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राष्ट्र के हमेशा सही होने का निहितार्थ

बढ़ती अनुदारता से हमारे समाज का कोई भी तबका बच नहीं पाया है. लगातार अनुदार, संवेदनहीन और बदमिजाज हो रहे नए भारत को लेकर मैं क्यों कुढ़ता रहता हूं.

अपडेटेड 25 अगस्त , 2014
हाल के वर्षों में जिस तेजी से इस राष्ट्र का कायाकल्प हुआ है, उसे सिर्फ एक शब्द में व्यक्त किया जा सकता है. आप अपनी राजनैतिक प्राथमिकताओं और अवस्थिति के मुताबिक इसे चाहें तो ‘बदलाव’ कहें, ‘अच्छे दिन’ कह लें या फिर पश्चिम बंगाल में चलने वाला इसका पर्याय उठा लें जहां इस परिघटना को सबसे पहला नाम दिया गया—‘पोरिबर्तन’. जाहिर है, स्वतंत्रता दिवस पर केंद्रित इस विशेषांक का विषय स्वाभाविक तौर पर परिवर्तन ही है. इंडिया टुडे के संवाददाता आपके लिए इस अंक के पन्नों में एक बदलते राष्ट्र की छवियां लेकर आए हैं, जिनमें जाहिर है ज्यादातर बदलाव भले के लिए ही होंगे. लेकिन, क्या यह बदलाव किसी सपने का अनावश्यक पीछा करने जैसा तो नहीं है? क्या इस बदलाव से कुछ चिंताएं उपज रही हैं?

आजादी के जश्न, नए दौर के आगमन और यूपीए-2 के साए तले पांच साल की शर्मिदगी से उबर कर राष्ट्रीय गौरव की बहाली के इस क्षण में यह सोचना अहम होगा कि आखिर कैसे हम हाल के वर्षों में कट्टरताओं और अनुदारताओं की ओर बढ़े हैं. अंतर्जातीय विवाहों पर प्रतिबंध लगाने वाली खाप पंचायतों की तो फौरन निंदा शुरू हो जाती है लेकिन हिंदू और मुस्लिम के बीच प्रेम को लव जेहाद का नाम देकर उसे खारिज करने वाली ताकतें मामूली आलोचना को भी बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं. अनुदारता के मामले में कोई भी शख्स पीछे नहीं रहना चाहता. नरेंद्र मोदी ने 7, आरसीआर में कदम रखते ही दिल्ली में इफ्तार की खूबसूरत परंपरा को तोड़ डाला, जिसमें वाजपेयी कभी पीछे नहीं रहे. ठीक उसी वक्त कांग्रेस ने महाराष्ट्र में मुसलमानों को आरक्षण देने की अपनी मंशा जाहिर कर दी. तमाम सर्वे बता रहे हैं कि इस देश में सामाजिक कट्टरता बढ़ती जा रही है और युवा पीढ़ी को अब अरेंज मैरेज रास आने लगे हैं.

इस बढ़ती अनुदारता से हमारे समाज का कोई भी तबका या संस्थान नहीं बच सका है. अपने पद से अवकाश ले रहा हमारा सेना प्रमुख जब कहता है कि हमारे फौजियों ने अपने भाइयों का सिर कलम किए जाने का बदला ले लिया है तब कोई उससे नहीं पूछता कि प्रतिशोध में ही सही, लेकिन हमारी सेना पलट कर वैसी ही बर्बरता आखिर कैसे कर सकती है? उसकी जगह आया नया सेनाध्यक्ष अपने पहले बयान में वादा करता है कि पाकिस्तान ने अगर उकसाया तो उसे कड़ा और उपयुक्त (तीखा और फौरन) जवाब दिया जाएगा! गोया हम कोई जंग लड़ रहे हों.

