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शी के झटके का झनाटेदार सबक

मोदी चतुर नेता हैं, वे भ्रम में नहीं रहते या अनजाने में भी कोई चूक नहीं करते. उन्हें पता होना चाहिए कि 1962 में चीन ने यह साबित करने के लिए हमारे ऊपर हमला बोल दिया था कि ज्यादा ताकतवर कौन है.

अपडेटेड 30 सितंबर , 2014
यह ज्ञान मुझे एक स्कूल में मिला, हालांकि वह मेरा स्कूल नहीं था. बात जुलाई की है जब मुझे दिल्ली के प्रतिष्ठित संस्कृति स्कूल में छात्रों को पुरस्कार देने के लिए बुलाया गया था. वहां महान लोगों के विचारों वाले पोस्टर लगे थे जिनमें एक में असामान्य रूप से  एक आंख वाले इज्राएली जनरल मोशे दयान का भी एक उद्धरण था, ''अगर आप अमन चाहते हैं, तो दोस्तों से नहीं, दुश्मनों से बात करें.”

बाद में मैंने गूगल पर खोजा तो पाया कि उद्धरण बिल्कुल सही था. पश्चिम एशिया में जंग और अमन के वर्षों को खंगालते हुए मैं कई और दिलचस्प उद्धरणों से गुजरा. अमन पर ऐसा ही एक अनपेक्षित उद्धरण इज्राएल की प्रधानमंत्री गोल्डा मायर का मिला, ''जो नेता अपने देश को जंग में झोंकने से पहले हिचकता नहीं, वह नेता बनने के लायक नहीं है.”

आप कहेंगे कि पश्चिम एशिया के इतिहास में हमें भटकने की क्या जरूरत जबकि हमारा ध्यान जापान, चीन, अमेरिका, यहां तक कि थोड़ा-बहुत नेपाल, ऑस्ट्रेलिया और उसके यूरेनियम पर होना चाहिए जो सब के सब अपने पाले में आ चुके हैं और ज्यादातर टिप्पणीकारों समेत मीडिया (खासकर समाचार चैनल) हांफ-हांफकर इसे हमारी नई सरकार और उसके प्रधानमंत्री की विदेश नीति की जीत बता रहा है? नरेंद्र मोदी जब अमेरिका को प्रभावित करने में जुटे हुए हैं, ऐन उसी मौके पर ऐसी बदमजगी की क्या जरूरत?

ऐसा इसलिए क्योंकि विदेश नीति का मतलब सिर्फ शिखर सम्मेलनों और विदेश दौरों की चमक-दमक नहीं है. इसलिए भी क्योंकि भारत की उच्चस्तरीय कूटनीति का कुल जोड़ अब भी रणनीतिक ही है. इस बात को मोदी समझते हैं और यह स्वीकार करने में हमें कोई हिचक भी नहीं होनी चाहिए.

इसीलिए मोदी का पहला बड़ा दौरा जापान का लगता है और ठीक उसी वक्त जब चीन के शी जिनपिंग भारतीय सत्ता की नई राजधानी अहमदाबाद में उतर रहे थे, प्रणब मुखर्जी विएतनाम में पाए जाते हैं. मतलब कि दो देशों की राजधानियों में जब हम झंडा फहरा रहे थे उस वक्त खुद बीजिंग के प्रति हमारे मन में भारी शंका थी. चीन ने संदेश पढऩे में कोई चूक नहीं की.

उसने जैसी प्रतिक्रिया दी, उसके लिए हम तैयार नहीं थे. उसने ऐसा संयोग बैठाया कि शी के आगमन के साथ ही पीएलए के करीब हजार सशस्त्र सैनिक लद्दाख के चुमार क्षेत्र में घुस आए. इस कार्रवाई की प्रकृति और इसके वक्त को समझ पाना भारत के जापान और विएतनाम दौरे जितना ही आसान था.

