पहला दृश्यः 29 अप्रैल को ओडिशा में भाजपा का चेहरा कहे जाने वाले केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कटक में कौशल विकास योजना का उद्घाटन करते हुए अंतरराष्ट्रीय कौशल विकास केंद्र स्थापित करने की घोषणा कर रहे थे, उसी समय कटक के बाराबटी में इनडोर स्टेडियम में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक एक सम्मेलन में राज्य में दक्षता विकास की नई इबारत लिख रहे थे. राजनैतिक हलकों में पटनायक और प्रधान में बयानों और कार्यक्रमों को लेकर चर्चा है.
दूसरा दृश्यः 4 अप्रैल को प्रधान भवानीपटना (कालाहांडी) में नवीन सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान कर रहे थे तो दूसरी ओर उसी रोज पटनायक ने ब्रह्मपुर में चंद्रशेखर साहू, विक्रम पंडा, कांग्रेस जिला अध्यक्ष, 12 कॉर्पोरेटरों समेत 111 लीडर 15,000 से ज्यादा कांग्रेस कार्यकर्ताओं को बीजद में शामिल कराया.
इसे 2019 के चुनाव की तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है. बीजद और भाजपा क्रमशः राज्य व केंद्र में सरकार होने के कारण कार्यक्रमों और विकास के वादों के साथ ही संगठन के स्तर पर भी तैयारी में जुटी हैं.
विधायकों की संख्या के कारण कांग्रेस भले ही राज्य में बीजद के मुकाबले नंबर दो की पार्टी होने का दावा करे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के दौरों को देखते हुए कहा जाने लगा है कि बीजद, भाजपा और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय संघर्ष की संभावना जताई जा रही है.
हाल ही में हुए बिजैपुर विधानसभा उपचुनाव को ओडिशा की राजनीति का बैरोमीटर कहा जा रहा है. इस चुनाव में पूरी ताकत झोंकने के बाद भी भाजपा नंबर दो पर रही और कांग्रेस तो बहुत नीचे चली गई.
अगले साल लोकसभा के साथ ही ओडिशा में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसी के मद्देनजर अभी से राजनैतिक पारा चढ़ रहा है. दलों ने चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं. कांग्रेस प्रदेश संगठन में फेरबदल करते हुए कहा गया कि पुरानी बातें भूल जाओ, नई शुरुआत हो चुकी है.

पार्टी के ओडिशा प्रभारी पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रत्याशियों की सूची तैयार करने में दो माह लगेंगे. भाजपा भी पीछे नहीं है. पिछले हफ्ते 6 मई को भाजपा की ओडिशा कोर कमेटी की बैठक भी चुनावी सिलसिले में हुई जिसमें संगठन की बूथ स्तर तक मजबूती और जून से विधानसभा क्षेत्रवार प्रत्याशियों के चयन की बात कही गई.
उसके अगले दिन सभी 30 जिलों के अध्यक्षों की बैठक हुई. दोनों बैठकों में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और ओडिशा प्रभारी अरुण सिंह मौजूद थे.
पार्टी ने बीते साल 15 अप्रैल को नेशनल एग्जीक्युटिव की भुवनेश्वर में हुई बैठक में पिछड़ा आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की घोषणा की थी.
भाजपा और कांग्रेस की चुनावी तैयारियों को देख बीजद अध्यक्ष और चार बार के मुख्यमंत्री पटनायक ने भी चुप्पी तोड़ दी और कहा कि पार्टी विधानसभा और लोकसभा प्रत्याशियों के नामों को अंतिम रूप दे रही है.
ओडिशा विधानसभा की 147 और लोकसभा की 21 सीटों पर अगले साल चुनाव होना है. पिछला चुनाव बीजू जनता दल के लिए हौसला बुलंद करने वाला रहा.
विधानसभा की 147 में से 117 तथा लोकसभा की 21 में से 20 सीट जीतकर पार्टी ने दमखम दिखाया था. जीत में मदमस्त नवीन पटनायक के मंत्री और विधायक, सांसद शायद भूल बैठे कि अगले चुनाव में भी जनता के सामने जाना है.
नतीजाः 2017 की शुरुआत में जिला परिषद के चुनाव में बीजद मुंह के बल धड़ाम हो गया. भाजपा 36 सीटों से बढ़कर 297 तक जा पहुंची और बीजद 651 से घटकर 473 सीटों पर आ गया. कांग्रेस 128 से घटकर 60 पर जा टिकी. बाकी 38 से सिमटकर 16 पर आ गए.
इस जीत से उत्साहित भाजपा ने 15 अप्रैल, 2017 को नेशनल एग्जीक्युटिव की बैठक भुवनेश्वर में बुला ली. बैठक में प्रधानमंत्री मोदी, अध्यक्ष शाह सहित सभी केंद्रीय मंत्री और भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री पहुंचे.
