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इंडिया टुडे कॉनक्लेव 2015: सफलता की बात चैंपियनों के साथ

शतरंज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद और क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर उन हस्तियों में से हैं जिन्होंने हमें एक प्रतिस्पर्धा मुक्त दुनिया से थोड़ी जटिल दुनिया तक का सफर करने में मदद दी है.

अपडेटेड 23 मार्च , 2015
अस्सी के दशक के आखिरी वर्षों में एक बड़ा ही विनम्र, खामोश, सौक्य-सा 20 वर्ष का जवान चेन्नै जा रही ट्रेन में सवार था, तभी एक बुजुर्ग ने उससे बातचीत शुरू की.
उसने पूछा, ''क्या करते हो, बेटा?''
जवाब आया, ''मैं शतरंज खेलता हूं.''
''वाह, क्या बात है! '' पर बुजुर्ग का पूरक सवाल था, ''लेकिन आखिर करते क्या हो?''
युवक ने फिर जवाब दिया, ''मैं फुल-टाइम शतरंज खिलाड़ी हूं, मैं और कुछ नहीं करता.''
लेकिन हैरत में डूबे बुजुर्ग के सवाल फिर भी नहीं रुके, ''क्या तुम्हारा आगे कॉलेज जाने या कोई नौकरी करने का इरादा नहीं है?''
युवक ने भी तपाक से कहा, ''नहीं, मेरा इरादा शतरंज खेलकर ही जीवन चलाने का है.''
बुजुर्ग ने दृढ़ता से कहा, ''बरखुरदार! ऐसे में जेहन में रखना कि खेल में करियर अनिश्चित होता है. तुम अगर विश्वनाथन आनंद होते तो भले ही शतरंज खेलकर अपना जीवन गुजार सकते थे, वरना यह खयाल न ही पालो तो बेहतर.''
उस युवक ने मुस्कराकर उनकी सलाह को विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर लिया. लेकिन उसने यह नहीं कहा कि वह वाकई और कोई नहीं बल्कि विश्वनाथन आनंद ही है.
लगभग उसी समय घुंघराले बालों वाला 16 साल का एक लड़का जो दिखने में 12 साल का लगता था, पाकिस्तान में भारतीय क्रिकेट टीम के लिए अपना पहला मैच खेल रहा था. अचानक सामने आ गई पेशेवर खेल की निष्ठुर दुनिया, जिसमें अपने लिए जगह बनाता जब वह एक शहर से दूसरे शहर का सफर करता तो कुछ स्टेडियमों में उसके स्वागत में लगे बैनरों पर लिखा होताः ''बच्चे, घर जाकर दूध पीकर आ. '' सियालकोट में चैथे टेस्ट में जब टेस्ट सीरीज बराबरी पर चल रही थी, तो वकार यूनुस की गोली-सी रफ्तार वाली एक तेज गेंद आकर उसे लगी. उसकी नाक पर लगी चोट की मरहमपट्टी करने के लिए खेल रुका तो शरारती मिजाज के जावेद मियांदाद, जिनकी मैदान की टीका-टिप्पणियों का मुकाबला सिर्फ उनकी अपनी बल्लेबाजी ही कर सकती थी, कहने लगे कि अब तो इसे उठाकर सीधा अस्पताल ले जाना पड़ेगा. चोट खाए लेकिन टूटे नहीं, उस लड़के ने दर्द और तमाम चुहलबाजियों का मुकाबला करते हुए बल्लेबाजी करते रहने का फैसला किया. उसने संघर्षपूर्ण 59 रन बनाए जो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उसका पहला अर्धशतक था, और भारत के लिए उसने मैच बचा लिया. उसके बाद अगले 25 वर्षों में उस लड़के सचिन रमेश तेंडुलकर ने 100 अंतरराष्ट्रीय शतक जमाए, बल्लेबाजी का हर रिकॉर्ड तोड़ डाला और एक अतुलनीय राष्ट्रीय हस्ती बन गए.

आनंद और तेंडुलकर उत्कृष्टता की उस भावना की प्रतिमूर्ति हैं जो नए उभरते भारत को परिभाषित कर रही है. अखबार के धुंधले पन्नों से निकलकर आधे घंटे के टीवी मैग्जीन शो, 24 घंटे के समाचार चैनलों, अनगिनत वेबसाइट और लगातार फैलती सोशल मीडिया की दुनिया तक की यह कहानी इस बात की है कि कैसे हमारा देश लाइसेंस राज के दौर से उद्यमिता के उदारीकरण-बाद के दौर में पहुंच गया है. इस सफर में ये दोनों शख्स लगातार हमारे साथ रहे हैं और इन्होंने एक सहज दौर से एक जटिल दुनिया में जाने में हमारी मदद की है. ऐशो-आराम के साजो-सामान के भारत को छूने और प्रौद्योगिकी के उसे गले लगाकर अवसरों के देश में तब्दील करने से कहीं पहले आनंद और तेंडुलकर यहां थे. वे चैंपियनों की उस दुर्लभ प्रजाति में से हैं जिन्होंने इस बदलाव के दौर को पार किया है और यहां तक कि उससे कामयाबी हासिल की है. इसीलिए उन्हें अगुआ या पथ प्रदर्शक कहा जाता है, सीमाओं को लांघने वाले, महानों में महानतम.

