भारत-श्रीलंका समझौते को 25 जुलाई (1987) के आसपास जब अंतिम रूप दिया जा रहा था तो मुझे 7 रेसकोर्स रोड पर होने वाली एक बैठक में भाग लेने के लिए कहा गया. वहां पता चला कि भारत चाहता था कि समझौते पर कोलंबो में 26 जुलाई को दस्तखत हों जबकि श्रीलंका को यह तारीख बहुत जल्दी की लग रही थी. श्रीलंकाई पक्ष चाहता था कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी यह कार्यक्रम 29 जुलाई तक खिसकाने के लिए राजी हो जाएं. उसी समय मुझे यह भी पता चला कि (वी.) प्रभाकरन अशोक होटल में ठहरा हुआ था—उसने बाद में यह दावा भी किया कि हमारी सरकार ने उसे नजरबंद कर रखा था. जाहिर है, प्रधानमंत्री की उससे मुलाकात हुई थी.
मेरी राय यह थी कि प्रधानमंत्री को प्रभाकरन से मुलाकात नहीं करनी चाहिए थी. बाद में मेरे यह पूछने पर कि क्या प्रधानमंत्री को एलटीटीई प्रमुख से लिखा-पढ़ी में कुछ मिला था, उन्होंने चिढ़कर जवाब दिया था, “उसने मुझे जुबान दी है.” मैंने कहा कि प्रभाकरन की जुबान की कोई अहमियत नहीं है. उससे लिखित में रजामंदी देने के लिए कहा जाना चाहिए था. मौका मिलने पर वह हमें डबल क्रॉस करेगा. प्रभाकरन ने ऐसा एकाधिक बार किया भी.
इस बात पर आपसी सहमति बन गई कि समझौते पर दस्तखत 29 जुलाई को कोलंबो में किए जाएंगे. समझौते पर दिन में 3 बजे दस्तखत हुए और उसके बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति ने एक स्वागत समारोह आयोजित कर रखा था. जब मैं और पी.वी. नरसिंह राव समारोह में आमंत्रित कुछ श्रीलंकाई नेताओं से बातचीत कर रहे थे तो हमने गौर किया कि राजीव, राष्ट्रपति (जे.आर.) जयवर्धने तथा कई अधिकारी किसी गंभीर मंत्रणा में मशगूल हैं. जयवर्धने ने उनसे कहा कि यदि भारत फौरन ही अपनी फौज श्रीलंका नहीं भेजता है तो उन्हें आशंका है कि उसी रात तख्तापलट हो सकता है. मैंने प्रधानमंत्री से कहा कि इतने गंभीर मामले पर दिल्ली लौटकर अपने वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगियों से परामर्श के बाद ही कोई फैसला लेना उचित होगा. उन्होंने बताया कि वे भारतीय फौज को हवाई जहाज से तत्काल कोलंबो भेजे जाने का आदेश दे चुके थे. जमीनी हकीकत यह थी कि भारत श्रीलंका के जातीय संघर्ष की आग में फंसने जा रहा था.
भारतीय शांति सेना (आइपीकेएफ) वहां अगस्त में पहुंची. उम्मीद यह की गई थी कि हम आज नहीं तो कल एलटीटीई का खात्मा करने में कामयाब हो जाएंगे. थल सेनाध्यक्ष ने शेखी बघारी कि वे दो हफ्ते में एलटीटीई और प्रभाकरन से निपट लेंगे. यह बेवकूफी भरी बात थी. भारतीय शांति सेना किसी स्पष्ट ब्रीफिंग या मकसद के बिना ही रवाना हो गई थी. सैनिकों को न तो जाफना प्रायद्वीप के भूगोल के बारे में बताया गया था, न ही एलटीटीई के छिपने के ठिकानों के बारे में. यह शंका शुरू से व्यक्त की जा रही थी कि जुलाई-अगस्त 1987 में संपन्न भारत-श्रीलंका समझौते के प्रति अनिच्छुक एलटीटीई को किसी गुप्त सौदेबाजी के माध्यम से उसे स्वीकार करने के लिए मनाया गया है. अप्रैल 1988 में यह खुलासा हुआ कि समझौते को समर्थन देने के बदले भारत सरकार लिट्टे को भारी धनराशि देने के लिए सहमत हुई थी. सूचना के स्रोत के बारे में पता चला कि वह कोलंबो स्थित भारतीय उच्चायोग और (राजीव गांधी के सलाहकार, जे.एन. दीक्षित स्वयं थे.
