अपनी डॉक्युमेंट्री कंटियाबाज में डायरेक्टर जोड़ी 29 वर्षीय फहद मुस्तफा और 28 वर्षीया दीप्ति कक्कड़ की कानपुर में बिजली चोर लोहा सिंह से पहली मुलाकात उस वक्त हुई थी जब वह नशे में धुत एक ट्रांसफॉर्मर पर काम में जुटा हुआ था. अपने खुरदुरे हाथों और टेढ़े-मेढ़े दांतों वाले चेहरे से लोहा फौरन अपनी ओर ध्यान खींचता था. मुस्तफा कहते हैं, ''अचानक उसका बागी रुख, उसकी मजबूती और अपने पर भरोसा फूट-फूटकर सामने आने लगता है. लोहा की झेली में कुछ भी यूं ही नहीं आ गिरा था बल्कि उसने उसे दूसरे तरीकों से हासिल करना सीख लिया था.”
कानपुर में अंधेरा छाते ही जिंदगी चलाने के लिए काम पर जुटने वाले लोहा को सुर्खियों में रहना पसंद आने लगता है. वह बेखौफ होकर बिना लाग-लपेट के अपनी जान पर खेलकर कई बार अंजाम दी गई गैर-कानूनी हरकतों की कहानियां सुनाने लगता है. डायरेक्टर जोड़ी को लोहा के रूप में अपनी फिल्म का करिश्माई हीरो मिल गया.
फिल्म कानपुर में भारी बिजली कटौती से सिले-सिलाए कपड़ों के कारखानों के कर्ज में डूबने और रोजगार के लिए भटकते लोगों की कहानी बयान करती है. जिस देश में करीब 40 करोड़ लोगों को बिजली की रोशनी नसीब न हो, वहां यह फिल्म महानगरों और दूसरे दर्जे के शहरों के बीच बुनियादी सुविधाओं के मामले में गहरी खाई और प्रशासन की चुनौतियों का जिक्र करती है.
करीब दो करोड़ रु. के बजट में बनी कंटियाबाज की शूटिंग कानपुर की सड़कों पर 2011 और 2012 में हुई. 2013 में कंटियाबाज का बर्लिन, ट्राइबेका, मेलबर्न और वेनिस के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सफल प्रदर्शन हुआ. इसे मुंबई फिल्म समारोह में भी सराहा गया. वहां उसे अ सेपरेशन जैसी ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित फिल्म बनाने वाले ईरानी फिल्मकार असगर फरहादी की अध्यक्षता वाली जूरी ने श्रेष्ठ भारतीय फिल्म के अवार्ड से नवाजा. इस फिल्म को इस साल श्रेष्ठ इन्वेस्टिगेटिव फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला.
इतना सम्मान और इतनी सराहना हासिल कर चुकी फिल्म के लिए यह आश्चर्य की बात नहीं थी कि फिल्मकार अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवाणे, विकास बहल और निर्माता मधु मानटेना ने इस डॉक्युमेंट्री को अपने फैंटम बैनर से रिलीज करने का फैसला किया. मोटवाणे कहते हैं, ''लोहा जैसा है, उसी रूप में आप उसके दीवाने हो जाएंगे. आप उसे जीतते हुए देखना चाहेंगे.”
यह पहला मौका होगा जब किसी बड़ी फिल्म कंपनी ने किसी डॉक्युमेंट्री को रिलीज किया है. हालांकि कंटियाबाज में किसी भरी-पूरी फिल्म जैसे मनोरंजन के तमाम मसाले हैं. उसमें बेहद रंग-रंगीला नायक (लोहा सिंह), ऐक्शन और थ्रिल (अंधेरी रात में उपद्रव जैसा नजारा), नाटकीयता (अपने काम के जोखिम को लेकर लोहा सिंह और उसकी मां के बीच बातचीत), रोमांस (बिजली चोरी को लेकर लोहा की दीवानगी) और कानपुर की भागमभाग, क्या कुछ नहीं है. कानपुर वैसे भी कभी-कभार ही परदे पर दिखता है. इतना ही नहीं, सिनेमाटोग्राफर मारिया ट्रिब-एलियाज, अमित सुरेंद्र और मुस्तफा ने शहर के खास पहलुओं को करीने से फिल्माया है.
