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गहरा हुआ बाबरी विध्वंस का दाग

ऐसे वक्त में जब भाजपा चुनावी जीतों पर इतरा रही है, सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी विध्वंस मामले में पार्टी के शीर्ष नेताओं पर मुकदमा चलाने का आदेश देकर भगवा खेमे को सकते में डाल दिया है.

बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के दौर में मुरली मनोहर जोशी, लालकृष्ण आडवाणी और उमा भारती
बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के दौर में मुरली मनोहर जोशी, लालकृष्ण आडवाणी और उमा भारती
अपडेटेड 25 अप्रैल , 2017
एक ऐसे वक्त में जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक के बाद एक चुनावी जीतों पर इतरा रही है, तब सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में पार्टी के शीर्ष नेताओं पर मुकदमा चलाने का आदेश देकर भगवा खेमे को सकते में डाल दिया है. भारतीय लोकतंत्र की साख और देश की हिंदू-मुस्लिम एकता को स्थायी क्षति पहुंचाने वाली 6 दिसंबर 1992 की घटना के वक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती घटनास्थल पर मौजूद थे.

देश की शीर्ष अदालत ने न सिर्फ इन नेताओं पर मस्जिद गिराने की साजिश रचने का मुकदमा चलाने का आदेश दिया है, बल्कि अदालत से यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि लगातार सुनवाई कर दो साल के भीतर इस मामले पर फैसला सुनाया जाए.

इस फैसले से इन तीन नेताओं के अलावा भाजपा नेता विनय कटियार पर भी मुकदमा चलेगा. अदालत ने रायबरेली और लखनऊ की अदालतों में चल रहे मुकदमे को एक ही साथ चलाने का आदेश भी दे दिया है. पहले हाइकोर्ट से इन नेताओं को साजिश रचने के आरोप से मुक्ति मिल गई थी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह बहस शुरू हो गई है कि क्या पुराने गुनाह का आरोप जिंदा होने से आडवाणी और जोशी राष्ट्रपति पद की दौड़ से हमेशा के लिए बाहर हो गए हैं?

और 2004 में अदालत के ही फैसले से पैदा हुए हालात में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद को गंवाने वाली उमा भारती को क्या एक बार फिर नैतिकता और कानून के तकाजे से केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा?

फिलहाल ऐसा दिखाई नहीं देता. राम मंदिर आंदोलन की कोख से सियासत में आईं उमा की पहली प्रतिक्रिया कुछ इस तरह आई, ''इसमें साजिश की कौन-सी बात है? जो कुछ हुआ, खुल्लम-खुल्ला हुआ. अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए.'' उमा ने स्पष्ट किया कि इस्तीफा देने का सवाल ही नहीं उठता.

कटियार ने भी ठोककर कहा कि जो हुआ 'खुल्लम खुल्ला' हुआ. दोनों नेताओं ने एक अपराध के खुल्लमखुल्ला होने की बात स्वीकार की और उन्हें ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं हुआ कि इससे 'सबका साथ, सबका विकास' के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारे की, दुनिया में किस कदर फजीहत होगी.

उधर, 6 दिसंबर 1992 को अपने जीवन का काला दिवस बता चुके आडवाणी ने मस्जिद गिराने का आरोपी बनाए जाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. इस बार उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा देने का भी कोई संकेत नहीं दिया, जबकि हवाला मामले में नाम आने पर नैतिक मानदंड स्थापित करते हुए उन्होंने सांसदी छोड़ दी थी. फैसले के बाद जोशी ने आडवाणी से मुलाकात जरूर की.

घटनाक्रम पर चुटकी लेते हुए राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने कहा, ''आडवाणी को राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए नरेंद्र मोदी ने सीबीआइ का इस्तेमाल किया है.'' लालू ही वह शख्स थे जिन्होंने 1991 में बिहार में आडवाणी की राम रथ यात्रा रोककर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया था.

लेकिन भाजपा नेतृत्व की सोच यादव से अलग है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास पर दो घंटे तक बैठक चली जिसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और वेंकैया नायडू मौजूद थे. पार्टी सूत्रों की मानें तो भाजपा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपने मुंह पर कालिख मानने की बजाए इससे उपजने वाले हालात को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की रणनीति पर विचार कर रही है.

पार्टी का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण का मुद्दा एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श में आ जाएगा, जो अंततः पार्टी के लिए ही फायदेमंद होगा. खासकर ऐसे समय में पार्टी इसका बेहतर इस्तेमाल कर सकती है, जब कट्टर हिंदुत्व की छवि वाले और दंगों के आरोपी योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में पार्टी के मुख्यमंत्री हैं. हालांकि रविशंकर प्रसाद ने आधिकारिक प्रतिक्रिया में यही कहा कि फैसले के अध्ययन के बाद ही पार्टी कोई जवाब देगी.
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