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फौलादी नारियों का सम्मान

मध्य प्रदेश ने महिलाओं को सशक्त करने के कदम बहुत पहले उठा लिए थे. यहां लाडली लक्ष्मी योजना बहुत पहले से लागू है.  एमपी के सीएम का मतलब चीफ मिनिस्टर नहीं कॉमन मैन भी है.

पुष्पा बेरी, ममता शर्मा, संपतिया उइके, शिवानी तनेजा, बासु कन्नौजिया
पुष्पा बेरी, ममता शर्मा, संपतिया उइके, शिवानी तनेजा, बासु कन्नौजिया
अपडेटेड 9 अप्रैल , 2018

वहां कामयाबी की मंजिलें छूने वाले कुछ संजीदा और भावुक किस्से थे और गंभीर बहस भी, लेकिन साथ ही आइटम गानों पर थिरकती और खिलखिलाती महिलाएं भी थीं. भोपाल में 30 मार्च को आयोजित इंडिया टुडे वूमन समिट ऐंड अवॉड्र्स के दूसरे संस्करण में बड़े यादगार पल रहे. फिल्मों में कामयाबी का परचम लहरा चुकी गायिका ममता शर्मा ने वहां मौजूद दर्शकों को सीट पर बैठे-बैठे झूमने के लिए मजबूर कर दिया.

लेकिन आयोजन की असली नायिकाएं थीं वो छह महिलाएं, जिनमें गायिका ममता शर्मा भी शामिल थीं, जिन्होंने मुश्किलों का सामना करके न सिर्फ कामयाब मुकाम हासिल किया, बल्कि समाज को भी नई दिशा दिखाई.

आयोजन में शिरकत करने पहुंचीं मध्य प्रदेश की महिला और बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस ने 'संघर्ष को नए तरह से पारिभाषित किया तो विधानसभा अध्यक्ष सीतासरन शर्मा ने नारी शक्ति के ऐसे सम्मान के लिए इंडिया टुडे की तारीफ की.

पुरस्कार और बातचीत के लिए इंडिया टुडे ने उन संघर्षशील महिलाओं को खोज निकाला, जिन्होंने तमाम बाधाओं को पार करने का माद्दा दिखाया था. चर्चा सत्र में बात करने के लिए बचपन में भेड़-बकरियां चराने से लेकर कृषि वैज्ञानिक बनने तक का सफर तय करने वाली डॉ. सरोज थीं, तो दिव्यांगता की वजह भारतीय विदेश सेवा में चयन न होने के बाद अपने हक की लड़ाई लडऩे वाली श्वेता बंसल भी.

पुरस्कार पाने वाले छह विजेताओं में पापड़ से कामयाबी का किस्सा लिखने वाली जबलपुर की कारोबारी पुष्पा बेरी, जनजातीय आबादी के हकों की आवाज उठाने और उनकी सांस्कृतिक विरासत को फिर से जीवित करने में अगुआई करने वाली राज्यसभा सांसद संपतिया उइके, जंगलों में अवैध शिकार और अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने वाली बासु कन्नौजिया, वंचित दलित, आदिवासी और मुस्लिम बच्चों को अपराधों और यौन उत्पीडऩ से बचाकर उनमें तालीम की लौ जलाने वाली शिवानी तनेजा, और कम संसाधनों के बीच निशानेबाजी का अपना हुनर निखारकर सोने-चांदी के पदकों पर निशाना साधने वाली चिंकी यादव और सोने जैसी खरी आवाज वाली ममता शर्मा भी थीं.

अपने स्वागत भाषण में ही इंडिया टुडे के संपादक अंशुमान तिवारी से कहा, ''आज समाज में आगे बढ़ती महिलाओं में साधारण पृष्ठभूमि और समाज के उपेक्षित तबके से आने वालों की संख्या अच्छी-खासी है. इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्टस के जरिए भारतीय महिलाओं की इन सफलताओं को सामने लाने में हमेशा सक्रिय भूमिका निभाई है, अब हम एक कदम आगे बढ़कर उनकी सफलता को अभिनंदन का मंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं.''

