राहुल गांधी के दिल्ली लौटने की अफवाह जिस दिन फैली, उसकी पूर्व संध्या पर वॉल स्ट्रीट जर्नल ने एक दिलचस्प लेख छापा जिसमें एक ग्राफिक भी था. इसमें दिखाया गया था कि कैसे राहुल को उनकी नियमित मौजूदगी के दिनों के मुकाबले दो महीने की गुमशुदगी के दौरान मीडिया में ज्यादा जगह दी गई. यह मौके पर की गई चोट थी क्योंकि अपने आत्मनिर्वासन के दिनों में राहुल हो सकता है कि उतने ही अंतर्मुखी रहे हों जितने दिल्ली में रहते वक्त होते हैं, लेकिन इस बार कम-से-कम उनको लेकर गहरी जिज्ञासा जरूर थी.
आपको उम्मीद रही होगी कि उनकी वापसी वैसे ही शांत होगी, जैसे वे चढ़े हुए शीशे वाली कार में अपने प्यारे जैक रसल्स कुत्ते के साथ घर को निकल लिए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार अपनी पार्टी की ओर से नरेंद्र मोदी को खड़ी की गई चुनौती का नेतृत्व करते हुए रामलीला मैदान में एक सुनियोजित किसान रैली की, जहां ''लाई गई'' भीड़ उनके गर्मजोशी भरे भाषण के हिसाब से अपने उत्साह का पर्याप्त प्रदर्शन नहीं कर सकी. रैली के दौरान सिर्फ एक बार सरगर्मी देखने को मिली, वह भी नकारात्मक प्रतिक्रिया के रूप में, जब लोगों को अपने बीच हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख अशोक तंवर दिखाई दिए.
गुलाबी साफा बांधे हुए अधिकतर लोग पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के लाए हुए थे और वे तंवर से इस बात को लेकर नाराज थे कि उन्होंने जाने-अनजाने में यह कह डाला था कि कांग्रेस के असली समर्थकों को साफा नहीं बांधना चाहिए. तंवर और हुड्डा के बीच का रिश्ता वैसे भी जगजाहिर है. इस घटना के माध्यम से राहुल को अपनी पार्टी के भीतर गुटबाजी और हताशा की भी एक तस्वीर देखने का मौका मिल गया. उनका भाषण भले ही आक्रोश भरा था, लेकिन वे न तो उनके वफादारों को और न ही उनके विरोधियों को हिला सका. उसमें कुछ भी नया नहीं था. इसकी बजाए कांग्रेस की रैली से ऐन पहले मोदी ने अपनी पार्टी के सांसदों को जो उपदेश दिया, वह कहीं ज्यादा सुर्खियों के लायक था.
अगली दोपहर लोकसभा में हालांकि यह तस्वीर नाटकीय तरीके से बदल चुकी थी. दो दिन बाद फिर बुधवार को राहुल पूरी तैयारी के साथ लोकसभा में पहुंचे. सवाल उठता है कि इसकी वजह क्या थी? वही राहुल जिनके भीतर की आग रामलीला मैदान में जुटे उन्हीं के पार्टी कार्यकर्ताओं के भीतर गर्मी नहीं पैदा कर सकी, आखिर समूचे विपक्ष को कैसे सक्रिय करने में कामयाब हो गए? इतने सारे लतीफों का विषय रहने वाले राहुल ने आखिर कैसे बीजेपी को रक्षात्मक मुद्रा अपनाने को बाध्य कर दिया, कम-से-कम पहली दोपहर ही सही? आजकल क्या कारगर होता है और क्या नहीं, उसके निर्णायक पैमाने पर जांचें तो सवाल बनता है कि आखिर राहुल पिछले सोमवार की शाम ट्विटर पर कैसे ट्रेंड कर रहे थे जबकि आइपीएल उनसे नीचे था. आइपीएल का यह सीजन शुरू होने के पिछले दो हफ्तों में ऐसा पहली बार हुआ!
