जनवरी के आखिरी दिनों में जाट, पाटीदार और मराठा अपने अलग-अलग विरोध प्रदर्शनों के लिए जमा हुए और उन्होंने पिछले कुछेक मामलों में दो साल से लंबित मांगों को दोबारा उठाया. हालांकि उनके इन प्रदर्शनों का एक-दूसरे से कोई संबंध न था, पर उनमें एक बात समान थी—सामाजिक रूप से उन्नत बताए जाने के बावजूद पीछे रह जाने का एहसास. गुजरात से छह महीने के लिए निर्वासित रहने के बाद हार्दिक पटेल 17 जनवरी को लौट आए. पर रैलियों में आई भीड़ ज्यादा उत्साहित न दिखी. लगता है निर्वासन में गुजरे समय ने इस आंदोलन पर असर डाला है. पिछले साल हरियाणा में जाटों के जिन विरोध प्रदर्शनों में दर्जन भर लोग मारे गए थे, वही जाट पिछले हफ्ते एक बार फिर सड़कों पर उतर आए.
इस बार भीड़ नियंत्रित थी, जिसमें मराठा आंदोलन की तरह खामोशी की शक्ति नजर आ रही थी. 31 जनवरी को मराठा प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांग को लेकर मुंबई में सड़कों को जाम कर दिया. कुछ आयोजकों का कहना था कि राज्य भर में 2,000 से ज्यादा जगहों पर सड़कों को जाम किया गया था. पर प्रदर्शनों ने कहीं भी हिंसक मोड़ नहीं लिया.
यह दरअसल राजनैतिक सोच की कमी को दर्शाता है कि आरक्षण को बेरोजगारी दूर करने के एकमात्र विकल्प के तौर पर देखा जाता है. राजनीतिशास्त्री क्रिस्टोफजैफरलो ने एक स्तंभ में लिखा था कि वर्चस्व रखने वाली जातियों में आरक्षण की मांग तब तक उठती रहेगी, जब तक कि आर्थिक वृद्धि रोजगार पैदा करने में विफल रहेगी. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की ताकत बताई जाने वाली युवा आबादी के लिए हर साल कम से कम 80 लाख रोजगार पैदा किए जाने की जरूरत है. जैफरलो के मुताबिक, न सिर्फ मुख्य सेक्टरों में ही नौकरियां कम होती जा रही हैं, बल्कि ''वे स्थायी भी नहीं हैं और उनमें मिलने वाला वेतन भी अच्छा नहीं.''
सियासी पार्टियां प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने की नासमझी कर रही हैं, जैसा कि किसी भी लोकतंत्र में होता है. वे राजनैतिक लाभ के लिए इन प्रदर्शनों के प्रति सहानुभूति दिखाती हैं. पर जाट, जो करीब दो दशकों से आरक्षण की मांग उठाते आ रहे हैं, पाटीदार और मराठा भी जानते हैं कि आरक्षण की मांग का उनका तर्क कमजोर है. उनके प्रदर्शनों में पहले-सा जोश नहीं रह गया है. प्रदर्शनकारी चुनाव में भी कुछ खास असर डालने में विफल रहे हैं, जैसा कि गुजरात के पालिका चुनावों में बीजेपी के खिलाफ वोट देने का पाटीदार नेताओं का आह्वान बेअसर साबित हुआ है. प्रदेश में जाट किसान इस बार पश्चिमी यूपी में बीजेपी के खिलाफ वोट देने की बात कह रहे हैं, मोदी सरकार के खिलाफ 'वादा खिलाफी' को ले गुस्से का इजहार हो रहा है.
इस बार भीड़ नियंत्रित थी, जिसमें मराठा आंदोलन की तरह खामोशी की शक्ति नजर आ रही थी. 31 जनवरी को मराठा प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांग को लेकर मुंबई में सड़कों को जाम कर दिया. कुछ आयोजकों का कहना था कि राज्य भर में 2,000 से ज्यादा जगहों पर सड़कों को जाम किया गया था. पर प्रदर्शनों ने कहीं भी हिंसक मोड़ नहीं लिया.
यह दरअसल राजनैतिक सोच की कमी को दर्शाता है कि आरक्षण को बेरोजगारी दूर करने के एकमात्र विकल्प के तौर पर देखा जाता है. राजनीतिशास्त्री क्रिस्टोफजैफरलो ने एक स्तंभ में लिखा था कि वर्चस्व रखने वाली जातियों में आरक्षण की मांग तब तक उठती रहेगी, जब तक कि आर्थिक वृद्धि रोजगार पैदा करने में विफल रहेगी. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की ताकत बताई जाने वाली युवा आबादी के लिए हर साल कम से कम 80 लाख रोजगार पैदा किए जाने की जरूरत है. जैफरलो के मुताबिक, न सिर्फ मुख्य सेक्टरों में ही नौकरियां कम होती जा रही हैं, बल्कि ''वे स्थायी भी नहीं हैं और उनमें मिलने वाला वेतन भी अच्छा नहीं.''
सियासी पार्टियां प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने की नासमझी कर रही हैं, जैसा कि किसी भी लोकतंत्र में होता है. वे राजनैतिक लाभ के लिए इन प्रदर्शनों के प्रति सहानुभूति दिखाती हैं. पर जाट, जो करीब दो दशकों से आरक्षण की मांग उठाते आ रहे हैं, पाटीदार और मराठा भी जानते हैं कि आरक्षण की मांग का उनका तर्क कमजोर है. उनके प्रदर्शनों में पहले-सा जोश नहीं रह गया है. प्रदर्शनकारी चुनाव में भी कुछ खास असर डालने में विफल रहे हैं, जैसा कि गुजरात के पालिका चुनावों में बीजेपी के खिलाफ वोट देने का पाटीदार नेताओं का आह्वान बेअसर साबित हुआ है. प्रदेश में जाट किसान इस बार पश्चिमी यूपी में बीजेपी के खिलाफ वोट देने की बात कह रहे हैं, मोदी सरकार के खिलाफ 'वादा खिलाफी' को ले गुस्से का इजहार हो रहा है.

