भारतीय फौजियों के लिए बख्तरबंद युद्धक वाहन के निर्माण से संबंधित परियोजना एक दशक से भी ज्यादा समय से साउथ ब्लॉक में नौकरशाही की भूल-भुलैया में चालकविहीन कार की तरह भटक रही है. 2009 के बाद से फ्यूचरिस्टिक इंफैन्ट्री कॉम्बेट व्हीकल (एफआइसीवी) नामक 60,000 करोड़ रु. की यह परियोजना दो बार बड़े वादों के साथ शुरू की जा चुकी है, लेकिन इसकी छोटी प्रतिकृति के निर्माण के लिए लोहे को तराशे जाने से पहले ही यह बाधित हो गई.
आइसीवी ऐसे बख्तरबंद वाहन होते हैं, जो सुसज्जित पैदल सेना को युद्ध भूमि तक ले जा सकते हैं. ये केवल बख्तरबंद से सुरक्षित ही नहीं होते, बल्कि तोप और तोपरोधी मिसाइलों और भारी मशीनगन से लैस होते हैं, ताकि साथ चल रही पैदल सेना को मदद कर सकें.
हालांकि एफआइसीवी परियोजना अभी युद्धभूमि का अपना पहला चरण यानी नौकरशाही को ही पार नहीं कर सकी है. परियोजना की शुरुआत 2009 में की गई और 2012 में इसे खत्म कर दिया गया. इसके बाद 2015 में इसे फिर शुरू किया गया और अभी मार्च, 2018 में इसे रक्षा मंत्रालय के डिफेंस प्रोडक्शन बोर्ड (डीपीबी) की मंजूरी का इंतजार है.
डीपीबी को अभी तय करना है कि इसे कौन सी एजेंसी विकसित करेगी. जिन पांच निजी कंपनियों ने निविदा भरी थी, उनमें से दो कंपनियों का चयन करना है, ताकि वे सरकारी ऑर्डिनेंस फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी) के साथ मिलकर एफआइसीवी की दो भिन्न प्रतिकृति का निर्माण कर सकें.
रक्षा मंत्रालय ने दस कंपनियों को न्योता दिया था, जिनमें से छह कंपनियों ने मंत्रालय के 2015 के ईओआइ (एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट) यानी आमंत्रण को स्वीकार किया. ये कंपनियां थीं एल ऐंड टी, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा, पीपावाव डिफेंस, ओएफबी और टाटा पावर की संयुक्त कंपनी एसईडी-टीटागढ़ वैगन्स, टाटा मोटर्स और भारत फोर्ज लिमिटेड.
पिछले नवंबर में रक्षा मंत्रालय ने इनमें से पांच कंपनियों की अंतिम सूची तैयार की. उसके बाद से डीपीबी की पिछले साल सितंबर, नवंबर और इस वर्ष मार्च में तीन बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन अभी दो कंपनियों पर मुहर लगनी बाकी है. यानी परियोजना अभी वहीं है, जहां से शुरू हुई थी.
एफआइसीवी का आदेश जारी होने से पहले कम से कम तीन महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने हैं—निजी क्षेत्र की एजेंसियों की शिनाख्त, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार किया जाना और अंत में दो प्रतिकृतियों में से एक का अंतिम रूप से चयन. इस प्रक्रिया में सात वर्ष का समय लग सकता है.
एफआइसीवी के लिए 2009 में शुरू की गई प्रक्रिया के तहत तो 2017 में उत्पादन शुरू हो जाना था. अभी तीन साल की देरी का मतलब है कि एफआइसीवी का आदेश अब वर्ष 2024 के आसपास ही जारी किया जा सकता है. रक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी बताते हैं कि इस समय जो बाधा नजर आ रही है उसके पीछे छांटी गई पांच कंपनियों में से एक की ओर से की गई शिकायत है.
पिछले साल महिंद्रा डिफेंस सिस्टम ने रक्षा मंत्रालय से उन तीन कंपनियों को अयोग्य ठहराने का आग्रह किया था, जिनकी वित्तीय स्थिति में अनियमितता देखी गई थी. यह मामला नवंबर, 2017 में स्वतंत्र विशेषज्ञ निरीक्षकों (आइईएम) के एक दल को सौंपा गया था, जिसने इस शिकायत को बेदम पाया.
हालांकि परियोजना उसके बाद भी आगे नहीं बढ़ी. इस दौड़ में शामिल निजी क्षेत्र की कंपनियां बेचैन हो चुकी हैं. उनका कहना है, "आप रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनियों को ताजा आदेशों से लाद दे रहे हैं और निजी क्षेत्र को भविष्य का ऐसा आदेश दिखा रहे हैं, जिसे जमीन पर उतरने में दशकों लग जाएंगे.'' इस बीच, सेना का कहना है कि पाकिस्तान और चीन के खिलाफ लड़ाई की स्थिति में आइसीवी उसकी रणनीति के लिए बेहद अहम हैं.
बख्तरबंद वाहनों को पश्चिमी मोर्चे पर रेगिस्तानी और मैदानी इलाके के साथ ही पाकिस्तान के भीतर और हिमालयी सरहदों और चीन के विरुद्ध तिब्बत के पठार में बख्तरबंद बेड़े में शामिल किया जाना है. सेना के पास 49 यंत्रीकृत पैदल बटालियन है, इनमें से प्रत्येक के पास 51 बीएमपी-2एस (बख्तरबंद वाहन) हैं. सोवियत शैली के इन आइसीवी को 38 साल पहले 1980 में शामिल किया गया था और इनका निर्माण लाइसेंस के तहत अब तेलंगाना में स्थित मेडक में किया गया था.
