उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में मैदान तो क्रिकेट का है लेकिन जंग मिसाइलों से लड़ी जा रही है. मैदान के एक कोने में आधा दर्जन मिसाइलें तनकर खड़ी हैं. ये बारूद ले जाकर तबाही मचाने वाली मिसाइलें नहीं हैं बल्कि इन्हें दो लीटर वाली कोल्ड ड्रिंक की खाली प्लास्टिक की बोतलों से बनाया गया है. बोतल में नीचे से छेद करके इसमें एक वॉल्व से पीवीसी पाइप जोड़कर मिसाइल का आकार दिया गया है.
अंग्रेजी वर्णमाला के 'एच’ आकार में पीवीसी पाइप को जोड़कर इससे रॉकेट लॉन्चर सरीखा काम लिया जा रहा है. मिसाइलनुमा बोतल में आधा लीटर पानी भरकर इसे पीवीसी पाइप से बने रॉकेट लान्चर के ऊपर जोड़ा गया है. एक तरफ वॉल्व लगे पीवीसी पाइप के जरिए बोतल में पंप से हवा भरी जा रही है. अंदर जाकर हवा बोतल में भरे पानी पर पीछे की ओर दबाव डालती है और जैसे ही बोतल के नीचे वॉल्व को ढीला किया, मिसाइल न्यूटन के तीसरे सिद्घांत 'हर क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है’ को हकीकत में बदलते हुए पानी की तेज धार के साथ हवा में आगे बढ़ जाती है.
100 मीटर की दूरी तय कर जैसे ही यह मिसाइल जमीन पर गिरती है, लखनऊ के श्रीराम स्वरूप ग्रुप ऑफ प्रोफेशनल कॉलेजेज में बीटेक सेकंड ईयर की छात्रा अपूर्वा चित्रांशी खुशी से उछल पड़ती है क्योंकि उसकी मिसाइल की रेंज ने साथी छात्रों के साथ 5 जुलाई की दोपहर मैदान में हो रहे 'इनोवेशन कंपीटिशन’ में सबको पछाड़ दिया है.
लखनऊ से 400 किलोमीटर दूर मथुरा जिले के गोवर्धन रोड पर शिक्षा विभाग में संयुक्त निदेशक पद से रिटायर हुए 62 वर्षीय एस.पी. शर्मा रहते हैं. रिटायरमेंट के बाद मिले पैसे से शर्मा ने तीन कमरे का मकान बनवाया. पिछले साल पहली बारिश में उनके मकान की दीवारों पर सीलन ने कब्जा कर लिया. कई कोशिशों के बाद भी यह समस्या ठीक नहीं हुई. सिविल इंजीनियर्स ने जांच की तो पता चला कि शर्मा के मकान में जो ईंटें लगी हैं, उनमें खारे पानी का उपयोग हुआ है और इसीलिए वे कमजोर हैं.
मथुरा का पानी खारा है और भट्ठों में इसका उपयोग कर बनाई जा रही ईंटें घटिया साबित हो रही हैं. दूसरी ओर मीठे पानी की ईंटें काफी दूर से लाने की वजह से महंगी पड़ती हैं लेकिन अब जल्द ही मथुरावासियों की खारे पानी की वजह से भवन निर्माण में होने वाली दिक्कतें दूर हो जाएंगी. मथुरा की जीएलए यूनिवर्सिटी के सिविल इंजीनियरिंग के छात्र केंद्रीय योजना आयोग की 'कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल’ के साथ मिलकर मथुरा के खारे पानी से मजबूत ईंटें तैयार करने की रिसर्च में जुट गए हैं.
यूपी के इंजीनियरिंग कॉलेजों में टेक्निकल एजुकेशन के तौर-तरीकों में यह नया बदलाव है. उत्तर प्रदेश टेक्निकल यूनिवर्सिटी (यूपीटीयू) के इंजीनियरिंग कॉलेज बाजार में लगातार बढ़ रहे कंपीटिशन से निबटने और छात्रों को दिलचस्प ढंग से टेक्निकल एजुकेशन देने के लिए न सिर्फ इनोवेशन से जुड़े तौर तरीकों को अपना रहे हैं बल्कि उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ रिसर्च को भी आत्मसात कर लिया है. यह क्वालिटी एजुकेशन देने की दिशा में बड़ा कदम है.