इसे बढ़ा-चढ़ाकर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, इसीलिए मैं इस घटना को राहुल या उनकी पार्टी के लिए निर्णायक मोड़ जैसा कोई नाम देने तो नहीं जा रहा, खासकर इसलिए भी कि उनमें दोबारा उभरने की संभावनाएं अब दिख रही हैं. पिछले छह वर्षों के दौरान पहली बार और अपने राजनीतिक करियर में दूसरी बार (पहली बार 2009 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में 21 सीटें जीतकर) हालांकि उन्होंने सकारात्मक प्रभाव तो छोड़ा है, यह मानना होगा.
मैंने राहुल के भाषण में तैयारी की बात इसलिए कही क्योंकि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश और नेट निरपेक्षता जैसे दोनों ही मुद्दों पर पार्टी का कदम सुनियोजित, सुविचारित और प्रत्याशित था. जिस दोपहर सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति भवन तक निकले विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया था, उसी दिन तय हो गया था कि बीजेपी पर अपने हमले में कांग्रेस भूमि अधिग्रहण के मुद्दे को केंद्र में रखेगी. राहुल ने भी कोई नई बात नहीं कही. मोदी और कॉर्पोरेट की मिलीभगत का आरोप वे रामलीला मैदान में लगा ही चुके थे. कांग्रेसी जानते थे कि वे दोबारा वही बात बोलेंगे. लोकसभा चुनाव की हार के बाद तमाम कांग्रेसी नेता उनसे निजी मुलाकात करने गए थे और राहुल ने सबसे एक ही बात कही थीः इस हार के लिए दो कारण जिम्मेदार हैं, पहला मनमोहन सिंह सरकार, जिसने उनकी या कांग्रेस अध्यक्ष की बात नहीं मानी और दूसरा कारण वे कॉर्पोरेट हैं जिन्होंने अपने धनबल से चुनाव को खरीद कर मोदी की झोली में डाल दिया.
संसद में बुधवार के मुकाबले सोमवार को उनका प्रदर्शन ज्यादा असरदार रहा क्योंकि वे पहली बार एक खांटी सांसद की तरह बोल रहे थेः काफी समझदारी से सही जगहों पर विराम देते हुए और सटीक अदायगी के साथ नपा-तुला व्यंग्य, चुभते हुए शब्द और जुमलों से पर्याप्त भरा हुआ भाषण. उनका ''सूट-बूट की सरकार'' वाला जुमला तो सुर्खियों में ही रहा. सबसे ज्यादा हालांकि जो फर्क दिखा, वह यह था कि राहुल अब न सिर्फ श्रोताओं से बल्कि कैमरे से भी आंख मिलाकर बात करने लगे हैं. पहले ऐसा नहीं था. चुनावी सभाओं में भी वे आंख नहीं मिलाते थे. नेहरू-गांधी खानदान में भाषण देने की कला कभी स्वाभाविक नहीं रही, लेकिन इसमें एक आत्मविश्वास जरूर था जिसके चलते आप अपने मतदाताओं की आंखों में सीधे देख पाते हैं गोया कह रहे हों कि ''मेरी आंखों में देखो, मेरे लफ्जों को पकड़ो, क्या तुम्हें महसूस नहीं होता कि तुम्हें मुझ पर भरोसा करना चाहिए.''
राहुल अपने अवकाश के दिनों में चाहे जो करते रहे हों, लेकिन इस दौरान उन्होंने खुद को एक ऐसी चीज से मुक्त कर लिया है जो किसी भी नेता के लिए सबसे बुरी बात होती हैः आंख मिलाने में संकोच करना और खुद की छवि एक सनकी, गैर-जिम्मेदार तथा पलायनवादी के रूप में स्थापित करना. इस सनक को इस रूप में देखा जा सकता है कि एक दिन वे किसी आदिवासी गांव में होते हैं, दूसरे दिन किसी दलित के घर पर, फिर किसी लोकल ट्रेन में और फिर अचानक भूमि अधिग्रहण के स्थल पर पहुंच जाते हैं जहां से वापस ही नहीं आते. हर बार वे खुद को आदिवासी, दलित, किसान, प्रवासी मजदूर, सामान्य यात्री वगैरह के योद्धा के तौर पर प्रस्तुत करते हैं. यह प्रवृत्ति खतरनाक है क्योंकि देश की सबसे पुरानी और सर्वाधिक अखिल भारतीय मौजूदगी वाली राजनैतिक पार्टी पर उनका उत्तराधिकार तय है. मैंने अक्सर परिहास में ही सही यह कहा है कि राहुल अगर वास्तव में योद्धा हैं तो उन्हें पैराशूट रेजिमेंट का योद्धा होना चाहिए.
