किरन चोपड़ा (58 वर्ष) एमडी, चोपड़ा रीटेक रबर प्रोडक्ट्स लिमिटेड
एस्टन मार्टिन वन-77 को पहचानते हैं? वही जेम्स बॉन्ड वाली कार. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ढाई करोड़ रु. की लागत वाली यह अनोखी 77 कारें तभी सड़क पर चल पाईं जब इसके साइलेंसर में लखनऊ के बने रबर पाट्र्स लगाए गए. ये कारें 2010 की शुरुआत में बनकर तैयार हो गई थीं लेकिन इनके साइलेंसर के रबर पार्ट्स में खराबी आ जाने के कारण सड़क पर न उतर सकीं. ब्रिटेन स्थित एस्टन मार्टिन के मुख्यालय ने विदेश में मौजूद सभी बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों से संपर्क साधा लेकिन उनके उपकरण जेम्स बॉन्ड की इस कार को दौड़ा न सके. साइलेंसर के रबर पार्ट्स निर्माताओं की बड़ी शिद्दत से खोज में जुटी एस्टन मार्टिन कंपनी का सितंबर, 2010 में लखनऊ की चोपड़ा रीटेक रबर प्रोडक्ट्स लिमिटेड के एमडी किरन चोपड़ा से संपर्क हुआ. कुछ महीनों के प्रयास के बाद किरन की कंपनी का बनाया रबर उपकरण एस्टन मार्टिन के मॉडल वन-77 में फिट बैठ गया और ये महंगी लग्जरी 77 कारें सड़कों पर दौडऩे लगीं.
लखनऊ के गोखले मार्ग निवासी किरन चोपड़ा उस परिवार से ताल्लुक रखते हैं जो आजादी से पहले पाकिस्तान के पेशावर में ऑटोमोबाइल के व्यापार में अग्रणी था. रॉल्स रॉयस से लेकर एंबेसडर जैसी गाडिय़ों की एजेंसी इनके पास थी. देश के बंटवारे के बाद इनका परिवार भारत आ गया. यहां भी वे गाडिय़ों को बेचने का व्यवसाय ही करने लगे. हालांकि किरन के पिता जे.सी. चोपड़ा के मन में कुछ और ही चल रहा था. वे गाडिय़ों के बिजनेस से हटकर निर्माण के क्षेत्र में हाथ आजमाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने लखनऊ में ऐशबाग के तालकटोरा में रबड़ की एक छोटी-सी फैक्ट्री खरीदी और गाडिय़ों में लगने वाले रबर के पार्ट्स बनाने शुरू किए.
उस वक्त लखनऊ के सेंट फ्रांसिस कॉलेज में पढ़ रहे किरन की रबर टेक्नोलॉजी में खास दिलचस्पी थी. 1973 में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने विश्व विख्यात लंदन कॉलेज ऑफ रबर टेक्नोलॉजी में दाखिला लिया. दो साल की पढ़ाई के दौरान किरन ने कॉलेज में टॉप किया. इसका फायदा यह हुआ कि उन्हें विश्व की अग्रणी कंपनियों में रबर टेक्नोलाजी में प्रशिक्षण पाने का मौका मिला. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और जब पढ़ाई पूरी कर किरन लखनऊ वापस आए तो उन्होंने अपने पिता को इस बात के लिए राजी किया कि अगर बिजनेस को आगे बढ़ाना है तो इसे विदेशों तक पहुंचाना पड़ेगा.
