हम इस मोड़ तक आए हैं तो इसलिए कि जम्मू-कश्मीर की जनता की बेहतरी के लिए कुछ कर सकें. न कर पाए तो शायद हमें भी अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर घर बैठना होगा.'' पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीपीपी) की प्रमुख 55 वर्षीया महबूबा मुफ्ती का इशारा बिल्कुल साफ था कि अब वे कदम वापस खींचने के लिए तैयार नहीं हैं.
महबूबा के बारे में माना जाता है कि पर्दे के पीछे महत्वपूर्ण निर्णय उन्हीं के होते हैं. अपने वालिद और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुक्रती मोहम्मद सईद के सियासी सीमाओं को लांघकर जम्मू-कश्मीर में गठबंधन की सरकार बनाने के बेहद नाजुक फैसले में अहम भूमिका निभाने वाली महबूबा का मानना है कि इससे कश्मीर घाटी में न केवल उनके घटक दलों को फायदा पहुंचेगा बल्कि इसका लाभ अब तक हाशिए पर पड़ी जम्मू और लद्दाख की जनता को भी मिलेगा.
जब सईद ने जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव का श्रेय पाकिस्तान और आतंकवादियों को दिया और हाल ही में 7 मार्च को जब मुक्चयमंत्री ने हुर्रियत के अलगाववादी मसर्रत आलम की रिहाई का विवादस्पद आदेश दिया तो सारा देश उबल पड़ा था. प्रदेश सरकार के इस विवादास्पद बयान और फैसले से बीजेपी में ऊपर से लेकर नीचे तक-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर जम्मू, किश्तवाड़, डोडा और भदेरवाह के पार्टी कार्यकर्ताओं तक-घबराहट का आलम बन गया था. हालांकि महबूबा कहती हैं कि उन्हें इसका कोई ''पछतावा नहीं, '' और साफ करती हैं कि आलम के मामले में उनके वालिद ने तो महज सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करवाया है. आलोचकों को जवाब देते हुए वे कहती हैं, ''आप ही बताइए, सुप्रीम कोर्ट का फैसला जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होता?''
अपने वालिद 79 वर्षीय मुफ्ती मोहम्मद सईद जितनी अनुभवी न होने के बावजूद महबूबा को अपना काम अच्छी तरह पता है. सियासत के उतार-चढ़ाव से दो-चार होने के बाद, खासकर उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस की गठबंधन सरकार के छह साल के कार्यकाल के दौरान वे राजनीति के दांव-पेच अच्छी तरह सीख चुकी हैं. वे यह भी जान चुकी हैं कि सियासी फायदे के लिए समय-समय पर आवाज बुलंद करना कितना जरूरी होता है.
अपनी आवाज पर्याप्त ऊंची करते हुए महबूबा कहती हैं, ''यह मुफ्ती साहब और मोदी जी, पीडीपी और बीजेपी का मसला नहीं है, यह जम्मू-कश्मीर का मसला है.'' अपने इन्हीं तेवरों में वे दक्षिण अफ्रीका की तर्ज पर ट्रुथ ऐंड रिकंसिलिएशन कमिशन की मांग करती हैं जो ''फर्जी मुठभेड़ों समेत कश्मीर में समाधान के नाम पर आतंकवादियों के हाथों बेगुनाहों की हत्या जैसी घटनाओं की तक्रतीश करे.''
यह जानते हुए कि कश्मीर मसला उठाए जाने के अंदेशे भर से ही कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस समेत गठबंधन की उनकी सहयोगी बीजेपी भी तिलमिला जाएगी, वे इस मसले से जुड़े सभी पक्षकारों को एक साथ एक मंच पर लाने की वकालत करती हैं. महबूबा कहती हैं कि पीडीपी और बीजेपी गठबंधन एक ''साझेदारी है'', इस बात से वाकिफ रहते हुए कि दोनों पार्टियों के बीच मतभेद कितने गहरे हैं. महबूबा का मानना है कि 1947 में हरि सिंह के शासनकाल से ही कश्मीर जिस अंधेरे कुंए में फंसा हुआ है, उसमें से उसे बचा निकालने की कुव्वत उनकी गठबंधन सरकार में ही है.
महबूबा कहती हैं कि पीडीपी और बीजेपी के बीच जो विरोधाभास हैं, उसी के कारण कश्मीर को लेकर नई समझ विकसित होगी और वही घाटी को नई दिशा देगी. ''देश की संप्रभुता सर्वोपरि होती है,'' इस बात पर जोर देते हुए वे कहती हैं, ''इन विरोधाभासों का खुलकर सामने आना अच्छी बात है. इसी बहाने देश को कम-से-कम यह तो पता चल रहा है कि कश्मीर का अलग संविधान और अलग झंडा है.'' उनके मुताबिक, कश्मीर या पीडीपी कोई भी इस सचाई को छिपाना नहीं चाहता.
पीडीपी-बीजेपी गठबंधन बने रहना घाटी की बड़ी युवा आबादी के लिए अच्छा होगा. दिलों पर मरहम लगाने और खुद को श्अलग-थलग्य मानने की दशक भर पुरानी मानसिकता से कश्मीरियों को आजादी देने के अलावा महबूबा ने युवाओं के लिए और जगह बनाने की वकालत शुरू कर दी है. वे कहती हैं, ''हम चाहते हैं, घाटी में ढेरों कॉफी हाउस हों, लाइब्रेरी हों, ऐसी जगहें हों जहां युवा खुलकर बात कर सकें, वक्त बिता सकें.''
सप्ताह के अंत में जम्मू के वेव मॉल में सैकड़ों की संख्या में युवा जोड़ों को सुकून से वक्त बिताते देखा जा सकता है. महबूबा जो कह रही हैं, अगर वे उसे कर पाती हैं तो घाटी में सब कुछ बदल जाएगा. जैसा वे कहती हैं, ''मुझे मैक्डॉनल्ड बहुत पसंद है.''

