कहानी पहले ही टेढ़ी-मेढ़ी थी, और अब उसमें एक और मोड़ आ गया है. 18 अप्रैल को अन्नाद्रमुक के विधायकों ने जेल में बंद पार्टी की वर्तमान अंतरिम महासचिव शशिकला और जाहिरा तौर पर उनके भ्रष्ट भतीजे और उपाध्यक्ष टीटीवी दिनकरन को पार्टी से निकालने के लिए एक बैठक की.
तमिलनाडु के वित्त मंत्री डी. जयकुमार ने कहा, ''हम पार्टी के हित में दिनकरन परिवार को किनारे करने जा रहे हैं,'' हालांकि अन्नाद्रमुक में कई अन्य लोगों की तरह उन्होंने भी एक बार दिनकरन के अचानक तेजी से आसमानी बुलंदियों पर पहुंचने को स्वीकार किया था. लेकिन अब स्थिति बेकाबू हो चली थी, क्योंकि विधायक अन्नाद्रमुक सरकार के भविष्य को लेकर तब आशंकित हो गए थे, जब चुनाव आयोग ने आर.के. नगर में 12 अप्रैल को होने वाला उपचुनाव रद्द कर दिया था. यह जयललिता की पूर्व विधानसभा सीट थी, जिनकी दिसंबर 2016 में मृत्यु हो गई थी, और जो अपनी पार्टी को और साथ ही राज्य को नेतृत्वविहीन छोड़ गईं थीं.
राज्य सरकार के मंत्रियों पर आयकर छापे मारे जाने के बाद चुनाव आयोग इस नतीजे पर पहुंचा कि इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि अंधाधुंध रिश्वतखोरी चल रही है. दिनकरन पर वोट खरीदने के लिए करीब 90 करोड़ रु. खर्च करने का आरोप था. उन पर यह आरोप पहले ही लगाया जा चुका था कि पार्टी के चुनाव चिन्ह 'दो पत्ती' के विवाद में अन्नाद्रमुक के पक्ष में फैसला कराने के लिए वे चुनाव आयोग के अधिकारियों को राजी करने के वास्ते 50 करोड़ रु. तक का भुगतान करने के लिए तैयार थे.
यह विवाद शशिकला, जिनको उनको अपनी प्रिय अम्मा के उत्तराधिकारी के रूप में देखने वाले चिन्नम्मा (मौसी) कहते हैं, और ओ. पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) के नेतृत्व वाले अलग हो चुके गुट के बीच था. पन्नीरसेल्वम को जयललिता की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री घोषित किया गया था. जब उनके साथियों ने जयललिता की जगह लेने के लिए शशिकला के पक्ष में जोरदार मांग की, तो वे भी अपने सहयोगियों के साथ रहे, लेकिन फरवरी में उन्होंने चौंकाने वाला पैंतरा बदला और दावा किया कि उन्हें इस्तीफा देने के लिए शशिकला ने मजबूर किया था. अंत में, पन्नीरसेल्वम के पक्ष में विधायकों की पर्याप्त संख्या नहीं रह गई थी. तब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ओर से नाटकीय हस्तक्षेप किया, शशिकला को भ्रष्टाचार की सजा के तौर पर चार साल के लिए जेल भेज दिया और मुख्यमंत्री बनने की उनकी कोशिश धरी की धरी रह गई.
अब ओपीएस और मुख्यमंत्री ई.के. पलानीसामी पार्टी के फिर से एकीकरण के लिए बातचीत कर रहे हैं. उन्हें एहसास है कि अन्नाद्रमुक घोर संकट की स्थिति में है. नोटबंदी के बाद से कम से कम चार मंत्रियों पर अवैध नकदी लेन-देन के लिए नजर रखी जा रही है. मंत्रियों और उनके सहयोगियों के घरों से कर निरीक्षकों को 152 करोड़ रु. मिले हैं.
