तमिलनाडु पिछले साल की तरह 2013-14 में भी बारिश की कमी से जूझता रहा. लेकिन दूसरी हरित क्रांति शुरू करने के लक्ष्य के तहत सरकार की कोशिशों से राज्य में 110.65 लाख मीट्रिक टन अनाज पैदा हुआ.
राज्य ने अनाज उत्पादन बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठाए. मॉनसून के अलग-अलग हालात के लिए बुआई के इलाके को मौसम की मार से सुरक्षित किया, फसलों में विविधता लाई गई, मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाई, जल संसाधनों का प्रबंध किया, सटीक खेती को बढ़ावा दिया, लघु सिंचाई को अपनाया, फसल अनुकूल तकनीक और खेत के हिसाब से दखल की नीति अपनाई.राज्य सरकार ने बीज की ऐसी नई किस्में लाने के लिए तीन साल की योजना बनाई है, जिससे फसल पकने में कम समय लगे, फसल हर तरह की मुश्किलें सहने में सक्षम हो, पोषक तत्वों की खपत कम हो और बाजार की पसंद हो.
2013-14 में तमिलनाडु ने 5.6 लाख रु. की लागत से 100 एकड़ बारानी जमीन में खेती शुरू कराई. राज्य में पानी की कमी है और खेती का इलाका 49.5 लाख हेक्टेयर का है. 2012-13 में सबसे भीषण अकाल पड़ा. इसके असर से बचने के लिए सरकार ने सोची-समझी नीति अपनाई. कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘‘खेती के लिए सिंचाई करने वाले तालाबों को असरदार माना गया जिनसे वर्षा की कमी के दौरान गरीब किसानों की मदद कर सकते हैं.
सरकार ने तालाब बनाने का पूरा खर्च उठाया. अब तक 23,772 तालाब बनाए गए हैं और 40,000 से अधिक किसानों को लाभ हुआ है. यह काम वर्षा जल संचयन जैसा ही है. तालाबों में पानी जमा कर फसलों को संकट से बचाने के काम में लिया जाता है.’’

