जब नरेंद्र मोदी ने मई में दिल्ली पर अवश्यंभावी फतह हासिल की तो ऐसा लगा कि एक संपूर्ण, सुगठित और पूरी तरह आदर्श से प्रेरित नवजागृत गणतंत्र लुटियंस की दिल्ली पर छाने को पूरी तरह से तैयार है. अगर मोदी के पास अपने किए हुए वादे पूरे करने का खाका तैयार था तो इतने भारी बहुमत से उन्हें जिताने वाले भारत के हाथ में उम्मीदों का परचम लहरा रहा था. लगता है कि वे भारत की अधीरता और बेचैनी को समझते हैं.
वह देश, जिसकी 33 प्रतिशत आबादी 1991 में महान उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद जन्मी है. यह वह भारत है, जिसने 24 घंटे सातों दिन टेलीविजन पर प्रसारित शोर और जोश से भरे दो नागरिक आंदोलन झेले हैं. एक आंदोलन स्पेक्ट्रम से लेकर कोयले तक प्राकृतिक संसाधनों के अनुचित आवंटन से उद्घाटित हुए भ्रष्टाचार के विरुद्ध चला था तो दूसरा आंदोलन महिलाओं की संरक्षा और सुरक्षा के सवाल पर खड़ा हुआ था.
यह भारत मंद अर्थव्यवस्था और अपूर्ण सामाजिक महत्वाकांक्षाओं के कारण अधीर था, जो दुनिया पर राज करने के उसके सपनों का दम घोट रही थी. यह वह भारत था, जिसे लगता था कि उसका वक्त आ गया है.
लेकिन सरकार चलाना, खासकर अपने उच्चतम अवतार में जरा टेढ़ा काम है. कहते हैं कि इंदिरा गांधी के चतुर कश्मीरी सलाहकार पी.एन. धर ने दमन सिंह की नई किताब में मनमोहन सिंह से कहा था कि वृद्धि छल से हासिल की जाती है. सर्वोत्तम असल में उत्तम का शत्रु हो सकता है.
लेकिन अपने ऐतिहासिक स्वाधीनता दिवस के उत्सव की तैयारी में जुटे भारत को आस्था की नाटकीय छलांग के बदले कुछ ऐसा लगता है कि उसे सिर्फ लीपापोती के जाल से बहलाया गया, जिसका कुछ हिस्सा एक ऐसा छद्म था कि भारत नाम के विचार की साझी चेतना को ही पलटने पर उतारू हो गया.
अभी से ऐसा लगने लगा है कि भारत अपने यहां हो रहे लडख़ड़ाते बदलाव से सहमा हुआ है. उद्योग जगत के सिरमौर जो कल तक उम्मीदवार नरेंद्र भाई की शान में कसीदे काढ़ते नहीं थक रहे थे, अब प्रधानमंत्री मोदी के बारे में एकदम मौन साधे हुए हैं. छाया बजट तैयार करने वाले अर्थशास्त्री अब एक और जोशीली मुख्यमंत्री के दरवाजे का रुख करने लगे हैं, जो श्रम सुधारों और भूमि सुधारों के वादे को पूरा करने के लिए पूरी तरह संकल्पित दिखती है.
मोदी के दमकते प्रोजेक्ट्स की वैकल्पिक संभावनाओं से सम्मोहित नौजवान ‘‘अच्छे दिन’’ के नारे का उलटा मतलब लगाने लगे हैं. अफवाह तो यहां तक है कि मोदी ने अपनी सरकार और पार्टी से कहा है कि यह नारा लगाना बंद करें. मोदी के भक्तों से भरे सोशल मीडिया पर भी असंतोष के स्वर उभरने लगे हैं. कल तक मोदी की जय-जयकार करने वालों में इतनी कटुता पहले कभी नहीं थी.
लेकिन 68 वर्ष बाद भारत यह भी जानता है कि उसे परिवर्तन की राह पर आगे बढऩे के लिए किसी सरकार की जरूरत नहीं है. आगामी पृष्ठों से जाहिर हो जाता है कि बदलाव की बयार हरियाणा के गांवों की तंग गलियों में बह रही है, जहां युवा महिला पहलवान लड़कियों को कमतर मानने की पुरानी, रूढ़िवादी परंपराओं को चुनौती दे रही हैं.