पन्नीरसेल्वम के लिए यह एक सैद्धांतिक मुद्दा बन गया है कि अन्नाद्रमुक के साथ कोई भी सुलह-समझौता शशिकला और उनके रिश्तेदारों को, जिन्हें कथित तौर पर 'मन्नारगुड़ी माफिया' कहा जाता है, हाशिए पर डालने का होगा. इस घोषणा के बाद कि शशिकला और दिनकरन को सरकार से और पार्टी में कोई भूमिका निभाने से बाहर रखा जाएगा, पन्नीरसेल्वम ने इसे 'हमारे धर्मयुद्ध में पहला कदम' करार दिया.
लगता है कि दिनकरन ने अपने भाग्य को स्वीकार कर लिया है, लेकिन पार्टी को एकजुट करने के लिए अन्नाद्रमुक को अभी बहुत कुछ करना है. जैसे पहली बात तो यही कि इसका नेता कौन होगा? क्या पन्नीरसेल्वम इसके नेता होंगे, जिन्हें जयललिता ने खुद तीन बार अपना विकल्प चुना था, और जो केंद्र सरकार का समर्थन होने का दावा करते हैं? अन्नाद्रमुक के भीतर ही अन्य लोग, जातिहीन समाज की ओर काम करने की द्रविड़वादी विचारधारा के बावजूद, इस बात को एक गुण के रूप में मानते हैं कि पलानीसामी पश्चिमी तमिलनाडु के गौंडर समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं.
एक ऐसी पार्टी में आम सहमति का आधार खोज पाना कठिन काम है, जो अब जयललिता के करिश्मे और इच्छाशक्ति के बूते एकजुट नहीं है. लेकिन, चूंकि अन्नाद्रमुक का कोई भी विधायक जल्द चुनाव होने का जोखिम नहीं उठाना चाहता है, इसलिए सरकार को सहारा देने के लिए कोई रास्ता निकालना ही होगा.
यहां तक कि प्रतिद्वंद्वी डीएमके भी नए चुनाव का खर्च उठाना पसंद नहीं करेगी. लेकिन तमिलनाडु सरकार को अपनी विश्वसनीयता जल्द बहाल करने की जरूरत है, वरना उसके सामने तेजी से बेचैन होती जा रही जनता का विश्वास और धैर्य खोने का जोखिम है.
तमिलनाडु के वित्त मंत्री डी. जयकुमार ने कहा, ''हम पार्टी के हित में दिनकरन परिवार को किनारे करने जा रहे हैं,'' हालांकि अन्नाद्रमुक में कई अन्य लोगों की तरह उन्होंने भी एक बार दिनकरन के अचानक तेजी से आसमानी बुलंदियों पर पहुंचने को स्वीकार किया था. लेकिन अब स्थिति बेकाबू हो चली थी, क्योंकि विधायक अन्नाद्रमुक सरकार के भविष्य को लेकर तब आशंकित हो गए थे, जब चुनाव आयोग ने आर.के. नगर में 12 अप्रैल को होने वाला उपचुनाव रद्द कर दिया था. यह जयललिता की पूर्व विधानसभा सीट थी, जिनकी दिसंबर 2016 में मृत्यु हो गई थी, और जो अपनी पार्टी को और साथ ही राज्य को नेतृत्वविहीन छोड़ गईं थीं.
राज्य सरकार के मंत्रियों पर आयकर छापे मारे जाने के बाद चुनाव आयोग इस नतीजे पर पहुंचा कि इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि अंधाधुंध रिश्वतखोरी चल रही है. दिनकरन पर वोट खरीदने के लिए करीब 90 करोड़ रु. खर्च करने का आरोप था. उन पर यह आरोप पहले ही लगाया जा चुका था कि पार्टी के चुनाव चिन्ह 'दो पत्ती' के विवाद में अन्नाद्रमुक के पक्ष में फैसला कराने के लिए वे चुनाव आयोग के अधिकारियों को राजी करने के वास्ते 50 करोड़ रु. तक का भुगतान करने के लिए तैयार थे.