(टेक्नीकल लैब में अध्यापक के साथ काम करते छात्र)
नई इबारत
यूपीटीयू ने भी अपनी कार्य प्रणाली में बदलाव कर एक नई इबारत लिखने की शुरुआत की है. तकरीबन 800 निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों से जुड़े यूपीटीयू के इतिहास में यह पहला मौका था जब 2014 की प्रवेश परीक्षा में एक भी 'मुन्ना भाई’ दूसरे छात्र की जगह परीक्षा देते नहीं पकड़ा गया. इस साल पहली बार यूपीटीयू की प्रवेश परीक्षा की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन रही. बायोमीट्रिक तकनीकी से प्रवेश परीक्षा देने वाले छात्रों की पहचान की गई और 'मुन्ना भाइयों’ पर नजर रखने के लिए तीन चरणों में निगरानी की व्यवस्था की गई थी.
सुधार के लिए यूपीटीयू प्रशासन में बड़ा बदलाव हुआ है. तकरीबन 10 साल बाद सरकार ने प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) अधिकारी पवन गंगवार को यूपीटीयू का नया रजिस्ट्रार नियुक्त किया है. गंगवार बताते हैं, ''काउंसिलिंग में सीट लॉक करने का चरणबद्ध तरीका अपनाने का फायदा यह है कि हर चरण के बाद छात्र को यूपीटीयू के इंजीनियरिंग कॉलेज में सीटों की पोजिशन पता चलती रहेगी.”
अभी तक यूपीटीयू आउटपुट आधारित टेक्निकल एजुकेशन मुहैया करा रही थी. शिक्षा की इस रणनीति को समझ्ते हुए यूपीटीयू के कुलपति प्रो. आर.के. खंडाल बताते हैं कि किसी भी इंडस्ट्री में एक इनपुट होता है जिसे 'प्रॉसेस’ करके आउटपुट पाया जाता है. टेक्निकल एजुकेशन में छात्र को इनपुट के रूप में समझा जा सकता है. टीचिंग टेक्नीक, प्रैक्टिकल, लैब, क्लास रूम फैकल्टी और टीचर्स छात्र को 'प्रॉसेस’ करते हैं और इसका आउटपुट हुआ डिग्री.
अभी तक आउटपुट आधारित टेक्निकल एजुकेशन में यूपीटीयू सिर्फ डिग्री दे रही थी. डिग्री लेने के बाद किसी छात्र में बाजार की मांग के अनुरूप काम करने की कैसी क्षमता है? यही उसका 'आउटकम’ है जो पिछले कुछ वर्षों के दौरान टेक्निकल एजुकेशन से गायब था.
अब 'आउटकम’ आधारित एजुकेशन में स्टुडेंट को शुरुआत से इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से ढाला जाता है. एजुकेशन में हुए इसी बदलाव ने 22 वर्षीय पलाश अग्रवाल को जापानी कंपनी में 22 लाख रु. सालाना के पैकेज पर नौकरी दिलवाई. उन्होंने इसी साल मथुरा की जीएलए यूनिवर्सिटी से बीटेक की परीक्षा 59 प्रतिशत अंकों के साथ पास की लेकिन नौकरी के मामले में अपने साथियों से काफी आगे निकल गए. पलाश बताते हैं, ''मैं कई विषयों में कमजोर था लेकिन मुझे कंप्यूटर लैंग्वेज काफी भाती थी. कॉलेज में माहौल मिलने के बाद मैंने लैंग्वेज पर और मेहनत की और अब नतीजा सामने है.”
जीएलए यूनिवर्सिटी के डॉ. अनूप कुमार गुप्ता बताते हैं, ''इंडस्ट्री भी अब आउटकम पर ही ज्यादा ध्यान दे रही है क्योंकि इससे ही छात्रों की असल क्षमता की परख होती है.” उनके आउटकम को निखारने के लिए ही श्रीरामस्वरूप मेमोरियल इंजीनियरिंग कॉलेज ने छात्रों के मूल्यांकन का खास तरीका ईजाद किया है.
