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भाजपा ने शुरू की कवायद ताकि न खिसके वोट

दलित आंदोलन के बाद भाजपा को सिर्फ दलित वोट बचाने की ही चिंता नहीं है, बल्कि पार्टी हिंदुत्व समर्थक वोट के बंटने का खतरा भी महसूस करने लगी है जिससे बचाने के लिए बने बेहिसाब कार्यक्रम.

असहज से भाजपा संसदीय दल की बैठक में पार्टी के नेतागण
असहज से भाजपा संसदीय दल की बैठक में पार्टी के नेतागण
अपडेटेड 11 जून , 2018

अप्रैल की 6 तारीख को भाजपा संसदीय दल की बैठक से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिह ने आश्वस्त किया कि दलित आंदोलन थम गया तो उनका सवाल था, '' क्या मुद्दा भी थमता दिख रहा है?''

इससे पहले कि गृह मंत्री कुछ कहते, प्रधानमंत्री ने कहा, ''सरकार का मुद्दा विकास है. अगर यह नहीं थमा तो बाकी मुद्दे खुद ही थम जाएंगे.'' इसके बाद संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री ने खुद ही सांसदों को अपने क्षेत्र में जाकर सरकार की तरफ से किए जा रहे विकास कार्यों के बारे में लोगों को जागरूक करने को कहा.

सांसदों से कहा गया कि सरकार की जितनी भी योजनाएं हैं,? उसके बारे में लोगों को न सिर्फ बताएं, बल्कि योजना का लाभ लेने में किसी को दिक्कत हो रही है या कोई शिकायत है तो उसे दूर करने की कोशिश करें. सांसदों को दलित बहुल इलाके में रात बिताने को भी कहा गया.

संसदीय दल की बैठक खत्म होने के बाद 6 अप्रैल की रात को ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भाजपा मुख्यालय में देर रात तक कार्यक्रम और इसकी रूपरेखा को अंतिम रूप दिया गया. अगले दिन 7 अप्रैल को जिस वक्त कार्यक्रम की बाबत भाजपा के जनप्रतिनिधियों को सूचना दी जानी थी, उससे महज कुछ घंटे पहले ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की प्रधानमंत्री से बातचीत हुई.

इसके बाद कार्यक्रम में एक ऐसा फैक्टर जोड़ा गया, जिसका लक्ष्य एसटी/एससी वर्ग के लोगों के स्वाभिमान के साथ पार्टी को खड़ा दिखाना है.

लिहाजा, 14 अप्रैल से 5 मई के बीच चलने वाले कार्यक्रम को 11 अप्रैल से 5 मई कर दिया गया. सभी सांसदों से कहा गया कि वे 11 अप्रैल को अपने क्षेत्र में जाएं और ज्योतिबा फुले की जयंती को समता दिवस के रूप में मनाएं. इसके बाद बाबा साहेब आंबेडकर के जन्मदिन 14 अप्रैल से मूल कार्यक्रम को जमीनी स्तर तक ले जाएं.

बात यहीं नहीं रुकी. दलितों के स्वाभिमान को राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ जोड़ने की जरूरत महसूस की गई. लिहाजा, 11 मई की तारीख तय की गई. इस दिन परमाणु विस्फोट के 20 साल पूरे हो रहे हैं. कार्यक्रम का औपचारिक समापन 11 मई को युवा शक्ति सम्मेलन के साथ किया जाना तय हुआ.

भाजपा ने यह कार्यक्रम उस वक्त तय किया है जब कर्नाटक चुनाव सिर पर है. भाजपा महासचिव अरुण सिंह कहते हैं, ''चुनाव तो होते रहते हैं. सरकार और संगठन का लक्ष्य है अंतिम लोगों तक विकास की रोशनी पहुंचाना.

