जब 9 सितंबर को देर रात दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्रसंघ चुनाव के नतीजे साफ होते जा रहे थे, भाजपा समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के नेताओं का उत्साह ठंडा पड़ता जा रहा था. दूसरी तरफ विपक्षी लेफ्ट यूनिटी जश्न में सराबोर था. लेप्ट यूनिटी की अध्यक्ष पद की उम्मीदवार और ऑल इंडिया स्टुडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की गीता कुमारी ने जीतने के तुरंत बाद कहा, ''वाइस चांसलर खबरदार!'' गीता ने महज जेएनयू के कुलपति नहीं, बल्कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भी भी आने वाले वक्त से आगाह किया. दरअसल जेएनयू पिछले करीब डेढ़ साल से भाजपा नेताओं के निशाने पर रही है.
लेकिन एबीवीपी को इससे भी बड़ा झटका तीन दिन बाद लगा जब दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस की नेशनल स्टुडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया ने (एनएसयूआइ) सेंट्रल पैनल के चार में सबसे अहम-अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-पद जीत लिए और उसे सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा. वहीं पिछले साल एबीवीपी को अध्यक्ष समेत तीन पदों पर जीत हासिल हुई थी. जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष गीता कहती हैं, ''दरअसल जिस तरह भाजपा सरकार ने विश्वविद्यालयों में कुलपति, यूजीसी और एबीवीपी के जरिए छात्रों के हितों पर कुठराघात किया है, यह उसी का नतीजा है.'' वहीं डीयू छात्रसंघ अध्यक्ष रॉकी तुसीद का कहना है, ''छात्रों ने देखा कि किस तरह भाजपा की शह पर एबीवीपी के लोग आक्रामक तरीके से छात्रों पर अपनी बात थोपना चाहते हैं. उन्हें यह नहीं पसंद आया.''
इसी तरह हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) में भी एबीवीपी हार गई और वहां अलायंस फॉर सोशल जस्टिस ने केंद्रीय पैनल के सभी पदों पर जीत हासिल की. एबीवीपी को हराने के लिए इस अलायंस के तहत रोहित वेमुला के संगठन आंबेडकर स्टुडेंट्स एसोसिएशन (एएसए) और स्टुडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के अलावा अन्य दलित, आदिवासी और मुस्लिम छात्र संगठनों ने हाथ मिला लिया. एचसीयू भी पिछले साल शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या की वजह से सुर्खियों में था और उसको लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ देशभर में विरोध-प्रदर्शन हुए थे.
यहां छात्र संघ चुनाव में भी वेमुला प्रकरण एक बड़ा मुद्दा था और उसके रिजल्ट जारी होते ही कैंपस में रोहित वेमुला संबंधी नारे गूंज रहे थे. वेमुला के साथी और एएसए के नेता डोंटा प्रशांत कहते हैं, ''एबीवीपी की हार भाजपा और उसकी सरकार के लिए छात्रों की ओर से एक जवाब है. सरकार ने जिस तरह कुलपति अप्पा राव को बरकरार रखा, रोहित वेमुला की आत्महत्या के जिम्मेदार लोगों को बचाने की कोशिश कर रही है, यह सब उसका जवाब है.'' जेएनयू में बिरसा आंबेडकर फुले स्टुडेंट्स एसोसिएशन (बाप्सा) के उभार को भी सत्ता के खिलाफ वंचित समुदाय की नाराजगी के तौर पर देखा गया. करीब तीन साल पहले ही गठित बाप्सा जेएनयू में बहुत कम अंतर से एबीवीपी के बाद तीसरे नंबर पर रही. देश के इन तीन अहम विश्वविद्यालयों में एबीवीपी की हार इसलिए भी अहम हैं क्योंकि यहां छात्रों और भाजपा सरकार के खिलाफ पिछले करीब डेढ़ साल से तकरार होती रही है.
यह सिलसिला अब भी जारी है और वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में छेडख़ानी के विरोध में प्रदर्शन कर रही छात्राओं पर लाठीचार्ज के बाद उत्तर प्रदेश और केंद्र की भाजपा सरकार विपक्षियों के निशाने पर आ गई है. हालांकि एबीवीपी के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक साकेत बहुगुणा ने इंडिया टुडे से कहा, ''ये कुछेक विश्वविद्यालय पूरा देश नहीं हैं. अगर आप देशभर के विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनावों का परिणाम देखेंगे तो एबीवीपी ने अधिकतर में जीत हासिल की है. आप ओडिशा, राजस्थान और उत्तराखंड के छात्रसंघों के चुनाव को देख लीजिए.'' लेकिन जिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्रों की विचारधारा की लड़ाई को पूरा देश देख रहा था, वहां छात्रों ने एबीवीपी की राजनीति को नकार दिया. पिछले करीब दो महीने में ओडिशा, उत्तराखंड, दिल्ली, पंजाब, असम, राजस्थान जैसे राज्यों में छात्रसंघ चुनाव हुए हैं.
