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चुनावी चंदा

पार्टी आम आदमी पार्टी की तरह क्राउडसोर्स फंडिंग के जरिए धन जुटाने पर विचार कर रही है.

पंकज नागिया मेल टुडे
पंकज नागिया मेल टुडे
अपडेटेड 23 जनवरी , 2020

कांग्रेस के हाल ही में दिल्ली में हुए महाधिवेशन में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंच से स्वीकार किया कि उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की जरूरत है तो पार्टी के ही एक नेता ने चुटकी ली, ''उन्हें वरिष्ठ नेताओं की जरूरत है, क्योंकि उन्हें पैसे की जरूरत है.''

हाल ही में जब कमलनाथ को मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, तो पार्टी के अंदरूनी हलकों में कयास लगाए गए कि कमलनाथ की धन जुटाने की क्षमता काम कर गई. कांग्रेस के एक महासचिव ने कहा, ''राहुल गांधी को धनाढ्य पुराने नेताओं की जरूरत है, ताकि फंडिंग के संकट से उबरा जा सके.'' संकट इतना गहरा है कि पार्टी की केंद्रीय इकाई अपने नेताओं के बुनियादी खर्चों और उनके भत्तों में कटौती कर रही है.

पार्टी ने कार्यकर्ताओं से सालाना 250 रु. पार्टी को दान देने के लिए भी कहा है. लेकिन 2019 के चुनाव के मद्देनजर ये सारे उपाय 'ऊंट के मुंह में जीरा' की तरह हैं. पार्टी अब आम आदमी पार्टी की तरह क्राउडसोर्सिंग पर विचार कर रही है. 2016-17 के आयकर ब्यौरे में भाजपा ने ऐलान किया कि उसे 1,194 स्रोतों से 532.3 करोड़ रु. का चंदा मिला, वहीं कांग्रेस ने बताया कि उसे 599 स्रोतों से 41.9 करोड़ रु. मिले. पिछले वित्त वर्ष की तुलना में भाजपा के चंदे में 593 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. 2016-17 में भाजपा को कॉर्पोरेट क्षेत्र से 515.4 करोड़ रु. का चंदा मिला, वहीं कांग्रेस को 36.1 करोड़ रुपए.

2017 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा की केंद्रीय समिति ने जहां 98.3 फीसदी धन उपलब्ध कराया था, वहीं कांग्रेस की केंद्रीय समिति इन राज्यों के चुनाव लडऩे के लिए जुटाए गए 96.5 करोड़ रु. में से सिर्फ 36 फीसदी ही उपलब्ध करा सकी. पार्टी अध्यक्ष हालांकि उत्साहित हैं. फरवरी में इंडिया टुडे से बातचीत में उन्होंने कहा था, ''गुजरात में भाजपा ने जितना खर्च किया, हम उसका एक अंश भी खर्च नहीं कर सके, लेकिन हमने कड़ी चुनौती दी.'' क्या कांग्रेस संसाधनों की कमी की भरपाई अपने हौसले से कर पाएगी?

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