टाइमिंग का काफी कुछ संबंध एलटीटीई के साथ शांति की एक नई पहल किए जाने से था जिसमें रॉ अग्रणी भूमिका निभा रहा था. सूचना भ्रम फैलाने की कोशिश में लीक की गई थी. अंततोगत्वा सिर्फ एक ही किस्त का भुगतान हो पाया था मगर यह स्थिति इसलिए आई क्योंकि समझौता होने के तीन महीने के भीतर ही भारतीय शांति सेना को जाफना में एलटीटीई से युद्ध का सामना करना पड़ा था.
1987 आते-आते राजीव गांधी सरकार की हवा निकल चुकी थी. राजीव गांधी जल्दबाज किस्म के इंसान थे. अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान उनकी उपलब्धियां उल्लेखनीय रही हैं. वे बहुत से भारतीयों की मानसिकता बदल पाने में कामयाब रहे और उन्होंने देश को इक्कीसवीं सदी के लिए तैयार किया. समय-समय पर उतावलेपन का परिचय देने वाले राजीव का मानना था कि जटिल समस्याओं को शब्दाडंबर के सहारे हल किया जा सकता है. इसके अप्रत्याशित परिणाम सामने होते थे.
1984 से 1989 के बीच उन्होंने (राजीव ने) अपने मंत्रिमंडल में दो दर्जन से ज्यादा फेरबदल किए. उनके मंत्रिमंडल में पांच साल पूरा करने वाले इकलौते मंत्री, रेल मंत्री माधवराव सिंधिया थे. उनके प्रधानमंत्री रहते विदेश मंत्रालय ने चार कैबिनेट मंत्री तथा छह राज्यमंत्रियों का मुंह देखा. संक्षेप में मंत्रीगण अपना काम ढंग से समझने या कोई दीर्घकालीन नीतिगत प्रस्ताव पेश करने लायक नहीं हो पाते थे. अपने प्रधानमंत्री पद के पहले अठारह महीनों के दौरान राजीव गांधी लगभग पूरी तरह अति अहंकारी मूर्खों की एक टीम पर निर्भर हो गए थे. वे तेज मगर ढीठ थे. एक समाजवादी होने का दम भरता था तो दूसरा सियासी गलियारे का एक अनाड़ी चलता पुर्जा था. तीसरा एक दखलअंदाज सरदर्द था. सामूहिक रूप से वे सभी एक गैर-जिम्मेदार मंडली का हिस्सा थे जो वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों और सरकारी नियमों-कानूनों की कोई खास कद्र नहीं करते थे. उन्होंने राजीव गांधी की प्रतिष्ठा और उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया. इसका खमियाजा राजीव गांधी को अपनी सरकार गंवाकर भुगतना पड़ा. विडंबना देखिए कि श्रीलंका के जातीय संघर्ष में कूद पडऩे की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी.
'अरुण सिंह तो दोस्त हैं'
मेरी राय यह थी कि प्रधानमंत्री को प्रभाकरन से मुलाकात नहीं करनी चाहिए थी. बाद में मेरे यह पूछने पर कि क्या प्रधानमंत्री को एलटीटीई प्रमुख से लिखा-पढ़ी में कुछ मिला था, उन्होंने चिढ़कर जवाब दिया था, “उसने मुझे जुबान दी है.” मैंने कहा कि प्रभाकरन की जुबान की कोई अहमियत नहीं है. उससे लिखित में रजामंदी देने के लिए कहा जाना चाहिए था. मौका मिलने पर वह हमें डबल क्रॉस करेगा. प्रभाकरन ने ऐसा एकाधिक बार किया भी.