शी के दौरे को चौपट करने के लिए पीएलए बस अपना दमखम दिखा रही थी, इस किस्म की मनगढ़ंत बातें सिर्फ चीन-भक्तों और अतिराष्ट्रवादी हुल्लड़ों के उस गिरोह को ही कायल कर सकती हैं जो पाकिस्तान-विरोध के रोग से ग्रस्त हैं और जिन्हें लगता है कि वहां की हर फौज उतनी ही मजबूत है जबकि हर नेता आसिफ अली जरदारी है.

भारत के उन्माद भरे रूढि़वादी माहौल में ऐसी कल्पनाएं बड़ी आसानी से फिट हो जाती हैं और इतने लंबे समय बाद हुए देश के गंभीरतम कूटनीतिक अपमान को भी हल्का करने की कोशिश करती हैं. और यह सब तब हो रहा है जब हमने आखिरकार एक सशक्त नेता को चुन लिया है.

चीन ने हमारे गुब्बारे की हवा निकालने के लिए अपने दौरे का इस्तेमाल किया. जिसे हम अपनी जमीन समझते हैं उस पर वे आराम से टहलते रहे जबकि हमारे नए प्रधानमंत्री अपने गृह नगर में उत्सव मनाते हुए उनके राष्ट्रपति को देख-देख मुस्कराते रहे. अगर चीन की जगह पाकिस्तान होता तब भी क्या हम इसी धैर्य का परिचय देते?

वहां तो हम इतने जज्बाती हो जाते हैं कि उनके राजनयिक के हुर्रियत नेताओं के साथ चाय पीने पर ही वार्ता रद्द कर डालते हैं. यानी छोटा पड़ोसी मामूली धृष्टता भी करे तो उसे लतिया दो लेकिन बड़ा वाला अगर तमाचा मार दे तो दूसरा गाल आगे कर दो. यही हमारी कूटनीतिक कार्यशैली है.

मोदी काफी चतुर नेता हैं. वे मूर्खता नहीं करते, न ही भ्रम में रहते हैं. उन्हें पता होना चाहिए कि 1962 में चीन को हमारे ऊपर यह दिखाने के लिए हमला करना पड़ा था कि ज्यादा ताकतवर कौन है. आज शी ने सिर्फ तीन दिन के दौरे में यही साबित कर डाला. इसका मतलब कि पांच दिनों तक अमेरिका में मोदी को यह बात सालती रहेगी.

मैं भारत के सर्वोच्च राष्ट्रीय (रणनीतिक) हित के चार स्तंभों को यहां क्रम से दोहराना चाहूंगा. पहला, भारत के भू-क्षेत्र में अब और कोई कमी नहीं आनी चाहिए. दूसरा, दक्षिण एशिया में उसकी महत्ता को चुनौती नहीं मिलनी चाहिए बल्कि उसे बढऩा चाहिए. तीसरा, भारत का वैश्विक कद बढऩा चाहिए. और चौथा, अपने एटमी अस्त्रों तथा मिसाइलों पर उसका पूर्ण नियंत्रण व स्वायत्तता होनी चाहिए.

चीन ने पहले तीन स्तंभों को हिला दिया है और हमें यह संदेश दे दिया है कि चौथे को लेकर उसे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. मुझे वास्तव में एक और गंभीर शक हो रहा है कि उसने इस तरह भारत में आए नए अतिराष्ट्रवादी उभार को भी चुनौती दी है और हमें याद दिलाया है कि हम अब तक पर्याप्त दक्षिणपंथी नहीं बन सके हैं.

यह भारत को बाध्य करता है कि वह बिल्कुल अलग रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में अपना अक्स देखे. मोदी फिलहाल अमेरिका में हैं और इस बात से सचेत हैं कि उनके उभार ने जहां नया आत्मविश्वास पैदा किया है वहीं हमारी ताकत और कमजोरियां बिल्कुल वैसी बनी हुई हैं जैसी उनके पूर्ववर्ती के दौर में थीं. चुनाव से सरकार बदलती है और राष्ट्र का मूड बदलता है, लेकिन उससे भू-राजनैतिक सचाइयां नहीं बदल जातीं.

