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नरेंद्र मोदी से देशवासियों की उम्मीदें उफान पर

देश ने नरेंद्र मोदी को इस ख्वाहिश से चुना कि वे उसके लिए अच्छे नतीजे दे सकेंगे. मोदी से देशवासियों की उम्मीदें अब भी बरकरार हैं. विशेष जनमत सर्वेक्षण में जाहिर हुआ कि अगर दोबारा चुनाव हुए तो 48 प्रतिशत मतदाता बीजेपी को ही अपना वोट देंगे. साथ ही 57 प्रतिशत मतदाताओं की प्रधानमंत्री के लिए पहली पसंद फिर मोदी ही हैं.

अपडेटेड 1 सितंबर , 2014
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने अभिभाषण से ठीक पहले, रात दो बजे जब लाल किले के मंच से बुलेटप्रूफ फाइबर ग्लास को हटाने के निर्देश दिए, तो मामला सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं था. अपने असाधारण चुनाव प्रचार अभियान में मोदी ने स्थानीय नायकों, बोलियों और साझा चिंताओं का इस्तेमाल करके लोगों के साथ सहज और फौरी रिश्ता कायम कर लिया था. उन्होंने मतदाताओं से सीधे कहा थाः मुझे वोट दीजिए और मैं नतीजे दूंगा. नई सरकार को आए नब्बे दिन हो चुके हैं और जिस देश ने मोदी को भारी मतों से विजयी बनाया, उसने अब तक अपना धैर्य और विश्वास नहीं खोया है. मोदी के गद्दीनशीन होने के बाद पहली बार, इंडिया टुडे समूह-हंसा रिसर्च के देश का मिज़ाज जानने के लिए जनमत सर्वेक्षण में 57 फीसदी लोग मानते हैं कि वे ही प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त हैं, 48 फीसदी लोगों का मानना है कि उन्होंने मंत्रियों को अप्रासंगिक बना दिया है जबकि 47 फीसदी लोग इस बात से आश्वस्त हैं कि वे आरएसएस के एजेंडे को रोकने में सक्षम होंगे. यूपीए के कार्यकाल में सत्ता के दो ध्रुवों की कार्यप्रणाली से ऊबे मतदाता अब चाहते हैं कि सत्ता और जवाबदेही दोनों का केंद्र एक ही हो. अगर दोबारा चुनाव हुए, तो 48 फीसदी लोगों का कहना है कि वे फिर बीजेपी को वोट देंगे. यह आंकड़ा भले ही भारी हो लेकिन मोदी की निजी लोकप्रियता के मुकाबले काफी कम है. आज चुनाव हुए तो बीजेपी को 16 मई को आए नतीजों से 32 सीटें ज्यादा मिलेंगी यानी कुल 314 सीटें मिलेंगी.
 
मोदी देश में राज करने की ख्वाहिश तो रखते ही थे. वे लोगों की भावनाओं पर भी राज करने की काबिलियत रखते हैं. उन्होंने अपने निष्पक्ष नजरिए से उन समुदायों तक पहुंच बनाई है जिनसे रिश्ते असहज रहे हैं. चाहे वह संसद में उनका अभिभाषण हो अथवा स्वतंत्रता दिवस का भावना प्रधान संबोधन, दोनों से यही बात साबित होती है. मोदी सरकार के साए में 78 फीसदी लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. 68 फीसदी मुसलमान भी यही राय रखते हैं. आश्चर्य की बात है कि सर्वेक्षण में कहीं ज्यादा मुसलमान इस बार बीजेपी को वोट देने की बात कह रहे हैं (29 फीसदी) जबकि कांग्रेस के मामले में यह आंकड़ा महज 24 फीसदी है.
देश का मिजाज, जनमत सर्वेक्षण
इससे भी चौंकाने वाली बात यह है कि मोदी खुद देश की भावनाओं के साथ कदमताल करते नजर आ रहे हैं जो शायद उनकी फीडबैक के तरीकों का ही नतीजा है. इंडिया टुडे समूह-हंसा रिसर्च सर्वेक्षण के मुताबिक 69 फीसदी लोग मानते हैं कि पाठ्यपुस्तकों में बदलाव होना चाहिए, 43 फीसदी लोग खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नहीं चाहते और 41 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनका मानना है कि फेसबुक पर टिप्पणी के मामले में आपराधिक मुकदमा दायर किया जाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं है.

