ताज महल कितना सफेद होना चाहिए? इस सवाल का सही जवाब तो सिर्फ मुगल सम्राट शाहजहां ही दे सकते थे जिन्होंने राजस्थान के मकराना की खदानों से निकले शुद्ध सफेद संगमरमर संग-ए-रुखम से अपने महबूब की याद में ऐसा मकबरा बनवाया था, जो देखने वालों के लिए दिन में कई दफे रंग बदलता थाः सूर्योदय पर दूधिया सफेद, भरी दोपहर में चमचमाता सफेद, सूर्यास्त के समय हल्की नारंगी आभा के साथ और रात में इंद्रधनुषी नीला.
तो ताज को किस तरह सफेद माना जाए? सुप्रीम कोर्ट ने हाल में जब स्मारक की दुर्दशा और धीरे-धीरे मटमैले रंग में बदलने को लेकर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई, तब से यह सवाल खासतौर पर उठने लगा है.
केंद्रीय संस्कृति राज्य मंत्री महेश शर्मा ने बयान दिया, ''हर किसी को आश्वस्त करता हूं कि ताज की संरचना पर फिलहाल कोई खतरा नहीं मंडरा रहा है और इसके मूल रंग में भी कोई बदलाव नहीं आया है.'' सरकार, स्टीरियोस्कोपिक इमेजिंग की मदद से ताज की 100 साल पुरानी तस्वीरों की तुलना ताजा तस्वीरों के साथ कराने की योजना बना रही है और सुप्रीम कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश कर सकती है.
यह कहना मुश्किल है कि सरकार क्या खोज निकालेगी. अगर आंखों देखी चीज पर यकीन करें, तो बीते 40 वर्षों में धीरे-धीरे ताज महल में लगा संगमरमर मटमैले पीले रंग में बदल गया है (संगमरमर से लगातार मिट्टी की परत हटाए जाने के बावजूद). ऐसा क्यों हो रहा है?
1980 और 90 के दशक में तो इस सवाल का छूटते ही जबाव मिलताः मथुरा में तेल रिफाइनरी के रूप में एक ऐसा राक्षस है जो अपने मुंह से लगातार सल्फर डाइऑक्साइड (so2) उगलता है. उसका धुआं ताज के ऊपर छा जाता है. वह (so2) हवा में मौजूद नमी के साथ मिलकर सल्फ्यूरिक एसिड बना लेता है और फिर ताज पर तेजाबी बारिश होती है.
इसी कारण धीरे-धीरे उसका संगमरमर नष्ट हो रहा है. जहरीली हवा ताज के क्षरण का प्रमुख कारक है, जो 'मार्बल कैंसर' करके उसको नुक्सान पहुंचा रहा है. कई विशेषज्ञों के मुताबिक, वायु प्रदूषण ताज की सेहत बिगाडऩे के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है और ताज का अपना मूल रंग वापस लाने के लिए विशेष उपचार की जरूरत है. कुछ लोगों के मुताबिक, एक निश्चित वक्त के बाद किसी भी चीज में ह्रास होता है और ताज के साथ भी यही हो रहा है.
सो, ताज को विशेष मरम्मत की जरूरत है, ताकि उसे पुरानी रंगत दी जा सके. एथेंस से लेकर चीन तक, दुनियाभर में मौजूद प्राचीन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासतों के साथ यही परेशानी आई है. संरक्षणकर्ता प्रदूषण और समय की मार झेल रहे इन स्मारकों की पुरानी गरिमा लौटाने के लिए संरक्षण कार्यों में कई दशकों से प्रयासरत हैं.
लेकिन आइआइटी-कानपुर के राजीव ऐंड संगीता लाहिड़ी चेयर के प्रोफेसर और सिविल इंजीनियरिंग ऐंड अर्थ साइंसेज के अध्यक्ष सच्चिदानंद त्रिपाठी के मुताबिक, पश्चिमी देशों के उलट भारत में सल्फर डाइऑक्साइड (so2) कोई समस्या नहीं है.
त्रिपाठी कहते हैं, ''SO2 सल्फेट्स में बदल जाता है. इसकी प्रकृति अम्लीय है. अगर आपके आस-पास पर्यावरण में पर्याप्त मात्रा में एसिड मौजूद हो तभी तेजाबी बारिश होगी.'' लेकिन भारत में बहुत अधिक धूलकण हैं जिसकी प्रकृति क्षारीय है. इसमें पाए जाने वाले कैल्शियम और अन्य खनिज भी क्षारीय हैं. वे बताते हैं, ''ये सभी मिलकर अम्लीय प्रदूषण को बेअसर कर देते हैं. इसी कारण हमारे देश में तेजाबी बारिश की समस्या उतनी ज्यादा नहीं है.