इस बदलाव का मतलब कांग्रेसियों के लिए यह है कि राहुल गांधी आखिरकार अपनी भूमिका में आ चुके हैं. उन्होंने जो लाइन चुनी है उस पर कई कांग्रेसियों को गंभीर संदेह है, खासकर उन्हें जो चुनाव लड़ते हैं. इन्हें राजीव गांधी के उन दिनों की याद आ जाती है जब उन्होंने दिल्ली की एक रैली में बोफोर्स के बाद पैदा हुए दबाव में कह डाला था कि ''नानी याद दिला देंगे.'' उनका इशारा अमेरिका वगैरह विदेशी ताकतों की ओर था जो उनकी सरकार को अस्थिर कर रही थीं. नेट निरपेक्षता पर बोलते हुए राहुल ने टाइम पत्रिका में ओबामा द्वारा की गई मोदी की तारीफ का उपहास उड़ाया. इसका प्रच्छन्न अर्थ यह था कि अमेरिकी राष्ट्रपति सिर्फ उन्हीं विदेशी नेताओं की सराहना करते हैं जो उनके टट्टू बनकर घूमते हैं. अमेरिका गोर्बाचेव का प्रशंसक इसलिए था क्योंकि उन्होंने रूस को टूट जाने दिया.
अमेरिका येल्तसिन की सराहना इसलिए करता था क्योंकि उन्होंने रूस के अधिकांश उद्योगों का निजीकरण कर डाला. ऐसी मान्यताएं शीत युद्ध के दौर मंन चलती थीं. आज ऐसी अप्रासंगिक बातें कहना हास्यास्पद है. एक बदली हुई दुनिया में जहां अमेरिका, क्यूबा और ईरान जैसे पुराने वैचारिक दुश्मन नए सिरे से दोस्ती कायम करने में लगे हैं, और इससे कहीं ज्यादा अहम यह तथ्य है कि जब खुद कांग्रेस की सरकार ने अपना वजूद जोखिम में डालते हुए अमेरिका के साथ पहली रणनीतिक साझेदारी को अंजाम दिया हो (परमाणु करार), इस तरह की बातें करना निराशावाद है.
वास्तव में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने ही अमेरिका से सबसे ज्यादा मात्रा में सीधे सरकारी रास्ते से हथियारों की खरीद की (जिसे अमेरिका में फॉरेन मिलिटरी सेल्स या एफएमएस कहते हैं). एक आत्मविश्वासविहीन और सनकी उत्तराधिकारी से एक संवादी नेता के रूप में कायांतरण होना एक बात है, लेकिन यह कोई नहीं चाहेगा कि कांग्रेस पार्टी का यह युवा नेतृत्व अपने मरहूम चाचा की तरह सिर्फ बवाल खड़ा करने और बहस करने का काम करे.
कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि ये शुरुआती दिन हैं और लोकसभा में घटकर 44 की संख्या पर पहुंच जाने तथा परंपरागत रूप से अपने सबसे मजबूत दो गढ़ों-दिल्ली और आंध्र प्रदेश (जिसमें अब दो राज्य तेलंगाना और सीमांध्र हो गए हैं) में खत्म हो जाने के मद्देनजर राहुल को अतिवादी तरीकों का सहारा लेना पड़ सकता है. अब ऐसा लगता है कि कांग्रेस में उत्तराधिकार की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जो अपरिहार्य थी लेकिन जिसमें कुछ संकोच भी था. इसका एक सीधा लाभ पार्टी की नई पीढ़ी को होगा जिनमें अधिकतर खानदानी नेता हैं, दो या तीन बार सांसद रह चुके हैं, बावजूद इसके जिन्हें अपना कद कम करके रखना पड़ता है और यूपीए की सरकार में जो कैबिनेट रैंक तक सिर्फ इस इंतजार में नहीं पहुंच सके कि राहुल आगे आकर कमान संभालें. इस लिहाज से इन युवा नेताओं के लिए भी उत्तराधिकार की प्रक्रिया अब पूरी हो चुकी है क्योंकि संभव है, पुराने नेता अब दरकिनार कर दिए जाएंगे. सचिन पायलट, दीपेंदर हुड्डा, जितिन प्रसाद, गौरव गोगोई, आरपीएन सिंह, शर्मिष्ठा मुखर्जी, मिलिंद देवड़ा, प्रणिति शिंदे जैसे युवा जाहिर तौर पर रेणुका चौधरी, शकील अहमद, मीम अफजल या संजय झा के मुकाबले इस पार्टी को कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से बचाने का काम कर सकते हैं.