मोदीजी की सरकार आम लोगों के लिए कितनी गंभीर है, इस तरह के कार्यक्रम से पता चलता है. केंद्र सरकार ने विकास के बड़े काम बड़े पैमाने पर किए हैं इसलिए हम हिम्मत के साथ लोगों के बीच जा रहे हैं.'' वे इस बात से इनकार करते हैं कि इसमें कोई सियासत है. हालांकि भाजपा के ही कई वरिष्ठ नेता परोक्ष रूप से मानते हैं, ''पिछले कुछ महीनों से सरकार को लेकर जो फीडबैक मिल रहे हैं, वह चिंता की बात है.

सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया के जरिए भी जो जानकारी मिल रही है, उसको लेकर आंख मूंदे रखना ठीक नहीं है. इसे सरकार में शामिल लोग और संगठन का नेतृत्व भी समझ रहा है. पार्टी और सरकार को दूसरे माध्यमों से भी जानकारी मिल रही है.''

भाजपा महासचिव अनिल जैन कहते हैं, ''विपक्षी दल खासकर कांग्रेस, केंद्र सरकार और भाजपा-संघ के खिलाफ झूठा प्रचार कर रही है. लोगों को गुमराह कर रही है. ऐसे में सरकार और संगठन दोनों का काम है कि इस झूठे प्रचार का जवाब प्रामाणिकता से दिया जाए.''

हालांकि भाजपा के लोग औपचारिक रूप से चाहे कुछ भी कहें, पार्टी के सभी जन-प्रतिनिधियों को आनन-फानन महीने भर के कार्यक्रम में सक्रिय करना अनायास नहीं है. भाजपा सूत्रों का कहना है कि जिस तरह से दलित आंदोलन के बाद पार्टी के बाहर और अंदर से भी विरोध के स्वर सामने आए, उससे साफ संकेत मिला कि दलित वोट छिटकने से बड़ी चिंता हिंदू वोट के दो फाड़ होने की है.

जिस तरह से पार्टी के दलित सांसद मुखर होकर सरकार और पार्टी के खिलाफ आग उगलने लगे हैं, उसकी प्रतिक्रिया में कहीं अगड़ी जाति के सांसद, दलित सांसदों के खिलाफ लामबंद न होने लगें.

बिहार में जिस तरह से 10 अप्रैल को अगड़ी जाति की तरफ से बंद का आयोजन किया गया, वह खरतनाक संकेत है. सोशल मीडिया में दलितों और गैर-दलितों के बीच खाई खुलकर दिखने लगी है. ऐसे में हिंदी पट्टी में 2019 में भाजपा का सियासी समीकरण बिगड़ सकता है.

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा जैसे राज्यों में भाजपा मुश्किल में फंस सकती है. इन राज्यों से भाजपा की कुल 162 लोकसभा सीटें आती हैं. भाजपा महासचिव भूपेंद्र यादव स्वीकार करते हैं, ''विपक्षी दल इस कोशिश में हैं कि जाति के नाम पर समाज को बांट दिया जाए ताकि सियासी फायदा उठाया जा सके.''

हालंकि वे यह भी जोड़ते हैं कि विपक्ष की चाल सफल नहीं होगी, क्योंकि मोदी सरकार सबके विकास का मुद्दा लेकर चल रही है. वे बताते हैं, ''14 अप्रैल से लेकर 5 मई तक के जो कार्यक्रम हैं, वे किसी एक जाति या समुदाय के लिए नहीं हैं. मोदी सरकार की योजनाओं का लाभ समाज के सभी वर्गों को मिला है.

इस कार्यक्रम में सभी समुदाय के लोग शामिल होंगे और जो कार्यक्रम के दौरान लाभार्थी होंगे, वे समाज के सभी वर्गों के लोग होंगे. हम यह संदेश देने में सफल रहेंगे कि भाजपा और मोदी सरकार की प्राथमिकता में सभी हैं, चाहे वह किसी भी समुदाय या धर्म से ताल्लुक रखता हो.''