यह बात प्रमाणित भी है. वरना, तेजाबी बारिश ने हमारी फसलों और नदी के पानी को नुक्सान पहुंचाया होता.'' त्रिपाठी ने शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम के साथ 2014 और 2017 के बीच ताज में वायु प्रदूषण पर शोध किया है.
उनके शोध से पता चला है कि वायु की खराब गुणवत्ता ताज के मटमैले होने और उसके क्षरण के लिए जिम्मेदार है. (so2) नहीं बल्कि धूलकणों की सघनताः ब्लैक कार्बन (कालिख), भूरा कार्बन और धूल की जमावट, जो मुख्य तौर पर शहर में मानव गतिविधियों की वजह से हैं. इनमें डीजल के जलने से होने वाला उत्सर्जन और गाडिय़ों के धुएं के अलावा नगरपालिका की ओर से खुले में कचरा जलाना, लकड़ी और गोबर जलाना आदि शामिल हैं.
यह बीते 40 वर्षों में ताज की रक्षा के लिए किए गए उपायों पर सवालिया निशान लगाता है. इन वर्षों में विशेषज्ञों के आयोग और समितियों के गठन के साथ-साथ अध्ययन और सर्वेक्षण होते रहे, रिपोर्टें आती रहीं. वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं ने अन्य प्रदूषकों (कार्बन और नाइट्रोजन के ऑक्साइड, धूल और हाइड्रोकार्बन) के प्रभावों को हमेशा अनदेखा किया और सबका ध्यान बस SO2 पर रहा.कई समितियों और आयोग में तो इस विषय के जानकार भी नहीं थे और कई अन्य ने पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन किए बिना प्रशासन को प्रभावित करने की कोशिश की. फिर हैरानी क्या कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से उत्सर्जन की निगरानी के बावजूद ताज ने अपना रंग बदलना जारी रखा.
बीते 40 वर्ष बस ध्यान बदलते रहने और भटकी प्राथमिकताओं की दास्तान हैं: '80 के दशक में मथुरा रिफाइनरी से निकलने वाले SO2 से शुरू होकर 90 के दशक में छोटी औद्योगिक इकाइयों के प्रदूषण; फिर 2000 के दशक के आरंभ में डीजल जनरेटरों और वाहन प्रदूषण से उत्सर्जन पर चिंता से लेकर हाल तक यमुना के क्षरण की थ्योरी तक.
अब नए खलनायक के रूप में धूल और कार्बन कणों को जिम्मेदार ठहराने का वक्त है. यह भारतीय विज्ञान की विफलता है या फिर हमारे राजनीतिक वर्ग की अकर्मण्यता?
पहेलियों में उलझकर रह गया ताज....
ताज को आखिर कौन बीमार कर रहा है? बीते 40 वर्षों में विशेषज्ञों और नीति-नियंताओं की कई समितियों के लिए तो यह यक्ष प्रश्न ही बना रहा है
तेल रिफाइनरी है वजह
1973 ताज महल से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर सोवियत संघ की सहायता से इंदिरा गांधी ने मथुरा में भारतीय तेल निगम की 60 लाख टन क्षमता वाली रिफाइनरी की नींव रखी; संसद को विश्वास दिलाया कि रिफाइनरी ताज की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के बाद ही शुरू होगी
1974 पर्यावरणीय खतरों की जांच के लिए पेट्रोलियम और रसायन मंत्रालय ने एस. वरदराजन की विशेषज्ञ समिति गठित की
1976-77 इटली की फर्म टेक्नेको और भारतीय मौसम विभाग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि रिफाइनरी से होने वाला प्रदूषण सुरक्षित सीमा में ही रहेगा; संगमरमर और बलुआ पत्थर में पहले से ही क्षरण हो चुका है
लेकिन कोई इसे रोक नहीं सकता...