कांग्रेस को युवाओं से आस
पिछले साल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी छात्रों के समर्थन में जेएनयू गए थे तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उन पर जोरदार तरीके से निशाना साधा था. खुद कांग्रेस के भीतर भी इसे सही कदम नहीं माना गया था. लेकिन अब उसके करीब डेढ़ साल बाद छात्र समुदाय ने ही कांग्रेस को मुस्कराने का मौका दिया है. जेएनयू में उसे एबीवीपी की हार का संतोष है, तो डीयू ने उसकी उम्मीदें जिंदा कर दी हैं. अब जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब डेढ़ साल का समय बचा है, विभिन्न राज्यों में एनएसयूआइ के बेहतर प्रदर्शन या कम-से-कम एबीवीपी की हार को कांग्रेस युवाओं केबीच जगह बनाने का अवसर मान रही है.
हालांकि यह सब अनायास नहीं है. राहुल और उनकी कोर-टीम वेमुला प्रकरण के दौरान से ही जुटी हुई है. वेमुला की आत्महत्या के बाद राहुल ने आनन-फानन में अपनी कोर टीम से बात की. एआइसीसी की संयुक्त सचिव और एनएसयूआइ की राष्ट्रीय प्रभारी रुचि गुप्ता कहती हैं, ''छात्रों के साथ हर तरह से और हर मुद्दे पर खड़ा होने का फैसला लिया गया.'' वहीं कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं, ''राहुल गांधी की सोच एकदम स्पष्ट है कि छात्रों और युवाओं को आरएसएस और भाजपा की सोच से सावधान रहने का आग्रह नियमित और अनिवार्य रूप से किया जाता रहे. कई राज्यों के छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी की हार संकेत है कि छात्र और युवा संघ और भाजपा को खारिज करने लगे हैं.''
एनएसयूआइ के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोज खान कहते हैं, ''एनएसयूआइ को जो सफलता मिली है, इसकी वजह यह है कि हमने कॉलेज के मुद्दों से आगे जाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर आज छात्रों और युवाओं को जो झेलना पड़ रहा है, उसका जिक्र करना शुरू किया. मतलब छात्रों को क्या खाना है, क्या पहनना है, क्या बोलना है जैसे मुद्दों को प्रचार के केंद्र में लाया गया. चूंकि आज के युवाओं के लिए निजी आजादी पर संकट है, इसलिए एनएसयूआइ ने ये मुद्दे उठाए और सफलता मिली.'' टीम राहुल छात्र और युवाओं के मुद्दों को लोगों के बीच ले जाने की रणनीति पर काम कर रही है. राहुल खुद इसकी निगरानी कर रहे हैं. छात्रों के बीच राहुल की कही बात पर क्या प्रतिक्रिया मिलती है, उसका विश्लेषण किया जाता है. इससे यह जानने की कोशिश है कि छात्र क्या सुनना चाहते हैं.
हालांकि साकेत बहुगुणा एनएसयूआइ की कामयाबी या एबीवीपी और सरकार से छात्रों की नाराजगी की बात को हास्यास्पद बताते हैं और कहते हैं, ''असल में एनएसयूआइ को छात्र विकल्प के तौर पर नहीं देखते. उसे तो देशभर में बुरी तरह नकार दिया गया है. और अगर दिल्ली को ही देख रहे हैं तो जेएनयू में एनएसयूआइ को और डीयू में आइसा (लेफ्ट) को तो नोटा से भी कम वोट मिले हैं.'' भले ही भगवा खेमा इस बात को स्वीकार न करे लेकिन सरकार को विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्रों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है, बीएचयू प्रकरण इसकी ताजा मिसाल है.
गीता कहती हैं, ''अगर डीयू जैसे किसी जगह पर एनएसयूआइ को सफलता मिली भी है तो वह भी एबीवीपी-भाजपा के खिलाफ छात्रों में माहौल की वजह से.'' कांग्रेस को भी इसका भान है. रुचि गुप्ता इसकी तस्दीक करती नजर आती हैं, ''विभिन्न विश्वविद्यालयों में एनएसयूआइ की जीत से भी बड़ी बात है एबीवीपी की हार. यह संकेत है कि छात्रों ने संघ और भाजपा की विचारधारा को खारिज करना शुरू कर दिया है.''
गौरतलब है कि 2014 के चुनाव में भाजपा के प्रति छात्रों का रुझान बढ़ा और कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था. उससे पहले छात्रों-युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए एबीवीपी सक्रिय हो गई थी. अब चक्र पूरा हो गया लगता है. उन्हीं शैक्षिक संस्थानों में दक्षिणपंथी छात्रसंघ के पांव उखडऩे पर भाजपा को 'खबरदार' हो जाना चाहिए क्योंकि युवाओं की नाराजगी आम चुनाव 2019 में भाजपा की राह में रोड़े भी अटका सकती है.

