आम तौर पर यह मान लिया जाता है कि पद्म पुरस्कारों के चयन में दांव-पेच और सियासी दुनियादारी कुछ न कुछ भूमिका तो निभाती ही है. लेकिन इस बात से कम ही लोग इनकार कर सकेंगे कि इस साल की अपेक्षाकृत छोटी फेहरिस्त में मामूली लोगों के गैरमामूली कामों को जगह और मान्यता दी गई है. अवार्ड देने की प्रक्रिया को लेकर तल्ख त्यौरियों के साथ आलोचनाएं की गई हैं. उनमें सबसे गौरतलब आलोचनाएं वे हैं जो बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गट्टा और कई बार बिलियड्र्स के विश्व चैंपियन पंकज आडवाणी ने की हैं. मगर सरकार ने भी अपने बचाव में कुछ पुख्ता बातें कही हैं.
इस साल बहुत सोच-विचार के बाद ऑनलाइन प्रक्रिया से नामांकन मंगवाए गए. इसमें डाक से भेजने के बजाए एक वेबसाइट पर जाकर नाम देने थे. इस प्रक्रिया का नतीजा यह हुआ कि आम तौर पर जितने नामांकन आते थे, इस बार उससे दोगुने नामांकन आए और पारदर्शिता भी बढ़ी. बताया जाता है कि प्रधानमंत्री ने इसमें निजी तौर पर दिलचस्पी ली. भीतर की चर्चाओं को जानने वालों के मुताबिक, प्रधानमंत्री ने कहा, ''ये पुरस्कार सच्ची प्रतिभा और योग्यता को पुरस्कृत करने का साधन होने चाहिए... लोगों में गर्व की भावना जागृत हो.'' चयन समिति में बैडमिंटन कोच पुलेला गोपीचंद, अदाकारा वहीदा रहमान और आरएसएस के नेता एस. गुरुमूर्ति सरीखी हस्तियां थीं.
उनकी अगुआई में ''सरपरस्ती और भाई-भतीजावाद की संस्कृति को खत्म करने'' की प्रधानमंत्री की हिदायत के मुताबिक चयन की कोशिशें की गईं. चयन समिति के एक सदस्य बताते हैं कि पहले ये पुरस्कार एहसान और इनायत के तौर पर बांटे जाते थे ''वीआइपी मरीजों के डॉक्टरों को हमेशा अवार्ड मिल जाते थे. अक्सर चयन समितियां इस बात से प्रभावित होती थीं कि किसी के लिए सिफारिश की चिट्ठी किसने लिखी है.''
चयन प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव सतपाल चौहान कहते हैं, ''चयन में काबिलियत का ख्याल नहीं अतिरिक्त ख्याल रखा गया.'' शायद तभी राष्ट्रपति भवन में पद्म श्री से सुशोभितों में 52 बरस के करीमुल हक भी थे, जो एक चाय बागान में काम करते हैं और 5,000 रु. महीना कमाते हैं. उनकी मां की मृत्यु दिल के दौरे से हो गई थी. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बंगाल के अपने गांव के जरूरतमंद लोगों को जल्दी से जल्दी अस्पताल पहुंचाने के काम में लगा दी. उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल कामचलाऊ एंबुलेंस में बदल ली. कभी नदी में बाढ़ आने पर उन्हें रास्ता बदलकर 45 किमी जाना पड़ता है. दो दशकों में वे 3,500 लोगों को अस्पताल पहुंचा चुके हैं. वे कहते हैं, ''कोई मुझे दिल्ली बुलाए, पुरस्कार दे, यह एक सपने की तरह लगता है.''
डॉ. राम यादव को भी उस वक्त यही लगा कि वे कोई सपना देख रहे हैं, जब उन्हें बताया गया कि उनकी 91 वर्षीया बुजुर्ग मां भक्ति यादव को पद्म श्री के लिए चुना गया है, जो स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं. उन्होंने कोई 88,000 गरीब औरतों को प्रसव में मदद की है. उनका नाम गृह मंत्रालय की टीम ने ही दिया था. पुरस्कृत हस्तियों में मशहूर सियासतदानों और एथलीटों से लेकर लोक गायक जितेंद्र हरिपाल और 'हलक्की की स्वरकोकिला' कही जाने वाली सुकरी बोम्मागौड़ा भी शामिल हैं जो 58 वर्षों से गा रही हैं. केरल की 76 वर्षीया मीनाक्षी अम्मा दशकों से दुनिया का सबसे पुराना मार्शल आर्ट कलरीपायट्टढू सिखा रही हैं. तेलंगाना के एक पुरस्कृत व्यक्ति दरिपल्ली रमैया 1 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगा चुके हैं. इस साल की पद्म पुरस्कारों की फेहरिस्त खासोआम की फेहरिस्त है.