1977 राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (एनईईआरआइ), एएसआइ, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने आंकड़ों को अपर्याप्त और अविश्वसनीय बताया. उनकी आपत्तियों की रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया
1977 वरदराजन कमेटी की रिपोर्ट ने कहा, मथुरा रिफाइनरी से कोई खास खतरा नहीं हैः इससे ताज के आसपास के वायुमंडल में प्रति घनमीटर केवल 1-2 माइक्रोग्राम SO2 की ही वृद्धि होगी
1978 इंटरनेशनल सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ प्रीजर्वेशन ऐंड रिस्टोरेशन ऑफ कल्चरल प्रोपर्टी, रोम के सहायक निदेशक डॉ जी. टोरटका ने कहा, ताजमहल के लिए 1% जोखिम भी बहुत अधिक है. डॉ टोरटका ने उस रिपोर्ट की जांच की थी
1979 कर्ण सिंह की अगुआई वाली संयुक्त संसदीय समिति ने रिफाइनरी का विरोध कियाः आंकड़े ठीक नहीं है, रिफाइनरी से निकलने वाले अन्य प्रदूषकों का प्रभाव (कार्बन के ऑक्साइड, नाइट्रोजन, धूल और कणों) का अध्ययन ही नहीं किया गया; 'विशेष' सही मायने में इस क्षेत्र में विशेषज्ञ है ही नहीं, रिफाइनरी को स्थानांतरित किया जाना चाहिए
1980 सरकार ने उच्च-स्तरीय पैनल और विशेषज्ञ समूह बनाया जिसे आगरा शहर की विभिन्न गतिविधियों से होने वाले SO2 उत्सर्जन के गहन अध्ययन की जिम्मेदारी दी गई
1982 मथुरा रिफाइनरी से व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो गईं
ताजा पीला पडऩे लगा ...
1984 प्रदूषण पर लगाम कसने के लिए सरकार ने ताज महल के चारों ओर 10,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ताज ट्रेपेजियम जोन (टीटीजेड) घोषित किया
1985 रिफाइनरी से निकलने वाले प्रदूषकों ने एक विश्व धरोहर जगह, भरतपुर पक्षी विहार के जीवों/वनस्पतियों को नुक्सान पहुंचाना शुरू कर दिया
वायु प्रदूषण की चिंता ...
1993 एनईईआरआइ की रिपोर्ट में तेजाबी बारिश (जब सल्फर डाइ ऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड को कुहासे या बारिश से नमी मिलती है) को ताज की बदहाली का कारण बताया गया. पर जब बारिश के पानी या फिर ताज की धुलाई के बाद निकले गंदे पानी का ph वैल्यू लिया गया तो उससे एनईईआरआइ की रिपोर्ट गलत साबित हुई
1994 फिर से वरदराजन कमेटी का गठन हुआ. केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने टीटीजेड को 'वायु प्रदूषण संरक्षण क्षेत्र' घोषित करके इस क्षेत्र में 'ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली' नई इकाईयों की स्थापना या मौजूदा इकाई की क्षमता के विस्तार पर रोक लगा दी
1974 पर्यावरणीय खतरों की जांच के लिए पेट्रोलियम और रसायन मंत्रालय ने एस. वरदराजन की विशेषज्ञ समिति गठित की
1976-77 इटली की फर्म टेक्नेको और भारतीय मौसम विभाग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि रिफाइनरी से होने वाला प्रदूषण सुरक्षित सीमा में ही रहेगा; संगमरमर और बलुआ पत्थर में पहले से ही क्षरण हो चुका है
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप...
1996 एक ऐतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट टीटीजेड के भीतर स्थित उद्योगों में कोयले और कोक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है और स्वच्छ ईंधन (सीएनजी) पर जाने का आदेश देता है. जो भी इंडस्ट्रीज इस मानदंड को पूरा करने में असफल रहते हैं उन्हें स्थानांतरित करने या फिर बंद करने के आदेश दिए गए. 2001 तक आगरा के ज्यादातर छोटे उद्योग (292) और लगभग सभी ढलाईघर (168) बंद होने के कगार पर
1999 आगरा में वायु, जल और भूमि की स्थिति सुधारने के लिए आर्थिक मामलों की संसदीय समिति ने 222.21 करोड़ के प्रोजेक्ट को मंजूरी दी
2000 सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिकों की महाजन कमेटी ने ताज के चारों तरफ चार वायु प्रदूषण मॉनिटरिंग स्टेशन और एक केंद्रीय विश्लेषणात्मक सह जांच प्रयोगशाला स्थापित किया
संसद का हस्तक्षेप
2002 गुलाम नबी आजाद की अगुआई में एक संसदीय समिति ने ताज की सुरक्षा बढ़ाने, चौबीसों घंटे अग्निशमन व्यवस्था रखने और मेटल डिटेक्टर के काम में कोई रुकावट न आए, इसे सुनिश्चित करने के लिए खासतौर से बिजली आपूर्ति का प्रबंध करने को कहा
2007-09 सीताराम येचुरी की अगुआई वाली संसदीय समिति ने ताज के पीले पडऩे को लेकर चिंता जाहिर की और इसे रोकने के इंतजाम करने को कहा. इसने परिवहन, टिकट व्यवस्था और सुरक्षा पर भी चिंता जाहिर की
फिर से रंग बदला...
