दस जुलाई को भारत के साथ आर्थिक संबंधों के विशेष प्रतिनिधि पॉल हर्मेलीन के नेतृत्व में 30 फ्रांसीसी कंपनियों का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल और भारत में फ्रांस के राजदूत फ्रांक्वा रेसो राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से मिले. राजस्थान वह चौथा राज्य था जहां प्रतिनिधिमंडल निवेश के इरादे से आया था. राजे ने यह सुनने के बाद कि 100 मेगावाट का संयंत्र लगाने के लिए जमीन मिलने में दिक्कत हो रही है, आनन-फानन में फ्रेंच कंपनी एकमे एडीएफ को जमीन दे दी. इससे प्रतिनिधिमंडल के सदस्य बहुत प्रभावित थे.
राजे ने जमीन देने में जो फुर्ती दिखाई वह मुद्दा नहीं है. मुद्दा यह है कि इसमें इतनी देर क्यों हुई. इससे यही साबित होता है कि उन्हें विरासत में जो प्रशासन मिला है, उसमें भारी खामियां हैं. यही वजह है कि 14 जुलाई को 2014-15 का बजट पेश करते हुए उन्होंने कहा कि वे राज्य की प्रशासन शैली में बदलाव की जमीन तैयार कर रही हैं.
भरतपुर और बीकानेर के जमीनी दौरे के बाद राजे को यकीन हो गया कि वर्तमान प्रशासन से कुछ हासिल नहीं होगा. लिहाजा, वे जोर-शोर से निजी-सार्वजनिक हिस्सेदारी (पीपीपी) के जरिए निजी क्षेत्र को आगे लाना चाहती हैं. इसमें जोखिम है. कर्मचारी संघों ने विरोध शुरू कर दिया है. कई नौकरशाह मानते हैं कि इसमें वक्त और पैसा दोनों ज्यादा लगेगा. कुछ बीजेपी नेता और विपक्ष इसे निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश मानता है. पर राजे अपना फैसला नहीं बदलने वालीं. बजट पेश करने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा, ''यह नई सोच है. हम कई कंपनियों से बात करेंगे. काम बहुत है और आगे बढऩे, अच्छा कर दिखाने के लिए प्रतियोगिता कड़ी होगी. '' उन्होंने 30,00,00 नौकरियां देने का वादा कर उन आशंकाओं को खारिज कर दिया कि निजी क्षेत्र पर जोर देने से नौकरियां नहीं होंगी.
एक और बयान में उन्होंने कहा कि वे चाहती हैं कि लोग आजीविका अर्जन में सक्षम हों और सम्मान से जीवन बिता सकें, न कि जीवन भर एक बार मुफ्त का भोजन खाते रहें. उनका कहना था, ''आप किसी व्यक्ति को मछली दें तो वह एक बार खाएगा, उसे मछली पकडऩा सिखा दें तो उम्र भर खाता रहेगा. '' उन्होंने चुपचाप गरीबों के लिए गेहूं की कीमत 1 रु. प्रति किलो से बढ़ाकर 2 रु. कर दी. स्प्रिंकल सिस्टम और टपक सिंचाई पर सब्सिडी के मामले में चुप्पी साध उन्होंने संकेत दे दिया कि वे अब और सब्सिडी नहीं देंगी.
उन्होंने विलासिता की चीजों-जैसे सिनेमा हॉल पर कर लगाकर 350 करोड़ रु. उगाहने का प्रावधान रखा है. व्यवसायियों के लिए उनका कहना था कि वे पूरी प्रक्रिया को कंप्यूटरीकृत करेंगी ताकि कर चुकाने के लिए किसी अधिकारी से वास्ता ही न पड़े. लेकिन राजे का सबसे महत्वपूर्ण फैसला इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश करने का है. वे 1,00,000 किमी लंबी सड़कें बनवाएंगी, जिसमें 20,000 किमी बड़ी सड़कें होंगी. ठेकेदारों को आठ वर्ष तक उनका रख-रखाव करना होगा. घटिया सड़क बनाने पर भारी जुर्माने का भी प्रावधान है.