इस साल बहुत सोच-विचार के बाद ऑनलाइन प्रक्रिया से नामांकन मंगवाए गए. इसमें डाक से भेजने के बजाए एक वेबसाइट पर जाकर नाम देने थे. इस प्रक्रिया का नतीजा यह हुआ कि आम तौर पर जितने नामांकन आते थे, इस बार उससे दोगुने नामांकन आए और पारदर्शिता भी बढ़ी. बताया जाता है कि प्रधानमंत्री ने इसमें निजी तौर पर दिलचस्पी ली. भीतर की चर्चाओं को जानने वालों के मुताबिक, प्रधानमंत्री ने कहा, ''ये पुरस्कार सच्ची प्रतिभा और योग्यता को पुरस्कृत करने का साधन होने चाहिए... लोगों में गर्व की भावना जागृत हो.'' चयन समिति में बैडमिंटन कोच पुलेला गोपीचंद, अदाकारा वहीदा रहमान और आरएसएस के नेता एस. गुरुमूर्ति सरीखी हस्तियां थीं.
उनकी अगुआई में ''सरपरस्ती और भाई-भतीजावाद की संस्कृति को खत्म करने'' की प्रधानमंत्री की हिदायत के मुताबिक चयन की कोशिशें की गईं. चयन समिति के एक सदस्य बताते हैं कि पहले ये पुरस्कार एहसान और इनायत के तौर पर बांटे जाते थे ''वीआइपी मरीजों के डॉक्टरों को हमेशा अवार्ड मिल जाते थे. अक्सर चयन समितियां इस बात से प्रभावित होती थीं कि किसी के लिए सिफारिश की चिट्ठी किसने लिखी है.''
चयन प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव सतपाल चौहान कहते हैं, ''चयन में काबिलियत का ख्याल नहीं अतिरिक्त ख्याल रखा गया.'' शायद तभी राष्ट्रपति भवन में पद्म श्री से सुशोभितों में 52 बरस के करीमुल हक भी थे, जो एक चाय बागान में काम करते हैं और 5,000 रु. महीना कमाते हैं. उनकी मां की मृत्यु दिल के दौरे से हो गई थी. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बंगाल के अपने गांव के जरूरतमंद लोगों को जल्दी से जल्दी अस्पताल पहुंचाने के काम में लगा दी. उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल कामचलाऊ एंबुलेंस में बदल ली. कभी नदी में बाढ़ आने पर उन्हें रास्ता बदलकर 45 किमी जाना पड़ता है. दो दशकों में वे 3,500 लोगों को अस्पताल पहुंचा चुके हैं. वे कहते हैं, ''कोई मुझे दिल्ली बुलाए, पुरस्कार दे, यह एक सपने की तरह लगता है.''
डॉ. राम यादव को भी उस वक्त यही लगा कि वे कोई सपना देख रहे हैं, जब उन्हें बताया गया कि उनकी 91 वर्षीया बुजुर्ग मां भक्ति यादव को पद्म श्री के लिए चुना गया है, जो स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं. उन्होंने कोई 88,000 गरीब औरतों को प्रसव में मदद की है. उनका नाम गृह मंत्रालय की टीम ने ही दिया था. पुरस्कृत हस्तियों में मशहूर सियासतदानों और एथलीटों से लेकर लोक गायक जितेंद्र हरिपाल और 'हलक्की की स्वरकोकिला' कही जाने वाली सुकरी बोम्मागौड़ा भी शामिल हैं जो 58 वर्षों से गा रही हैं. केरल की 76 वर्षीया मीनाक्षी अम्मा दशकों से दुनिया का सबसे पुराना मार्शल आर्ट कलरीपायट्टढू सिखा रही हैं. तेलंगाना के एक पुरस्कृत व्यक्ति दरिपल्ली रमैया 1 करोड़ से ज्यादा पेड़ लगा चुके हैं. इस साल की पद्म पुरस्कारों की फेहरिस्त खासोआम की फेहरिस्त है.

