अचानक 14 मार्च, 2011 को सीरिया की राजधानी दमिश्क में बशर अल असद के शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. इसे पश्चिम एशिया के तमाम तानाशाहों के खिलाफ शुरू हुए विरोध की ही तरह माना गया. अब चार साल बाद इंडिया टुडे कॉनक्लेव में बहस आयोजित की गई कि आखिर वह अरब वसंत क्यों इस्लामी सर्दियों में बदल गया. इसमें तालिबान से लोहा लेने वाले अफगानिस्तान के पूर्व खुफिया प्रमुख अमरुल्लाह सालेह और इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक ऐंड सीरिया (आइएसआइएस) के विशेषज्ञ प्रोफेसर बर्नार्ड हेकल के साथ-साथ इस्लामी आतंक के चंगुल से बच गए दो लोग शामिल हुए. इनमें आइएसआइएस की गिरक्रत से छूटे फ्रांसीसी पत्रकार निकोलस हेनिन और अल कायदा से जुड़े जबहत अल नुस्र के आजाद किए थियो पैडनोस हैं जिन्होंने अपनी खौफनाक दास्तान सुनाई और बताया कि कैसे आइएसआइएस ने अरब वसंत का फायदा उठाया.
यह बहस आइएसआइएस के खिलाफ जंग में अहम योगदान कर सकती है. फिलहाल इराक और सीरिया के सीमावर्ती इलाकों में आइएसआइएस के खिलाफ ईरान की मदद से इराकी फौज और अमेरिकी जेट विमानों की मदद से कुर्द लड़ाकों की मुहिम जारी है.
बागी गुटों ने पहले भी राष्ट्र-राज्यों को चुनौती दी है. सबसे ताजा मामला 1996 में अफगानिस्तान में तालिबान के उभार का है. उसे आखिरकार अमेरिका में 9/11 हमलों के बाद नाटो फौज ने उखाड़ फेंका. इसलिए अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशालय के पूर्व प्रमुख अमरुल्लाह सालेह आइएसआइएस जैसी वहशियाना करतूतों से अच्छी तरह वाकिफ हैं. वे कहते हैं, "फर्क सिर्फ यह है कि तालिबान ने अपने बंधकों को आइएसआइएस की तरह ऑरेंज रंग के जंपसूट्स पहनाकर बंद करके नहीं रखा. वे साल दर साल कत्लेआम करते चले गए."
मध्ययुगीन वहशियाना बर्बरता ही आइएसआइएस को अलग पहचान देती है. बंधक आम नागरिकों और फौजियों का एक साथ सिर कलम करना, धार्मिक अल्पसंख्यकों का कत्लेआम. और इस सब का उम्दा किस्म का वीडियो सोशल मीडिया पर डालकर नए रंगरूटों को लुभाना. हेनिन के मुताबिक, आइएसआइएस के इस पैमाने पर हिंसा और उकसावे का एक मकसद है. हेनिन को सीरिया में 2013 में आइएसआइएस ने पकड़ा था और जेक्स फॉली, स्टीवन सॉटलॉफ, डेविड हेंस और एलन हेनिंग के साथ 10 महीने तक बंधक बनाकर रखा गया. बाद में बाकियों की हत्या कर दी गई. हेनिन ने कहा, "वे यह सब दहशत फैलाने और उकसाने के लिए करते हैं. इससे पश्चिम में सुर्खियां बनती हैं. हम उकसावे पर कुछ ज्यादा ही हिंसा कर बैठते हैं. फिर यह हिंसा उसके लिए नए रंगरूटों की भर्ती का कारगर तरीका बन जाता है. अमेरिकी सरकार का अनुमान है कि 90 देशों से करीब 20,000 विदेशी लड़ाके आइएसआइएस की पांत में शामिल होने के लिए गए. इनमें पश्चिमी देशों से 3,400 और भारत से चार रंगरूट थे. एक अमेरिकी सीनेटर ने तो इसे दुनिया में इस्लामी आतंकियों का सबसे बड़ा जमावड़ा कहा."