यहीं से एक नई शुरुआत हुई. किरन बताते हैं, “मैंने सोचा कि जो सबसे कठिन बाजार है अगर वहां हमने कामयाबी हासिल कर ली तो दुनिया में हम छा जाएंगे.” चूंकि उन दिनों भी ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में जर्मनी अग्रणी था इसलिए किरन ने जर्मन इंजीनियरिंग पर ध्यान लगाया. जर्मनी में हर साल सितंबर में दुनिया का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल मेला लगता था. 1977 में किरन वहां गए, गाडिय़ां देखीं लेकिन वे दुविधा में थे. वे बताते हैं, “मैंने सोचा कि हमारी कंपनी का बिजनेस तभी बढ़ेगा जब हम वे पार्ट्स बनाएं जो बार-बार खराब होते हों. ये वे पार्ट होंगे जो गाड़ी के नीचे लगे होंगे.” किरन ने एक कार के निचले हिस्से का मुआयना किया तो पाया कि धुआं छोडऩे वाले साइलेंसर के साथ कई सारे रबर के पार्ट्स लगे होते हैं जो उसके कंपन को गाड़ी में फैलने से रोकते हैं. उस वक्त अंतरराष्ट्रीय बाजार में तीन गाडिय़ां मर्सिडीज-बेंज, फॉक्सवैगन और जनरल मोटर्स की ओपेल ज्यादा बिकती थीं. किरन इन गाडिय़ों के साइलेंसर के रबर पार्ट्स के नमूने लेकर लखनऊ आए और एक वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद हू-ब-हू वैसे ही रबर पार्ट्स तैयार कर लिए. इस बार जर्मनी के ऑटोमोबाइल मेले में एक स्टॉल लगाकर लखनऊ के बने इन पार्ट्स का प्रदर्शन किया गया. इन्होंने कार निर्माता कंपनियों का ध्यान तो बटोरा लेकिन ये भारत में भी बन सकते हैं, इसे लेकर अंदेशा था. किरन बताते हैं, “हमने नई कारों के लिए रबर पार्ट्स बनाने पर फोकस नहीं किया क्योंकि लखनऊ में बैठकर इन बड़ी कंपनियों की डिमांड पूरी नहीं की जा सकती थी. हमने पार्ट्स के रिप्लेसमेंट का बाजार पकड़ा. मतलब नई गाडिय़ों के पाट्ड्ढर्स खराब होने पर जब वे बदले जाएं तो वह हमारा ही लगे.” जर्मनी के ऑटोमोबाइल मेले में “रीटेक कंपनी” के मालिक रीटेक को किरन के उपकरण बेहद पसंद आए. कुछ दिनों बाद वे किरन की फैक्ट्री देखने लखनऊ भी आए और भरोसा होने पर साइलेंसर के दो लाख रबर पार्ट्स बनाने का ऑर्डर दिया.
पहली बार लखनऊ ही नहीं देश में किसी भी निर्माण कंपनी को विदेशी कंपनी से इतना बड़ा ऑर्डर मिला था. किरन ने बैंक से उधार लेकर अपना ऑर्डर पूरा किया. चूंकि ये पार्ट्स विश्वस्तरीय गुणवत्ता वाले थे, इसलिए विश्व की सबसे मशहूर गाडिय़ों में साइलेंसर के रिप्लेसमेंट रबर पार्ट्स के बाजार में लखनऊ छाने लगा. जर्मनी के अलावा अमेरिका के बाजार में भी इन उपकरणों की मांग बढ़ी. देखते ही देखते किरन की कंपनी रिप्लेसमेंट बाजार की अगुआ बन गई लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों नहीं टिक सकी. अस्सी के दशक में रुपया मजबूत हो रहा था और अब विदेशी कंपनियों को भारत से व्यापार करना घाटे का सौदा महसूस होने लगा. हालात ये हो गए कि 1985 आते-आते किरन को रबर के पार्ट्स बनाने का कारखाना बंद करना पड़ा. कुछ दिनों बाद इसे बेचकर किरन दूसरे व्यवसायों में ध्यान लगाने लगे.
“बिट्स” के नाम से लखनऊ में एक कंप्यूटर एजुकेशन सेंटर खोला, जिसने छात्रों के बीच काफी ख्याति बटोरी. सात साल बाद 1992 में जब रुपया डॉलर के मुकाबले काफी कमजोर हुआ तो हालात फिर बदले. विदेशी कंपनियों के लिए भारत से व्यापार करना फायदेमंद हो गया था. एक बार फिर रीटेक कंपनी के मालिक ने किरन से संपर्क किया. अब एक नई कंपनी चोपड़ा रीटेक रबर प्रोडक्ट्स लिमिटेड की नींव पड़ी. लखनऊ में चिनहट के देवा रोड पर बंद पड़ी एक फैक्ट्री खरीदी गई. नई मशीनें खरीदी गईं और डेढ़ साल के भीतर इनमें काम शुरू हो गया. तीन से चार साल के भीतर चोपड़ा-रीटेक की जुगलबंदी ने यूरोप में साइलेंसर के रबर पार्ट्स के बाजार पर अपना कब्जा जमा लिया. सात वर्ष बाद किरन ने लखनऊ में ही विदेशी कारों के सस्पेंशन में लगने वाले रबर के बुश बनाने शुरू किए जो बाजार में छा गए. आज स्थिति यह है कि विदेशी कारों के साइलेंसर के रबर पार्ट्स बेचने वाली सबसे बड़ी कंपनी “टेनेको” और सस्पेंशन के रबर पार्ट्स की सप्लाइ करने वाली सबसे बड़ी कंपनी “फेडरलमोगल” की लखनऊ की चोपड़ा रीटेक रबर प्रोडक्ट्स लिमिटेड सबसे बड़ी और पसंदीदा सप्लायर है.
किरन चोपड़ा फख्र के साथ कहते हैं, “हमारी कंपनी का आयात शून्य और निर्यात सौ फीसदी है.” इतना ही नहीं, 1960 से लेकर अब तक दुनिया में बनी सभी कारों के साइलेंसर के रबर पार्ट्स लखनऊ की इस कंपनी के पास मौजूद हैं जो कहीं और नहीं हैं.

