ट्यूबवेल कनेक्शन पर अनिश्चितकालीन रोक लगा दी है जिनकी अनुमति पिछली अकाली-भाजपा सरकार ने 2017 की शुरुआत में चुनाव से ऐन पहले राजनैतिक फायदे के लिए दी थी.

Advertisement
Advertisement