यह कड़ी मेहनत, धैर्य और ठंडे दिमाग की मांग करता है. चीन की हरकतों में एक प्रवृत्ति मौजूद है कि वह भारत के संकल्प की परीक्षा लेता है. अगर मैं यह कहूं कि पिछली सरकार ऐसे ही उकसावों से काफी कुशलतापूर्वक और संकल्प के साथ निबटी थी, तो मैं अच्छे से वाकिफ  हूं कि लोग भड़क जाएंगे.

चीन ने तवांग में दलाई लामा की यात्रा को रोकने के लिए जब भारत को तकरीबन चेतावनी दे डाली थी (नवंबर 2009), तो भारत ने आंख में आंख डालकर उसका जवाब दिया था. मई 2013 में ली केकियांग के भारत दौरे पर जब सीमा पर अतिक्रमण हुआ था तो सरकार ने कहा था कि यात्रा जारी रखनी है तो पीएलए इलाका खाली करे.

जाहिर है, इस बार चीनियों ने कोई मौका नहीं छोड़ा. शी के भारत में आते ही खेल शुरू हुआ और एक राष्ट्राध्यक्ष को वापस भेजने का मतलब तकरीबन युद्ध की घोषणा जैसा होता.

मनमोहन सिंह ने संपादकों के साथ एक दुर्लभ संवाद में किसी कद्दावर राजनैतिक नेता की तरह भारत के रणनीतिक संकट को समझाया था. यह संवाद प्रकाशित करने के लिए नहीं था लेकिन एक संपादक ने इसे अगले दिन की हेडलाइन बना डाला. इसीलिए अब इस बात का जिक्र करके मैं कोई विश्वास भंग नहीं कर रहा. उन्होंने कहा था कि भारत को उसकी जद में रखने के लिए चीन एक बहुत सस्ती ''त्रिकोणीय” नीति अपनाता है.

संक्षेप में इसका अर्थ यह हुआ कि हमारा संतुलन बिगाडऩे के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल और इस तरह हमारे प्रभुत्व को कम करके चीन के प्रभुत्व को बढ़ाया जाना. जब तक पाकिस्तान हमें फंसाए रखता है, तब तक चीन को हमारे साथ सीमा विवाद सुलझने की कोई जरूरत नहीं दिखाई देती. राखी से लेकर टर्बाइन तक चीन अपने सस्ते उत्पादों के लिए भारत को सिर्फ एक बाजार के तौर पर अहमियत देता है.

पिछले आंकड़े बताते हैं कि भारत में चीन का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पोलैंड से भी कम था. इस तरह चीन हमारे साथ अपने रिश्ते को विशुद्ध एकतरफा तिजारत से तय करता है जबकि हमारी रणनीतिक हद को तय करने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करता है. इस तरह वह आराम से रहता है. इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए भारत को नई जुगत लगानी होगी.

मई 2014 के बाद के माहौल में यह बहुत इंकलाबी विचार जान पड़ सकता है, लेकिन ऐसा है नहीं. इस त्रिकोण से बाहर निकलने का इकलौता रास्ता यह है कि पहले पाकिस्तान की ओर कदम आगे बढ़ाए जाएं और दिल बड़ा करके बाकी पड़ोसियों से भी अपने लंबित पड़े मामले सुलटा लिए जाएं जिसमें बांग्लादेश के साथ भूमि विवाद का मसला भी शामिल है.

हम जानते हैं कि पाकिस्तानी सहयोग नहीं करते और उनके यहां की सत्ता संरचना उलझी हुई है. लेकिन चीन के मुकाबले भारत और बाकी दुनिया के पास वहां से लाभ उठाने के ज्यादा मौके मौजूद हैं. अमेरिका के दौरे पर मोदी के दिमाग में सबसे पहली प्राथमिकता अमन के लिए एक वैश्विक गठजोड़ कायम करना होनी चाहिए ताकि पाकिस्तानी सियासत और समाज के चरित्र को बदला जा सके.

वैश्विक आदर्शों में यह सर्वाधिक साझा आदर्श है और भारत को अमेरिका के इर्द-गिर्द एक गठजोड़ की जरूरत होगी, और कौन जाने लंबी दौड़ में चीन के साथ भी ऐसा ही करने की जरूरत आन पड़े. यह बिल्कुल वही रणनीति है जिस पर वाजपेयी-बृजेश मिश्र और मनमोहन-शंकर मेनन की जोड़ियों ने अतीत में काम किया है और दोनों ही मामलों में पाकिस्तान के साथ कुछ कामयाबी भी मिली है.

तात्कालिक जरूरत यह है कि भारत को पाकिस्तान के साथ संवाद बहाल करने के लिए चुपचाप कूटनीतिक कदम उठाने चाहिए और इस मसले पर अपने सबसे अहम पड़ोसी के प्रति जनधारणा को भी उसी दिशा में अनुकूलित करना चाहिए. आज इसका उलटा हो रहा है जब हम सबसे अहम पड़ोसी का मुहावरा चीन के लिए इस्तेमाल करके खुद को ही रिझाते हैं, लेकिन शी और चुमार प्रकरण के बाद हम जान गए हैं कि चीन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, न ही उसे हमारे एटमी हथियारों की कोई चिंता है. वे पूरब के पहाड़ों में युद्धक कोर को बिना आर्टिलरी के तैनात किए जाने पर हमारे ऊपर हंसते जरूर हैं.

अब हम शुरुआत में बताए दोनों प्रमुख इज्राएलियों के उद्धरणों को सही परिप्रेक्ष्य में रख सकते हैं. आपको अमन चाहिए तो अपने दुश्मनों से बात करनी होगी, जिनमें सबसे मुश्किल दुश्मन से सबसे पहले बात करनी होगी. नई सरकार और उसके वोटर इज्राएल की मेधा के प्रशंसक हैं. अगर इज्राएल के सबसे कामयाब फौजी नेता आपसे कह रहे हैं कि जाओ, दुश्मन से बात करो, जंग के नतीजों के प्रति सचेत रहो, तो आप समझ सकते हैं कि आपको पुनर्विचार करना होगा.

मेरी वाजपेयी डायरी से एक और पन्ना
मुझे विश्वास नहीं होता कि मैं संकट की घड़ी में इतने ठंडे दिमाग वाले किसी नेता से मिला हूं जितने अटल बिहारी वाजपेयी थे.

करगिल में संघर्ष जब अपने चरम पर था, तब एक शनिवार की शाम मैंने उनसे वक्त मांगा था. मुझे दोपहर तीन बजे का वक्त दिया गया और मैं समय पर पहुंच गया. मुझे भीतर के कमरे में ले जाया गया. साढ़े तीन बज गए, फिर चार भी बज गए, मैं बैठा रहा. मैंने सोचा क्या वे भूल गए कि मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं?

फिर उनका एक सहयोगी आया. कुछ संकोच से कहा, ''प्रधानमंत्री दोपहर की नींद से नहीं जगे हैं, आज कुछ लंबा सो गए.”

करीब साढ़े चार बजे मुझे भीतर ले जाया गया. वाजपेयी कुछ झेंप के साथ मजाकिया लहजे में बोले, ''अरे, अरे, अरे, अनर्थ हो गया, सोते रह गए हम और शेखरजी को प्रतीक्षा करनी पड़ी, अब क्या होगा?”

मैं पहले से ही खीझ हुआ था इसलिए पूछ डाला, ''किंतु अटलजी, करगिल में युद्ध और आप दो घंटे से सो रहे हैं दोपहर में?”

''हां, ठीक कहा आपने”, अटलजी बोले और उनकी आंखें  ''भय” से विस्फारित हो गईं. वे बोले, ''जंग चल रही है, राइफल लाओ, अटलजी लडऩे जाएंगे अब करगिल में, देश में जवानों की कमी जो हो गई है.”

उसके बाद हम दोनों हंसे, फिर वे एक पेस्ट्री पर जुट गए और मुझे सबक मिला कि कैसे एक मजबूत और आत्मविश्वासी नेता घोर संकट में भी अपना संयम बनाए रखता है.
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