वे लोकलुभावन नीतियों का बेरहमी से विरोध करती हैं. कांग्रेस की गहलोत सरकार की मुफ्त दवा और जांच करने की योजना से सरकारी अस्पतालों में आने वाले रोगियों की संख्या 10 लाख से बढ़कर 25 लाख हो गई है, जबकि डॉक्टरों की संख्या कमोबेश उतनी ही है. नर्सिंग स्टाफ की संख्या कम होने से स्थिति और गंभीर हो गई है. ऐसे में इलाज की गुणवत्ता कम होने, इलाज में अधिक समय लगने से हताश रोगियों और तनावग्रस्त डॉक्टरों तथा अस्पताल के अन्य कर्मचारियों के बीच आए दिन झ्गड़े होते रहते हैं. हर रोगी को सारी दवाएं और जांच मुफ्त नहीं मिल पाती. राजे ने ऐसी योजना पर सवाल खड़े किए. वे मानती हैं कि रोगी थोड़ा-बहुत खर्च करने की स्थिति में है तो कंसल्टेशन फीस आदि के रूप में पैसा वसूला जा सकता है. उन्होंने निजी क्षेत्र को भी मुफ्त जांच और दवा देने की पेशकश की है ताकि सरकारी अस्पतालों पर दबाव कम हो.

(ग्रामीण इलाकों के दौरे पर राजे)
राजे के पास भामाशाह योजना के जरिए सीधे सब्सिडी हस्तांतरित करने और कांग्रेस की खराब तरीके से शुरू परियोजनाओं के बीच संतुलन बिठाने और राज्य की वित्तीय हालत सुधारने की चुनौती थी. उन्होंने पीपीपी के जरिए प्रशासन में बदलाव लाकर 12 प्रतिशत विकास का लक्ष्य रखा है. उन्होंने राज्य रोडवेज प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव रखा है और तीन कॉर्पोरेशनों को मिलाकर एक संगठन तैयार किया है जो इन्फ्रास्ट्रक्चर को देखेगा. कम ऊंचाई वाली बिल्डिंगों को ऊंची बिल्डिंगों में बदलने के लिए एनबीसीसी के साथ संयुक्त उपक्रम शुरू किया गया है. वे राज्य में हवाई उड़ानों की स्थिति सुधारने, नई यूनिवर्सिटी, कॉलेज और मॉडल स्कूल खोलने पर ध्यान दे रही हैं. वे मानती हैं कि राज्य सामाजिक विकास सूचकों पर काफी पीछे है, उन्होंने खासकर शिशु-मातृ मृत्यु दर को कम करने का आश्वासन दिया है.
सार्वजनिक निर्माण विभाग के मंत्री यूनुस खान कहते हैं, ''सड़क निर्माण में निजी क्षेत्र को लाने और टोल टैक्स लगाने से थोड़ी ही जनसंख्या प्रभावित होगी लेकिन लाभ पूरे राज्य को होगा. '' राजे ने पर्यटन और हैरिटेज संरक्षण क्षेत्र के लिए काफी पैसा उपलब्ध कराया है. उनका कहना है कि वे राज्य को हॉलैंड की तरह देखना चाहती हैं, जहां पशुपालन और पर्यटन साथ-साथ चलते हैं. वे 100 शहरों की केंद्र सरकारी की योजना में राज्य के पांच शहरों को शामिल करवाना चाहती हैं.
जयपुर में मेट्रो और बाड़मेर में तेल शोधक कारखाने में राज्य की हिस्सेदारी पर उनका कड़ा रुख है. जून, 2013 तक राज्य में मेट्रो शुरू करने का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका. गहलोत ने करीब 100 करोड़ रु. के इंजन और मेट्रो रेल मंगवाए थे, जिनका इस्तेमाल अभी कम से कम तीन साल तक नहीं हो पाएगा. आनन-फानन ठेके देने में निहित स्वार्थों की बू आ रही है और राजे इसमें भ्रष्टाचार की जांच करेंगी. इसी तरह गहलोत का इरादा तेलशोधक की नींव रखने की औपचारिकता दिखाना भर था, बाकी काम एचपीसीएल के ही जिम्मे था. राजे का आरोप है कि राज्य के हितों को ताक पर रखकर पक्षपाती सहमति पत्र तैयार किया गया. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट उनके प्रस्तावों का मखौल उड़ाते हैं, ''वे तेलशोधक कारखाने को टालती दिखती हैं. उनके प्रस्तावों में विशिष्ट विवरणों की कमी है जैसे किन पांच शहरों को वे स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करना चाहती हैं और कर लगाए जाने वाले संगमरमर का आकार तथा वजन क्या होगा? इस आशय की घोषणा होने से पहले भ्रष्टाचार और सौदेबाजी होगी. '' लेकिन बड़ा सवाल यह है कि राजे बजट में की गई घोषणाओं को किस सीमा तक लागू कर पाएंगी.