सबसे ज्यादा अहम बात यह है कि राहुल ने उस सबसे खतरनाक सवाल का जवाब पार्टी को दे डाला है जो लोकसभा चुनाव की हार के बाद से ही पार्टी के सिर पर मंडरा रहा थाः क्या हमारा कोई भविष्य है? व्यावहारिक और चुनावी भविष्यवाणी के लिहाज से पार्टी में कोई उम्मीद नजर नहीं आती. योगेंद्र यादव ने ठीक स्थापना दी थी कि एक बार जब कोई पार्टी किसी राज्य में 15 फीसदी की वोट हिस्सेदारी से नीचे आ जाती है तो उसकी बहाली तकरीबन नामुमकिन होती है. इस हिसाब से अगर आप भारत के मानचित्र पर कांग्रेस की मौजूदगी को आंकें तो पाएंगे कि कई राज्यों में यह पार्टी इस स्तर से नीचे जा चुकी है और स्थिति निराशाजनक है.
राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके पास 20 फीसदी के आसपास वोट हैं और जैसा कि राहुल के नए सलाहकारों का मानना है, आप ऐसी किसी भी पार्टी को खत्म हो चुका नहीं कह सकते जो जबरदस्त हार की स्थिति में भी इतने वोट लेकर आई हो. वे कहते हैं कि मोदी के प्रधानमंत्री होने और न होने के बीच सिर्फ पांच फीसदी वोटों की दूरी है. कांग्रेस अगर दूसरी गैर-बीजेपी ताकतों के साथ मिलकर बीजेपी से सिर्फ पांच फीसदी वोट छीन ले और उसे 31 फीसदी से 26-27 फीसदी तक ला दे, तो तस्वीर बदल जाएगी. फिलहाल लक्ष्य सत्ता में लौटना नहीं बल्कि मोदी को कमजोर करना है. अगर इस लक्ष्य के लिए प्रचार में कॉर्पोरेट भारत और अमेरिकी नीति के खिलाफ भी बोलना पड़े, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है.
आपको उम्मीद रही होगी कि उनकी वापसी वैसे ही शांत होगी, जैसे वे चढ़े हुए शीशे वाली कार में अपने प्यारे जैक रसल्स कुत्ते के साथ घर को निकल लिए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार अपनी पार्टी की ओर से नरेंद्र मोदी को खड़ी की गई चुनौती का नेतृत्व करते हुए रामलीला मैदान में एक सुनियोजित किसान रैली की, जहां ''लाई गई'' भीड़ उनके गर्मजोशी भरे भाषण के हिसाब से अपने उत्साह का पर्याप्त प्रदर्शन नहीं कर सकी. रैली के दौरान सिर्फ एक बार सरगर्मी देखने को मिली, वह भी नकारात्मक प्रतिक्रिया के रूप में, जब लोगों को अपने बीच हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख अशोक तंवर दिखाई दिए.
गुलाबी साफा बांधे हुए अधिकतर लोग पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के लाए हुए थे और वे तंवर से इस बात को लेकर नाराज थे कि उन्होंने जाने-अनजाने में यह कह डाला था कि कांग्रेस के असली समर्थकों को साफा नहीं बांधना चाहिए. तंवर और हुड्डा के बीच का रिश्ता वैसे भी जगजाहिर है. इस घटना के माध्यम से राहुल को अपनी पार्टी के भीतर गुटबाजी और हताशा की भी एक तस्वीर देखने का मौका मिल गया. उनका भाषण भले ही आक्रोश भरा था, लेकिन वे न तो उनके वफादारों को और न ही उनके विरोधियों को हिला सका. उसमें कुछ भी नया नहीं था. इसकी बजाए कांग्रेस की रैली से ऐन पहले मोदी ने अपनी पार्टी के सांसदों को जो उपदेश दिया, वह कहीं ज्यादा सुर्खियों के लायक था.
