नवादा जिले के रामनगर के 41 वर्षीय अवधेश प्रसाद उर्फ जुम्मन मिस्त्री की सुबह पेचकस और हथौड़े जैसे औजारों के साथ शुरू होती है. साधारण से दिखने वाले अवधेश ऑटो रिपेयङ्क्षरग करते हैं. 8 सितंबर को वे नवादा एसडीओ कार्यालय में कार्यरत एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट श्यामदेव प्रसाद को 4,000 रु. रिश्वत लेते हुए निगरानी विभाग की टीम के हाथों गिरफ्तार करवाने में सफल रहे. घर की गली को लेकर अवधेश और एसडीओ के वाहन चालक के बीच विवाद था. एसडीओ कार्यालय में उसका मुकदमा चल रहा था. प्रसाद ने अवधेश के पक्ष में फैसला देने के नाम पर 5,000 रु. मांगे थे. मजिस्ट्रेट जेल में हैं और मामला निगरानी कोर्ट में है. अवधेश कहते हैं, ''बेकार ऑटो को रिपेयर कर ठीक किया जा सकता है तो सिस्टम के भ्रष्टाचार को क्यों नहीं."
बिहार में आम आदमी की ऐसी साहस भरी कहानियां भरी पड़ी हैं. बक्सर में स्टेशन रोड निवासी बीज दुकानदार सत्येंद्र कुमार सिंह से जिला कृषि पदाधिकारी श्रीभगवान राय ने बीज दुकान का सत्यापन कराने की एवज में 50,000 रु. रिश्वत मांगी तो उन्होंने 21 अगस्त को राय को 40,000 रु. रिश्वत लेते गिरफ्तार करवा दिया. इसी तरह नरहट के बदलपुर के 44 वर्षीय विजय पांडेय ने रिश्वत मांग रहे थानाध्यक्ष जगनारायण राम को 10,000 रु. रिश्वत लेते गिरफ्तार करवा दिया. आरोप है कि थानाध्यक्ष उन पर न सिर्फ दुष्कर्म के एक मामले में शिकायत वापस लेने का दबाव बना रहे थे बल्कि झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी देते थे. जमुई जिले के गिधौर प्रखंड के 50 वर्षीय धनेश्वर यादव से बिजली कनेक्शन के एग्रीमेंट के लिए 5,000 रु. की रिश्वत की मांग की जा रही थी. उन्होंने जूनियर इंजीनियर को रिश्वत लेते रंगेहाथ गिरफ्तार करा दिया. बाद में बिजली विभाग ने उन्हें डराने की कोशिश की. बगैर कनेक्शन बिल भेज दिया. आखिरकार विभाग ने उनका एग्रीमेंट किया और जूनियर इंजीनियर को बरखास्त कर दिया गया.
ऐसे ही लोगों की वजह से भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान ने रंग दिखाया है. सरकारी विभागों के संयुक्त निदेशक से लेकर थानेदार जैसे अधिकारी तक हर जिले में गिरफ्तार हुए हैं. मधेपुरा के डीएम की स्टाफ कार से 1,90,000 रु. बरामद होने के मामले में उन्हें जेल भेजा गया. वैसे बड़े अधिकारी कम पकड़े जा रहे हैं. लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों के फंसने में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है. निगरानी विभाग के अनुसार 2006 से 27 अगस्त 2014 तक ट्रैपिंग यानी रिश्वत लेते पकड़े जाने के 599 मामले दर्ज हुए हैं जबकि 1995 से 2005 तक सिर्फ 47 ट्रैपिंग केस दर्ज हुए. इस साल 27 अगस्त तक ऐसे 41 मामले दर्ज हो चुके थे.
दूसरी ओर ऐसे लोकसेवकों को सजा मिलने की गति धीमी है. 21 मार्च, 2014 को निगरानी विभाग के तत्कालीन प्रधान सचिव एस.के. नेगी ने विभागों को 137 सजायाफ्ता लोकसेवकों की सूची भेजी. इसमें 108 मामले 2006 के पहले और 29 मामले 2006 के बाद के हैं, जिसमें लोकसेवकों को सजा सुनाई गई है. नीतीश कुमार के शासनकाल में 88 मामलों की सुनवाई Þई जिसमें 29 लोकसेवकों को सजा सुनाई जा सकी. पकड़े जाने वाले अधिकारियों को सजा दिलवाने में देरी की वजह स्पेशल कोर्ट की संख्या में कमी है. वैसे पटना, मुजफ्फरपुर और भागलपुर में विशेष निगरानी कोर्ट बने हैं, पर इनके पास निगरानी के अलावा दूसरे मामलों की भी सुनवाई होती है. लिहाजा, इन मुकदमों का निष्पादन प्रभावित होता है. शायद यही वजह है कि लोगों का उत्साह कम हुआ है. 2007 में ट्रैपिंग के 105 मामले दर्ज हुए थे. लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या öति वर्ष घटकर 50 के करीब पÞंच गई है. निगरानी विभाग के सामने और भी मुश्किलें हैं. पदाधिकारियों के कई पद खाली हैं.
विभाग के अपर पुलिस महानिदेशक रवींद्र कुमार कहते हैं, ''सक्रियता बढ़ाई जा रही है. भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई को लेकर हर माह मुख्य सचिव के साथ बैठक होती है. मुजफ्फरपुर में एसपी का खाली पद भरा गया है." नागरिक अधिकार मंच के संयोजक शिवप्रकाश राय कहते हैं, ''गिरफ्तार लोकसेवकों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करने और सजा दिलाने में शिथिलता बरती जाती है. मामलों का स्पीडी ट्रायल नहीं होता, इस वजह से चंद माह बाद ही आरोपी ड्यूटी पर वापस आ जाते हैं." वैसे मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा है, ''भ्रष्टाचारियों के खिलाफ साइलेंटली काम हो रहा है. वे बख्शे नहीं जाएंगे." पर इतना जरूर है कि आम आदमी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ एक्शन में है.
भ्रष्टाचार के खिलाफ एक्शन में बिहार की जनता
बिहार में भ्रष्टाचारी अधिकारियों को पकड़वाने में जनता आगे है. ऐसे मामलों में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है. लेकिन सजा मिलने में देरी से थोड़ी निराशा.

अपडेटेड 29 सितंबर , 2014
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