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संसद: विपक्ष की तरफ हाथ बढ़ाने की मजबूरी

बिहार चुनाव में हार के बाद लगता है मोदी सरकार को एहसास हो गया है कि संसद में विपक्षी दलों से असहयोग मोल लेने से बेहतर रणनीति है उनकी तरफ हाथ बढ़ाना

अपडेटेड 7 दिसंबर , 2015

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक पारित कराने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के चालू शीतकालीन सत्र में विपक्ष की ओर हाथ बढ़ाया है. वहीं बाकी सरकार भी यह सुनिश्चित कर रही है कि वह ऐसा कुछ भी न करे, जो विपक्ष को नाराज कर दे और वह अपना मन बदल ले. लिहाजा वित्त मंत्री अरुण जेटली कांग्रेस के साथ बातचीत शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, वे कांग्रेस के इस प्रस्ताव से सहमत हैं कि एक विवाद निवारण ढांचा स्थापित किया जाना चाहिए, जिसकी अध्यक्षता एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश करें. यह उन तीन मुद्दों में से एक है, जिनके लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा था कि अगर बीजेपी जीएसटी विधेयक पारित कराने में बिना शर्त समर्थन चाहती है, तो उसे इन्हें तो मानना ही होगा. यह विवाद निवारण ढांचा केंद्र और राज्यों के बीच संभावित विवादों को हल करने का काम करेगा.

जेटली के अलावा, संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू और वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमन को विपक्षी दलों से बातचीत करने और उन्हें साथ लाने का दायित्व सौंपा गया है. सरकार का कहना है कि वह जीएसटी पर वार्ता शुरू करने के लिए इस सप्ताह के अंत तक सोनिया गांधी के अमेरिका में चिकित्सा उपचार से वापस लौटने का इंतजार करेगी. विवाद निवारण ढांचे के अलावा, कांग्रेस एक प्रतिशत अतिरिक्त सेस को भी खत्म कराना चाहती है, जिसकी मांग मोटे तौर पर विनिर्माण उद्योग वाले राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात) ने की है. इसके साथ ही वह जीएसटी की दर की अधिकतम सीमा 18 प्रतिशत कराना और इसका उल्लेख बिल में भी चाहती है.

वेंकैया नायडू इस बात पर जोर देते आ रहे हैं कि जीएसटी विधेयक और अन्य मुद्दों पर प्रगति के लिए टकराव की बजाए 'लेन और देन' और 'लोकतंत्र की भावना' जरूरी है. हालांकि जेटली बिल में जीएसटी की सीमा 18 प्रतिशत रखने को लेकर थोड़े चिंतित हैं, क्योंकि कई राज्यों ने विशेष तौर पर लग्जरी वस्तुओं पर अतिरिक्त करों के लिए दबाव बना रखा है. केंद्र और राज्यों में एक दोहरी कर संरचना पहले से है. बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार करते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव में हार के बाद बीजेपी ने महसूस किया था कि विपक्ष की बात सुनने और उसकी आलोचना स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

एक अन्य बीजेपी नेता ने फिलहाल पार्टी की मजबूरी को स्वीकार किया कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी के किसी भी अन्य प्रमुख राज्य में चुनाव जीतने की संभावना नहीं है. 2016 में, तृणमूल कांग्रेस संभवत: पश्चिम बंगाल में सत्ता में बरकरार रहेगी और यहां तक कि असम में भी कड़ा संघर्ष रहेगा, ठीक पंजाब की तरह, जहां 2017 की शुरुआत में चुनाव होना है. इस बीजेपी नेता ने कहा, ''हमें इस सच को स्वीकार करना होगा कि हमें राज्यसभा में बहुमत लायक संख्या नहीं मिलेगी. इसका मतलब है कि 2019 में जब तक लोकसभा चुनाव नहीं हो जाते, हमें विपक्ष से हाथ मिलाना होगा. ''

यह पूछे जाने पर कि क्या संसद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री की उपस्थिति और असहिष्णुता पर हुई बहस के उनके जवाब, इस बदलाव की मिसाल हैंक्योंकि मानसून सत्र में प्रधानमंत्री कभी-कभार ही सदन के अंदर दिखे थेबीजेपी नेता ने कहा, ''अगर आप यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह परिवर्तन बिहार में हार के बाद हुआ है तो यह गलत नहीं होगा. ''

