कर्ज और सूखे से त्रस्त हो आत्महत्या करने वाले ओडिशा के 133 किसानों की चिताओं पर राजनैतिक रोटियां सेकने का सिलसिला तेज हो गया है. पिछले साल हुईं आत्महत्या की सिलसिलेवार घटनाओं के दौरान नेता मुंह छिपाए रहे. लेकिन अब धीरे-धीरे मृतक किसानों के परिवारों से मिलने-जुलने और उन्हें राहत पहुंचाने का दम भरने लगे हैं. आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं पश्चिमी ओडिशा में हुईं और उसमें भी बरगढ़ सबसे आगे है. पिछले साल यहां 23 किसानों ने मौत को गले लगाया. बरगढ़ अब राजनैतिक पार्टियों के लिए नया तीर्थ बन गया है. इसे पूर्वी भारत का विदर्भ कहा जाने लगा है. वोट की खातिर सहानुभूति बटोरने में कांग्रेस, बीजेपी और बीजू जनता दल के साथ-साथ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे वामदल भी पीछे नहीं हैं.
इसकी शुरुआत पिछले साल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने की थी. उन्होंने पदयात्रा की और व्यक्तिगत तौर पर मृत किसानों के परिवारों से मिले भी. मोदी ने भी 21 फरवरी को बरगढ़ में किसान रैली के बाद यही किया यानी किसानों से बातचीत करके उनका दर्द जाना. पर किसान आत्महत्या के मुद्दे पर विरोध की राजनीति में कांग्रेस आगे निकल गई और बीजेपी दूसरे नंबर पर रह गई. इसी सवाल पर कांग्रेस ने विधानसभा नहीं चलने दी थी.
शायद यही तिलमिलाहट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बरगढ़ लाने वाली है. उन्होंने इसी महीने दूसरी बार 21 फरवरी को बरगढ़ में किसान रैली की. उनके सिपहसालार बीजेपी के ओडिशा प्रभारी महासचिव अरुण सिंह और प्रदेश अध्यक्ष बसंत पांडा आदि ने राज्य के तमाम जिलों में घूम-घूमकर रैली का माहौल बनाया. जिलाध्यक्षों को भीड़ जुटाने का कोटा दे दिया गया था. कम से कम दो लाख किसानों को मोदी की इस रैली में लाने का दावा किया गया था.
7 फरवरी को पारादीप में रिफाइनरी के लोकार्पण के बाद 21 फरवरी को मोदी का बरगढ़ पहुंचना ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है. हालांकि नवीन ने पश्चिम ओडिशा के किसानों के लिए 35,000 करोड़ रु. के पैकेज की घोषणा की थी पर सरकार अब तक सूखा और कर्ज के कारण इतने किसानों की आत्महत्या की बात को नकारती रही है. कृषि मंत्री प्रदीप महारथी कहते हैं, ''जिलाधिकारियों से मंगाई गई रिपोर्ट के मुताबिक, आत्महत्या की वजह सूखा और कर्ज न होकर उनकी निजी समस्याएं हैं. इसके बाद भी सरकार जांच कर रही है कि ऐसी घटनाएं जिन जिलों में हुई हैं, उन्हें राहत और पुनर्वास सहायता दी जाए.''
मोदी की किसान रैली के जवाब में नवीन पटनायक के रणनीतिकारों ने भी आनन-फानन में उनकी रैलियों की योजना बना डाली. मोदी की रैली से पहले ही 18 फरवरी को नवीन पटनायक बरगढ़ से सटे हुए जिलों बलांगीर और कालाहांडी का दौरा करेंगे.
पश्चिमी ओडिशा में अचानक तेज हुई राजनैतिक गतिविधियों के पीछे एक कारण यह भी है कि 2017 में पंचायत चुनाव होने वाले हैं. इनमें बीजेपी को अपनी राजनैतिक जमीन तैयार करनी है तो नवीन के सामने अपनी जमीन को बचाकर रखने की चुनौती है. बीजू जनता दल (बीजद) के प्रवक्ता समीर रंजन दास मुख्यमंत्री के दौरे की तैयारियों को लेकर उत्साहित हैं.