अगर आप सोचते हों कि हमारी अदालतें, या फिर सुप्रीम कोर्ट जिसका दिल सामान्यतः बहुत उदार है, इस प्रवृत्ति से बचे हुए हैं, तो दोबारा सोचिएगा. अदालतों द्वारा जमानत न देना अब रोजमर्रा की बात हो चली है जो लोकशाही के सिद्धांतों के प्रतिकूल है. राजा से लेकर कनिमोली और जगनमोहन रेड्डी और तरुण तेजपाल से लेकर ऐमवे के अमेरिकी सीईओ तक के मामले में जमानत न देने की नई परंपरा का इस्तेमाल सुनवाई और दंड के विकल्प के तौर पर किया गया है जिसका राजनीतिकों, मीडिया और सिविल सोसाइटी ने भी खूब स्वागत किया है. इस पर कोई भी सवाल उठाकर देखिए, तत्काल आपसे पूछ लिया जाएगाः क्या आप भ्रष्ट, चोर, अपराधियों वगैरह के साथ सहानुभूति रखते हैं? गोया आर्थिक सुधारों से उमड़ी बदलाव की इस लहर में हमारी उदार भावनाएं भी बह गई हैं. इस व्यवस्था और इसकी प्रक्रियाओं में हमारी आस्था इस कदर गिर चुकी है, हम इतने अधीर हो चुके हैं कि यह पूछने की कोई जुर्रत भी नहीं करता कि बिना आरोप-पत्र के या दोष सिद्ध हुए आखिर कैसे सुब्रत राय सहारा को अनिश्चित काल तक हिरासत में रखा जा सकता है. चूंकि हम मानते हैं कि वह आदमी बुरा है, क्या सिर्फ इसलिए उसे काल कोठरी में डालकर चाबी दरिया में फेंक दी जानी चाहिए.

यह लग सकता है कि मैं न्यायिक व्यवस्था को निशाने पर ले रहा हूं. यदि ऐसा है तो सिर्फ  इसलिए क्योंकि वे तमाम संस्थाएं जो हमें बहुसंख्यकवाद की अतियों से बचाने का काम करती आई हैं, उनमें न्यायपालिका सबसे अहम है. आज वह भी बेहद गुस्से में है. व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सदी भर पुरानी जो बहस हमारे यहां चली आई थी, हम पाते हैं कि उसे इसने सिर के बल खड़ा कर डाला है. आप देखिए कि मृत्युदंड सुनाए जाने की दर कैसी तेज हो गई है, भले ही तत्काल एक भी सजा न दी जानी हो. सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ और विवेकवान न्यायाधीश ने इस बात को हाल ही में बड़े अच्छे से रखा था कि अब न्यायपालिका अपराधी को सुधारने की (अधिक सभ्य) दृष्टि से नहीं बल्कि प्रतिशोध की दृष्टि से काम कर रही है जिसकी वजह मीडिया और नागरिक समाज द्वारा पैदा किया गया दबाव और लोकरंजक किस्म की मांगें हैं. कभी सिद्धांतों पर लडऩे वाले नागरिक स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं की चुप्पी भी इस मामले में अखरने वाली है. ऐसा नहीं कि वे खत्म हो गए हैं. अगली बार जब कभी छत्तीसगढ़ या झारखंड में कोई शीर्ष माओवादी मारा जाएगा, वे सब एक संयुक्त निंदा प्रस्ताव पर दस्तखत करने के लिए बाहर निकल आएंगे. इन एक्टिविस्ट ने भी अब खुद को विशिष्ट हित समूहों के रूप में तब्दील कर लिया है.

इस सबका दोष मोदी के उभार को देना बहुत आसान होता, लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा. इसका उलटा कहीं ज्यादा सच है कि देश के लोगों में बढ़ती अनुदारता ने मोदी की लहर को मजबूती दी है. आप इसके लिए भी मोदी को दोष नहीं दे सकते क्योंकि यह बात समूचे राजनैतिक तबकों पर एक साथ लागू होती है. सभी दलों की इसमें समान हिस्सेदारी है. आप उन कानूनों को ले सकते हैं जिनका वैयक्तिक आजादी से लेना-देना है और जिन्हें पारित करवाने की जल्दबाजी में इन दलों ने पर्याप्त विचार तक करना ठीक नहीं समझा. कथित निर्भया कानून से लेकर जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं में आप पाएंगे कि सारा मिजाज दरअसल ऐसा ही हैः उन्हें पकड़ो, फांसी पर लटका दो और संभव हो तो चौराहे पर लैंपपोस्ट से लटकाओ.