वे विदेशी राजधानियों के गलियारों में अंधाधुंध दौड़ी चली जा रही हैं, जहां नया भारत आगे बढ़ रहा है. बदलता भारत जमीन से उठकर पहली बार लोकसभा में पहुंचे सांसदों की शक्ल ले रहा है. वे खेतों, कारखानों और सेनाओं से निकलकर यहां तक पहुंचे हैं.
यह भारत वैचारिक रूप से तटस्थ रहना चाहता है. यह भारत स्कूल की किताबों और एक समान नागरिक संहिता के लिए कुलबुलाते नागपुर में बैठे गुजरे जमाने के कुछ लोगों की नादानियों को नजरअंदाज करने को तैयार है, बशर्तें नौकरियां बढ़ें और महंगाई नीचे आए. चिंता इस बात की है कि यह भारत सांप्रदायिक विद्वेष की सुलगती आंच को भी नजरअंदाज करने को तैयार है.
यह बात लोगों को चुनाव में कठोर फैसले लेने के लिए मजबूर कर रही है. इस भारत को अपनी कल्पना के भारत की आदत पड़ गई है. एक ऐसा भारत, जो चीन के बराबर है और अमेरिका के लिए चुनौती है. यह भारत मानता है कि विदेशों में बसे उसके कुछ वंशजों की कुछ उपलब्धियां लाखों भारतवासियों की नियति की प्रतीक हैं. जाहिर है कि अगर वह ऐसा मनता है तो हो ऐसा सकता है.
मोदी के युग में यह उम्मीद की जा रही है कि आम आदमी के लिए रोजमर्रा की जिंदगी की तकलीफें कुछ कम होंगी. फिर चाहे वह सत्यापन की प्रक्रिया हो या जमीन अपने नाम कराने की कार्रवाई. यूपीए की विरासत को बिना सोचे-समझे खारिज किया या मिटाया नहीं जाएगा.
आधार की तरह जो जरूरी होगा, उसे जारी रखा जाएगा. हरसिमरत कौर बादल ने बहुत अपनेपन के साथ बताया कि हमारा काम खुद बोलेगा. मंत्री मुंह बंद रखना सीख रहे हैं और सचिव काम के बाद फुर्सत में जाम से जाम टकराना और अध्ययन के लिए विदेशी दौरे छोडऩा सीख रहे हैं.
चाहे शिक्षक प्रशिक्षण का स्तर हो या मानव संसाधन विकास मंत्रालय में ऑनलाइन कोर्स की उपलब्धता; पीयूष गोयल के मंत्रालय की बिजली क्षेत्र सुधार सलाहकार समिति हो या 36 अर्थ खो चुके कानूनों का अंत हो; या फिर मोदी की विदेश यात्राओं का आधार तैयार करने के लिए सुषमा स्वराज के तैयारी के दौरे हों, लोगों की नजरों से दूर काम चल रहा है. इन तैयारियों को सोच-विचारकर किए गए ट्वीट संदेशों और इक्का-दुक्का न्यूज बाइट्स में व्यक्त किया जाता है.
पर क्या भारत को संतुष्ट करने के लिए इतना काफी है?
याद करें, मोदी के चुने हुए अध्यक्ष अमित शाह ने बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद में कहा था, ‘‘संतोष से कुछ प्राप्त नहीं होगा.’’ जाहिर है, ऐसा कहने के पीछे उनका इशारा मार्च से पहले होने वाले आठ विधानसभा चुनावों की तैयारी की तरफ था.
लेकिन शायद वे उस नए भारत के मन की बात कह रहे थे, जिसे हमेशा कुछ और चाहिए. मोदी ने संसद में अपने पहले भाषण में जब दलगत राजनीति से उठने की कोशिश की थी तो देश सम्मोहित हो गया था. लाल किले पर राष्ट्र के नाम उनका संबोधन सुनकर देश एक बार फिर मोहपाश में बंधने को तैयार है. पर वह इतनी आश्वस्ति और भरोसा चाहता है कि इस यात्रा के बाद मनचाही मंजिल मिलेगी. मोदी ने स्वयं राष्ट्रीय परिषद में कहा था, ‘‘हम चलें या न चलें, देश चल पड़ा है.’’