कानपुर के चमनगंज में जन्मे मुस्तफा कहते हैं, ''कानपुर तंग, भीड़-भाड़ वाला और प्रदूषण भरा शहर है. कई मायनों में यह नरक जैसा है. यही चीजें अनोखे नजारे पेश करतीं हैं और जादुई यथार्थ का एहसास कराती हैं.” डॉक्युमेंट्री में अंधेरे में डूबे और तारों के जाल में उलझे कानपुर के कुछ बड़े ही परेशान करने वाले दृश्य हैं.
इस तरह के विजुअल्स ही नहीं बल्कि लोग भी कंटियाबाज को दिलचस्प बनाते हैं. लोहा कानपुर का रॉबिनहुड सिंह है जो जान जोखिम में डालकर बिजली के खंभों पर चढ़कर तारों में कटिया फंसाकर गरीब की जिंदगी में रोशनी लाता है. उसके बरअक्स कानपुर बिजली वितरण कंपनी की पहली महिला प्रमुख ऋतु माहेश्वरी हैं जो बिजली चोरी पर अंकुश लगाकर व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रही हैं. घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रम की मुखिया के नाते वे बकाया बिलों की वसूली और कनेक्शन काटने के लिए छापा दस्ता भेजती हैं.
घोर अराजकता के बीच उनकी बातें तर्कसंगत हैं लेकिन दो बच्चों की मां माहेश्वरी एक हारी हुई लड़ाई लड़ रही हैं. कोलंबिया यूनिवर्सिटी में फिलहाल पब्लिक पॉलिसी की छात्रा कक्कड़ कहती हैं, ''उन्हीं को देखकर मैंने आइएएस अफसर बनने का इरादा छोड़ दिया.” फिल्म में माहेश्वरी कहती हैं, ''अगर आप चीजें बदलना चाहते हैं तो उदार रवैया ही अपनाना पड़ेगा. आप व्यवस्था को झकझोर नहीं सकते क्योंकि आपका तबादला या फिर बर्खास्तगी हो जाएगी.”
फिल्मकारों का असली संघर्ष लोहा और माहेश्वरी के सफर को एक साथ दिखाने का रहा है. ''दोनों की जिंदगियां बिजली की कमी की समस्या और हल निकालने के इर्दगिर्द चलती हैं.” अपने काम में वे भले ताकतवर दिखते हैं लेकिन दोनों के पास कोई ताकत नहीं हैं. मोटवाणे कहते हैं, ''कोई विजेता नहीं है. आप नहीं जानते कि किसका पक्ष लेना चाहिए. दोनों के लिए सहानुभूति पैदा होती है.”
मुस्तफा और कक्कड़ का एक साथ यह दूसरा प्रोजेक्ट है लेकिन वे ऐसे फिल्मकार के रूप में सामने आए हैं जिनके पास कड़वे सच पर पूरे शोध के साथ पिरोई कहानी और संतुलित नजरिया है. इसकी बड़ी वजह मुस्तफा हैं जो कानपुर के होने के नाते इस औद्योगिक शहर के बिजली संकट से बखूबी परिचित हैं.
बतौर डायरेक्टर वे कहते हैं, ''कानपुर के बारे में मेरी यादें बिना बिजली-पानी के गर्मियां काटने की रही हैं.” कक्कड़ को गाजियाबाद में बिजली कटौती का तीखा एहसास है. सो, दोनों को एक-दूसरे में सहयोगी मिल गया. उनकी मुलाकात दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास पढऩे के दौरान हुई. कक्कड़ एफसी चेचन्या की प्रोडक्शन मैनेजर थीं और मुस्तफा ने ऑस्ट्रिया के कलागनफुर्त में चेचन्याई शरणार्थियों के शिविर के फुटबॉल क्लब पर 2010 में डॉक्युमेंट्री बनाई थी.
कंटियाबाज के पहली बार रिलीज होने के तीन साल बाद लोहा सिंह आज भी 'कंटियाबाज’ यानी बिजली चोर बनकर ही अपना गुजर-बसर कर रहा है. फिल्म के 22 अगस्त को सिनेमाघर में रिलीज के दौरान पहली बार लोहा सिंह हवाई जहाज में सवार होकर फिल्म के प्रचार के लिए मुंबई पहुंचा.