यह विवाद शशिकला, जिनको उनको अपनी प्रिय अम्मा के उत्तराधिकारी के रूप में देखने वाले चिन्नम्मा (मौसी) कहते हैं, और ओ. पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) के नेतृत्व वाले अलग हो चुके गुट के बीच था. पन्नीरसेल्वम को जयललिता की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री घोषित किया गया था. जब उनके साथियों ने जयललिता की जगह लेने के लिए शशिकला के पक्ष में जोरदार मांग की, तो वे भी अपने सहयोगियों के साथ रहे, लेकिन फरवरी में उन्होंने चौंकाने वाला पैंतरा बदला और दावा किया कि उन्हें इस्तीफा देने के लिए शशिकला ने मजबूर किया था. अंत में, पन्नीरसेल्वम के पक्ष में विधायकों की पर्याप्त संख्या नहीं रह गई थी. तब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ओर से नाटकीय हस्तक्षेप किया, शशिकला को भ्रष्टाचार की सजा के तौर पर चार साल के लिए जेल भेज दिया और मुख्यमंत्री बनने की उनकी कोशिश धरी की धरी रह गई.
अब ओपीएस और मुख्यमंत्री ई.के. पलानीसामी पार्टी के फिर से एकीकरण के लिए बातचीत कर रहे हैं. उन्हें एहसास है कि अन्नाद्रमुक घोर संकट की स्थिति में है. नोटबंदी के बाद से कम से कम चार मंत्रियों पर अवैध नकदी लेन-देन के लिए नजर रखी जा रही है. मंत्रियों और उनके सहयोगियों के घरों से कर निरीक्षकों को 152 करोड़ रु. मिले हैं.
पन्नीरसेल्वम के लिए यह एक सैद्धांतिक मुद्दा बन गया है कि अन्नाद्रमुक के साथ कोई भी सुलह-समझौता शशिकला और उनके रिश्तेदारों को, जिन्हें कथित तौर पर 'मन्नारगुड़ी माफिया' कहा जाता है, हाशिए पर डालने का होगा. इस घोषणा के बाद कि शशिकला और दिनकरन को सरकार से और पार्टी में कोई भूमिका निभाने से बाहर रखा जाएगा, पन्नीरसेल्वम ने इसे 'हमारे धर्मयुद्ध में पहला कदम' करार दिया.
लगता है कि दिनकरन ने अपने भाग्य को स्वीकार कर लिया है, लेकिन पार्टी को एकजुट करने के लिए अन्नाद्रमुक को अभी बहुत कुछ करना है. जैसे पहली बात तो यही कि इसका नेता कौन होगा? क्या पन्नीरसेल्वम इसके नेता होंगे, जिन्हें जयललिता ने खुद तीन बार अपना विकल्प चुना था, और जो केंद्र सरकार का समर्थन होने का दावा करते हैं? अन्नाद्रमुक के भीतर ही अन्य लोग, जातिहीन समाज की ओर काम करने की द्रविड़वादी विचारधारा के बावजूद, इस बात को एक गुण के रूप में मानते हैं कि पलानीसामी पश्चिमी तमिलनाडु के गौंडर समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं.
एक ऐसी पार्टी में आम सहमति का आधार खोज पाना कठिन काम है, जो अब जयललिता के करिश्मे और इच्छाशक्ति के बूते एकजुट नहीं है. लेकिन, चूंकि अन्नाद्रमुक का कोई भी विधायक जल्द चुनाव होने का जोखिम नहीं उठाना चाहता है, इसलिए सरकार को सहारा देने के लिए कोई रास्ता निकालना ही होगा.
यहां तक कि प्रतिद्वंद्वी डीएमके भी नए चुनाव का खर्च उठाना पसंद नहीं करेगी. लेकिन तमिलनाडु सरकार को अपनी विश्वसनीयता जल्द बहाल करने की जरूरत है, वरना उसके सामने तेजी से बेचैन होती जा रही जनता का विश्वास और धैर्य खोने का जोखिम है.