इस बात पर आपसी सहमति बन गई कि समझौते पर दस्तखत 29 जुलाई को कोलंबो में किए जाएंगे. समझौते पर दिन में 3 बजे दस्तखत हुए और उसके बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति ने एक स्वागत समारोह आयोजित कर रखा था. जब मैं और पी.वी. नरसिंह राव समारोह में आमंत्रित कुछ श्रीलंकाई नेताओं से बातचीत कर रहे थे तो हमने गौर किया कि राजीव, राष्ट्रपति (जे.आर.) जयवर्धने तथा कई अधिकारी किसी गंभीर मंत्रणा में मशगूल हैं. जयवर्धने ने उनसे कहा कि यदि भारत फौरन ही अपनी फौज श्रीलंका नहीं भेजता है तो उन्हें आशंका है कि उसी रात तख्तापलट हो सकता है. मैंने प्रधानमंत्री से कहा कि इतने गंभीर मामले पर दिल्ली लौटकर अपने वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगियों से परामर्श के बाद ही कोई फैसला लेना उचित होगा. उन्होंने बताया कि वे भारतीय फौज को हवाई जहाज से तत्काल कोलंबो भेजे जाने का आदेश दे चुके थे. जमीनी हकीकत यह थी कि भारत श्रीलंका के जातीय संघर्ष की आग में फंसने जा रहा था.
भारतीय शांति सेना (आइपीकेएफ) वहां अगस्त में पहुंची. उम्मीद यह की गई थी कि हम आज नहीं तो कल एलटीटीई का खात्मा करने में कामयाब हो जाएंगे. थल सेनाध्यक्ष ने शेखी बघारी कि वे दो हफ्ते में एलटीटीई और प्रभाकरन से निपट लेंगे. यह बेवकूफी भरी बात थी. भारतीय शांति सेना किसी स्पष्ट ब्रीफिंग या मकसद के बिना ही रवाना हो गई थी. सैनिकों को न तो जाफना प्रायद्वीप के भूगोल के बारे में बताया गया था, न ही एलटीटीई के छिपने के ठिकानों के बारे में. यह शंका शुरू से व्यक्त की जा रही थी कि जुलाई-अगस्त 1987 में संपन्न भारत-श्रीलंका समझौते के प्रति अनिच्छुक एलटीटीई को किसी गुप्त सौदेबाजी के माध्यम से उसे स्वीकार करने के लिए मनाया गया है. अप्रैल 1988 में यह खुलासा हुआ कि समझौते को समर्थन देने के बदले भारत सरकार लिट्टे को भारी धनराशि देने के लिए सहमत हुई थी. सूचना के स्रोत के बारे में पता चला कि वह कोलंबो स्थित भारतीय उच्चायोग और (राजीव गांधी के सलाहकार, जे.एन. दीक्षित स्वयं थे.
टाइमिंग का काफी कुछ संबंध एलटीटीई के साथ शांति की एक नई पहल किए जाने से था जिसमें रॉ अग्रणी भूमिका निभा रहा था. सूचना भ्रम फैलाने की कोशिश में लीक की गई थी. अंततोगत्वा सिर्फ एक ही किस्त का भुगतान हो पाया था मगर यह स्थिति इसलिए आई क्योंकि समझौता होने के तीन महीने के भीतर ही भारतीय शांति सेना को जाफना में एलटीटीई से युद्ध का सामना करना पड़ा था.
1987 आते-आते राजीव गांधी सरकार की हवा निकल चुकी थी. राजीव गांधी जल्दबाज किस्म के इंसान थे. अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान उनकी उपलब्धियां उल्लेखनीय रही हैं. वे बहुत से भारतीयों की मानसिकता बदल पाने में कामयाब रहे और उन्होंने देश को इक्कीसवीं सदी के लिए तैयार किया. समय-समय पर उतावलेपन का परिचय देने वाले राजीव का मानना था कि जटिल समस्याओं को शब्दाडंबर के सहारे हल किया जा सकता है. इसके अप्रत्याशित परिणाम सामने होते थे.