बीजेपी की भारी जीत से उत्साहित यह देश अब भी इस उम्मीद और इंतजार में है कि अच्छे दिन जरूर आएंगे. सर्वेक्षण में शामिल 49 फीसदी लोग मानते हैं कि भविष्य में उनकी आर्थिक हालत में सुधार होगा और 65 फीसदी का मानना है कि अगले छह महीने में मोदी सरकार देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला देगी. सर्वेक्षण में लोगों का कहना है कि वे संसद में मजबूत विपक्ष की कामना करते हैं और उन्हें कांग्रेस से इस भूमिका के निभाए जाने की उम्मीद है. यह रुझान परिपक्व लोकतंत्र का सशक्तसंकेत है. भारत को एक नेता तो चाहिए लेकिन ऐसा नहीं जो निर्विरोध हो.

देश के मतदाता उदार हैं. वे राहुल गांधी को एक और मौका देना चाहते हैं और वे राहुल को उनकी बहन प्रियंका व उनकी मां सोनिया पर तरजीह देते हैं. वे मानते हैं कि गांधी परिवार ही कांग्रेस को सक्षम नेता दे सकता है. यह इस बात का संदेश है कि राहुल को सक्रिय रहना चाहिए और लगातार अपनी सक्रियता बनाए रखनी चाहिए. संसद में किसी एक दिन संसद में सांप्रदायिक हिंसा पर गुस्सा जाहिर करना और अगले ही दिन से फिर मौन हो जाना ऐसे शख्स के लिए नहीं सुहाता, जिसे मोदी के खिलाफ खड़ा होना है.
बीजेपी गरीबों पर ध्यान देने वाली पार्टी
वक्त हालांकि बीतता जा रहा है. सर्वेक्षण में लोग मोदी को छह महीने का वक्त देते नजर आ रहे हैं. वे नहीं चाहते कि देश के अमूल्य संसाधन सरदार पटेल की प्रतिमा जैसे प्रतीकात्मक कामों पर खर्च हों. सर्वेक्षण में शामिल 67 फीसदी लोगों का कहना है कि वे बढ़ती महंगाई के हिसाब से कमाई नहीं कर पा रहे हैं. इस दौरान मोदी ने एक ज्यादा जवाबदेह सरकार का मुजाहिरा किया है जो लंबे समय तक और ज्यादा मेहनत से काम कर रही है. दिल्ली के चमकदार कमरों और पांच सितारा होटलों में टहलने वाले सत्ता के दलालों को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. अब तक एक भी घोटाले की भनक नहीं लग सकी है—यहां तक कि 70,000 रुपए की मामूली रकम के मामले में भी जवाबदेही देखने को मिल रही है जैसा कि हमने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सीईओ के कथित रिश्वत कांड में देखा है. सार्वजनिक सेवाओं पर सरकार की पहल लोगों के घरों तक पहुंच चुकी है. दो कॉर्पोरेट ने शौचालय निर्माण के लिए 100-100 करोड़ खर्च करने का वादा कर डाला है.

बकौल मोदी, उनकी सरकार किसी न किसी तरीके से हर किसी को प्रभावित करेगी. ई-गवर्नेंस, ई-शिक्षण, ई-कॉमर्स और टेलीमेडिसिन जैसी पहल से नौकरशाहों और जनता के बीच की दूरी खत्म होगी और रिश्वतखोरी तथा ढिलाई समाप्त होगी. क्या यह सब पर्याप्त होगा? जैसा कि सर्वेक्षण में सामने आया है, लोगों को बेहतर सार्वजनिक सेवाएं तो चाहिए लेकिन उनके लिए भुगतान करने को वे तैयार नहीं हैं. विडंबनाएं और भी हैं, मसलन उदारीकरण में जवान हुई पीढ़ी रियल एस्टेट के अलावा बैंक के एफडी में अब भी निवेश क्यों करना चाहती है? या फिर, जब वे नेताओं को भ्रष्ट मानते हैं, तो सर्वेक्षण में शामिल हर चार में से एक व्यक्ति ने रिश्वत क्यों दी है? अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय कहते हैं, 1991 के बाद विभिन्न सरकारों के दौरान आर्थिक मोर्चे पर बदलाव की गति धीमी रही है तो इसलिए कि जनता भी पूरी तरह बदलाव नहीं चाहती.

इसलिए मोदी और देश के लोगों, दोनों को ही एक-दूसरे की बातों का ख्याल रखना पड़ेगा. ऐसा करने के लिए अभी कम से कम पांच साल का वक्त तो है ही.
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