2015 के इंडिया टुडे कॉनक्लेव में आधुनिक भारत के इन दो बाजीगरों ने खेल जगत में सुपरस्टार बनने के रास्ते पर दुर्लभ रोशनी डाली. राजदीप सरदेसाई और बोरिया मजूमदार संचालित सत्र में तेंडुलकर ने खुद में यकीन रखने की ताकत और कड़ी मेहनत की अहमियत के बारे में बताया और यह भी स्पष्ट किया कि कैसे उत्कृष्टता की तलाश दरअसल एक सब कुछ सोख लेने वाला, किसी चूक को माफ न करने वाला एक ऐसा सफर है जिसमें कोई शॉर्टकट नहीं हो सकता. उसी साफगोई के साथ बोलते हुए, जिससे उन्होंने 2013 में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में अपने रिटायरमेंट भाषण के दौरान सारी दुनिया को चमत्कृत कर दिया था, सचिन ने कहाः ''आप डॉक्टर बनना चाहते हैं, वकील, हॉकी खिलाड़ी, फुटबॉलर या और कुछ भी, उसकी शुरुआत आपके दिल से होनी चाहिए. मेरे मामले में भी क्रिकेट की शुरुआत मेरे दिल से हुई और फिर उसने दिमाग तक का रास्ता बनाया. ऐसा नहीं था कि मैं जब भी बल्लेबाजी करने उतरता था तो हर गेंद को हर समय किसी भी तरह से मार सकता था. कुछ ओवर, कुछ स्पेल, कुछ सत्र ऐसे होते थे जब मुझे गेंद को जाने देना होता था और अपना समय आने का इंतजार करना होता था.''

एक अन्य सत्र में आम तौर पर कम बोलने वाले आनंद ने न सिर्फ सफलता के दर्शन पर रोशनी डाली बल्कि इस बात का प्रत्यक्ष प्रदर्शन भी किया कि कैसे वे अपने संचित ज्ञान का इस्तेमाल करते हैं और कैसे उन्होंने अपने दिमाग को इस बात के लिए प्रशिक्षित कर रखा है कि वह एक ही पल में अपने भीतर जमा 1.2 करोड़ बाजियों में से किसी भी एक को तुरंत याद कर सकता है. उस पल वहां मौजूद लोग ''वाह-वाह'' कर उठे जब आनंद का इम्तिहान लेने के लिए उन्हें एक पुरानी विश्व चैंपियनशिप की बाजी का बोर्ड दिखाया गया और उन्हें उसकी पहचान करने को कहा गया. ''यह मुझे याद है. यह (टिग्रेन) पेत्रोसियन बनाम (बोरिस) स्पास्की की बाजी है.'' आनंद से पूछा गया कि क्या उन्हें याद है वह साल कौन-सा था? उन्होंने कहा, ''1963 का मुकाबला.'' वे बिल्कुल सही थे.

भारत रत्न से सक्वमानित हो चुके तेंडुलकर ने क्रिकेट के बाद की अपनी जिंदगी में खेल के प्रति अपने जज्बे को ऐसे कार्यक्रमों में ढालने का संकल्प दिखाया है जिनकी बदौलत वे भारतीय खेलों को वापस कुछ दे सकें. उधर आनंद मौजूदा विश्व चैंपियन मैग्नस कार्लसन से एक जंग में उलझे हैं जो पहले ही दो साल में दो बार विश्व खिताबी मुकाबले में उन्हें मात दे चुके हैं. वे मानते हैं, ''अब इसमें छिपाने वाली कोई बात नहीं है कि अगर कोई आपको दो बार पटखनी दे देता है तो वह आपके दिमाग पर भी चोट करता है. यकीनन मुझमें अब भी उन्हें हराने की कोशिश करने का जज्बा है.''

सचिन ने एक शारीरिक खेल में उम्र की सीमाओं को तब तक आगे खिसकाया जब तक कि वे अपने 40वें जन्मदिन के नजदीक नहीं पहुंच गए. आनंद पहले ही 45 वर्ष के हो चुके हैं और अपना विश्व खिताब फिर से हासिल करने के लिए कंप्यूटर-प्रशिक्षित पीढ़ी से मुकाबला कर रहे हैं. वे कहते हैं, ''मैं अब तक शतरंज के खेल से मोहित हूं और कई ऐसी बातें हैं जो मुझे अब भी समझ में नहीं आतीं. मैं उनकी तह तक जाने के लिए बेताब हूं और यही बात मुझे सक्रिय रखती है.''
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