इसमें इस पर नजर रखी जाती है कि किसी विषय या क्षेत्र में छात्र कहां ठहर रहा है. कॉलेज के डायरेक्टर पंकज अग्रवाल बताते हैं, ''अगर हम छात्रों को यह बताने में सफल हो जाते हैं कि इंडस्ट्री की मांग के मुताबिक उनकी परफॉर्मेंस में क्या गुंजाइश है तो वे मेहनत करने के लिए प्रेरित होते हैं और इसी से अच्छे नतीजे भी आते हैं.”

(अंबालिका इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी में कूका रोबोटिक्स ट्रेनिंग लैब)
लैब से बन रही पहचान
लखनऊ के श्रीरामस्वरूप मेमोरियल इंजीनियरिंग कॉलेज से इस साल बीटेक फस्र्ट ईयर की परीक्षा पास करने वाली 20 वर्षीया मोनिका शर्मा जब पहली बार अपनी इलेक्ट्रिकल लैब में गई थीं तो यहां पर फैले तारों के मकडज़ाल, बे्रक बोल्ट, फंक्शन जनरेटर और सीआरओ को देखकर घबरा गई थीं.
वे बताती हैं, ''बाजार में बिकने वाली खूबसूरत रेडीमेड किट की जगह लैब में मेरा सामना बिजली के बिखरे सामान से हुआ. धीरे-धीरे इन सामान को जोड़कर हमने खुद से किट तैयार की और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रयोग शुरू किए. इससे हमें इंजीनियरिंग के छोटे से छोटे सिद्धांत बखूबी समझ आ गए हैं.”
असल में आज से दस साल पहले जब यूपी में तेजी से इंजीनियरिंग कॉलेज खुले तो अचानक मांग देखकर कई कंपनियों ने अलग-अलग इंजीनियरिंग लैब की रेडीमेड किट बाजार में उतार दी. इस किट से प्रैक्टिकल करने में छात्र को कुछ भी सीखने को नहीं मिलता.
वाराणसी के एसएमएस गु्रप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन एम.पी. सिंह कहते हैं, ''बगैर स्तरीय लैब के अच्छे इंजीनियर पैदा नहीं किए जा सकते और लैब में बांटे जाने वाले ज्ञान को समय सीमा में नहीं बांधा जा सकता. इसलिए किसी भी कॉलेज में एजुकेशन का स्तर इस बात से तय होता है कि वहां के छात्र लैब में कितना समय गुजारते हैं.”

(जीएलएल यूनिवर्सिटी में लैब में काम करते छात्र)
रिसर्च को लगे पंख
इंजीनियरिंग कॉलेजों ने जैसे ही क्वालिटी एजुकेशन के लिए कम से कम एमटेक डिग्रीधारी शिक्षकों की भर्ती शुरू की रिसर्च के लिए माहौल बनना शुरू हो गया. कॉलेजों को यह समझ् में आ गया है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर में भले भी इनवेस्ट कम किया जाए लेकिन शिक्षकों की गुणवत्ता के लिए पैसे खर्च करना अब फायदे का सौदा है.
टाटा कंसल्टेंसी सर्विस (टीसीएस) के मुख्य सलाहकार जयंत कृष्ण बताते हैं, ''इंजीनियरिंग कॉलेजों के बीच लगातार बढ़ रही प्रतिस्पर्धा ने रिसर्च पर ध्यान केंद्रित कर दिया है. शिक्षकों को पढ़ाने के साथ रिसर्च की सुविधाएं भी दी जा रही हैं तो छात्रों को भी छोटे-छोटे प्रोजेक्ट के जरिए रिसर्च के शुरुआती तौर-तरीकों से वाकिफ कराया जा रहा है.”
प्रवीर सिंह इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (पीएसआइटी) छात्रों को किसी भी विषय में दिए गए प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए आर्थिक मदद मुहैया करा रहा है. इसी तरह मथुरा की जीएलए यूनिवर्सिटी ने अपने यहां 25 लाख रु. का 'रिसर्च फंड’ बनाया है जिससे छात्रों को आर्थिक मदद दी जा रही है. इससे बड़ी संख्या में टीचर और छात्र रिसर्च के लिए प्रेरित हो रहे हैं.
