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धर्मांतरण: आस्था बदलने की कवायद

जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने एक धर्र्मांतरण विरोधी कानून बनाने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन विपक्ष और विशेषज्ञ इसे अनुपयोगी बताते हुए खारिज कर रहे हैं.

अपडेटेड 23 दिसंबर , 2014

फरवरी की 19 तारीख, वर्ष 1981. तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के मीनाक्षीपुरम गांव के लगभग 150 दलित परिवारों ने इस क्षेत्र के दबदबे वाले थेवर समुदाय के तानों और व्यंग्य से तंग आकर इस्लाम कबूल कर लिया था. इस घटना के बाद दक्षिणपंथी हिंदू समूहों ने धर्मांतरण के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान चला दिया. मामले ने इतना तूल पकड़ा कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे उदार नेता भी तमिलनाडु के उस गांव में गए और परिवारों को दोबारा हिंदू धर्म अंगीकार करने का अनुरोध किया. रि-कनवर्जन यानी पुनर्धर्मांतरण/परावर्तन के प्रयास अधिक नहीं तो कम-से-कम इतने पुराने तो हैं ही.

समाजविज्ञानियों का कहना है कि अपना धर्म छोड़ दूसरा अपनाने की मुख्य वजह समाज में व्याप्त असमानता है, हाशिए पर पहुंचा दिए गए लोग दबदबे या ऊंची हैसियत वाली जाति और समुदाय से अपमानित और उपेक्षित महसूस करने पर यह कदम उठाते हैं. आरएसएस के मुख्य प्रवक्ता मनमोहन वैद्य के मुताबिक, ऊंची जाति के हिंदुओं और समाज के कमजोर तबके के बीच संपर्कों और संवाद की कमी की वजह से दूसरे धर्मों के नेता उनकी भावनाओं का “शोषण” कर उन्हें धर्मांतरण को उकसाते हैं. भारी संख्या में ऐसे धर्मांतरण को रोकने के लिए दक्षिणपंथी संगठन पुनर्धर्मांतरण करवाते हैं—जैसी कि 1981 में मीनाक्षीपुरम में शायद वाजपेयी की मंशा थी या फिर उत्तर प्रदेश में आरएसएस का धर्म जागरण मंच और उससे जुड़े दूसरे संगठन जिसके लिए प्रयास करते रहे हैं. ऐसे में किसी और तरह की रोक की बजाए एक सख्त धर्मांतरण विरोधी कानून अधिक कारगर होगा ताकि ऐसे मामले हो ही न पाएं.
मध्य प्रदेश, ओडिसा, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जबरन या धोखे से धर्मांतरण रोकने के लिए कानून हैं. संसदीय मामलों के मंत्री एम. वेंकैया नायडू अब एक राष्ट्रीय धर्मांतरण विरोधी कानून लाने का प्रयास कर रहे हैं. उन्होंने संसद में कहा, “मैं सारे दलों से गंभीरता से इस पर विचार करने का आग्रह करता हूं: सभी राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून हो, केंद्र में भी ऐसा ही कानून बने.”
दिवंत नेता दिलीप सिंह जूदेव पुन: धर्मांतरित सरना समुदाय के लोगों के पांव धोते हुए
(दिवंत नेता दिलीप सिंह जूदेव पुन: धर्मांतरित सरना समुदाय के लोगों के पांव धोते हुए)

लेकिन विपक्ष के नेता अब इसे अपने हिंदुत्व ब्रांड को पूरे देश पर थोपने का हथकंडा बता रहे हैं. कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का कहना है, “देश का हर नागरिक अपनी पसंद के धर्म को अपनाने के लिए स्वतंत्र है. यह उसका निजी मामला होता है. असल मामला जबरन धर्म परिवर्तन का है जिसे बीजेपी दूसरी दिशा में मोडऩे का प्रयास कर रही है.”

समाज विज्ञानी दीपांकर गुप्ता का भी मानना है कि धर्मांतरण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना समस्या का समाधान नहीं है. वे कहते हैं, “हमें जबरन धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए. यह परिवर्तन सतही या दिखावटी भी होता है क्योंकि लोग प्रायः ही अपने मूल धर्म में लौट आते हैं.”
हालांकि हिंदू संगठनों का आरोप है कि ईसाई मिशनरी गरीब इलाकों में निचले तबके के हिंदुओं को मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रलोभन देकर जबरन धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं. लेकिन कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी ऐसे दावों को आधारहीन बताते हैं. उनका कहना है, “मैं एक आयरिश कैथोलिक स्कूल में पढ़ा हूं और वहां पढ़ाए जाने वाले आदर्शों से प्रेरित था. मैं जिंदगी भर उनका अनुसरण करता रहा लेकिन मैंने कभी धर्म परिवर्तन नहीं किया.”

दूसरी ओर ईसाई समूहों का दावा है कि हाशिए पर पहुंचे हिंदू खुद ही अपना धर्म बदल रहे हैं. उनके मुताबिक हिंदू समूह अपने ‘पुनरूधर्मांतरण’ के प्रयासों के जरिए इन लोगों को सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाएं और अन्य तरह के प्रलोभन दे रहे हैं, इस तरह तो यह भी जबरन धर्म परिवर्तन ही हुआ. लेकिन हिंदू दक्षिणपंथी गुट पूर्वोत्तर, ओडिसा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनरियों की ओर उंगली उठा रहे हैं. हालांकि यह दावों और प्रतिदावों का किस्सा है लेकिन हिंदू संगठनों को तब आंकड़ों का ठोस आधार मिल गया जब 25 जून, 2013 को केरल के मुख्यमंत्री उम्मन चांडी ने राज्य विधायिका को सूचित किया कि 2006 से 2012 के बीच 7,713 लोगों ने इस्लाम अपना लिया जबकि इस अवधि में हिंदू धर्म में लौटने वालों की संख्या सिर्फ, 2,803 थी. इस दौरान कितने लोगों ने ईसाई धर्म अपनाया, इसका आंकड़ा उनके पास उपलब्ध नहीं था.