वह देश, जिसकी 33 प्रतिशत आबादी 1991 में महान उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद जन्मी है. यह वह भारत है, जिसने 24 घंटे सातों दिन टेलीविजन पर प्रसारित शोर और जोश से भरे दो नागरिक आंदोलन झेले हैं. एक आंदोलन स्पेक्ट्रम से लेकर कोयले तक प्राकृतिक संसाधनों के अनुचित आवंटन से उद्घाटित हुए भ्रष्टाचार के विरुद्ध चला था तो दूसरा आंदोलन महिलाओं की संरक्षा और सुरक्षा के सवाल पर खड़ा हुआ था.
यह भारत मंद अर्थव्यवस्था और अपूर्ण सामाजिक महत्वाकांक्षाओं के कारण अधीर था, जो दुनिया पर राज करने के उसके सपनों का दम घोट रही थी. यह वह भारत था, जिसे लगता था कि उसका वक्त आ गया है.
लेकिन सरकार चलाना, खासकर अपने उच्चतम अवतार में जरा टेढ़ा काम है. कहते हैं कि इंदिरा गांधी के चतुर कश्मीरी सलाहकार पी.एन. धर ने दमन सिंह की नई किताब में मनमोहन सिंह से कहा था कि वृद्धि छल से हासिल की जाती है. सर्वोत्तम असल में उत्तम का शत्रु हो सकता है.
लेकिन अपने ऐतिहासिक स्वाधीनता दिवस के उत्सव की तैयारी में जुटे भारत को आस्था की नाटकीय छलांग के बदले कुछ ऐसा लगता है कि उसे सिर्फ लीपापोती के जाल से बहलाया गया, जिसका कुछ हिस्सा एक ऐसा छद्म था कि भारत नाम के विचार की साझी चेतना को ही पलटने पर उतारू हो गया.
अभी से ऐसा लगने लगा है कि भारत अपने यहां हो रहे लडख़ड़ाते बदलाव से सहमा हुआ है. उद्योग जगत के सिरमौर जो कल तक उम्मीदवार नरेंद्र भाई की शान में कसीदे काढ़ते नहीं थक रहे थे, अब प्रधानमंत्री मोदी के बारे में एकदम मौन साधे हुए हैं. छाया बजट तैयार करने वाले अर्थशास्त्री अब एक और जोशीली मुख्यमंत्री के दरवाजे का रुख करने लगे हैं, जो श्रम सुधारों और भूमि सुधारों के वादे को पूरा करने के लिए पूरी तरह संकल्पित दिखती है.
मोदी के दमकते प्रोजेक्ट्स की वैकल्पिक संभावनाओं से सम्मोहित नौजवान ‘‘अच्छे दिन’’ के नारे का उलटा मतलब लगाने लगे हैं. अफवाह तो यहां तक है कि मोदी ने अपनी सरकार और पार्टी से कहा है कि यह नारा लगाना बंद करें. मोदी के भक्तों से भरे सोशल मीडिया पर भी असंतोष के स्वर उभरने लगे हैं. कल तक मोदी की जय-जयकार करने वालों में इतनी कटुता पहले कभी नहीं थी.
लेकिन 68 वर्ष बाद भारत यह भी जानता है कि उसे परिवर्तन की राह पर आगे बढऩे के लिए किसी सरकार की जरूरत नहीं है. आगामी पृष्ठों से जाहिर हो जाता है कि बदलाव की बयार हरियाणा के गांवों की तंग गलियों में बह रही है, जहां युवा महिला पहलवान लड़कियों को कमतर मानने की पुरानी, रूढ़िवादी परंपराओं को चुनौती दे रही हैं.
