एलईडी लाइट या लाइट इमिटिंग डायोड (प्रकाश फैलाने वाले) सेमीकंडक्टर डिवाइस होते हैं जिनमें से जब इलेक्ट्रिक करंट दौड़ता है तो वे प्रकाश पैदा करते हैं. ये यहां नए नहीं हैं, कई सालों से रोशनी दे रहे हैं लेकिन डिजिटल घडिय़ों, कंप्यूटर स्क्रीन और यातायात के सिग्नल को. इन्हें प्रकाश के पारंपरिक स्रोत के रूप में नहीं देखा जाता था. बदलाव उस वक्त आया जब 2006 में नीदरलैंड की लेमनिस लाइटिंग एलईडी बल्बों का व्यावसायिक उत्पादन करने वाली दुनिया की पहली कंपनी बनी. अमेरिका और ब्रिटेन सरीखे ज्यादातर विकसित देशों ने बड़े पैमाने पर एलईडी बल्बों को अपनाया है. अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी के मुताबिक, “एलईडी लाइटिंग के व्यापक इस्तेमाल का अमेरिका में ऊर्जा बचत के क्षेत्र पर गहरा प्रभाव पड़ा है. एलईडी का इस्तेमाल किए जाने पर 2027 तक 348 टेरावॉट घंटे (गैर-एलईडी बल्बों का इस्तेमाल करने पर) बिजली बचाई जा सकती है. यह 44 बड़े ऊर्जा संयंत्रों (जिसमें से हर संयंत्र की क्षमता 1,000 मेगावॉट है) से हर साल पैदा होने वाली बिजली के बराबर है और कुल बचत 30 अरब डॉलर से भी ज्यादा है.
भारत में पहला एलईडी बल्ब 2009 में एनटीएल इलेक्ट्रॉनिक्स ने लेमनिस की तकनीक का इस्तेमाल करके बनाया था. 2014 में, एनटीएल ने लेमनिस का अधिग्रहण कर लिया और दुनिया का सबसे बड़ा एलईडी बल्ब निर्माता बन गया. आज भारत में ही दर्जन भर से ज्यादा कंपनियां एलईडी बल्ब बना रही हैं. केंद्र भी इसे बढ़ावा दे रहा है. लक्ष्य 77 करोड़ इनकैंडेसेंट बल्बों की जगह एलईडी को लाना है.