वह डायरेक्टरों से हवाई अड्डे पर लंबी मुस्कान और हाथ में एक छोटे-से सूटकेस के साथ मिला. शुरू में फोटोग्राफर कोल्सटन जूलियन के शूट के दौरान वह थोड़ा घबरा गया था लेकिन कुछ देर बाद लोहा एकदम सहज हो गया. कक्कड़ कहती हैं, ''उसे फिल्मी नजरों से फौरन हटा लिया गया. यह फिल्म अपने आप में उसके लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है. उसका जीवन जोखिम का दूसरा नाम है.”
कानपुर में अंधेरा छाते ही जिंदगी चलाने के लिए काम पर जुटने वाले लोहा को सुर्खियों में रहना पसंद आने लगता है. वह बेखौफ होकर बिना लाग-लपेट के अपनी जान पर खेलकर कई बार अंजाम दी गई गैर-कानूनी हरकतों की कहानियां सुनाने लगता है. डायरेक्टर जोड़ी को लोहा के रूप में अपनी फिल्म का करिश्माई हीरो मिल गया.
फिल्म कानपुर में भारी बिजली कटौती से सिले-सिलाए कपड़ों के कारखानों के कर्ज में डूबने और रोजगार के लिए भटकते लोगों की कहानी बयान करती है. जिस देश में करीब 40 करोड़ लोगों को बिजली की रोशनी नसीब न हो, वहां यह फिल्म महानगरों और दूसरे दर्जे के शहरों के बीच बुनियादी सुविधाओं के मामले में गहरी खाई और प्रशासन की चुनौतियों का जिक्र करती है.
करीब दो करोड़ रु. के बजट में बनी कंटियाबाज की शूटिंग कानपुर की सड़कों पर 2011 और 2012 में हुई. 2013 में कंटियाबाज का बर्लिन, ट्राइबेका, मेलबर्न और वेनिस के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सफल प्रदर्शन हुआ. इसे मुंबई फिल्म समारोह में भी सराहा गया. वहां उसे अ सेपरेशन जैसी ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित फिल्म बनाने वाले ईरानी फिल्मकार असगर फरहादी की अध्यक्षता वाली जूरी ने श्रेष्ठ भारतीय फिल्म के अवार्ड से नवाजा. इस फिल्म को इस साल श्रेष्ठ इन्वेस्टिगेटिव फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला.
इतना सम्मान और इतनी सराहना हासिल कर चुकी फिल्म के लिए यह आश्चर्य की बात नहीं थी कि फिल्मकार अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवाणे, विकास बहल और निर्माता मधु मानटेना ने इस डॉक्युमेंट्री को अपने फैंटम बैनर से रिलीज करने का फैसला किया. मोटवाणे कहते हैं, ''लोहा जैसा है, उसी रूप में आप उसके दीवाने हो जाएंगे. आप उसे जीतते हुए देखना चाहेंगे.”
यह पहला मौका होगा जब किसी बड़ी फिल्म कंपनी ने किसी डॉक्युमेंट्री को रिलीज किया है. हालांकि कंटियाबाज में किसी भरी-पूरी फिल्म जैसे मनोरंजन के तमाम मसाले हैं. उसमें बेहद रंग-रंगीला नायक (लोहा सिंह), ऐक्शन और थ्रिल (अंधेरी रात में उपद्रव जैसा नजारा), नाटकीयता (अपने काम के जोखिम को लेकर लोहा सिंह और उसकी मां के बीच बातचीत), रोमांस (बिजली चोरी को लेकर लोहा की दीवानगी) और कानपुर की भागमभाग, क्या कुछ नहीं है. कानपुर वैसे भी कभी-कभार ही परदे पर दिखता है. इतना ही नहीं, सिनेमाटोग्राफर मारिया ट्रिब-एलियाज, अमित सुरेंद्र और मुस्तफा ने शहर के खास पहलुओं को करीने से फिल्माया है.कानपुर के चमनगंज में जन्मे मुस्तफा कहते हैं, ''कानपुर तंग, भीड़-भाड़ वाला और प्रदूषण भरा शहर है. कई मायनों में यह नरक जैसा है. यही चीजें अनोखे नजारे पेश करतीं हैं और जादुई यथार्थ का एहसास कराती हैं.” डॉक्युमेंट्री में अंधेरे में डूबे और तारों के जाल में उलझे कानपुर के कुछ बड़े ही परेशान करने वाले दृश्य हैं.