अगली दोपहर लोकसभा में हालांकि यह तस्वीर नाटकीय तरीके से बदल चुकी थी. दो दिन बाद फिर बुधवार को राहुल पूरी तैयारी के साथ लोकसभा में पहुंचे. सवाल उठता है कि इसकी वजह क्या थी? वही राहुल जिनके भीतर की आग रामलीला मैदान में जुटे उन्हीं के पार्टी कार्यकर्ताओं के भीतर गर्मी नहीं पैदा कर सकी, आखिर समूचे विपक्ष को कैसे सक्रिय करने में कामयाब हो गए? इतने सारे लतीफों का विषय रहने वाले राहुल ने आखिर कैसे बीजेपी को रक्षात्मक मुद्रा अपनाने को बाध्य कर दिया, कम-से-कम पहली दोपहर ही सही? आजकल क्या कारगर होता है और क्या नहीं, उसके निर्णायक पैमाने पर जांचें तो सवाल बनता है कि आखिर राहुल पिछले सोमवार की शाम ट्विटर पर कैसे ट्रेंड कर रहे थे जबकि आइपीएल उनसे नीचे था. आइपीएल का यह सीजन शुरू होने के पिछले दो हफ्तों में ऐसा पहली बार हुआ!
इसे बढ़ा-चढ़ाकर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, इसीलिए मैं इस घटना को राहुल या उनकी पार्टी के लिए निर्णायक मोड़ जैसा कोई नाम देने तो नहीं जा रहा, खासकर इसलिए भी कि उनमें दोबारा उभरने की संभावनाएं अब दिख रही हैं. पिछले छह वर्षों के दौरान पहली बार और अपने राजनीतिक करियर में दूसरी बार (पहली बार 2009 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में 21 सीटें जीतकर) हालांकि उन्होंने सकारात्मक प्रभाव तो छोड़ा है, यह मानना होगा.
मैंने राहुल के भाषण में तैयारी की बात इसलिए कही क्योंकि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश और नेट निरपेक्षता जैसे दोनों ही मुद्दों पर पार्टी का कदम सुनियोजित, सुविचारित और प्रत्याशित था. जिस दोपहर सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति भवन तक निकले विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया था, उसी दिन तय हो गया था कि बीजेपी पर अपने हमले में कांग्रेस भूमि अधिग्रहण के मुद्दे को केंद्र में रखेगी. राहुल ने भी कोई नई बात नहीं कही. मोदी और कॉर्पोरेट की मिलीभगत का आरोप वे रामलीला मैदान में लगा ही चुके थे. कांग्रेसी जानते थे कि वे दोबारा वही बात बोलेंगे. लोकसभा चुनाव की हार के बाद तमाम कांग्रेसी नेता उनसे निजी मुलाकात करने गए थे और राहुल ने सबसे एक ही बात कही थीः इस हार के लिए दो कारण जिम्मेदार हैं, पहला मनमोहन सिंह सरकार, जिसने उनकी या कांग्रेस अध्यक्ष की बात नहीं मानी और दूसरा कारण वे कॉर्पोरेट हैं जिन्होंने अपने धनबल से चुनाव को खरीद कर मोदी की झोली में डाल दिया.
संसद में बुधवार के मुकाबले सोमवार को उनका प्रदर्शन ज्यादा असरदार रहा क्योंकि वे पहली बार एक खांटी सांसद की तरह बोल रहे थेः काफी समझदारी से सही जगहों पर विराम देते हुए और सटीक अदायगी के साथ नपा-तुला व्यंग्य, चुभते हुए शब्द और जुमलों से पर्याप्त भरा हुआ भाषण. उनका ''सूट-बूट की सरकार'' वाला जुमला तो सुर्खियों में ही रहा. सबसे ज्यादा हालांकि जो फर्क दिखा, वह यह था कि राहुल अब न सिर्फ श्रोताओं से बल्कि कैमरे से भी आंख मिलाकर बात करने लगे हैं. पहले ऐसा नहीं था. चुनावी सभाओं में भी वे आंख नहीं मिलाते थे. नेहरू-गांधी खानदान में भाषण देने की कला कभी स्वाभाविक नहीं रही, लेकिन इसमें एक आत्मविश्वास जरूर था जिसके चलते आप अपने मतदाताओं की आंखों में सीधे देख पाते हैं गोया कह रहे हों कि ''मेरी आंखों में देखो, मेरे लफ्जों को पकड़ो, क्या तुम्हें महसूस नहीं होता कि तुम्हें मुझ पर भरोसा करना चाहिए.''