कैबिनेट का विस्तार करने और बोर्डों और कॉर्पोरेशनों में राजनैतिक नियुक्तियां हटाने में राजे की अक्षमता बीजेपी की अच्छी तस्वीर पेश नहीं करती. इससे नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और आरएसएस के साथ वसुंधरा के मतभेदों की अटकलों को बल मिलता है. यह अफवाह भी थी कि उन्हें रक्षा मंत्री के रूप में केंद्र में लाया जा रहा है, हालांकि वसुंधरा ने इससे इनकार कर दिया. पहले जिस तरह वे दिल्ली गईं और प्रधानमंत्री तथा अन्य केंद्रीय मंत्रियों से राज्य के संवेदनशील मुद्दों पर बात की, उससे उनके आलोचक व्यथित हो गए हैं. उनके लिए अच्छी बात यह है कि स्थानीय आरएसएस नेताओं को उन पर भरोसा है और वे उन्हें थोड़ी छूट भी देना चाहते हैं बशर्ते उनकी बात सुनी जाए.
कुछ लोगों को कैबिनेट में जगह चाहिए जिसका वे विरोध कर रही हैं. उनके पास कुछ मंत्रालयों की फाइलें हैं जिन्हें मंजूरी का इंतजार है. बजट के जरिए राज्य को तेजी से आगे ले जाने का प्रयास करने के बाद उन्हें और बीजेपी को यह आश्वस्ति देनी होगी कि वे कैबिनेट का विस्तार कैसे करती हैं, नियुक्तियां कैसे करती हैं, गहलोत दौर के राजनैतिक नियुक्तियां कैसे हटाती हैं और सरकार कितने कारगर ढंग से चला पाती हैं.
राजे ने जमीन देने में जो फुर्ती दिखाई वह मुद्दा नहीं है. मुद्दा यह है कि इसमें इतनी देर क्यों हुई. इससे यही साबित होता है कि उन्हें विरासत में जो प्रशासन मिला है, उसमें भारी खामियां हैं. यही वजह है कि 14 जुलाई को 2014-15 का बजट पेश करते हुए उन्होंने कहा कि वे राज्य की प्रशासन शैली में बदलाव की जमीन तैयार कर रही हैं.
भरतपुर और बीकानेर के जमीनी दौरे के बाद राजे को यकीन हो गया कि वर्तमान प्रशासन से कुछ हासिल नहीं होगा. लिहाजा, वे जोर-शोर से निजी-सार्वजनिक हिस्सेदारी (पीपीपी) के जरिए निजी क्षेत्र को आगे लाना चाहती हैं. इसमें जोखिम है. कर्मचारी संघों ने विरोध शुरू कर दिया है. कई नौकरशाह मानते हैं कि इसमें वक्त और पैसा दोनों ज्यादा लगेगा. कुछ बीजेपी नेता और विपक्ष इसे निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश मानता है. पर राजे अपना फैसला नहीं बदलने वालीं. बजट पेश करने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा, ''यह नई सोच है. हम कई कंपनियों से बात करेंगे. काम बहुत है और आगे बढऩे, अच्छा कर दिखाने के लिए प्रतियोगिता कड़ी होगी. '' उन्होंने 30,00,00 नौकरियां देने का वादा कर उन आशंकाओं को खारिज कर दिया कि निजी क्षेत्र पर जोर देने से नौकरियां नहीं होंगी.