इस सनक भरे माहौल में कुछ और विकृतियां सतह पर उभर आई हैं. मसलन, सारे नेता चोर हैं और जिन पर मुकदमा चल रहा है वे जब तक खुद को निर्दोष साबित नहीं कर लेते तब तक दोषी हैं. नतीजा यह होता है कि ऐसे मामलों से निबटने के वे अपने तरीके खोज निकालते हैं: विशेष फास्ट टै्रक अदालतें जहां उन्हें जल्दी इंसाफ मिल सके. यह एक और ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे हमारे यहां सुविधा संपन्न लोग खुद को व्यवस्था से अलग कर लेते हैं और बाकी को उस नरक में छोड़ देते हैं. यह वैसे ही है जैसे एक भीड़ भरे गंदले सरकारी अस्पताल में कोई वीआइपी वॉर्ड या नेताओं की अपनी अदालत जैसे कि दिल्ली में नौकरशाहों के बच्चों के लिए अपना संस्कृति स्कूल मौजूद है. तर्ज यह कि अगर आप अपने बच्चों के लिए विशेष स्कूल खुलवा सकते हैं तो मैं तीव्र गति के इंसाफ  के लिए अपनी अदालतें भी खुलवा सकता हूं. बाकी का भारत नरक में जीने के लिए अभिशप्त है तो रहे, उसकी जिंदगी और करियर सामान्य अदालतों के चक्कर काटते निबट जाएं तो हमें क्या! जैसा कि हमने हाल में देखा कि एक शख्स को प्रत्यक्षतः दोषी नहीं साबित करने में अदालत को 25 साल लग गए—वह शख्स और कोई नहीं बल्कि टाटा स्टील के पूर्व प्रबंध निदेशक जे.जे. ईरानी थे (1989 में जमशेदपुर अग्निकांड का मुकदमा).

इस बदलाव की वजहें बताना आसान नहीं है. हो सकता है ऐसा इसलिए हुआ हो क्योंकि अब हमारे यहां युवाओं की तादाद काफी ज्यादा है और हम आर्थिक सुधारों का फल चख चुकी तेजी से बढ़ती एक अर्थव्यवस्था की पैदाइश हैं. ऐसे समाज की उपज, जो कायदे से शिक्षित या कहें कि साक्षर होने से पहले ही हाइपर-कनेक्टेड (अत्याधुनिक सूचना तंत्र का हिस्सा) हो गया. मैं ऐसा कहने के खतरे समझ् रहा हूं. मेरे ऊपर उपदेशात्मक होने का आरोप लग सकता है. लेकिन, भारतीयों की यह समूची पीढ़ी ज्ञान कहां से अर्जित कर रही है? आंशिक तौर पर सियासी मुहावरेबाजियों से, या फिर स्थानीय उपदेशकों के धार्मिक या वैचारिक प्रवचनों से, टीवी पर प्रचार करने वालों से (और मेरा आशय पूरी तरह सेकुलर है) या फिर मीडिया से, जिससे अप्रभावित रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती, जबकि खुद न्यायपालिका इस प्रवृत्ति का शिकार हो चुकी हो. करगिल की जंग ने मीडिया को सिखाया कि देशभक्ति एक बिकाऊ माल हो सकती है, खासकर एक ऐसी स्थिति में जब जंग आपने जीत ली हो. लेकिन पिछले कुछ बरसों के दौरान इस देशभक्ति ने एक ऐसे राष्ट्रवाद के लिए राह बनाई है जहां यह मान लिया जाता है कि मेरा राष्ट्र तो कभी गलत हो ही नहीं सकता. यही बात परेशान करने वाली है.

देशभक्ति और राष्ट्रवाद का फर्क अगर आप और बेहतर शब्दों में समझना चाहते हों तो मैं 70 साल पुराने जॉर्ज ऑरवेल के एक निबंध से कुछ वाक्य उधार लेना चाहूंगाः “राष्ट्रवाद को देशभक्ति के साथ दिग्भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए. यहां हम दो भिन्न और विरोधी विचारों की बात कर रहे हैं. देशभक्ति से मेरा आशय एक विशिष्ट जगह और जीवन की विशिष्ट शैली के प्रति समर्पण से है जिसे आप दुनिया में श्रेष्ठ मानते हों लेकिन जिसमें उसे दूसरे पर थोपने की आकांक्षा न हो.”