यह नया अध्याय बिहार में बीजेपी की हार के बाद बनी नई राजनैतिक रणनीति के केंद्र में है और अब यह सबकी नजरों में आकर्षण का बिंदु है. बिहार विधानसभा चुनाव निश्चित तौर पर एक ऐतिहासिक घटना है जिसने बीबी और एबी जैसे नए जुमलों को जन्म दिया है, इनका मतलब है बिफोर बिहार यानी बिहार से पहले और आफ्टर बिहार यानी बिहार के बाद ये 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी-अमित शाह गठबंधन की अद्भुत जीत के पुराने अभिमान को तोड़ रही है.

लिहाजा प्रधानमंत्री ने आदेश दिया कि लोकसभा में असहिष्णुता पर बहस के दौरान बीजेपी शांत बैठेगी और बिना सुगबुगाहट के विपक्ष को सुनेगी, और जब बोलने की उनकी बारी आई, तो उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू की इस समझदारी की सराहना की कि उन्होंने राम मनोहर लोहिया की इस बात को स्वीकार किया था कि कुछ मामलों में वे गलत रहे थे. क्या इस तरह से यह मोदी की ओर से एक अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति थी कि वे भी गलत रहे थे? तृणमूल कांग्रेस के नेता सौगत रॉय ने इंडिया टुडे को बताया कि बिहार चुनाव ने ''निश्चित रूप से बीजेपी को होश में ला दिया है और उसका अहंकार ध्वस्त कर दिया है. विपक्ष से बात करने में उनके दृष्टिकोण में एक निश्चित बदलाव हुआ है. ''

यह पूछे जाने पर कि यह नजर कैसे आता है, रॉय ने कहा कि नायडू विपक्ष तक बहुत ज्यादा बढ़ रहे हैं, जेटली जीएसटी विधेयक पारित कराने के लिए विपक्ष से मदद मांगने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, और सदन में बोलने की विपक्ष की मांगों को सहानुभूति से लिया जा रहा है. इस सब से बढ़कर, खुद मोदी ने जीएसटी गतिरोध तोडऩे के प्रयास में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और अपने पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह को चाय पर बुलाया और उनकी मेजबानी की.

तृणमूल कांग्रेस के नेता रॉय कहते हैं, ''बीजेपी की नई रणनीति है कि काम करो और परिणाम दिखाओ. लोग पूछ रहे हैं, काम क्या किया है? यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि संसद चले. पिछले सत्र से विपरीत जो पूरी तरह से बेकार गया था, अगर इसी तरह से एक और सत्र भी बेकार चला जाता है, तो बीजेपी के नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठेंगे. ''

बीजू जनता दल के सांसद बिजयंत पांडा मानते हैं, '' हाशिए पर पड़े कुछ दक्षिणपंथी तत्वों ने देश की स्थिति में उत्तेजना भर दी है. '' वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री ''मध्यमार्ग की ओर बहुत अधिक बढ़ रहे हैं. ऐसा नहीं है कि इससे पहले वे संसद में हाशिए पर पड़े तत्वों के खिलाफ नहीं बोले हैं, बात सिर्फ यह रही कि वे तुरंत नहीं बोले थे. ''

धर निजी तौर पर बीजेपी के नेता अभी भी चुपचाप मुंह दबाकर हंस रहे हैं कि जीएसटी विधेयक में संशोधन की कांग्रेस की ये तीन मांगें यहां तक कि कांग्रेस के खुद अपने मसौदे में भी मौजूद नहीं थीं, लेकिन सार्वजनिक रूप से कोई भी कांग्रेस के खिलाफ एक शब्द भी कहने की हिम्मत नहीं करता. यहां तक कि जब राहुल गांधी ने विदेश राज्यमंत्री वी.के. सिंह के दलित बच्चों की कुत्तों से तुलना करने की टिप्पणी पर खरी-खोटी कही, तो भी सत्ता पक्ष वाले अपनी सीटों से नहीं उठे और न ही उन्होंने किसी तरह का विरोध किया.