हालांकि यूपीटीयू का अभी अपना रिसर्च सेंटर नहीं है. छात्र और टीचर यहां रजिस्ट्रेशन कराकर अपने कॉलेज में रिसर्च करते हैं. 2012 में यूपीटीयू में पीएचडी में रजिस्ट्रेशन कराने वाले छात्रों की संख्या 170 के करीब थी जो 2013 में 400 को पार कर गई. रिसर्च के लिए बने महौल को और असरदार बनाने के लिए यूपीटीयू टीचर्स टीचिंग फेलो योजना की शुरुआत करने जा रही है.
इसमें हर साल करीब विभिन्न इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने वाले या रिसर्च करने वाले 100 टीचर्स को यूनिवर्सिटी फेलोशिप देगी. इसकी राशि उतनी ही होगी जितनी एक लेक्चरर या असिस्टेंट प्रोफेसर का वेतन होता है. यह फेलोशिप कम-से-कम तीन साल तक दी जाएगी. इनका चयन एक परीक्षा के जरिए किया जाएगा. यूपीटीयू के रजिस्ट्रार पवन गंगवार बताते हैं, ''अब टीचर्स को यह दुख नहीं होगा कि पढ़ाने के साथ वे रिसर्च नहीं कर पा रहे या फिर रिसर्च कर रहे हैं लेकिन पढ़ाने का अनुभव नहीं मिल पा रहा है.”
इन प्रेरक दशाओं में इस बार यूपीटीयू में रिसर्च करने वालों की संख्या 800 के पार हो जाने की उम्मीद है. इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (आइआइए) के प्रदेश उपाध्यक्ष सुनील वैश्य बताते हैं, ''उत्तर प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेजों में रिसर्च करने वालों की संख्या बीटेक के पांच लाख छात्रों की तुलना में काफी कम है. यह तब बढ़ेगी जब हर कॉलेज में न सिर्फ रिसर्च बल्कि पोस्ट ग्रेजुएशन प्रोग्राम भी तेजी से शुरू होंगे.”
हर तरह के मौके
छात्रों की प्रतिभा निखारने और वैल्यू एडिशन करने में कॉलेजों में होने वाली कोर्स से इतर सांस्कृतिक और दूसरी गतिविधियों की भी बहुत बड़ी भूमिका है. अगर छात्र खुश रहेंगे तो उनमें नई ऊर्जा का संचार होगा. यही सकारात्मक ऊर्जा छात्र के कामकाज को और अधिक प्रभावी बनाने में मदद करती है. करीब सभी बड़े संस्थान नियमित रूप से अब अपने यहां ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देने लगे हैं.
जीएलए ग्रुप ऑफ कॉलेजेज के प्रमुख नारायण दास अग्रवाल बताते हैं, ''इंडस्ट्री की मांग में भी परिवर्तन हुआ है. अब किसी छात्र में सिर्फ अच्छे टीम लीडर के गुण ही नहीं परखे जाते बल्कि यह भी देखा जाता है कि उसमें एक अच्छा टीम मेंबर बनने के गुण हैं कि नहीं.”
श्रीरामस्वरूप मेमोरियल इंजीनियरिंग कॉलेज में यूफिनी और स्टेप म्युजिक क्लब, ड्रामा क्लब ड्रैकुला, फोटोग्रॉफी क्लब, रोबोटिक क्लब जैसी गतिविधियों ने छात्रों में पर्सनेलिटी डेवलपमेंट को नया आयाम दिया है. पंकज अग्रवाल बताते हैं, ''हमारे कॉलेज में सारी व्यावसायिक गतिविधियां छात्रों के जरिए कराई जाती हैं. इनमें बाहर की किसी संस्था की मदद नहीं ली जाती. कई बार छात्रों से गलती हो जाती है लेकिन इसी से वे सीखते भी हैं. यहां छात्रों को अपने उन सारे शौक को पूरे करने की छूट है जो वे इससे पहले पढ़ाई के दबाव के चलते नहीं पूरा कर पाए हैं.”
