जब पिछले साल मई में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने प्रिय इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) को बढ़ावा देने के लिए बेल्ट ऐंड रोड फोरम का उद्घाटन कर रहे थे, उस कार्यक्रम में अनुपस्थित रहने वाला भारत एकमात्र बड़ा देश था. कहा जा रहा था कि नई दिल्ली को यह अनुपस्थिति भारी पड़ेगी और भारत अलग-थलग पड़ जाएगा.
चीन में भारत के पूर्व राजनयिक अशोक कंठ याद करते हुए बताते हैं, ‘‘हमारी अपनी कुछ चिंताएं थीं जिसे जाहिर करने के बाद हमने इस फोरम से खुद को अलग कर लिया. तब कुछ लोगों का मानना था कि 60 देशों के समर्थन वाले इस वैश्विक प्रोजेक्ट से खुद को अलग करके हम दरकिनार हो जाएंगे.’’
बीजिंग फोरम के एक साल बाद बीआरआइ पर भारत का रुख सही साबित हो रहा है. पिछली मई में नई दिल्ली ने अपने बयान में इस मेगा प्रोजेक्ट में पारदर्शिता और वित्तीय स्थिरता की कमी को लेकर चिंताएं जाहिर की थीं. कंठ के मुताबिक, ‘‘अब दूसरी जगहों से भी ऐसी आवाजें उठने लगी हैं.’’
बीआरआइ के शुरुआती समर्थकों में से एक श्रीलंका पर अब चीन का 8 अरब डॉलर से ज्यादा का कर्ज चढ़ गया है. चीनी ऋण चुकाने में असमर्थ—जिनमें से कुछ कर्ज तो पिछली सरकार ने 6.4 प्रतिशत ब्याज दर पर लिया था—कोलंबो को अपने हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल के पट्टे पर एक चीनी कंपनी को देना पड़ा है.
म्यांमार की सरकार ने कहा है कि वह चीनी परियोजनाओं की शर्तों की समीक्षा करेगी जबकि मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने भी चीनी ऋण पर चिंतता जताते हुए 20 अरब डॉलर की हाइस्पीड रेल परियोजना रद्द कर दी है.
यहां तक कि चीन के ‘सदाबहार यार’ पाकिस्तान में भी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) की शर्तों की आलोचना तेजी से बढ़ रही है. चुनाव अभियान के दौरान, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के इमरान खान ने कई सीपीईसी परियोजनाओं में कथित भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी का इल्जाम लगाकर पिछली सरकार की आलोचना की है.
22 जुलाई को वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट से पता चला कि चीनी बिजली कंपनियों को सीपीईसी परियोजनाओं से अपने निवेश पर 34 प्रतिशत वार्षिक रिटर्न की गारंटी दी गई है. वह भी तब, जब पाकिस्तान आर्थिक दिवालियेपन के कगार पर खड़ा है. माना जा रहा है कि नई सरकार आइएमएफ की शरण में जाने को मजबूर होगी (इससे नई सीपीईसी परियोजनाओं पर रोक लग सकती है).
इन घटनाओं ने बीआरआइ को लेकर भारत के शुरुआती संदेह को सही साबित किया है. जनवरी 2016 तक चीनी दूतावास में तैनात कंठ (बीजिं ग ने पहली बार 2015 में बीआरआइ में औपचारिक रूप से शामिल होने के लिए भारत से संपर्क किया था) बताते हैं कि भारत ने तभी कह दिया था कि इस प्रोजेक्ट को लेकर ‘स्पष्टता की कमी’ भारत की मुख्य चिं ता है.
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 2015 में अपने चीनी समकक्ष वांग यी के सामने अपना रुख जाहिर करते हुए कहा था, ‘‘हम समझते हैं कि यह एक चीनी पहल थी—न कि एक बहुपक्षीय पहल—और हमें समय से इसको लेकर पूरी जानकारी विस्तार से नहीं मुहैया की गई थी’’ इसलिए भारत के मन में इस योजना को लेकर गहरे संदेह उभर रहे हैं.
यही कारण है कि भारत ने अगले वर्ष चीन समर्थित एशियाई इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक में शामिल होने में कोई आना-कानी नहीं की.
बीजिंग ने पहली बार इसे बीआरआइ से जुड़े प्रोजेक्ट के रूप में पेश किया तब भारत ने बैंक के अध्यक्ष जिन लिकुन को स्पष्ट कर दिया था कि भारत इसमें केवल तभी शामिल होगा जब यह परियोजना वास्तव में एक बहुपक्षीय परियोजना जैसी दिखेगी.
चीन ने अपनी शुरुआती आनाकानी के बाद भारत के रुख को स्वीकार कर लिया है और बीआरआइ में भारत के शामिल होने के लिए नई दिल्ली पर दबाव डालने की अपनी कोशिशें बंद कर दी हैं.
अधिकारियों का कहना है कि भारत की चिंदताएं चीन की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर हैं जिसे चीन बीआरआइ की आड़ में आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. भारत इसे लेकर सतर्क है और घटनाओं पर नजर बनाए हुए है. फिलहाल तो चीन की यह महत्वाकांक्षी योजना उसके आस-पड़ोस के देशों में ही परेशानी में घिरती नजर आ रही है.
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