उत्तराखंड बीजेपी में इन दिनों घमासान है. एक ओर पार्टी 2017 में प्रदेश में सत्तारूढ़ होने का दावा करते नहीं थक रही, वहीं दूसरी ओर पार्टी का अगला प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा, इस मुद्दे पर ही कोई फैसला नहीं हो पा रहा है. राज्य में पिछले चार उपचुनावों में शिकस्त झेलने और पंचायती तथा स्थानीय निकाय चुनाव में बीजेपी का सूपड़ा पूरी तरह साफ होने के बाद से पार्टी अध्यक्ष पर खतरे के बादल मंडरा रहे थे. अब तो वर्तमान अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत का कार्यकाल भी पूरा हो गया है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि उत्तराखंड में बीजेपी का अगला प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा?
कई नामों को लेकर चर्चाओं और अफवाहों का बाजार गर्म है. सतपाल महाराज, सांसद रमेश पोखरियाल निशंक, नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट, सांसद भगत सिंह कोश्यारी के अलावा पार्टी के संगठन मंत्री रह चुके और पूर्व कैबिनेट मंत्री त्रिवेंद्र सिंह और पार्टी के संगठन मंत्री रहे डॉ. धन सिंह रावत और नरेश बंसल का नाम भी लिया जा रहा है. खटीमा से विधायक पुष्कर सिंह धामी के नाम पर भी अटकलें लग रही हैं.
इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री और नैनीताल लोकसभा सीट से सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने अपने नाम की अफवाह से साफ इनकार किया है. वे कहते हैं, “किसी युवा को ही पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए.” नरेंद्र मोदी और अमित शाह से नजदीकी के कारण राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी का नाम भी अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल बताया जा रहा है, लेकिन बलूनी खुद अपनी सफाई देते हुए कहते हैं, “मैं दिल्ली में खुश हूं. इसलिए पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनने में मेरी कोई रुचि नहीं है.”
नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट का नाम भी संभावित लोगों की फेहरिस्त में शामिल है.लेकिन वे भी अपनी सफाई पेश करने में किसी से पीछे नहीं हैं. अजय भट्ट कहते हैं, “पार्टी ने मुझे नेता प्रतिपक्ष बनाकर इज्जत दी है. अब मैं पार्टी अध्यक्ष की किसी दौड़ में शामिल नहीं हूं. मेरा पूरा ध्यान इस वक्त 2017 के चुनावों पर है.” कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए सतपाल महाराज का नाम भी उठ रहा है, लेकिन उन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी में बिखराव का डर है.
अब बचे पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक. पार्टी सूत्रों का कहना है कि निशंक अंदरखाने में धनसिंह रावत को अध्यक्ष बनाए जाने के लिए प्रयासरत हैं. धनसिंह रावत के नाम पर पूर्व मुख्यमंत्रियों भगत सिंह कोश्यारी और भुवन चंद्र खंडूड़ी ने मौन साध रखा है. खंडूड़ी कहते हैं, “पार्टी जिसे चाहेगी, उसे तय कर देगी. दिसंबर में यह तय हो जाएगा.”
इन दोनों की तटस्थता को केंद्रीय मंत्रिमंडल के संभावित विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है. बीजेपी का मानना है कि 2017 से पहले यदि केंद्रीय मंत्रिमंडल में उत्तराखंड को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया तो कांग्रेस इसे बीजेपी के खिलाफ एक अस्त्र के रूप में भुनाएगी और पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी यह समझता है.
इसके बाद मैदान में दो ही प्रमुख नाम शेष बचते हैं&धनसिंह रावत और पूर्व कैबिनेट मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत. त्रिवेंद्र सिंह लोकसभा चुनाव के समय उनके साथ यूपी में चुनाव सहप्रभारी के रूप में काम कर चुके हैं और अमित शाह के नजदीकी हैं. कोश्यारी, निशंक और भुवन चंद्र खंडूड़ी की धनसिंह के नाम पर मौन सहमति है. संगठन में भी धनसिंह की मजबूत पकड़ है.
अब देखना यह है कि आखिरकार कौन-सा सियासी गणित कहां सही बैठता है और कौन-सा कयास सही साबित होता है. फिलहाल अध्यक्ष पद को लेकर हो रही उथल-पुथल के बीच पार्टी 2017 की चुनावी तैयारियों में पिछड़ रही है. कांग्रेस ताबड़तोड़ दौरे और घोषणाएं कर रही है और जनता में अपनी पकड़ बना रही है. बीजेपी का यह संकट हल हो तो वह आने वाले दूसरे सियासी संकटों पर विचार करे.