बरेली के श्री राममूर्ति स्मारक कालेज ऑफ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी के छात्र एरोनॉटिक्स क्लब, सिनर्जी क्लब, रोबोटिक क्लब जैसे दो दर्जन क्लबों का संचालन कर रहे हैं. इन क्लबों की गतिविधियों को कॉलेज को संचालित करने वाले एसआएमएस ट्रस्ट से आर्थिक मदद मिलती है. इसी तरह वाराणसी का एसएमएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस छात्रों में भारतीय संस्कृति के गुण और संस्कार को निखारकर उसकी प्रतिभा को नया आयाम देने की कोशिश में लगा हुआ है. यहां चल रहे स्प्रिचुएलिटी सेंटर फॉर ह्यूमन एनरिचमेंट में छात्रों को पढ़ाई के साथ भारतीय संस्कृति और संस्कारों की भी शिक्षा दी जाती है.
संस्थान के कार्यकारी सचिव डॉ. एम.पी. सिंह बताते हैं, ''टेक्निकल एजुकेशन के साथ अध्यात्म का प्रशिक्षण पाने वाले छात्र दूसरों के मुकाबले कहीं ज्यादा धैर्यवान और संवेदनशील होते हैं. अपनी इस विशेषता के जरिए यह नौकरी के दौरान न केवल दूसरों से काम ले पाते हैं बल्कि खुद भी काफी काम करके मिसाल पेश करते हैं.”

(एसआरएमएस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के कैंपस में छात्र)
प्लेसमेंट की आसान राह
वैश्विक आर्थिक मंदी की वजह से पिछले तीन साल से उत्तर प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेजों में बड़ी कंपनियां प्लेसमेंट के लिए नहीं आ रही थीं. लेकिन इस साल कॉग्निजेंट और एसेंशियल जैसी कंपनियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. लोकसभा चुनाव के बाद शेयर मार्केट में जिस तरह से तेजी दिखाई दी उसने इंडस्ट्री की मनोदशा की ओर इशारा किया.
इसी अनुकूल माहौल में इंडस्ट्री को टेक्निकल एजुकेशन में प्रशिक्षित युवाओं की जरूरत पड़ी और उन्होंने उत्तर प्रदेश की ओर रुख किया. प्लेसमेंट को आकर्षित करने के लिए इंजीनियरिंग कॉलेज कई तरकीब लगा रहे हैं. पीएसआइटी कानपुर, जीएलए यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में आइटी की अग्रणी कंपनी इन्फोसिस कैंपस कनेक्ट पार्टनर जैसा कार्यक्रम चला रही है.
आइबीएम ने पीएसआइटी कानपुर को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस घोषित किया है. आइबीएम समय-समय पर सॉफ्टवेयर कंपीटिशन का आयोजन करती है जिसमें बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग के छात्र हिस्सा लेते हैं. इससे छात्रों को इंडस्ट्री में हो रहे बदलाव की जानकारी हो जाती है. यह कंपनी कैंपस इंटरव्यू करने के लिए इंजीनियरिंग कॉलेज आती है तो छात्रों में किसी प्रकार की घबराहट नहीं होती और वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं.
प्लेसमेंट और इंडस्ट्री की मांग को ध्यान में रखते हुए ही यूपीटीयू ने तीन स्तरों पर कोर्स में बदलाव किया है. पिछले वर्ष यूनिवर्सिटी ने बीटेक फर्स्ट ईयर का कोर्स बदला था. 2014 में सेकंड ईयर का कोर्स बदलने जा रहा है. इंडस्ट्री ट्रेंड के मुताबिक कोर्स में इंटर्नशिप और ट्रेनिंग को महत्व दिया गया है और इसके बाद सबसे ज्यादा जोर स्टुडेंट की 'फिनिशिंग’ पर दिया जा रहा है.
नतीजतन इस साल यूपीटीयू के सभी अच्छे निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में औसतन 60 से 70 फीसदी छात्रों को प्रतिष्ठित कंपनियों में नौकरी मिली है. छात्रों को रोजगार मिलने की संभावनाएं उनके व्यक्तित्व विकास पर भी निर्भर करती हैं और बगैर आकर्षक कम्युनिकेशन स्किल के व्यक्तित्व विकास संभव नहीं है.