महिलाओं के अवसर और रोजगार

समिट के पहले सत्र में परिचर्चा के  विषय 'अवसर और रोजगार' में ऐसी महिलाओं ने हिस्सा लिया जिन्होंने अपने-अपने तरीकों से समाज में अलग मुकाम बनाया है. इसमें कांग्रेस प्रवक्ता शोभा ओझा, वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (वीआइटी), भोपाल की वाइस प्रेसिडेंट कादंबरी एस. विश्वनाथन, भारतीय वन सेवा की बासु कन्नौजिया और आइसेक्ट की डायरेक्टर, एचआर ऐंड मार्केटिंग, पल्लवी राव चतुर्वेदी शामिल थीं.

कांग्रेस प्रवक्ता शोभा ओझा ने कहा, ''हमें यह नहीं सोचना है कि महिला हैं तो हम कमजोर हैं बल्कि यह सोचना है कि हम सबसे ज्यादा मजबूत हैं. हम घर का भी काम कर सकते है और बाहर का भी.'' वीआइटी की कादंबरी एस. विश्वनाथन ने सलाह दी, ''चुनौतियां जीवन का हिस्सा है, हमें इनका सामना करना चाहिए और जीवन में महिलाओं को बैलेंस बनाकर चलना चाहिए.''

भारतीय वन सेवा की अफसर बासु कन्नौजिया ने बताया कि किस तरह से उन्हें 750 हेक्टेयर जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने और 47 अवैध वाहन जंगल में बरामद करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा. उन्होंने बताया, ''महिलाओं को देखकर धारणा बन गई है कि अरे, यह तो महिला है.

यह कर पाएंगी कि नहीं. मैं यह धारणा तोडऩा चाहती थी.'' ड्यूटी के दौरान वन माफिया के खिलाफ लड़ाई के समय कई बार विभाग के भीतर तो कई बार बाहर से भी दबाव जैसी परेशानियां आती रहीं, लेकिन वह अपने कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटी. डॉ. पल्लवी ने पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर कम होने पर महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा, ''अगर महिलाएं दौड़ में हिस्सा ही नहीं लेंगी तो आगे कैसे बढ़ेंगी. आगे बढऩा है तो महिलाओं को गेम प्ले करना पड़ेगा. पुरुषों से मुकाबला करना ही होगा.''

मेरी सफलता, मेरी कहानी

दूसरे सत्र में दर्शक ऐसी शख्सियतों से रू-ब-रू हुए जिनके पास खुद एक मशाल बनकर दूसरे के लिए मिसाल बनने का रोमांचक किस्सा था. 'मेरी सफलता, मेरी कहानी' सत्र में इंडिया टुडे के संपादक अंशुमान तिवारी ने जब श्वेता बंसल, महंत दिव्या गिरि और डॉ. सरोज से लोगों का परिचय कराया तो हॉल तालियों से गूंज उठा.

इनमें से एक श्वेता बंसल के लिए दिव्यांगता आइएएस अफसर होने के बाद मनपसंद काडर हासिल करने के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई तो उन्होंने इसके खिलाफ लंबी लड़ाई शुरू की. उन्होंने कहा, ''मैं चाहती थी कि मेरी लड़ाई का फायदा न सिर्फ मुझे मिले पर मेरे बाद आने वालों को भी मिले जो मेरी तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं. कोर्ट से हम ऐसा आदेश कराने में सफल रहे. यही मेरी सबसे बड़ी जीत है.''

दूसरी वक्ता डॉ. सरोज कभी भेड़-बकरियां चराती थीं, लेकिन आज वह कृषि वैज्ञानिक हैं. बचपन में उनको स्कूल पढऩे की बजाए अपने दो भाइयों को स्कूल तक लाने-ले जाने लिए भेजा जाता था. पर उनकी लगन देखकर शिक्षक ने उन्हें क्लास में बुला लिया.