सेना इस साल से बीएमपी-2एस को बदलने का काम शुरू करेगी. एफआइसीवी अभी कहीं नजर नहीं आ रहे हैं और न ही इन्हें विकसित करने का फंड है, यह अहम इसलिए है, क्योंकि यह माना गया था कि रक्षा मंत्रालय परियोजना की लागत का 90 फीसदी खर्च वहन करेगा और बाकी हिस्सा निजी क्षेत्र करेंगे. इस साल रक्षा बजट में प्रतिकृतियों के निर्माण के लिए सिर्फ 142.85 करोड़ रु. आवंटित किए गए हैं, जिसने स्वदेशी परियोजनाओं पर एक और प्रश्नचिन्ह लगा दिया है.
13 मार्च को लोकसभा में रखी गई रक्षा मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्ट में सैन्य सेवा के उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद का यह बयान दर्ज किया गया है, "हम इन योजनाओं के जरिए सेना के लिए फ्यूचर रेडी कॉम्बेट व्हीकल (एफआरसीवी) और एफआइसीवी के निर्माण का इंतजार कर रहे हैं. हालांकि जिस तरह के बजट का आवंटन हुआ है, इसमें कुछ वर्षों की देरी हो सकती है. मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि इनका भविष्य क्या होगा...''
नौकरशाही की वजह से हो रही यह देरी उच्च प्रौद्योगिकी वाली तीनों "निर्माण'' परियोजनाओं को प्रभावित कर रही है, एक दशक के दौरान निजी कंपनियों को जिनकी पेशकश की गई है. इत्तफाक से श्निर्माण्य परियोजनाएं सरकार के अग्रणी अभियान "मेक इन इंडिया'' से भी आगे निकल गई है, क्योंकि यहां रक्षा मंत्रालय शोध का खर्च उठा रहा है और स्वामित्व वाली रक्षा प्रणाली का निर्माण कर रहा है.
सेना की तीनों इकाइयों, बख्तरबंद, गोलाबारूद और पैदल सेना को आपस में जोडऩे के लिए प्रस्तावित 70,000 करोड़ रु. की बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम (बीएमएस) फंड के अभाव में आगे नहीं बढ़ पा रही है.
18,000 करोड़ रु. का टैक्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम (टीसीएस), जो कि दुश्मन के क्षेत्र में प्रतिरक्षा दल को संचार संपर्क मुहैया कराएगा, पिछले साल से अंतिम चरण में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी के पास निर्णय के अभाव में लटका हुआ है.
और एफआइसीवी को तो अभी परियोजना विकास के चरण से गुजरना है. इसका पहला प्रयास 2012 में नाकाम हो गया, क्योंकि सेना के मुताबिक, आइपीएमटी और अधिग्रहण इकाई के बीच ईओई को लेकर कोई तारतम्य नहीं था.
रक्षा मंत्रालय ने यह कहते हुए इसे रद्द कर दिया कि वह इसे नौ महीने में फिर से शुरू करेगा. यह 2015 में इसके फिर से शुरू होने से तीन साल पहले की बात है. मौजूदा अवरोध के कारण परियोजना में तीन साल की और देरी होगी.
दरअसल सैन्य बल सोवियत जमाने के अपने सैन्य साजो-सामान को बड़े पैमाने पर बदलना चाहते हैं, भारतीय उद्योग जगत सैन्य साजो-सामान के उत्पादन में बड़ा हिस्सा चाहता है, जिस पर अभी रक्षा संबंधी सरकारी उपक्रमों का एकाधिकार है. राजनैतिक व्यवस्था शर्मिंदा करने वाली इन सुर्खियों से निजात पाना चाहती है कि भारत दुनिया का हथियारों का सबसे बड़ा आयातक बन गया है.
मगर वर्षों से कुछ भी नहीं बदला है, सिवाय इसके कि 2009 में जहां परियोजना की लागत 26,000 करोड़ रु. थी वह बढ़कर आज 60,000 करोड़ रु. हो गई है. प्रतिरक्षा का यह सबसे बड़ा अकेला अनुबंध है, लेकिन आगे नहीं बढ़ पा रहा है. 13 मार्च को स्टॉकहोम इंस्टीट्यूट ऑफ पीस ऐंड रिसर्च इंटरनेशनल ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि भारत दुनिया का हथियारों का सबसे बड़ा आयातक है और वह 2007 से 2017 के दौरान वैश्विक स्तर पर हुए हथियारों के हस्तांतरण का 12 फीसदी का हिस्सेदार था.
सरकार की मेक इन इंडिया पहल रक्षा उद्योग के मामले में अनेक कारणों से सिरे नहीं चढ़ रही है, इनमें से सबसे बड़ा कारण है, एफआईसीवी, बीएमएस और टीसीएस जैसी उच्च स्तरीय स्वदेशी परियोजनाओं को जमीन पर उतारने की अक्षमता. भारतीय उद्योग पर इस परियोजना का व्यापक असर पड़ सकता है. सेना ने संकेत दिए हैं कि मोटे तौर पर एक एफआइसीवी की लागत बीस से तीस करोड़ रुपए के बीच बैठेगी.
इसका 60 फीसदी स्थानीय उद्योग से आएगा, यानी परियोजना के डेवलपर्स से. यहां तक कि इंजन और ट्रांसमिशन जैसे महत्वपूर्ण आयातित हिस्से, जो कुल आयातित पुर्जों का 40 फीसदी है, उनका निर्माण भी आखिरकार देश के भीतर हो सकता है. फिलहाल एफआइसीवी कागजों पर है और भारत में स्वदेशी हथियारों की राह में वित्तीय या प्रौद्योगिकी नहीं बल्कि नौकरशाही बाधा है.
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