scorecardresearch

हजारों ख्वाहिशें...और एक उलझन

भारत को आय रोजगार में बढ़त और गरीबी में कमी चाहिए. यह करिश्मा सिर्फ तेज आर्थिक ग्रोथ से संभव है. महंगाई को रोके बिना ग्रोथ के पहिए को घुमाना नामुमकिन है.

अपडेटेड 25 अगस्त , 2014
पश्चिम बंगाल की सीमाएं सील हैं. एक आलू भी उस पार नहीं जा सकता. पुलिस अपराधियों की नहीं सब्जी के ट्रकों की तलाश में है, जिनसे जब्त आलू सस्ती दर पर उपभोक्ताओं को बेचा जा रहा है. तमिलनाडु में अम्मा किचन के सामने लोगों की कतारें देखते ही बनती हैं. करीब 300 भोजनालयों से ढाई लाख लोग रोज एक रुपए की इडली, तीन रुपए में दाल रोटी और पांच रुपए का पोंगल खा रहे हैं और अम्मा किचन को भारत में फूड सब्सिडी स्कीमों की दादी मां बना रहे हैं.

यह जनता को महंगाई से बचाने के भौंडे और खर्चीले तरीके हैं लेकिन खौफजदा ममता और जयललिता कोई जोखिम नहीं लेना चाहतीं. उन्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि आर्थिक सुधारों के पोस्टर पुरुष डॉ. मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी चूक यह नहीं थी कि उनकी अगुआई में भारत की आर्थिक ग्रोथ डूब गई बल्कि यूपीए राज में ताजा इतिहास की सबसे लंबी और जिद्दी महंगाई ने जनता को धर लिया और भारत की ग्रैंड ओल्ड पार्टी चुनावों के बाद एक सम्मानित विपक्ष बनने की हैसियत तक खो बैठी.

सियासत में महंगाई का खौफ अगर एक छोर पर है तो दूसरे सिरे पर बैठे निवेशक भी निढाल होने लगे हैं. जनवरी से अब तक करीब 9.5 फीसदी की औसत उपभोक्ता महंगाई के बाद उम्मीदों की दीवार पर उलझनों की इबारत उभर रही है. क्या मुद्रास्फीति-मंदी और महंगे कर्ज का दुष्चक्र शायद जल्दी नहीं टूटेगा? जिसकी चपेट में आकर भारत की ग्रोथ फैक्ट्री ठप हो गई है. 

कमजोर विकास दर की ढलान पर भारत अकेला नहीं था. 2007 से 2013 के बीच सभी इमर्जिंग इकोनॉमी में ग्रोथ गिरी थी. सुधारों के डॉक्टर तो महंगाई के मोर्चे पर फिसले थे और फिर सब कुछ फिसलता चला गया. बीते दो तीन वर्षों में चीन, रूस, थाईलैंड, दक्षिण अफ्रीका में विकास दर घटने के साथ महंगाई भी घटी लेकिन भारत में उपभोक्ता मुद्रास्फीति दहाई पर पहुंच गई और नीचे नहीं उतरी जिससे भारत, अपने हमसफर देशों के बीच, आम लोगों की कमाई में तेज कमी और सबसे ऊंची खाद्य महंगाई वाला मुल्क हो गया.

महंगाई से कम मांग, सीमित उपभोक्ता खपत और महंगे कर्ज का जटिल दुष्चक्र बना था जिसने हताशा का चरम गढ़ा. चुनाव में अभूतपूर्व जनादेश और शेयर बाजार में ऐतिहासिक निवेश, इस निराशा से उबरने की उम्मीदों की अनोखी नुमाइश बनकर आया. अलबत्ता तल्ख हकीकत यह है कि महंगाई की गुत्थी नई सरकार आने के बाद और ज्यादा ही कडिय़ल हो गई है.

भारत में महंगाई के सभी नाखून खुल चुके हैं. फल सब्जियों वाली मौसमी मूल्य वृद्धि और अच्छी पैदावार के बावजूद खाद्य उत्पादों की सप्लाई में कमी से निकली महंगाई तो पहले से मौजूद थी, एनसीएईआर के मुताबिक ईंधन और बिजली की ऊंची दरें और दहाई के अंक पर पहुंची ऊर्जा मुद्रास्फीति, जिद्दी महंगाई की सबसे नई ताकत बन गई हैं क्योंकि मनमोहन सिंह के बाद मोदी भी दुनिया में पांचवें सबसे बड़े कोयला भंडार वाले देश में कोयले का उत्पादन और आपूर्ति नहीं बढ़ा सके.