आज वे गुजरात में कृषि वैज्ञानिक हैं और उनके कई शोध-पत्र देश-विदेश में प्रकाशित हो चुके हैं. डॉ. सरोज ने कहा, ''मैं अपने पेपर की जरिए किसानों को हर तरह की मदद उपलब्ध कराती हूं. किस तरह की खेती की जा सकती है और किस तरह की मदद सरकार से ली जा सकती है.'' फिल्म अभिनेत्री सुष्मिता सेन से प्रेरणा लेकर उन्होंने एक लड़की को गोद भी लिया है और एक बेटे की मां भी है.

देश की पहली महिला पुरोहित बनने वाली महंत दिव्या गिरि मुंबई में पैथोलॉजी लैब खोलना चाहती थीं, पर मन अध्यात्म की तरफ खिंच गया. संन्यास का फैसला आसान नहीं था. घरवालों के बाद संतों ने संन्यास की दीक्षा देने में आनाकानी की.

लेकिन अब महंत दिव्या गिरि न सिर्फ लखनऊ के मनकामेश्वर मठ की महंत हैं, बल्कि उन्होंने जड़ परंपराओं के बीच कुछ नई कोशिशें भी की हैं. मसलन, उन्होंने व्यवस्था दी है कि महिलाओं पीरियड्स के दौरान भी पूजा कर सकती हैं. उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा, ''पीरियड (माहवारी) के दौरान पूजा नहीं करने का कोई दबाव नहीं है.'' उन्होंने कहा कि महिला कमर के नीचे से ही जननी होती है. वह अशुद्ध कैसे हो सकती है? महंत दिव्या गिरि ने इसके अलावा मनकामेश्वर मठ में शिवलिंग का जलाभिषेक गंगाजल की बजाए गोमती के जल से करने की परंपरा की शुरुआत की है.

जब जम गई महफिल

वूमन समिट का तीसरा सत्र, 'मेरी यात्रा' वाकई धूम-धड़ाके से भरा था. मशहूर पाश्र्वगायिका ममता शर्मा दर्शकों के बीच बैठी ही थीं कि मंच पर पहुंचकर महिलाओं की टोली ने उनके हिट गानों, मुन्नी बदनाम हुई और अनारकली डिस्को चली पर डांस करना शुरू कर दिया.

बारह भाषाओं में गाने वाली ग्वालियर के बेटी ममता शर्मा ने गीत-संगीत के हल्के-फुल्के पलों के बीच अपने संघर्ष के दिनों को याद किया, जब उनको जगरातों और डांडिया समारोह में स्टेज पर गाना पड़ा था और गाने से उनकी पहली कमाई महज 50 रु. की थी.

सिर्फ आइटम सांग गाने के सवाल पर उन्होंने कहा, ''संगीत तो संगीत है. मेरे लिए गाना महत्वपूर्ण है. कम से कम ऐसे गानों के जरिए कुछ लोग सब कुछ भुलाकर झूम उठते हैं, मुस्करा उठते हैं. मेरे लिए यही मेरी कामयाबी है.'' बाद में ममता ने ऐसा कर भी दिखाया. इंडिया टुडे के संपादकीय समूह के वरिष्ठों को उन्होंने मंच पर बुलाकर गाने को मजबूर कर दिया.

कार्यक्रम के आखिर में इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने कहा, ''इंडिया टुडे वूमन समिट ऐंड अवॉड्र्स में महिलाओं की बौद्धिक, भावनात्मक और पेशेवर सफलताओं को सम्मानित किया जाता है. और यहां बेहद कामयाब महिलाओं की प्रेरणास्पद कहानियों, उनकी कठिन परिस्थितियों से जूझने की इच्छाशक्ति और सृजनात्मकता पर चर्चा की जाती है.''

मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सीतासरन शर्मा और महिला और बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस की मौजूदगी में पुरस्कार वितरण समारोह और भी यादगार हो गया जब एक विजेता और समाजसेवी शिवानी तनेजा मंच पर अपने साथ एक बुजुर्ग महिला को ले गईं. इसी तरह के साहस और दृढ़ निश्चय की कई कहानियों को साझा करता यह समिट यादगार बन गया.

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