जबरन धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध लगाने के कानून का इतिहास ब्रिटिश काल में ढूंढा जा सकता है. तब कई रियासतों ने धर्मांतरण विरोधी कानून तैयार किया था. रायगढ़ राज्य धर्मांतरण विधेयक 1936; पटना धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक 1942;  सरगुजा राज्य धर्मत्याग अधिनियम, 1945 और उदयपुर राज्य धर्मांतरण विरोधी कानून ऐसे ही कानून थे. स्वतंत्रता के बाद राज्य सरकारों के  बनाए गए कानूनों में जबरन धर्म परिवर्तन को भारतीय दंड प्रक्रिया की धारा 295-ए और 298 के तहत दंडनीय अपराध माना गया. इसके तहत दूसरों की धार्मिक भावनाओं को जान-बूझकर आहत करना और दुर्भावना रखना दंडनीय अपराध है, जिसके लिए जेल और जुर्माना दोनों का प्रावधान है.
धर्मांतरण कानून
लेकिन धर्म विरोधी कानूनों के आलोचकों का मानना है कि इससे जिला प्रशासन को धर्म परिवर्तन के मामलों की पड़ताल के लिए निर्बाध अधिकार मिल जाते हैं. उदाहरण के तौर पर गुजरात में किसी भी तरह के धर्म परिवर्तन से पहले स्थानीय अधिकारियों से इजाजत लेनी पड़ती है (देखें बॉक्स). इसके अलावा ‘जबरन’ और ‘धोखे’ तथा ‘थोपने’ और ‘प्रलोभन’ जैसे शब्दों की व्याख्या भी अस्पष्ट है.

उत्तर प्रदेश में धर्म जागरण मंच ने जो हालात पैदा किए हैं, उन्हें कई लोग संघ द्वारा बीजेपी को एक केंद्रीय धर्मांतरण विरोधी विधेयक पारित करवाने में मदद करने के प्रयास के रूप में देख रहे हैं. पूर्व गृह सचिव जी.के. पिल्लै कहते हैं कि अगले 12 महीनों में इस आशय का कानून अस्तित्व में आ सकता है. लेकिन जब कई राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून हैं और समय-समय पर विभिन्न अदालतों ने उन्हें मान्यता दी है तो राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे कानून की जरूरत पर भी कई लोग सवाल उठा रहे हैं.

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष नसीम अहमद के मुताबिक, धर्मांतरण पर पूरी तरह प्रतिबंध लाने वाला कानून व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है. हालांकि वे कहते हैं,  “लेकिन धर्म परिवर्तन किसी प्रलोभन, भय या धोखे से नहीं किया जाना चाहिए.” वरिष्ठ वकील के.टी.एस. तुलसी स्थानीय प्रशासन के हाथ में दिए गए अधिकारों का औचित्य नहीं मानते. वे कहते हैं, “जिला अधिकारी तो वही करेगा जो राज्य का मुख्यमंत्री कहेगा.” तुलसी का यह भी कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी हमारे मौलिक अधिकारों में दी गई है और इसमें धर्म परिवर्तन का अधिकार भी शामिल है, जिसे जबरन धर्म परिवर्तन से अलग रखकर देखा जाना चाहिए.

लेकिन भगवा ब्रिगेड ने ‘घर वापसी’ का नारा गढ़कर बढ़त तो हासिल कर ही ली है क्योंकि पुनः धर्मांतरण किसी भी धर्मांतरण विरोधी कानून के दायरे में नहीं आता है. ‘पुनः धर्मांतरण’ का अर्थ है, पहले की गई गलती को सुधारना. इसे एक तरह की वैधता भी प्राप्त है. इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस में एसोसिएट फेलो अर्पिता आनंद का कहना है, “कानून धर्म परिवर्तन पर तो प्रतिबंध लगाता है, लेकिन निचले तबके के हिंदुओं के फिर से अपने धर्म में लौटने पर प्रतिबंध नहीं है.”

दीपांकर गुप्ता ‘घर वापसी’ की अवधारणा को भी खारिज कर देते हैं. उनका तर्क है कि पांचवीं पीढ़ी के मुसलमानों के लिए इस्लाम उनके घर जैसा है. यह तो ऐसा ही है जैसे कोई श्वेत अमेरिकी अश्वेत अमेरिकी से अफ्रीका लौटने को कहे, “जबकि अश्वेत अमेरिकी कई पीढिय़ों से अमेरिका में रह रहे हैं और अब यह उनके घर जैसा है.”

इधर, अलीगढ़ पुनः धर्मांतरण अभियान पर रोक लगा देने से सरकार और विपक्ष को नए धर्मांतरण विरोधी कानून की जरूरत पर विचार करने के लिए और वक्त मिल जाएगा. पर सवाल है कि क्या इससे व्यक्ति के किसी अन्य धर्म को अपनाने के अधिकार का हनन होगा? इसके अलावा, घर वापसी के नाम पर चौथी या पांचवीं पीढ़ी के मुसलमानों या ईसाइयों का फिर से धर्म बदलना सिर्फ आंकड़े बढ़ाने का प्रयास भर तो नहीं? फिलहाल लगता है, धर्मांतरण के राजनैतिक फुटबॉल का स्कोर चुनाव के अगले दौर यानी देश के हिंदी भाषी प्रदेशों—बिहार और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के बाद ही पता चल पाएगा.

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