2010-13 एनईईआरआइ के अध्ययन से पता चलता है कि टीटीजेड की पर्यावरणीय गुणवत्ता में सुधार के लिए 1998 में 220 करोड़ रु. के केंद्रीय निवेश के बावजूद ताज एक बार फिर से बढ़ते वायु और जल प्रदूषण का शिकार हो रहा है.
अध्ययन में विशेष रूप से यह पाया गया है कि 2002 तक जिस नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (जिसमें अम्लीय प्रकृति के कारण संगमरमर को नुक्सान पहुंचाने की क्षमता है) में गिरावट देखी जा रही थी, वह एक बार फिर से बढऩा शुरू हो गया है और 1996 के स्तर को पार कर चुका है. एनइइआरआइ ने मानव आबादी और वाहनों की संख्या में वृद्धि को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया.
एनईईआरआइ की रिपोर्ट में कहा गया कि 2001 की तुलना में शहर की वाणिज्यिक दुकानों में जेनरेटरों की संख्या में 178त्न की वृद्धि हुई है
नए दुश्मन
2014-17 आइआइटी-कानपुर, अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन और जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक अध्ययन में पाया गया कि ताजमहल पर अभी भी प्रदूषण के खतरे के बादल मंडरा रहे है; खतरा सल्फर डाइ ऑक्साइड से नहीं बल्कि काले कार्बन, ऑर्गेनिक कार्बन और धूल से है जो कि मुख्य रूप से शहर में होने वाली मानव गतिविधियों, विशेष रूप से बायोमास के जलाने से पैदा हो रहे हैं
2015 अश्विनी कुमार की अध्यक्षता वाली एक संसदीय समिति ने टीटीजेड से ग्लास और पेठा उद्योगों को बंद करने या हटाने की सिफारिश की; वह डीजल जेनरेटर पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध करती है, ताज को 24 घंटे बिजली की आपूर्ति का निर्देश देती है
2015 हवा में क्या है? नेशनल अंबिएंट मॉनिटरिंग प्रोग्राम (एनएएमपी) के तहत शहरी उत्सर्जन के अध्ययन में पीएम10, SO2 और NO2 और प्रदूषण के इन स्रोतों के बारे में जानकारी मिली:
सफेद कितना सफेद है?
2018 भूरे-पीले रंग के साथ ताज पर बन रहीं हरी चित्तियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एएसआइ को लताड़ लगाई. केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने ताज के वास्तविक रंग का वैज्ञानिक विधि से पता लगाने के लिए कमेटी बनाने की घोषणा की—क्या ताज वाकई उतना ही झक सफेद था जितना हम सोचते हैं.
खलनायक की पहचान
पुराना शत्रुः मथुरा तेल रिफाइनरी. 1980 के दशक में रिफाइनरी से निकलने वाले सल्फर डाइ ऑक्साइड को मुख्य खलनायक घोषित किया गया था
नया शत्रुः उत्तर प्रदेश सरकार, राज्य का शहरी विकास मंत्रालय, आगरा नगर निगम. कार्बनिक ईंधनों, बायोमास और कचरे के जलने से निकलने वाले कार्बन युक्त धूलकण
कुछ काम तो हो
अपशिष्ट को कम करने के लिए रिसाइकल सुविधाओं का निर्माण और विस्तारः कई कम आय वाले देश (नाइजर, कैमरून, ट्यूनीशिया) अपने कुछ कचरे को रिसाइकल करते हैं
कंपोस्टिंग को प्रोत्साहनः इंडोनेशिया और श्रीलंका अपने नागरिकों को जैविक अपशिष्ट को कम करने के एक व्यवहार्य तरीके, कंपोस्टिंग के लाभ सिखा रहे हैं
कचरे से बायोगैसः बेंगलूरू में आर्ट ऑफ लिविंग, अक्षय पात्र, टीवीएस और इंफोसिस ने बायोगैस इकाइयों की स्थापना की है
प्रदूषकों पर भारी जुर्मानाः हांगकांग पहली बार सजा के तौर पर 50,000 डॉलर का जुर्माना लगाता है, साथ ही जितने समय तक अपराध जारी रहता है उसके लिए प्रत्येक 15 मिनट के एवज में 500 डॉलर की दर से जुर्माना जारी रहता है
लोगों की राय
हम स्रोत स्थान पर ही कचरे को अलग करने या रिसाइकलिंग करके शहर को कचरा मुक्त देखना चाहते हैं. शहर में कोई अस्थायी जमाव नहीं होना चाहिए. लैंडफिल साइटों पर विशाल डंप को खत्म करने के वैज्ञानिक तरीकों की तलाश करें.
(आगरा के पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं
द्वारा जुलाई 2018 में तैयार किए गए 'पीपल्स
विजन डॉक्यूमेंट' से)
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