वे विदेशी राजधानियों के गलियारों में अंधाधुंध दौड़ी चली जा रही हैं, जहां नया भारत आगे बढ़ रहा है. बदलता भारत जमीन से उठकर पहली बार लोकसभा में पहुंचे सांसदों की शक्ल ले रहा है. वे खेतों, कारखानों और सेनाओं से निकलकर यहां तक पहुंचे हैं.
यह भारत वैचारिक रूप से तटस्थ रहना चाहता है. यह भारत स्कूल की किताबों और एक समान नागरिक संहिता के लिए कुलबुलाते नागपुर में बैठे गुजरे जमाने के कुछ लोगों की नादानियों को नजरअंदाज करने को तैयार है, बशर्तें नौकरियां बढ़ें और महंगाई नीचे आए. चिंता इस बात की है कि यह भारत सांप्रदायिक विद्वेष की सुलगती आंच को भी नजरअंदाज करने को तैयार है.
यह बात लोगों को चुनाव में कठोर फैसले लेने के लिए मजबूर कर रही है. इस भारत को अपनी कल्पना के भारत की आदत पड़ गई है. एक ऐसा भारत, जो चीन के बराबर है और अमेरिका के लिए चुनौती है. यह भारत मानता है कि विदेशों में बसे उसके कुछ वंशजों की कुछ उपलब्धियां लाखों भारतवासियों की नियति की प्रतीक हैं. जाहिर है कि अगर वह ऐसा मनता है तो हो ऐसा सकता है.
मोदी के युग में यह उम्मीद की जा रही है कि आम आदमी के लिए रोजमर्रा की जिंदगी की तकलीफें कुछ कम होंगी. फिर चाहे वह सत्यापन की प्रक्रिया हो या जमीन अपने नाम कराने की कार्रवाई. यूपीए की विरासत को बिना सोचे-समझे खारिज किया या मिटाया नहीं जाएगा.
आधार की तरह जो जरूरी होगा, उसे जारी रखा जाएगा. हरसिमरत कौर बादल ने बहुत अपनेपन के साथ बताया कि हमारा काम खुद बोलेगा. मंत्री मुंह बंद रखना सीख रहे हैं और सचिव काम के बाद फुर्सत में जाम से जाम टकराना और अध्ययन के लिए विदेशी दौरे छोडऩा सीख रहे हैं.
चाहे शिक्षक प्रशिक्षण का स्तर हो या मानव संसाधन विकास मंत्रालय में ऑनलाइन कोर्स की उपलब्धता; पीयूष गोयल के मंत्रालय की बिजली क्षेत्र सुधार सलाहकार समिति हो या 36 अर्थ खो चुके कानूनों का अंत हो; या फिर मोदी की विदेश यात्राओं का आधार तैयार करने के लिए सुषमा स्वराज के तैयारी के दौरे हों, लोगों की नजरों से दूर काम चल रहा है. इन तैयारियों को सोच-विचारकर किए गए ट्वीट संदेशों और इक्का-दुक्का न्यूज बाइट्स में व्यक्त किया जाता है.
पर क्या भारत को संतुष्ट करने के लिए इतना काफी है?
याद करें, मोदी के चुने हुए अध्यक्ष अमित शाह ने बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद में कहा था, ‘‘संतोष से कुछ प्राप्त नहीं होगा.’’ जाहिर है, ऐसा कहने के पीछे उनका इशारा मार्च से पहले होने वाले आठ विधानसभा चुनावों की तैयारी की तरफ था.
लेकिन शायद वे उस नए भारत के मन की बात कह रहे थे, जिसे हमेशा कुछ और चाहिए. मोदी ने संसद में अपने पहले भाषण में जब दलगत राजनीति से उठने की कोशिश की थी तो देश सम्मोहित हो गया था. लाल किले पर राष्ट्र के नाम उनका संबोधन सुनकर देश एक बार फिर मोहपाश में बंधने को तैयार है. पर वह इतनी आश्वस्ति और भरोसा चाहता है कि इस यात्रा के बाद मनचाही मंजिल मिलेगी. मोदी ने स्वयं राष्ट्रीय परिषद में कहा था, ‘‘हम चलें या न चलें, देश चल पड़ा है.’’