भुवनेश्वर को पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर राज्यों के विकास का गेटवे तक घोषित कर दिया गया. यही नहीं, खुद मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद चार बार और शाह छह बार ओडिशा आ चुके हैं. शाह का दावा है कि 36,000 बूथों पर भाजपा संगठन खड़ा हो चुका है.

बिजैपुर उपचुनाव में करारी शिकस्त के बाद भी शाह कार्यकर्ताओं की हौसलाअफजाई को ओडिशा आए और कालाहांडी, बलांगीर व भुवनेश्वर में सभा की. जिला परिषद चुनाव में जीत के अद्ध्रसत्य को भाजपा ने शायद पूरा सच मान लिया था, उसका यह भ्रम बिजैपुर उपचुनाव में दूर हो गया होगा.
यह सीट तीन बार से कांग्रेस जीत रही थी पर दिवंगत विधायक की पत्नी को पार्टी में शामिल कराके मैदान मार लिया. भाजपा के प्रवक्ता सज्जन शर्मा कहते हैं, ''यहां तो भाजपा कभी थी ही नहीं उसके बाद भी नंबर दो पर पहुंचकर ग्राफ तो बढ़ाया ही.''
दरअसल, जिला परिषद के चुनाव में केसरिया परचम लहराकर भाजपा की कामयाबी ने पटनायक की नींद उड़ा दी थी.
वे भी शेर की तरह मांद से बाहर आकर ललकारने वालों को जवाब देने लगे. उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपियों को दरवाजा दिखाया.
यही नहीं, बयानों से पार्टी को मुश्किल में डालने वाले वरिष्ठ मंत्री दामोदर राउत को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया. पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में सांसद बैजयंत पंडा को बर्खास्त करने में पटनायक एक पल भी नहीं झिझके.
चुनावी तैयारी के तहत उनका यही कहना है कि जनकल्याण योजनाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार से माइलेज लो. 'आमो गांव, आमो विकास' का नारा बुलंद करने के लिए उन्होंने युवाओं की टीम लगा दी है.
जिलास्तर पर वे संगठन की निगरानी के साथ ही सांसदों और विधायकों का रिपोर्ट कार्ड खुद देख रहे हैं. करीब छह सीटें ऐसी हैं जिन्हें बीजद 2,000 वोटों के अंतर से हारा है.
पटनायक युवाओं को जोडऩे में काफी हद तक कामयाब होते दिख रहे हैं. हॉकी ओडिशा की आत्मा में बसती है. मुख्यमंत्री ने हॉकी वल्र्ड कप आयोजित करने का बीड़ा उठाकर युवाओं की नब्ज पकडऩे की कोशिश की.
बीजद की प्रवक्ता सुलोचना दास कहती हैं, ''वे (मुख्यमंत्री) पश्चिम बंगाल के सीएम ज्योति बसु (21 जून, 1977 से लेकर 6 नवंबर, 2000 तक) और सिक्किम के सीएम पी.चामलिंग का रिकॉर्ड तोडऩे की ओर बढ़ रहे हैं.'' बीजद की चुनावी रणनीति यही है कि पारदर्शिता बरतते हुए विकास को आगे बढ़ाओ.
लोककल्याण के लिए बीजद सरकार का खजाना खोल दिया गया है. पटनायक जनता से जुडऩे का कोई भी अवसर नहीं छोड़ते. पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्र कहते हैं कि कौन कहां से लड़ेगा, यह लगभग तय किया जा चुका है.
इस बार चुनाव में नए और युवा चेहरे बीजद के टिकट पर चुनाव मैदान में देखे जा सकते हैं. सूत्र बताते हैं कि 56 विधायकों और छह सांसदों का टिकट कटना लगभग तय माना जा रहा है. बीजद ने जिला परिषद के चुनाव में शिकस्त के बाद संगठन और मंत्रिमंडल में फेरबदल किया तथा जनता से करीबी बनाकर लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ा लिया.
दरअसल, 2014 से लेकर 2017 तक बीजद थोड़ा सुस्त रहा. इस दौरान भाजपा और कांग्रेस को चिटफंड घोटाला, बढ़ती किसान आत्महत्या, रेप की बढ़ती घटनाओं, महानदी जल विवाद, लोकायक्त नियुक्ति जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने का मौका मिल गया. इन मुद्दों पर सदन तक नहीं चलने दिया गया. लेकिन भाजपा की केंद्र सरकार को निशाने पर लेकर बीजद सरकार भी बखूबी निपटते दिखी.
'आमो गांव, आमो विकास' का नारा लेकर ग्रामीण इलाकों में घुसकर आधार को और भी मजबूत करने के लिए बीजद ने युवा प्रकोष्ठ को आर्थिक लाभ देते हुए सक्रिय किया है. ग्राम पंचायत स्तर तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क तैयार है और सारा डेटा कंप्यूटर में फीड है. विधानसभा और लोकसभा सीट पर कौन लड़ेगा, किस जनप्रतिनिधि की क्या परफॉर्मेंस है, इसका भी लेखाजोखा सिर्फ एक क्लिक से कंप्यूटर की स्क्रीन पर आ जाता है.