असल में, सुना यह गया है कि बीजेपी नेताओं के लिए एक अनौपचारिक फतवा जारी किया गया है कि वे तुरंत उस अहंकार का प्रदर्शन रोक दें, जो इन पिछले 18 महीनों का पर्याय बन गया है. अभिमान समाप्त हो चुका है, विनम्रता आ गई है. यहां तक कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी बिहार हार के बाद से सुने कम और देखे ज्यादा जाते हैं. हालांकि एक अपवाद के तौर पर हाल ही में असम में एक सभा में उन्होंने कहा कि तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार मुस्लिम अल्पसंख्यकों को तुष्ट करने पर इतनी उतारू है कि गोगोई जल्द ही असम को बांग्लादेश का हिस्सा बना देंगे.

लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई बाघ अपना अंदाज बदल सकता है? क्या नरेंद्र मोदी गंभीरता से इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि भारत, असल में, गुजरात की तुलना में बहुत बड़ा है और साथ ही बहुत अधिक विविध भी है, लिहाजा इसे अलग ढंग से संभाला जाना होगा?

जनता दल (यूनाइटेड) के नेता पवन वर्मा उन लोगों में से एक हैं जो मानते हैं कि 'बिहार में हार के बावजूद, यह सोचना गलती होगी कि बीजेपी एक अधिक उदार पार्टी होती जा रही है. उसका एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि उसे अपने हिंदुत्व मुद्दे पर और अधिक जोर देना होगा, जिसका अर्थ है कि वह आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने ऊंची जाति के हिंदू वोट पर और अधिक निर्भर होगी. इससे मतदाताओं का ध्रुवीकरण और भी अधिक होगा. ' वर्मा कहते हैं कि जेडी(यू) अन्य विपक्षी दलों की तरह जीएसटी का समर्थन करेगा, क्योंकि यह 'सदन की भावना' है, लेकिन वे चेतावनी देते हैं कि जैसे ही जीएसटी विधेयक पारित हो जाएगा, बीजेपी अपना हाल में अख्तियार किया संयम खो देगी.

लेकिन जो लोग मोदी को पिछले कई वर्षों से जानते हैं, वे कहते हैं कि शीर्ष पर पहुंचने की मोदी की भूख इतनी अधिक है कि 'वे परिस्थितियों के अनुरूप बदल जाएंगे, लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा को नजर से ओझल नहीं होने देंगे. ' एक विश्लेषक के मुताबिक, मई 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद संसद के सेंट्रल हॉल में बीजेपी संसदीय बोर्ड में मोदी का पहला भाषण इस तथ्य के लिए उल्लेखनीय था कि उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय जैसे आरएसएस के कई प्रतीक पुरुषों को याद किया था. विश्लेषक का कहना है कि ''उस वक्त, वे एक संघ प्रचारक की तरह अधिक और प्रधानमंत्री की तरह कम व्यवहार कर रहे थे. ''

एक साल बाद जुलाई 2015 में कजाकस्तान के अस्ताना में मोदी ने भारत और मध्य एशिया दोनों की 'इस्लामी विरासत' की प्रशंसा की थी, जो इस्लाम के उच्चतम आदर्शोंज्ञान, शील, दया और कल्याणसे परिभाषित थी, जिसने ''अतिवाद की शक्तियों को हमेशा अस्वीकार किया. '' इस विश्लेषक के मुताबिक, मोदी बीजेपी में दक्षिणपंथी हाशिए के लिए एक संकेत भेज रहे थे कि उसे अपने उग्र भाषणों का सुर नीचे करना चाहिए. पीछे मुड़कर देखें, तो बिहार में हार पर एक नया संसदीय जवाब दवा की वह खुराक हो सकती है, जिसकी जरूरत मोदी को अपने प्रधानमंत्री पद के धर्म की याद दिलाने के लिए थी. एक थके हुए पहले कार्यकाल में वापस जान डालने के लिए राख से फिर उठ खड़ा होना एक अच्छा तरीका है.

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