एक और बयान में उन्होंने कहा कि वे चाहती हैं कि लोग आजीविका अर्जन में सक्षम हों और सम्मान से जीवन बिता सकें, न कि जीवन भर एक बार मुफ्त का भोजन खाते रहें. उनका कहना था, ''आप किसी व्यक्ति को मछली दें तो वह एक बार खाएगा, उसे मछली पकडऩा सिखा दें तो उम्र भर खाता रहेगा. '' उन्होंने चुपचाप गरीबों के लिए गेहूं की कीमत 1 रु. प्रति किलो से बढ़ाकर 2 रु. कर दी. स्प्रिंकल सिस्टम और टपक सिंचाई पर सब्सिडी के मामले में चुप्पी साध उन्होंने संकेत दे दिया कि वे अब और सब्सिडी नहीं देंगी.
उन्होंने विलासिता की चीजों-जैसे सिनेमा हॉल पर कर लगाकर 350 करोड़ रु. उगाहने का प्रावधान रखा है. व्यवसायियों के लिए उनका कहना था कि वे पूरी प्रक्रिया को कंप्यूटरीकृत करेंगी ताकि कर चुकाने के लिए किसी अधिकारी से वास्ता ही न पड़े. लेकिन राजे का सबसे महत्वपूर्ण फैसला इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश करने का है. वे 1,00,000 किमी लंबी सड़कें बनवाएंगी, जिसमें 20,000 किमी बड़ी सड़कें होंगी. ठेकेदारों को आठ वर्ष तक उनका रख-रखाव करना होगा. घटिया सड़क बनाने पर भारी जुर्माने का भी प्रावधान है.
वे लोकलुभावन नीतियों का बेरहमी से विरोध करती हैं. कांग्रेस की गहलोत सरकार की मुफ्त दवा और जांच करने की योजना से सरकारी अस्पतालों में आने वाले रोगियों की संख्या 10 लाख से बढ़कर 25 लाख हो गई है, जबकि डॉक्टरों की संख्या कमोबेश उतनी ही है. नर्सिंग स्टाफ की संख्या कम होने से स्थिति और गंभीर हो गई है. ऐसे में इलाज की गुणवत्ता कम होने, इलाज में अधिक समय लगने से हताश रोगियों और तनावग्रस्त डॉक्टरों तथा अस्पताल के अन्य कर्मचारियों के बीच आए दिन झ्गड़े होते रहते हैं. हर रोगी को सारी दवाएं और जांच मुफ्त नहीं मिल पाती. राजे ने ऐसी योजना पर सवाल खड़े किए. वे मानती हैं कि रोगी थोड़ा-बहुत खर्च करने की स्थिति में है तो कंसल्टेशन फीस आदि के रूप में पैसा वसूला जा सकता है. उन्होंने निजी क्षेत्र को भी मुफ्त जांच और दवा देने की पेशकश की है ताकि सरकारी अस्पतालों पर दबाव कम हो.

(ग्रामीण इलाकों के दौरे पर राजे)
राजे के पास भामाशाह योजना के जरिए सीधे सब्सिडी हस्तांतरित करने और कांग्रेस की खराब तरीके से शुरू परियोजनाओं के बीच संतुलन बिठाने और राज्य की वित्तीय हालत सुधारने की चुनौती थी. उन्होंने पीपीपी के जरिए प्रशासन में बदलाव लाकर 12 प्रतिशत विकास का लक्ष्य रखा है. उन्होंने राज्य रोडवेज प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव रखा है और तीन कॉर्पोरेशनों को मिलाकर एक संगठन तैयार किया है जो इन्फ्रास्ट्रक्चर को देखेगा. कम ऊंचाई वाली बिल्डिंगों को ऊंची बिल्डिंगों में बदलने के लिए एनबीसीसी के साथ संयुक्त उपक्रम शुरू किया गया है. वे राज्य में हवाई उड़ानों की स्थिति सुधारने, नई यूनिवर्सिटी, कॉलेज और मॉडल स्कूल खोलने पर ध्यान दे रही हैं. वे मानती हैं कि राज्य सामाजिक विकास सूचकों पर काफी पीछे है, उन्होंने खासकर शिशु-मातृ मृत्यु दर को कम करने का आश्वासन दिया है.