भाजपा सूत्रों का कहना है कि इन कार्यक्रमों के जरिए मोदी और शाह की जोड़ी दलित बनाम अन्य की बहस को विराम देने का मन बना चुकी है. मोदी का मंत्र है, ''विकास का मुद्दा नहीं थमा तो अन्य मुद्दे खुद ही थम जाएंगे.''

मतलब यह है कि सरकारी योजनाओं की इतनी जोरशोर से चर्चा शुरू कर दो कि दूसरे मुद्दे खुद ही ढक जाएं. इसके लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, कौशल विकास मंत्रालय को ग्राम स्वराज अभियान में शामिल किया गया है.

चुनौती सबसे पहले दलितों को दोबारा साधने की है इसलिए 14 अप्रैल को भीमराव आंबेडकर की जयंती को सामाजिक न्याय दिवस के रूप में मनाया जाएगा और खुद प्रधानमंत्री मोदी इस दिन देश को संबोधित करेंगे.

18 अप्रैल को स्वच्छ भारत पर्व मनाया जाएगा. 20 अप्रैल को उज्ज्वला योजना के तहत लाभार्थियों को गैस सिलेंडर वितरित किए जाएंगे. 28 अप्रैल को प्रधानमंत्री आवास योजना और प्रधानमंत्री सौभाग्य योजना के तहत नए लाभार्थियों के नाम घोषित किए जाएंगे. इसी तरह चिकित्सा बीमा योजना के लाभार्थियों के नाम घोषित होंगे और कौशल विकास केंद्र खोलने की घोषणा भी होगी.

इसके अलावा 20,000 से अधिक ऐसे गांवों में जहां दलितों की आबादी 50 फीसदी के आसपास है, वहां भाजपा नेता और मंत्री रात्रि विश्राम करेंगे. जिन जगहों पर गैर-दलित अधिक हैं, वहां भी सांसदों को एक रात अपने क्षेत्र के किसी गांव में रात्रि विश्राम करने और गांव-चैपाल आयोजित करने को कहा गया है.

भाजपा की यह पूरी कवायद संघ के लिहाज से भी जरूरी है. आरएसएस के नेता कहते हैं कि युवा, किसान, महिला और दलित बड़े पैमाने पर केंद्र सरकार से छिटकने लगे हैं. हर समन्वय बैठक में इसका जिक्र संघ के स्वयंसेवक करते रहे हैं.

इस चिंता से भाजपा को भी अवगत कराया जाता रहा है, लेकिन हालात सुधरे नहीं. जब महाराष्ट्र में किसानों ने बड़ा आंदोलन (मार्च) किया और दलित आंदोलन पिछले दिनों जिस बड़े पैमाने पर हुआ, उसने संघ प्रचारकों की बात को सही साबित किया.

भाजपा अगर पहले इस दिशा में काम करती तो स्थिति बेहतर होती. अब मामला आर-पार का है. सो, भाजपा और सरकार, दोनों सक्रिय हैं. लेकिन संघ का मानना है कि स्थिति को संभालने में काफी देर हो गई है.

समाज के एक वर्ग को साधने में अगर मामूली चूक हुई तो मामला बनने की जगह और बिगड़ सकता है. भाजपा भी यह जानती है कि साधने से एक वर्ग तो सध सकता है लेकिन सभी को साधने के लिए जिस राष्ट्रीय भावना की जरूरत है वह फिलहाल न तो मंदिर मुद्दे में है, न ही 'अच्छे दिन' के नारे में. सो, पार्टी नया शिगूफा लेकर आई है परमाणु विस्फोट जयंती (युवा शक्ति सम्मेलन).

11 मई को यह दिवस पोकरण परमाणु परीक्षण (पार्ट-2) के 20 साल पूरा होने के उपलक्ष्य में मनाया जाएगा. इस उम्मीद में कि शायद कर्नाटक में 12 मई के मतदान में यह दिवस कोई भूमिका अदा कर दे.

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