इस तरह के विजुअल्स ही नहीं बल्कि लोग भी कंटियाबाज को दिलचस्प बनाते हैं. लोहा कानपुर का रॉबिनहुड सिंह है जो जान जोखिम में डालकर बिजली के खंभों पर चढ़कर तारों में कटिया फंसाकर गरीब की जिंदगी में रोशनी लाता है. उसके बरअक्स कानपुर बिजली वितरण कंपनी की पहली महिला प्रमुख ऋतु माहेश्वरी हैं जो बिजली चोरी पर अंकुश लगाकर व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रही हैं. घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रम की मुखिया के नाते वे बकाया बिलों की वसूली और कनेक्शन काटने के लिए छापा दस्ता भेजती हैं.
घोर अराजकता के बीच उनकी बातें तर्कसंगत हैं लेकिन दो बच्चों की मां माहेश्वरी एक हारी हुई लड़ाई लड़ रही हैं. कोलंबिया यूनिवर्सिटी में फिलहाल पब्लिक पॉलिसी की छात्रा कक्कड़ कहती हैं, ''उन्हीं को देखकर मैंने आइएएस अफसर बनने का इरादा छोड़ दिया.” फिल्म में माहेश्वरी कहती हैं, ''अगर आप चीजें बदलना चाहते हैं तो उदार रवैया ही अपनाना पड़ेगा. आप व्यवस्था को झकझोर नहीं सकते क्योंकि आपका तबादला या फिर बर्खास्तगी हो जाएगी.”
फिल्मकारों का असली संघर्ष लोहा और माहेश्वरी के सफर को एक साथ दिखाने का रहा है. ''दोनों की जिंदगियां बिजली की कमी की समस्या और हल निकालने के इर्दगिर्द चलती हैं.” अपने काम में वे भले ताकतवर दिखते हैं लेकिन दोनों के पास कोई ताकत नहीं हैं. मोटवाणे कहते हैं, ''कोई विजेता नहीं है. आप नहीं जानते कि किसका पक्ष लेना चाहिए. दोनों के लिए सहानुभूति पैदा होती है.”
मुस्तफा और कक्कड़ का एक साथ यह दूसरा प्रोजेक्ट है लेकिन वे ऐसे फिल्मकार के रूप में सामने आए हैं जिनके पास कड़वे सच पर पूरे शोध के साथ पिरोई कहानी और संतुलित नजरिया है. इसकी बड़ी वजह मुस्तफा हैं जो कानपुर के होने के नाते इस औद्योगिक शहर के बिजली संकट से बखूबी परिचित हैं.
बतौर डायरेक्टर वे कहते हैं, ''कानपुर के बारे में मेरी यादें बिना बिजली-पानी के गर्मियां काटने की रही हैं.” कक्कड़ को गाजियाबाद में बिजली कटौती का तीखा एहसास है. सो, दोनों को एक-दूसरे में सहयोगी मिल गया. उनकी मुलाकात दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास पढऩे के दौरान हुई. कक्कड़ एफसी चेचन्या की प्रोडक्शन मैनेजर थीं और मुस्तफा ने ऑस्ट्रिया के कलागनफुर्त में चेचन्याई शरणार्थियों के शिविर के फुटबॉल क्लब पर 2010 में डॉक्युमेंट्री बनाई थी.
कंटियाबाज के पहली बार रिलीज होने के तीन साल बाद लोहा सिंह आज भी 'कंटियाबाज’ यानी बिजली चोर बनकर ही अपना गुजर-बसर कर रहा है. फिल्म के 22 अगस्त को सिनेमाघर में रिलीज के दौरान पहली बार लोहा सिंह हवाई जहाज में सवार होकर फिल्म के प्रचार के लिए मुंबई पहुंचा.
वह डायरेक्टरों से हवाई अड्डे पर लंबी मुस्कान और हाथ में एक छोटे-से सूटकेस के साथ मिला. शुरू में फोटोग्राफर कोल्सटन जूलियन के शूट के दौरान वह थोड़ा घबरा गया था लेकिन कुछ देर बाद लोहा एकदम सहज हो गया. कक्कड़ कहती हैं, ''उसे फिल्मी नजरों से फौरन हटा लिया गया. यह फिल्म अपने आप में उसके लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है. उसका जीवन जोखिम का दूसरा नाम है.”