1984 से 1989 के बीच उन्होंने (राजीव ने) अपने मंत्रिमंडल में दो दर्जन से ज्यादा फेरबदल किए. उनके मंत्रिमंडल में पांच साल पूरा करने वाले इकलौते मंत्री, रेल मंत्री माधवराव सिंधिया थे. उनके प्रधानमंत्री रहते विदेश मंत्रालय ने चार कैबिनेट मंत्री तथा छह राज्यमंत्रियों का मुंह देखा. संक्षेप में मंत्रीगण अपना काम ढंग से समझने या कोई दीर्घकालीन नीतिगत प्रस्ताव पेश करने लायक नहीं हो पाते थे. अपने प्रधानमंत्री पद के पहले अठारह महीनों के दौरान राजीव गांधी लगभग पूरी तरह अति अहंकारी मूर्खों की एक टीम पर निर्भर हो गए थे. वे तेज मगर ढीठ थे. एक समाजवादी होने का दम भरता था तो दूसरा सियासी गलियारे का एक अनाड़ी चलता पुर्जा था. तीसरा एक दखलअंदाज सरदर्द था. सामूहिक रूप से वे सभी एक गैर-जिम्मेदार मंडली का हिस्सा थे जो वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों और सरकारी नियमों-कानूनों की कोई खास कद्र नहीं करते थे. उन्होंने राजीव गांधी की प्रतिष्ठा और उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया. इसका खमियाजा राजीव गांधी को अपनी सरकार गंवाकर भुगतना पड़ा. विडंबना देखिए कि श्रीलंका के जातीय संघर्ष में कूद पडऩे की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी.
'अरुण सिंह तो दोस्त हैं'
भारतीय सेना ने थल सेनाध्यक्ष जनरल कृष्णस्वामी
सुंदरजी की कमान में भारत-पाक सीमा पर ‘ब्रासटैक्स’ कोड नाम के व्यापक
सैन्य अभ्यास की योजना बनाई थी. समस्त विवरणों सहित योजना की मंजूरी
तत्कालीन रक्षा राज्यमंत्री अरुण सिंह ने दी थी. बड़े पैमाने के इस अभ्यास
को देखते हुए पाकिस्तान में ऐसी आशंकाओं ने जन्म लिया कि ये अभ्यास सीमा
पार हस्तक्षेप करने की आड़ के लिए किए जा रहे हैं. भारतीय अखबारों में इस
आशय की खबरें छपीं कि पाकिस्तान अपनी फौज को युद्ध के लिए लामबंद कर रहा
है.
मैंने विदेश राज्यमंत्री की हैसियत से राजीव गांधी को बताया कि विदेश मंत्रालय को इस बारे में कुछ भी पता नहीं है. प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बारे में वे भी कुछ नहीं जानते हैं. मैं दंग रह गया.
जाहिर है कि अरुण सिंह तथा जनरल कृष्णस्वामी सुंदरजी उनकी मंजूरी लिए बिना ही यह अभियान चला रहे थे.
मैंने उनसे कहा कि उन्हें फौरन मंत्री को बर्खास्त कर देना चाहिए. लेकिन उनकी प्रतिक्रिया थी, “अरुण सिंह दोस्त हैं.”
मैंने तनिक कड़ाई से कहा, “सर, आप दून स्कूल के ओल्ड बॉयज एसोसिएशन के अध्यक्ष नहीं हैं. आप भारत के प्रधानमंत्री हैं. प्रधानमंत्रियों के दोस्त नहीं हुआ करते हैं.”
मैंने विदेश राज्यमंत्री की हैसियत से राजीव गांधी को बताया कि विदेश मंत्रालय को इस बारे में कुछ भी पता नहीं है. प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बारे में वे भी कुछ नहीं जानते हैं. मैं दंग रह गया.
जाहिर है कि अरुण सिंह तथा जनरल कृष्णस्वामी सुंदरजी उनकी मंजूरी लिए बिना ही यह अभियान चला रहे थे.
मैंने उनसे कहा कि उन्हें फौरन मंत्री को बर्खास्त कर देना चाहिए. लेकिन उनकी प्रतिक्रिया थी, “अरुण सिंह दोस्त हैं.”
मैंने तनिक कड़ाई से कहा, “सर, आप दून स्कूल के ओल्ड बॉयज एसोसिएशन के अध्यक्ष नहीं हैं. आप भारत के प्रधानमंत्री हैं. प्रधानमंत्रियों के दोस्त नहीं हुआ करते हैं.”

