आज मैं 68 साल का हूं और 69 का होने वाला हूं. मैं आपको यह कह सकता हूं कि आज मेरी जैविक उम्र तब से कहीं बेहतर है, जब मैं अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में विद्यार्थी हुआ करता था.''
अंधेरे हॉल के बीचोबीच रौशनी है. स्टेज पर एक व्यक्ति अकेला खड़ा है. उनके पीछे दीवार पर बहुत सारे स्क्रीन हैं, जहां चमकते सितारों और ब्रह्मांड की तस्वीरें घूम रही हैं. यह समूचा ब्रह्मांड ही उनकी प्रयोगशाला है. जिस पर उनका शोध चल रहा है, वह है मनुष्य का दिमाग. देह उनका औजार है और उनकी प्रेरणा हैं वे तमाम रहस्य, जिनसे मुमकिन होता है मन का इलाज. वे पश्चिम में सबसे ज्यादा परिचित हिंदुस्तानी नामों में से एक हैं. वे आध्यात्मिकता के रूपकों में आधुनिक विज्ञान की व्याक्चया कर संसार को चकित करते रहते हैं. मिलिए दीपक चोपड़ा से. वे एंडोक्राइनोलॉजिस्ट हैं, जो पश्चिम के चिकित्सा विज्ञान, न्यूरोसाइंस और भौतिकी में आयुर्वेद की आत्मा को घोलकर इनसानी शरीर और दिमाग की बेहतरी के रास्ते खोज रहे हैं.
नहीं, वे जॉर्ज ब्लूनी या केरी ग्रांट की तरह नहीं लगते. इंटरनेट पर अञ्चसर यह विवाद होता रहता है, ''दीपक चोपड़ा किसकी तरह दिखते हैं.'' एक व्यक्ति, जिसका जीवन और काम हमेशा बहुत तेजी से बदलता रहा, उन्हें शायद यह कहना उनका सबसे वाजिब सम्मान होगाः चिकित्सक, लेखक, मोटीवेशनल स्पीकर, फिल्म निर्माता और नए युग के विद्वान. कभी वैज्ञानिकों ने उनकी आलोचना की तो कभी सबसे सरल और प्रेरक दार्शनिक के रूप में उनकी सराहना हुई. वे निस्संदेह हमारे समय के प्रतिमान हैं. उनकी अनुमानित संपत्ति तकरीबन 8 करोड़ डॉलर है, जो पॉप गायक जस्टिन बीबर के बराबर है.
आज उनके पास एक नया संदेश हैः संपूर्ण मौलिक स्वास्थ्य. यह एक नई क्रांति है कि कैसे एक मनुष्य के रूप में स्वस्थ रहने की प्रक्रिया में हम अपने जीन को भी प्रभावित कर सकते हैं. वैज्ञानिकों के एक समूह के साथ वे हर तरह के मानवीय व्यवहार का अध्ययन कर रहे हैं. उग्रता और आक्रामकता से लेकर तनाव, गुस्सा और चिंता. कृतज्ञता, संवेदना, करुणा, सदाशयता, आशावाद, खुशी और अर्थपूर्णता भी. इसका नतीजा? पूरी देह में इस बात के प्रमाणों की मुखर मौजूदगी कि मनुष्य का दिमाग ही बेहतर स्वास्थ्य की कुंजी है. वे कहते हैं, ''हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका में दिमाग होता है. आपके शरीर की प्रत्येक कोशिका अपने आप से संवाद करती है. यह संवाद पूरे समय चलता रहता है. यहां तक कि नींद में भी सक्रिय रहता है.''
देह और दिमाग के इस संवाद के स्रोत हमारी जीन में छिपे हैं. जैसा कि डॉ. चोपड़ा कहते हैं, ''जीन के बारीक स्तर तक आपका मस्तिष्क शरीर को बता रहा होता है कि कैसे जीना चाहिए.'' विचार, भावनाएं, संवेदनाएं, छवियां, मानवीय व्यवहार में मामूली-से-मामूली बदलाव और आपकी चुनी गई जीवन शैली-खानपान और व्यायाम से लेकर नींद तक, सब कुछ हमारे जीन को प्रभावित कर सकती है. वे कहते हैं, ''अपने शरीर की 95 फीसदी जीन को हम नियंत्रित कर सकते हैं.'' इससे भी बड़ी बात यह कि जीन पर योग-साधना का भी प्रभाव पड़ता है. वे कहते हैं, ''योग-ध्यान कोशिकाओं के जैविक क्षय की प्रक्रिया को प्रभावित करता है.'' इसका छिपा हुआ संदेश यह हैः अपने शरीर को यह बताने के लिए कभी देर नहीं होती कि अब बुढ़ाना बंद करो. चोपड़ा कहते हैं, ''तीन महीने के भीतर आप जीन के स्तर पर अपनी जैविक उम्र की गाड़ी की दिशा कई सालों के लिए उलट सकते हैं.''
कैसे? अपने प्रतिरोधक तंत्र के बारे में विचार करिए. तनाव के कारण हमारे शरीर के जटिल जैविक तंत्र का सामंजस्य बिगड़ जाता है. या अगर इसे यूं कहें कि हमारे शरीर में फैली हुई सौ खरब माइक्रोऑर्गेनिज्म (सूक्ष्मजीव) खास तौर पर पेट, मुंह और त्वचा की माइक्रोऑर्गेनिज्म अशांत हो जाती हैं. तब हमारा जैविक तंत्र सामान्य कोशिकाओं पर हमला करने लगता है. उनमें सूजन और बीमारियां पैदा होती हैं. फिर चाहे वह डायबिटीज हो, हृदय रोग, अल्जाइमर्स या कैंसर. माना जाता है कि अधिकांश मामलों में अमूमन मुख्य वजह सूजन ही होती है.
इस दिशा में काम चल रहा है. डॉ. चोपड़ा और उनकी टीम की खोज जल्द ही वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए सामने होगी. इस बीच इस विद्वान के कुछ शब्दः ''सबसे ताकतवर ही जीवित रहेगा'' का सिद्घांत अब खत्म हो गया है. आज का सिद्घांत यह हैकृसबसे बुद्घिमान ही जीवित रहेगा.'' इसलिए जीवन के प्रति अपना नजरिया बदलें. सूजन, बीमारियों, बुढ़ापे और यहां तक कि मृत्यु से भी लड़ने के लिए सकारात्मक रहें (एक डायरी रखें, जिसमें उन सबका जिक्र हो, जिनके कृतज्ञ हैं आप).