राहुल अपने अवकाश के दिनों में चाहे जो करते रहे हों, लेकिन इस दौरान उन्होंने खुद को एक ऐसी चीज से मुक्त कर लिया है जो किसी भी नेता के लिए सबसे बुरी बात होती हैः आंख मिलाने में संकोच करना और खुद की छवि एक सनकी, गैर-जिम्मेदार तथा पलायनवादी के रूप में स्थापित करना. इस सनक को इस रूप में देखा जा सकता है कि एक दिन वे किसी आदिवासी गांव में होते हैं, दूसरे दिन किसी दलित के घर पर, फिर किसी लोकल ट्रेन में और फिर अचानक भूमि अधिग्रहण के स्थल पर पहुंच जाते हैं जहां से वापस ही नहीं आते. हर बार वे खुद को आदिवासी, दलित, किसान, प्रवासी मजदूर, सामान्य यात्री वगैरह के योद्धा के तौर पर प्रस्तुत करते हैं. यह प्रवृत्ति खतरनाक है क्योंकि देश की सबसे पुरानी और सर्वाधिक अखिल भारतीय मौजूदगी वाली राजनैतिक पार्टी पर उनका उत्तराधिकार तय है. मैंने अक्सर परिहास में ही सही यह कहा है कि राहुल अगर वास्तव में योद्धा हैं तो उन्हें पैराशूट रेजिमेंट का योद्धा होना चाहिए.
इस बदलाव का मतलब कांग्रेसियों के लिए यह है कि राहुल गांधी आखिरकार अपनी भूमिका में आ चुके हैं. उन्होंने जो लाइन चुनी है उस पर कई कांग्रेसियों को गंभीर संदेह है, खासकर उन्हें जो चुनाव लड़ते हैं. इन्हें राजीव गांधी के उन दिनों की याद आ जाती है जब उन्होंने दिल्ली की एक रैली में बोफोर्स के बाद पैदा हुए दबाव में कह डाला था कि ''नानी याद दिला देंगे.'' उनका इशारा अमेरिका वगैरह विदेशी ताकतों की ओर था जो उनकी सरकार को अस्थिर कर रही थीं. नेट निरपेक्षता पर बोलते हुए राहुल ने टाइम पत्रिका में ओबामा द्वारा की गई मोदी की तारीफ का उपहास उड़ाया. इसका प्रच्छन्न अर्थ यह था कि अमेरिकी राष्ट्रपति सिर्फ उन्हीं विदेशी नेताओं की सराहना करते हैं जो उनके टट्टू बनकर घूमते हैं. अमेरिका गोर्बाचेव का प्रशंसक इसलिए था क्योंकि उन्होंने रूस को टूट जाने दिया.
अमेरिका येल्तसिन की सराहना इसलिए करता था क्योंकि उन्होंने रूस के अधिकांश उद्योगों का निजीकरण कर डाला. ऐसी मान्यताएं शीत युद्ध के दौर मंन चलती थीं. आज ऐसी अप्रासंगिक बातें कहना हास्यास्पद है. एक बदली हुई दुनिया में जहां अमेरिका, क्यूबा और ईरान जैसे पुराने वैचारिक दुश्मन नए सिरे से दोस्ती कायम करने में लगे हैं, और इससे कहीं ज्यादा अहम यह तथ्य है कि जब खुद कांग्रेस की सरकार ने अपना वजूद जोखिम में डालते हुए अमेरिका के साथ पहली रणनीतिक साझेदारी को अंजाम दिया हो (परमाणु करार), इस तरह की बातें करना निराशावाद है.