कम्युनिकेशन दक्षता के लिए भाषा पर पकड़ जरूरी है और ज्यादातर संस्थानों का ध्यान अब इस बुनियादी जरूरत की तरफ केंद्रित हो चुका है. श्री राममूर्ति स्मारक कालेज ऑफ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी के चेयरमैन देवमूर्ति अग्रवाल बताते हैं, ''छात्रों में कम्युनिकेशन स्किल को बढ़ाने के लिए हमने अपने संस्थान में लैंग्वेज लैब की स्थापना की है.”
इंजीनियरिंग कॉलेजों ने काफी बेहतर मानव संसाधन तैयार कर देश और विदेश की बड़ी कंपनियों के सामने विकल्प प्रस्तुत किया है. अब बारी सरकार की है. राज्य में इंडस्ट्री फ्रेंड्ली माहौल से निजी कंपनियों को आकर्षित कर बड़ी संख्या में प्रदेश के भीतर ही रोजगार बढ़ सकता है. इससे नौकरी की तलाश में यूपी के इंजीनियरों का पलायन रुकेगा और यहीं से यूपी के अच्छे दिनों की शुरुआत भी होगी.
छात्रों के पसंदीदा ठिकाने
टेक्निकल एजुकेशन क्षेत्र के नौ ऐसे संस्थान जो इन्फ्रास्ट्रक्चर और पढ़ाई की वजह से मांग में हैं
श्री रामस्वरूप मेमोरियल ग्रुप ऑफ प्रोफेशनल कॉलेजेज, लखनऊ
कोर्स: बीटेक, बीबीए, बीसीए, एमबीए, एमसीए
खूबियां: शानदार लैब, आइआइटी और एनआइआइटी के पूर्व छात्रों से भरी फैकल्टी, एजुकेशन में इनोवेशन का समावेश
पढ़ाई के साथ-साथ छात्रों में वैल्यू एडिशन के लिए संस्कृति, खेल और रोबोटिक्स से जुड़ी कई तरह की गतिविधियां निरंतर चलती हैं. 'टर्म पेपर’ के माध्यम से छात्रों और शिक्षकों के बीच कंपीटिशन का माहौल तैयार किया जाता है.
अगला पड़ाव: इंटरनेशनल इंडस्ट्री के मुताबिक पढ़ाई, रिसर्च का दायरा बढ़ाना.
''हमारे छात्र पढ़ाई के दौरान सख्त मूल्यांकन प्रक्रिया से गुजरते हैं जिससे वे अपनी प्रतिभा के साथ सौ फीसदी न्याय कर पाते हैं.” —पंकज अग्रवाल, डायरेक्टर
जीएलए यूनिवर्सिटी, मथुरा
कोर्स: बीटेक, एमटेक, बीबीए, एमबीए, बीफार्मा, बायोटेक्नोलॉजी, पीएचडी, अन्य कोर्स
खूबियां: सेल्फ फाइनेंस यूनिवर्सिटी में सबसे बड़ा आवासीय कैंपस, रिसर्च के लिए प्रतिष्ठित संस्थानों से अनुबंध, वाइ-फाइ कैंपस.
यहां की छात्रा संकृप्ति चौधरी ने कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज में महिला अभ्यर्थियों में पहला स्थान प्राप्त किया. रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए 25 लाख रु. के फंड की व्यवस्था.
अगला पड़ाव: छात्रों के वैल्यू एडिशन के लिए कई नए कार्यक्रम की शुरुआत करना.
''हम ग्लोबल इंडस्ट्री की मांग के मुताबिक छात्रों को प्रशिक्षित करते हैं जिससे उनका
अच्छा प्लेसमेंट होता है.” —नारायण दास अग्रवाल, चांसलर
यूनाइटेड ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, इलाहाबाद
कोर्स: बीटेक, एमटेक, एमसीए, बीबीए, बीसीए, बीफार्मा और पीजीडीसीएम
खूबियां: हाइटेक साधनों से शिक्षा, छात्रों के लिए ