झरखंड विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की रणनीति के बारे में तीन माह पहले पूछने पर बीजेपी का थोड़ा भी वजनदार नेता यही कहता, ''गठबंधन? क्यों भाई? अकेले ही काफी हैं." भला क्यों न दोहराता. आखिर पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य की 14 में से 12 सीटें बीजेपी की झेली में जो आई थीं. बीजेपी नेताओं के इस जवाब में अकड़ था. यही वजह थी कि बीजेपी ने ऑल झरखंड स्टुडेंट्स यूनियन (एजेएसयू) सरीखे भरोसेमंद सहयोगियों के दबे-छिपे गठबंधन प्रस्तावों को ठुकरा दिया था.
लेकिन महज चार माह बाद ही स्थिति बदल गई है. उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनावों में पार्टी को भारी नुक्सान उठाना पड़ा और क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत होकर उभरीं. झरखंड की दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां सुदेश महतो के नेतृत्व में एजेएसयू और बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में झरखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) अपने दम पर चुनाव लडऩे का इरादा जता रही हैं. वहीं बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व गुटों में बंटी अपनी राज्य इकाई का एकजुट चेहरा पेश करने की जद्दोजहद में है.
सुदेश महतो कहते हैं, ''हमारा गठबंधन तो झरखंड की जनता के साथ है." महतो को उम्मीद होगी कि उनकी पैठ वाले कुर्मी वोटरों के अलावा वे जाति की सोच से परे रहने वाले युवाओं और महिलाओं का समर्थन भी हासिल कर लेंगे. इसी तरह मरांडी विधानसभा की 81 सीटों में से अधिकांश पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे हैं. उपचुनावों में बीजेपी की हार से महतो और मरांडी को उम्मीद है कि वे अपने उन नाराज वोटरों को फिर अपने पाले में ले आएंगे, जो लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में चले गए थे.
एजेएसयू ने 2009 के विधानसभा चुनाव में 5,26,231 वोट हासिल करके 6 सीटें जीती थीं, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे 4,88,719 वोट ही मिले. दूसरी ओर, जेवीएम ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 15,79,772 वोट हासिल किए, जो 2009 के विधानसभा चुनाव में उसे प्राप्त 9,23,671 वोटों से ज्यादा थे. इसके बावजूद लोकसभा चुनाव में उसे 1 फीसदी से भी कम वोट मिले, जबकि 2009 के विधानसभा चुनाव में उसके वोटों का हिस्सा करीब 9 फीसदी था. 
(अपनी पार्टी के एक कार्यक्रम में सुदेश महतो)
बीजेपी की मजबूरियां खुलकर सामने आ गईं जब 8 सितंबर को उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को रांची की एक रैली में नरेंद्र मोदी के नाम की दुहाई देनी पड़ी. उन्होंने पार्टी के लोगों से कहा, ''मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को भूल जाएं. इसकी बजाए स्पष्ट बहुमत लाने पर ध्यान दें." एक ओर जहां अर्जुन मुंडा के समर्थकों ने उन्हें चौथी बार मुख्यमंत्री बनाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया है. तो पूर्व उप-मुख्यमंत्री रघुबर दास इस बार सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर निशाना साध रहे हैं. बीजेपी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का ऐलान नहीं कर सकती. इससे मुंडा और रघुबर दास धड़ों के बीच खाई चौड़ी हो जाएगी.
दूसरी ओर, चूंकि झरखंड में लोकसभा और विधानसभा चुनाव का वोटिंग पैटर्न हमेशा अलग रहा है, इसलिए भी स्थानीय क्षत्रप उम्मीद पाले बैठे हैं. लोकसभा चुनाव में वोटरों ने हमेशा स्पष्ट जनादेश दिया है, लेकिन विधानसभा चुनावों में उन्होंने एक बार भी किसी एक दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया. कांग्रेस और बीजेपी-दोनों ही पार्टियां अपने लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को विधानसभा चुनाव में दोहराने में नाकाम रही हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राज्य की 14 में से 8 सीटें जीती थीं और राज्य के 81 विधानसभा क्षेत्रों में से 46 में बढ़त हासिल की थी. कुछ माह बाद जब विधानसभा चुनाव हुए तो वह सिर्फ 18 सीटें ही जीत सकी.
झरखंड के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वोटिंग के इस परस्पर विरोधी रुझन में भी एक सिलसिला दिखाई देता है. वोटरों ने विधानसभा चुनावों में हमेशा खंडित या त्रिशंकु जनादेश दिया है, जबकि 2004, 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने हर बार स्पष्ट जनादेश दिया. 2004 में बीजेपी के इंडिया शाइनिंग अभियान से जहां देश का बहुमत नाखुश था, झरखंड ने भी इसी राष्ट्रीय रुझन के साथ राज्य की 13 सीटें कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए की झेली में डाल दीं. 2009 में राज्य ने राष्ट्रीय मिजाज के खिलाफ जाते हुए बीजेपी को 8 सीटें दीं और कांग्रेस को महज एक सीट पर समेट दिया. 2014 में झरखंड ने एक बार फिर राष्ट्रीय लहरों के साथ तैरते हुए 14 में से 12 सीटें बीजेपी को दे दीं. तो क्या विधानसभा चुनाव में वह इसके उलट रहेगा?
वैसे जब विधानसभा चुनाव का मौका आता है तब क्षेत्रीय आकांक्षाएं और पहचान की राजनीति वोटरों के व्यवहार पर हावी हो जाती है. वोटिंग पैटर्न में भिन्नता साफ दिखाई देती है. 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व के वाले यूपीए गठबंधन ने राज्य की 14 सीटों में से 13 सीटें जीत ली थीं जबकि उस वक्त राज्य सरकार का नेतृत्व कर रही बीजेपी सिर्फ एक सीट तक सिमट गई थी. कुछ माह बाद विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस को धूल चाटनी पड़ी और बीजेपी नेतृत्व वाला एनडीए 82 विधायकों के सदन में 36 सीटों के साथ सबसे बड़ा गठबंधन बनकर उभरा.
अब कांग्रेस क्षेत्रीय गठबंधन के लिए राजनैतिक पानी में चारा डालकर बैठी है. उसकी निगाह पर भी है और वह उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए गठबंधन का साझ उम्मीदवार तक घोषित कर सकती है. हालांकि राजनीति में मरांडी के पक्के विरोधी शिबू सोरेन के जेएमएम के साथ कांग्रेस का पहले से ही गठबंधन है, पर इस बार वह आरजेडी, जेडी(यू) और एजेएसयू को भी साथ लाने के लिए उत्सुक है. कांग्रेस के एक नेता ने इंडिया टुडे से कहा, '' महतो और मरांडी को मतभेदों को भुलाकर हाथ मिला लेना चाहिए और बीजेपी के खिलाफ मजबूत विकल्प बनना चाहिए."
झारखंड में ताल ठोंकते स्थानीय क्षत्रप तो दुविधा में दिग्गज
झारखंड में पार्टियों के सूरमाओं की उम्मीदें उफान पर हैं, वहीं कल तक गठबंधन से इनकार कर रही बीजेपी अब सावधानी की मुद्रा में.

अपडेटेड 29 सितंबर , 2014
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