दरअसल, आइएसआइएस के तेजी से उभार की वजहें 2003 में इराक में अमेरिकी घुसपैठ में तलाशी जा सकती हैं. आइएसआइएस के कब्जे में अब ब्रिटेन से बड़ा इलाका है. वहां शिया बहुल सरकार से मोहभंग के शिकार सुन्नी अरब आइएसआइएस के साथ जा मिले. आइएसआइएस ने 2011 में अमेरिकी अगुआई में नाटो फौज के हटने से शून्य को भर दिया.
फिर, इस गुट ने अपनी जड़ें तलाशते नौजवानों को बड़े पैमाने पर आकर्षित किया. इससे हजारों की संख्या में विदेशी लड़ाके उससे आ जुड़े.
हेनिन ने कहा, "अगर आपको समाज से कोई गिला-शिकवा है, अगर आप अपने मां-बाप से बगावत करना चाहते हैं तो आइएसआइएस में शामिल हो जाओ. वहां आपको दुस्साहस का मजा लेने का मौका मिलेगा, बंदूक और लड़की तो शर्तिया मिलेगी. अगर आप फ्रांसीसी नौजवान हो, जिंदगी में कुछ अनोखा करना चाहते हो तो आप क्या करोगे? मादक पदार्थ का सेवन करने जैसा ही बगावत का नशा है."
गृहयुद्ध से अच्छे और बुरे का फर्क मिट गया है. थियो पैडनोस अल कायदा के बंधक थे. उन्हें उन लोगों ने कहा कि अगर पाव भर सोना नहीं दोगे तो कत्ल कर दिए जाओगे. वे उनसे बचकर भाग निकले और आजाद सीरियाई फौज के पास पहुंच गए, जो उस गुट की शायद पश्चिमी सहयोगी है. इस तरह वे फिर अपने अपहर्ताओं के पास पहुंच गए.
हेकल इस राय से पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि आइएसआइएस के विदेशी लड़ाके अपने देश में लौटकर जंग छेड़ देंगे. वे कहते हैं, "यह उलटी धारा की दलील अफगानिस्तान के अनुभव पर आधारित है. अरब के लड़ाके वहां गए और लौटकर जेहादी गुटों से जुड़कर 9/11 को अंजाम दे डाला. लेकिन इस्लामिक स्टेट में जा रहे रंगरूट अपने पासपोर्ट जला दे रहे हैं और ज्यादातर वहीं मर जाने की सोचकर जाते हैं."
पैडनोस इससे सहमत हैं, "वहां हर कोई अजीब-से जुनून का शिकार है. मजहबी जुनून और बंदूक तथा मौत के साए में ही वे जी रहे हैं...वहां से वापसी का कोई रास्ता बचता नहीं है. वे पुल पार कर गए हैं और अब इस पार नहीं आना चाहते. " सालेह को आइएसआइएस के अफगानिस्तान में फैलने का कोई डर नहीं है क्योंकि तालिबान को ही आइएसआइएस के लिए अपना इलाका छोडऩा पड़ेगा और फिर, सीरिया तथा इराक के उलट अफगान राष्ट्रीय बलों को ऐसे बागियों से लडऩे का अच्छा अनुभव है.
बहरहाल, आधुनिक दौर में सबसे मुश्किल आतंकवादी समूह आइएसआइएस से आखिर कैसे निबटा जा सकता है? विशेषज्ञों की राय है कि फौजी कार्रवाई तो एक तरीका है मगर तरीका भोथरा है. हेकल ने कहा, "आप उन्हें फौजी ताकत से नेस्तनाबूद कर सकते हो, लेकिन सचमुच उनका अस्तित्व मिटाने के लिए आपको उन सामाजिक-राजनैतिक और व्यवस्थागत वजहों को मिटाना होगा जिसकी वे उपज हैं और यह अधिक मुश्किल काम है. आइएसआइएस इराकी और सीरियाई समाज के सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक बिखराव का लक्षण है. ये समस्याएं एफ16 लड़ाकू विमानों के बम बरसाने से नहीं दूर होने वाली हैं. "