सार्वजनिक निर्माण विभाग के मंत्री यूनुस खान कहते हैं, ''सड़क निर्माण में निजी क्षेत्र को लाने और टोल टैक्स लगाने से थोड़ी ही जनसंख्या प्रभावित होगी लेकिन लाभ पूरे राज्य को होगा. '' राजे ने पर्यटन और हैरिटेज संरक्षण क्षेत्र के लिए काफी पैसा उपलब्ध कराया है. उनका कहना है कि वे राज्य को हॉलैंड की तरह देखना चाहती हैं, जहां पशुपालन और पर्यटन साथ-साथ चलते हैं. वे 100 शहरों की केंद्र सरकारी की योजना में राज्य के पांच शहरों को शामिल करवाना चाहती हैं.
जयपुर में मेट्रो और बाड़मेर में तेल शोधक कारखाने में राज्य की हिस्सेदारी पर उनका कड़ा रुख है. जून, 2013 तक राज्य में मेट्रो शुरू करने का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका. गहलोत ने करीब 100 करोड़ रु. के इंजन और मेट्रो रेल मंगवाए थे, जिनका इस्तेमाल अभी कम से कम तीन साल तक नहीं हो पाएगा. आनन-फानन ठेके देने में निहित स्वार्थों की बू आ रही है और राजे इसमें भ्रष्टाचार की जांच करेंगी. इसी तरह गहलोत का इरादा तेलशोधक की नींव रखने की औपचारिकता दिखाना भर था, बाकी काम एचपीसीएल के ही जिम्मे था. राजे का आरोप है कि राज्य के हितों को ताक पर रखकर पक्षपाती सहमति पत्र तैयार किया गया. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट उनके प्रस्तावों का मखौल उड़ाते हैं, ''वे तेलशोधक कारखाने को टालती दिखती हैं. उनके प्रस्तावों में विशिष्ट विवरणों की कमी है जैसे किन पांच शहरों को वे स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करना चाहती हैं और कर लगाए जाने वाले संगमरमर का आकार तथा वजन क्या होगा? इस आशय की घोषणा होने से पहले भ्रष्टाचार और सौदेबाजी होगी. '' लेकिन बड़ा सवाल यह है कि राजे बजट में की गई घोषणाओं को किस सीमा तक लागू कर पाएंगी.
कैबिनेट का विस्तार करने और बोर्डों और कॉर्पोरेशनों में राजनैतिक नियुक्तियां हटाने में राजे की अक्षमता बीजेपी की अच्छी तस्वीर पेश नहीं करती. इससे नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और आरएसएस के साथ वसुंधरा के मतभेदों की अटकलों को बल मिलता है. यह अफवाह भी थी कि उन्हें रक्षा मंत्री के रूप में केंद्र में लाया जा रहा है, हालांकि वसुंधरा ने इससे इनकार कर दिया. पहले जिस तरह वे दिल्ली गईं और प्रधानमंत्री तथा अन्य केंद्रीय मंत्रियों से राज्य के संवेदनशील मुद्दों पर बात की, उससे उनके आलोचक व्यथित हो गए हैं. उनके लिए अच्छी बात यह है कि स्थानीय आरएसएस नेताओं को उन पर भरोसा है और वे उन्हें थोड़ी छूट भी देना चाहते हैं बशर्ते उनकी बात सुनी जाए.
कुछ लोगों को कैबिनेट में जगह चाहिए जिसका वे विरोध कर रही हैं. उनके पास कुछ मंत्रालयों की फाइलें हैं जिन्हें मंजूरी का इंतजार है. बजट के जरिए राज्य को तेजी से आगे ले जाने का प्रयास करने के बाद उन्हें और बीजेपी को यह आश्वस्ति देनी होगी कि वे कैबिनेट का विस्तार कैसे करती हैं, नियुक्तियां कैसे करती हैं, गहलोत दौर के राजनैतिक नियुक्तियां कैसे हटाती हैं और सरकार कितने कारगर ढंग से चला पाती हैं.