यूरोप जब राष्ट्रवाद की आग में झुलस रहा था तब ऑरवेल ने यह अनमोल निबंध लिखा थाः “देशभक्ति सैन्य और सांस्कृतिक, दोनों ही संदर्भों में रक्षात्मक प्रकृति की श्रेणी है. दूसरी ओर राष्ट्रवाद को सत्ता की आकांक्षा से अलग करना संभव नहीं है.” उन्होंने निष्कर्ष दिया था कि राष्ट्रवाद अमन-चैन का सबसे खतरनाक दुश्मन है.

इस फर्क को समझने का एक और तरीका है. मैं अपने राष्ट्र से, किसी मसले पर उसकी राष्ट्रीय नीति से, यहां तक कि कश्मीर जैसे संवेदनशील मसले पर भी असहमत रह सकता हूं और तब भी देशभक्त हो सकता हूं. लेकिन यदि मैं राष्ट्रवादी हूं, तब मेरा राष्ट्र जो कुछ भी करता या कहता है वह मेरे लिए सही ही होना चाहिए. यह तर्क अजीबोगरीब ढंग से सीमाओं को लांघ जा सकता है. आप देखिए कि कैसे हम सब ने एंडरसन से हुई झड़प के बाद रवींद्र जडेजा को निर्दोष घोषित कर डाला था. जब एक न्यायाधीश ने फैसला सुनाया कि दोनों की गलती बराबर थी, तो हम पूर्वाग्रह और पक्षपात चिल्लाने लगे. यह हालत तब है जबकि दुनिया के क्रिकेट पर तकरीबन भारत का ही कब्जा है. साइमन बार्नेस ने अपनी पुस्तक द मीनिंग ऑफ स्पोर्ट में जो लिखा था, वह ऐसे बदले हुए भारत के लिए तो नहीं थाः “देशभक्ति, राष्ट्रवाद जैसी नहीं होती है. अपनी टीम का उत्साहवर्धन करना एक चीज है जबकि यह सोचना कि आपके देश को ही विश्व कप जीतने का अधिकार है, टीम के हारने पर किसी को तो इसकी सजा मिलनी ही चाहिए, कि आपका देश ही दुनिया के लिए एजेंडा तय करेगा और इससे असहमत होने वाला न सिर्फ गलत है बल्कि विक्षिप्त है—यह अलहदा चीज है.”

आजादी की 68वीं वर्षगांठ पर भारत के लिए यह बहुत महीन बात होनी चाहिए, लेकिन राष्ट्रवाद का यह नया, अनुदार और अधीर उभार अपने साथ समस्याएं लेकर आ रहा है. मसलन, अगर मेरा राष्ट्र हमेशा सही है और आप उससे असहमत हैं तो आप राष्ट्रद्रोही हैं या दूसरे ग्रह के ही प्राणी हैं. यह समस्या इसलिए पैदा हुई है क्योंकि अभी-अभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने राष्ट्रवाद की नई परिभाषा हमें दी हैः राष्ट्रवाद यानी हिंदुत्व. यदि आप हिंदुस्तान में रहते हैं तो आपको हिंदू होना पड़ेगा, फिर चाहे आप किसी भी ईश्वर की आराधना करते हों.

क्या आप इससे असहमत हैं? हमारे राष्ट्रवाद को चुनौती देने की आपकी हिम्मत कैसे हुई? अब आप शायद समझ गए हों कि कुछ भी कर पाने की महत्वाकांक्षा, छोटे शहर-कस्बों के सशक्तीकरण, उच्च संचार तंत्र और गैजेटयुक्त जीवनशैली के उन्नयन से इस राष्ट्र में आ रहे चैतरफा बदलाव के बावजूद मैं क्यों कुढ़ रहा हूं. मेरी कुढऩ के पीछे दरअसल लगातार अनुदार, संवेदनहीन और बदमिजाज होते जा रहे एक भारत की असहज कर देने वाली एक सच्चाई जो है.
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