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महाराष्ट्र में महायुति की आहुति

महाराष्ट्र में नाटकीय मोड़. अति आत्मविश्वास में शिवसेना और बीजेपी ने अलग-अलग राहें चुन ली हैं तो बुरे वक्त में झुकने से कांग्रेस के इनकार ने एनसीपी को किया जुदा.

अपडेटेड 30 सितंबर , 2014
मई में हुए लोकसभा चुनाव में पश्चिमी महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में जब कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा और उन्हें मु_ी भर सीटें ही मिल पाईं तो गोपीनाथ मुंडे को राहत की सांस लेनी चाहिए थी. लेकिन बीजेपी के इस चतुर राजनेता को जमीनी हकीकत का पूरा एहसास था. उन्होंने नरेंद्र मोदी को बताया कि पार्टी को महाराष्ट्र पर निगाह जमाए रखनी होगी. मोदी जब मई में अपनी कैबिनेट की रूपरेखा बना रहे थे तो मुंडे महायुति की साथ चुनाव लडऩे वाली छह पार्टियों को खुश रखने के लिए बेहद उत्सुक थे. वे जानते थे कि उनकी निगाहें विधानसभा चुनावों पर हैं. लेकिन इस साल जून में दिल्ली में इंडिया गेट के पास सडक़ दुर्घटना में मुंडे की मौत के साथ ही महायुति की इस फिक्र का भी अंत हो गया. इसलिए 25 सितंबर को विधानसभा चुनाव का पर्चा भरने के लिए जब सिर्फ दो दिन बचे और पितृपक्ष बीतने के बाद नवरात्र का पहला शुभ दिन आया तो 25 साल से चली आ रही महायुति इतिहास की अमानत बन चुकी थी.

रात नौ बजे शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने ट्वीट किया, ‘‘यह गठजोड़ तब से था, जब मैं पैदा भी नहीं हुआ था. मैं बीजेपी नेताओं के साथ एकता और भाईचारे के माहौल में पला-बढ़ा.’’ यह भावुक बयान शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के उस पौत्र का था, जिसकी जिद को इस गठबंधन के टूटने की सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है.
गठबंधन की बाकी पार्टियां आरपीआइ, एसएसपी, आरएसपी और शिवसंग्राम भी जल्द ही अपना रुख तय कर लेंगी. लेकिन इस टूट की जड़ें लोकसभा चुनाव की जीत के बाद से ही पडऩे लगी थीं. इस आग में घी का काम बीजेपी के उस आंतरिक सर्वे ने भी किया जिसमें बताया गया कि अगर चारों पार्टियां अकेले चुनाव लड़ती हैं तो बीजेपी को 288 में 134 तक सीटें मिल सकती हैं, जबकि शिवसेना 46 पर सिमट जाएगी. ऐसे में चुनाव बाद गठबंधन की गुंजाइश बची रहेगी. साथ ही कांग्रेस से अलग हो चुकी एनसीपी के लिए भी तब बीजेपी अछूत नहीं होगी. इसीलिए बीजेपी झुकी नहीं. पार्टी मानती है कि मोदी लहर में कोई कमी नहीं आई है.

आखिर इसी लहर के सहारे गठबंधन ने लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र की 48 में से 42 सीटें जीतीं. दूसरी तरफ सत्ताधारी कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन भी टूट गया. यहां शरद पवार की एनसीपी लगातार कांग्रेस पर दबाव बनाए हुए थी कि उसकी सीटें बढ़ाई जाएं, लेकिन कांग्रेस पहले तो एनसीपी को लंबे समय तक टालती रही और बाद में उसकी बात सुनना ही बंद कर दिया. कांग्रेस की ओर से जो भी हस्तक्षेप हुआ वह मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और कुछ मामलों में अशोक चव्हाण ही करते दिखे. पार्टी ने जिस तरह किसी भी कद्दावर महासचिव को बातचीत के लिए नहीं उतारा उससे जाहिर है कि कांग्रेस भी आर-पार के मूड में थी.
सोनिया गांधी और शरद पवार
उधर, एनसीपी की दलील थी कि 15 साल के गठबंधन में लगातार कांग्रेस का ही मुख्यमंत्री बना है. इस बार दोनों दल 144-144 सीटों पर चुनाव लड़ें और दोनों दलों का मुख्यमंत्री ढाई-ढाई साल के लिए कुर्सी पर बैठे. यानी दोनों ही पक्ष कुछ इस तरह का अडिय़ल रवैया लेकर चल रहे थे कि गठबंधन का जुआ उनके कंधे से उतर जाए. 25 सितंबर को गठबंधन तोडऩे का ऐलान करने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल, अजित पवार और सुनील तत्कारे ने कांग्रेस पर उनकी मांगों को न सुनने का आरोप लगाया. एनसीपी समय के पहिए में घूमते हुए वहीं पहुंच गई है, जहां से 15 साल पहले उसका जन्म हुआ था. उस समय कांग्रेस नेता शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर कांग्रेस छोड़ दी थी औैर अपनी पार्टी एनसीपी का गठन किया था. लेकिन साझ वोटों के डर ने नई पार्टी को तुरंत ही कांग्रेस से हाथ मिलाने को मजबूर कर दिया. 15 साल के सत्ता भोग के बाद राजनीति के मंजे खिलाड़ी शरद पवार हवा का रुख समझ रहे हैं. उधर, हवा को मुलायम सिंह यादव भी भांप रहे हैं.

गठबंधन टूटने के बाद कांग्रेस के साथ आने में समाजवादी पार्टी ने खासी दिलचस्पी दिखाई है. पार्टी नेतृत्व ने बिना समय गंवाए अबु आसिम आजमी को कांग्रेस से बातचीत करने के लिए खुला हाथ दे दिया. लेकिन सवाल है कि इस खुले मुकाबले में कांग्रेस और एनसीपी के हाथ क्या आने वाला है? और क्या ताजा समीकरण महाराष्ट्र की राजनीति में राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण शिवसेना के लिए कोई नर्ई भूमिका खोलने वाला है. हां, इस चुनाव में सब पार्टियों के पास अपने नारे होंगे, लेकिन बीजेपी के पास इसके अलावा मोदी नाम का तावीज भी होगा.
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