महंगे इंपोर्टेड कोयले की वजह से पूरे देश में बिजली की दरें बढऩे का पहला दौर इस महीने पूरा हो जाएगा जबकि दूसरा चरण दूर नहीं है. भ्रष्टाचार और महंगाई के बीच नया रिश्ता बना है. 2013 तक पिछले पांच वर्षों में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स पर भारत की रैंकिंग 70 पर थी जो बीते साल 94 पर पहुंच गई.

ताजा महंगाई ने भी 2007 से गति पकड़ी है और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. विश्व बैंक ठीक ही कहता है कि विकासशील देशों में भ्रष्टाचार की वजह से परियोजनाएं 20 फीसदी तक महंगी होती हैं. देश में कई सेवाओं व सुविधाओं की ऊंची कीमतें इसका प्रमाण हैं.

केंद्र में नई सरकार बने ढाई महीने बीत चुके हैं और एक किलो टमाटर खरीदने पर अपनी आधी दैनिक मजदूरी खर्च कर रहे लोग इस बात से ज्यादा हैरान हैं कि केंद्र सरकार रोटी-दाल को सस्ता करने के लिए कोई नई सूझ क्यों नहीं ला पा रही है.

राज्य सरकारें कीमतें थामने के लिए अजीबोगरीब फैसले कर रही हैं और केंद्र सरकार सब्जियों के एक्सपोर्ट पर रोक जैसे दकियानूसी उपायों या प्रतीकात्मक कदमों (प्राइस स्टेबालाइजेशन फंड) तक सीमित है. बजट में मिली इनकम टैक्स छूट भी साढ़े तीन करोड़ आयकरदाताओं के लिए है, 1.2 अरब आम लोगों के जख्मों को कोई मरहम नहीं मिला है.

हर साल चुनाव झेलने वाले नेता अच्छी तरह जानते हैं कि जहां लोगों की मासिक आय का 35-40 फीसदी हिस्सा खाने पर खर्च होता हो वहां रोटी-दाल की महंगाई महंगी पड़ सकती है. इसलिए सियासत में बेचैनी बढ़ रही है जबकि उद्योगों को पता है कि मोदी सरकार, मंदी और महंगाई की जुगलबंदी से मुकाबिल है. गैर-पारंपरिक कोशिशों के बिना इसे तोडऩा बेहद मुश्किल है.

जापान में प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने सस्ते कर्ज के जादू से दशकीय मंदी खत्म करने का जो चमत्कार कर दिखाया है, वह भारत में मुमकिन नहीं है क्योंकि बाजार में ज्यादा पैसा महंगाई को नई ताकत देगा, इसलिए रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन निवेशकों और उद्योगों से कह रहे हैं कि मुद्रास्फीति की विदाई, सस्ते कर्ज और ग्रोथ की वापसी का इंतजार लंबा हो सकता है.

भारत को आय और रोजगार में बढ़त और गरीबी में कमी चाहिए. यह करिश्मा सिर्फ तेज आर्थिक ग्रोथ के जरिए ही संभव हो सकता है. महंगाई को रोके बिना ग्रोथ के पहिए को घुमाना नामुमकिन जैसा है. नई सरकार के 100 दिन पूरे नहीं हुए हैं लेकिन तेज ग्रोथ की जल्दी वापसी को लेकर असमंजस, अब उम्मीदों पर भारी पड़ रहा है.

राज्यों के चुनाव सिर पर हैं जबकि आर्थिक ग्रोथ के आंकड़े हर तिमाही आते हैं. महंगाई से ग्रोथ ढहने और सियासत के गर्क होने का इतिहास भारत ने अभी-अभी गढ़ा है. हो सकता है छह महीने बाद लोग यह कहते सुने जाएं कि हम इतिहास से यही सीखते हैं हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा.   
Advertisement
Advertisement