संगठन विस्तार की रणनीति के साथ ही पटनायक ने जाने-माने मीडिया घराने के मालिक सौयरंजन पटनाक और कीस में 25 हजार आदिवासी बच्चों को केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा देने वाले तथा मीडिया ग्रुप के मालिक अच्युत सामंत व अभिनेता से नेता बने प्रशांत नंदा को राज्यसभा में भेजा.
यही नहीं, मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त आरुप पटनायक, आकाशवाणी के महानिदेशक रहे गिरिधारी महंति को बीजद में शामिल करके संकेत दिया कि राजनीति ही नहीं, बीजद प्रतिभाओं की भी कद्र करता है. मुख्यमंत्री ने एक बड़ी एजेंसी से सीटवार सर्वेक्षण भी कराया है.
विधानसभा में सीटों के लिहाज से राज्य में नंबर दो की पार्टी कही जाने वाली कांग्रेस के लिए ओडिशा सियासी बियाबान होता जा रहा है.
उसकी हालत किस कदर पतली है यह तो 2019 के चुनाव नतीजे बताएंगे पर पार्टी ने संगठन में बड़ा फेरबदल करके यह दिखाने की कोशिश की है कि पार्टी राज्य में खोया हुआ आधार वापस लाने की मशक्कत में जुट गई है.
राहुल गांधी खुद ओडिशा के संगठन में रुचि ले रहे हैं. हाल ही में ओडिशा प्रभारी बनाए गए पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह कहते हैं कि ऐन मौके पर टिकट घोषित न करके जुलाई तक प्रत्याशियों की घोषणा कर दी जाएगी. हालांकि नए प्रदेश अध्यक्ष निरंजन पटनायक को पार्टी के भीतर से चुनौती मिलने लगी है.
प्रदेश कमेटी में चुनाव घोषणा पत्र समिति के चेयरमैन पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीकांत जेना ने राहुल को पत्र लिखकर कहा है कि पिछड़ों को नेतृत्व में तरजीह मिलनी चाहिए.
कांग्रेस की हालत बीजद-भाजपा गठबंधन (1999) के चुनाव बाद खराब होती गई. हालांकि भाजपा में उतना सुधार नहीं आया क्योंकि बीजद ने कांग्रेस के साथ ही भाजपा को भी खोखला करना शुरू कर दिया.
वोट प्रतिशत के साथ ही सीटें भी घटती गईं. कांग्रेस चुनाव से पहले जिला, ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर पर संगठन खड़ा करने की चुनौती से जूझ रही है. वैसे, कांग्रेस भी जल्दी अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर देगी. प्रदेश अध्यक्ष निरंजन कहते हैं, ''कांग्रेस का आधार मजबूत है. उसे प्रत्याशी चयन में मुश्किल नहीं होगी. प्रत्याशियों की सूची को अंतिम रूप देने में छह माह लगेंगे.''
भाजपा का 'आमा बूथ, सबुथू मजबूत' का नारा कारगर होता नहीं दिख रहा. पार्टी अध्यक्ष शाह अपने भाषण की शुरुआत 'मेरे बूथ के मालिकों' से करते हैं. बड़े नेताओं की बूथ प्रवास योजना को भाजपा की गुटबाजी ने पलीता लगा दिया है. केंद्रीय नेतृत्व ने ओडिशा पर विशेष ध्यान दिया है.

अगर 2019 के चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन संतोषजनक न रहा तो सबसे ज्यादा किरकिरी अमित शाह की होगी. प्रदेश संगठन मंत्री शारदा सत्पथी को हटाकर मानसरंजन महंति को लाया जाना आरएसएस के हस्तक्षेप का सीधा संकेत माना जा रहा है. यही नहीं, सूत्रों की मानें तो प्रभारी महासचिव को भी चुनाव से पहले बदला जा सकता है. राम माधव का नाम चर्चा में है.
वे जल्दी ही ओडिशा के प्रभारी बनाए जा सकते हैं. हाल ही में ओडिशा के दो प्रमुख नेताओं ने उनसे दिल्ली में भेंट की है. प्रदेश अध्यक्ष बसंत पंडा का पद डगमगाने लगा है हालांकि वे कहते हैं, ''प्रत्याशी चयन भी समय पर होगा. फिलहाल पूरा जोर संगठन मजबूती, बूथ कमेटियों पर है.
केंद्र की योजनाएं जनता तक ले जाने का लक्ष्य है.'' सूत्र बताते हैं कि चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष भी बदले जा सकते हैं. और तो और, राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ओडिशा की राजनीति में चुनाव से पूर्व एंट्री मार सकते हैं. विजय महापात्रा, दिलीप राय, दुर्योधन माझी हाशिये पर हैं. फिलहाल तीनों दल 2019 की तैयारी के साथ ही इस साल होने वाले शहरी निकायों के चुनाव की तरफ भी नजर गड़ाए हैं.
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