वास्तव में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने ही अमेरिका से सबसे ज्यादा मात्रा में सीधे सरकारी रास्ते से हथियारों की खरीद की (जिसे अमेरिका में फॉरेन मिलिटरी सेल्स या एफएमएस कहते हैं). एक आत्मविश्वासविहीन और सनकी उत्तराधिकारी से एक संवादी नेता के रूप में कायांतरण होना एक बात है, लेकिन यह कोई नहीं चाहेगा कि कांग्रेस पार्टी का यह युवा नेतृत्व अपने मरहूम चाचा की तरह सिर्फ बवाल खड़ा करने और बहस करने का काम करे.
कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि ये शुरुआती दिन हैं और लोकसभा में घटकर 44 की संख्या पर पहुंच जाने तथा परंपरागत रूप से अपने सबसे मजबूत दो गढ़ों-दिल्ली और आंध्र प्रदेश (जिसमें अब दो राज्य तेलंगाना और सीमांध्र हो गए हैं) में खत्म हो जाने के मद्देनजर राहुल को अतिवादी तरीकों का सहारा लेना पड़ सकता है. अब ऐसा लगता है कि कांग्रेस में उत्तराधिकार की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जो अपरिहार्य थी लेकिन जिसमें कुछ संकोच भी था. इसका एक सीधा लाभ पार्टी की नई पीढ़ी को होगा जिनमें अधिकतर खानदानी नेता हैं, दो या तीन बार सांसद रह चुके हैं, बावजूद इसके जिन्हें अपना कद कम करके रखना पड़ता है और यूपीए की सरकार में जो कैबिनेट रैंक तक सिर्फ इस इंतजार में नहीं पहुंच सके कि राहुल आगे आकर कमान संभालें. इस लिहाज से इन युवा नेताओं के लिए भी उत्तराधिकार की प्रक्रिया अब पूरी हो चुकी है क्योंकि संभव है, पुराने नेता अब दरकिनार कर दिए जाएंगे. सचिन पायलट, दीपेंदर हुड्डा, जितिन प्रसाद, गौरव गोगोई, आरपीएन सिंह, शर्मिष्ठा मुखर्जी, मिलिंद देवड़ा, प्रणिति शिंदे जैसे युवा जाहिर तौर पर रेणुका चौधरी, शकील अहमद, मीम अफजल या संजय झा के मुकाबले इस पार्टी को कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से बचाने का काम कर सकते हैं.
सबसे ज्यादा अहम बात यह है कि राहुल ने उस सबसे खतरनाक सवाल का जवाब पार्टी को दे डाला है जो लोकसभा चुनाव की हार के बाद से ही पार्टी के सिर पर मंडरा रहा थाः क्या हमारा कोई भविष्य है? व्यावहारिक और चुनावी भविष्यवाणी के लिहाज से पार्टी में कोई उम्मीद नजर नहीं आती. योगेंद्र यादव ने ठीक स्थापना दी थी कि एक बार जब कोई पार्टी किसी राज्य में 15 फीसदी की वोट हिस्सेदारी से नीचे आ जाती है तो उसकी बहाली तकरीबन नामुमकिन होती है. इस हिसाब से अगर आप भारत के मानचित्र पर कांग्रेस की मौजूदगी को आंकें तो पाएंगे कि कई राज्यों में यह पार्टी इस स्तर से नीचे जा चुकी है और स्थिति निराशाजनक है.
राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके पास 20 फीसदी के आसपास वोट हैं और जैसा कि राहुल के नए सलाहकारों का मानना है, आप ऐसी किसी भी पार्टी को खत्म हो चुका नहीं कह सकते जो जबरदस्त हार की स्थिति में भी इतने वोट लेकर आई हो. वे कहते हैं कि मोदी के प्रधानमंत्री होने और न होने के बीच सिर्फ पांच फीसदी वोटों की दूरी है. कांग्रेस अगर दूसरी गैर-बीजेपी ताकतों के साथ मिलकर बीजेपी से सिर्फ पांच फीसदी वोट छीन ले और उसे 31 फीसदी से 26-27 फीसदी तक ला दे, तो तस्वीर बदल जाएगी. फिलहाल लक्ष्य सत्ता में लौटना नहीं बल्कि मोदी को कमजोर करना है. अगर इस लक्ष्य के लिए प्रचार में कॉर्पोरेट भारत और अमेरिकी नीति के खिलाफ भी बोलना पड़े, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है.

