राजनीति में ऐसे क्षण भी आते हैं जहां से एक नेता और एक राष्ट्र की किस्मत और कई बार तो इतिहास की लकीरें भी बदल जाती हैं. बहुत कम लोगों को ऐसी आशा थी कि 20 जुलाई को लोकसभा में एनडीए सरकार के खिलाफ पेश अविश्वास प्रस्ताव, ऐसा ही एक क्षण साबित हो सकता है.
आखिरकार जैसी आशा थी, वैसा ही परिणाम आयाः तेदेपा जैसे सहयोगी के पाला बदलकर विरोधी पक्ष में चले जाने और शिवसेना जैसे पुराने सहयोगी के सदन में मतदान से खुद को अलग कर लेने के बावजूद, इसमें कोई संदेह नहीं था कि एनडीए इसे आसानी से जीत लेगा. और वही हुआ भी. एनडीए को 325 वोट और संयुक्त विपक्ष को 126 वोट मिले.
फिर भी परिणामों से ज्यादा चर्चा में रही सदन की कार्यवाही, जिसने तय कर दिया कि 2019 में लड़ाई किसके-किसके बीच होने वाली है. भाजपा की तरफ से नरेंद्र मोदी होंगे जो हाल के वर्षों के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री के रूप में उभरे हैं तो उनके सामने होंगे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जिनके कंधों पर भारत की सबसे पुरानी पार्टी की अगुआई का दायित्व है और जो 14 साल से राजनीति में सक्रिय हैं फिर भी उन्हें राजनीति का नौसिखुआ ही माना जाता रहा है.
जिन लोगों को सदन की कार्यवाही को लाइव देखने का मौका मिला हो (लेखक ने उसे लाइव देखा था) उन्होंने तीन महत्वपूर्ण बातों पर जरूर गौर किया होगा. पहली बात, जब राहुल अपना भाषण देने खड़े हुए तो, उन्होंने "जुमला स्ट्राइक'' और नौकरियों के लिए मोदी पर सीधा हमला बोलकर अपने विरोधियों और प्रशंसकों, दोनों को चौंका दिया.
उसके बाद उन्होंने फ्रांस से राफेल फाइटर विमान सौदे पर उंगली उठाकर प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री की साख पर सवाल खड़े किए और सत्तापक्ष में बौखलाहट पैदा कर दी. ऐसा करते हुए राहुल ने संकेत दिया कि अब वे श्पप्पू्य नहीं रहे जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी छवि बनाई है.
वे साफ तौर पर मोदी सरकार की गलतियां गिनाकर खुद को प्रधानमंत्री पद के योग्य दावेदार के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे थे.
एक और पल था जब राहुल ने अपने हिंदू होने और सबको प्यार बांटने के संदेश पर जोर दिया. उन्होंने भाजपा और आरएसएस का भी यह कहते हुए शुक्रिया अदा किया कि उनके कारण ही वे अपने धर्म को ज्यादा जान पाए हैं. और उसके बाद तो उन्होंने जो किया वह सभी के लिए चौंका देने वाला था.
वे चलकर सत्तापक्ष की ओर आए और हैरान मोदी को गले लगा लिया. उसके कुछ ही पलों बाद उन्होंने अपने कांग्रेसी साथी की ओर देखते हुए शरारती अंदाज में आंख मारी और मानो उनके सारे किए कराए पर पानी फिर गया हो. लेकिन इन दोनों घटनाओं ने यह दर्शाया कि राहुल अब किसी के कहे पर नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से अपने निर्णय करते हैं.
इसमें एक महत्वपूर्ण संदेश यह था कि राहुल खुद को भाजपा की विभाजनकारी और नफरतभरी राजनीति से एकदम अलग, सबको साथ लेकर चलने वाला नेता साबित करने की कोशिश कर रहे थे. यदि राहुल मोदी और भाजपा की ही तरह संघ पर ही उतने ही हमलावर न हुए होते तो उनके नए हिंदुत्व प्रेम ने उन्हें भी संघ के उन नेताओं के करीब खड़ा कर दिया होता जो मोदी-शाह की जोड़ी के कथित अहंकार और राजनैतिक दबंगई से खीझे हुए हैं.
निर्णायक मोड़ तो उस वक्त आया जब मोदी ने अपनी सरकार के लिए एक आकर्षक रक्षा कवच तैयार किया जिसे मुक्चय रूप से तीन लक्ष्यों को साधने के लिए तैयार किया गया थाः कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं की विश्वसनीयता पर करारा प्रहार करना, विपक्ष की एकजुटता के प्रयासों को तार-तार करना और इस मौके का फायदा अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाने और नए भारत के निर्माण के वादे के साथ 2019 के अपने चुनाव अभियान का आधिकारिक रूप से आगाज.
मोदी के भाषण में उनकी वह वाक्पटुता नजर आई जिसके लिए वे जाने जाते हैं लेकिन अपनी सरकार की आर्थिक क्षेत्र की उपलब्धियों को गिनाते समय वे थोड़े रक्षात्मक भी नजर आए. अपने अंदाज से अलग हटकर वे आर्थिक क्षेत्र में सरकार का प्रदर्शन बताने के लिए बहुत ज्यादा आंकड़ों का सहारा ले रहे थे. लेकिन राहुल के उन्हें गले लगाने की कोशिशों का मखौल उड़ाते हुए लगता है प्रधानमंत्री ने एक बड़ा मौका गंवा दिया.
मोदी इस अवसर का लाभ उठाते हुए देशभर में एक नई आम सहमति बनाने और विपक्षी दलों से श्टीम इंडिया्य का हिस्सा बनकर वृहत्तर सहयोग की मांग कर सकते थे. और जो मुद्दे देश के लिए वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण हैं, उस पर आपसी मतभेदों को भुलाकर देश के व्यापक हित में साथ मिलकर काम करना चाहिए.
मोदी सबको साथ लेकर चलने की भावना रखने वाले एक महान नेता के तौर पर खुद को स्थापित कर सकते थे. पर उन्होंने यह मौका राहुल को दे दिया.
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