राज्य सरकार किसान कल्याण की योजना घोषित कर सकती है. पश्चिम ओडिशा में बीजेपी और कांग्रेस की सक्रियता से घबराई बीजद सरकार ने राउरकेला में भी 27 फरवरी को नवीन का कार्यक्रम तय कर दिया है. उस कार्यक्रम में नवीन पटनायक 650 करोड़ रु. की लागत वाली मेगा इरिगेशन लिफ्ट योजना की घोषणा करेंगे.
कांग्रेस भी इस दांवपेच में पीछे नहीं है. प्रदेश कांग्रेस ने किसान आत्महत्या पर एक श्वेत पत्र जारी किया है, जिसमें 133 किसानों की आत्महत्या के आंकड़े दिए गए हैं. लेकिन सरकार इन आंकड़ों को सिरे से नकार रही है. वरिष्ठ पत्रकार कानन दास कहते हैं, ''नवीन सरकार किसान आत्महत्या और राशनकार्ड घोटाले से सहमी हुई है. उसे डर है कि कहीं उसका बना-बनाया जनाधार ही खिसकने न लगे.'' लेकिन दास का मानना है कि हाल-फिलहाल में ऐसा होता लगता तो नहीं है क्योंकि नवीन पटनायक का बीपीएल वोट बैंक जबरदस्त है.
इस वोट बैंक में सेंधमारी करना किसी भी दल के लिए आसान नहीं है. दूसरी तरफ मोदी और उनके मंत्रियों के लगातार हो रहे ओडिशा दौरे से बीजद नेता भी सकपकाए हुए हैं. बीजेपी को भी लगता है कि अगर पंचायत चुनाव तक वह अपना जनाधार बढ़ा सकी तो यह एक उपलब्धि होगी. बीजेपी नेता बीजद सरकार के प्रति ज्यादा आक्रामक नहीं हैं. इसकी एक वजह यह है कि केंद्र में विधेयकों को पास कराने में राज्यसभा में बीजद सांसदों की सहायता की जरूरत पड़ सकती है.
उधर, किसानों के सवाल पर वामदल सीपीआइ, सीपीआइ (एम), सीपीआइ (एमएल) और फॉरवर्ड ब्लॉक एक मंच पर आ चुके हैं. मोदी की किसान रैली वाले दिन ही यानी 21 फरवरी को वामदल भुवनेश्वर में संयुक्त सम्मेलन आयोजित करेंगे. बाद में 19 मार्च को भुवनेश्वर में रैली भी करेंगे. सीपीआइ सेक्रेटरी दिवाकर नायक कहते हैं, ''16 साल से शासन कर रहे बीजद ने कृषि के सवाल पर कुछ नहीं किया. केंद्र और राज्य सरकार ओडिशा की बदहाली के लिए बराबर की जिम्मेदार हैं.''
नव निर्माण कृषक संगठन के नेता अक्षय कुमार ने किसानों को एक क्विंटल धान, पांच हजार रु. और इतनी ही रकम का सुरक्षा भत्ता देने की मांग की है. उन्होंने राज्य के 36 लाख किसान परिवारों को 21,600 करोड़ रु. पेंशन (राज्य बजट का 4 फीसदी) देने की मांग को लेकर 18 फरवरी को एक किसान सम्मेलन बुलाया है. इससे पहले 17 फरवरी को कटक से 20,000 किसान पदयात्रा निकालकर भुवनेश्वर जाएंगे. संगठन का कहना है कि राज्य की 70 फीसदी आबादी अपनी आजीविका के लिए खेतीबाड़ी पर निर्भर है, लेकिन सरकार उनकी ओर से बिल्कुल बेखबर है.
कृषक संगठन के संयोजक अशोक प्रधान की मानें तो जून, 2015 से लेकर अब तक पूरे राज्य में 200 से भी ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. इनमें से 35 किसान तो सिर्फ बरगढ़ (कांग्रेस के श्वेतपत्र और मीडिया के मुताबिक 23) के हैं. उधर मुख्यमंत्री पटनायक ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम भी उठाए हैं. उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली से सूखा और कर्ज पीड़ित किसानों के लिए 3,500 करोड़ रु. की राहत मांगी है. उन्होंने कृषि के लिए बजट में 10,900 करोड़ रु. अलग से रखे और इसमें बीजू कृषक कल्याण योजना के तहत किसानों के लिए एक लाख के बीमा का भी प्रावधान रखा.
नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, ओडिशा में 57.5 फीसदी किसान परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं. यहां के एक किसान परिवार की मासिक आय 4,976 रु. है. ओडिशा इकोनॉमिक सर्वे 2014-15 के अनुसार खेती की विकास दर 2013 में 12.3 फीसदी थी, लेकिन समुद्री तूफान और बाढ़ के कारण यह दर इस कदर नकारात्मक हो गई कि 1.97 फीसदी पर ही सिमटकर रह गई.
ओडिशा में अब यह स्थिति है कि किसानों की रीढ़ की हड्डी टूट गई है. मजदूरी के लिए लोग शहरों और दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं. फेलिन समुद्री तूफान से पीड़ित किसानों को अभी तक मुआवजा नहीं मिला है. लेकिन सरकार को आपदा प्रबंधन का अवॉर्ड जरूर मिल गया. किसान नेता शैलजा रवि कहते हैं, ''आज तक ओडिशा सरकार ने खेतिहर मजदूरों की पहचान नहीं कराई, जबकि आत्महत्या करने वालों में उन्हीं की संख्या ज्यादा है. सरकारी संस्थाओं की ओर से प्रति एकड़ 15,000 रु. का कर्ज दिया जाता है, जो कि बहुत कम है.''
ओडिशा में लगभग 70 लाख किसान परिवार हैं, जिनमें से 60 फीसदी खेतिहर मजदूर हैं. ओडिशा की 80 फीसदी खेती यही खेतिहर मजदूर करते हैं. हालांकि सरकार ने 1965 में खेतिहर किसानों के लिए भूमि सुधार अधिनियम बनाया था पर यह लागू नहीं हो पाया. नवीन पटनायक सरकार ने 2011 में इस कानून में संशोधन तय किया था, लेकिन यह भी लागू नहीं हुआ. यदि यह कानून लागू हो गया तो बंटाई पर खेती करने वाले यानी खेतिहर मजदूरों को वही अधिकार मिल जाएंगे, जो आम किसानों को मिलते हैं. यानी कर्ज, बीमा योजना का लाभ.
फिलहाल सरकार ने महाधिवक्ता से खेतिहर किसानों के कानूनी संरक्षण पर राय मांगी है. सरकार अब उन्हें दस हजार करोड़ रु. का ऋण देने पर विचार कर रही है यानी किसानों को कर्जदार बनाने का सरकारी रास्ता. मुमकिन है इससे उनकी राह कुछ आसान हो सके.
कहां है किसान आयोग की रिपोर्ट?
ओडिशा सरकार ने राज्य किसान आयोग की रिपोर्ट पर अमल करना तो दूर, उसे सार्वजनिक तक नहीं किया. हाइकोर्ट में एक सामाजिक कार्यकर्ता निशिकांत ने जनहित याचिका दायर की है. यह आयोग पूर्व मुख्य सचिव एस.एस. पटनायक की अध्यक्षता में 2 जनवरी, 2010 को गठित हुआ था. 2012 में आयोग ने सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी. इसमें खेती-बाड़ी को रोजगारपरक बनाने और बीज, खाद, सिंचाई, जलवायु के मुताबिक खेती की विभिन्न श्रेणी बनाकर किसानों के कल्याण के लिए जरूरी कदम उठाने की सिफारिश की गई थी. कृषि मंत्री प्रदीप महारथी कहते हैं कि आयोग की सिफारिशों पर जल्द ही विचार करके इसे लागू किया जाएगा.
ओडिशाः पूर्वी भारत का नया विदर्भ बरगढ़
बरगढ़ में किसानों की सिलसिलेवार आत्महत्या ने इसे नेताओं की रैलियों और राहत घोषणाओं का नया केंद्र बनाया.

अपडेटेड 26 फ़रवरी , 2016
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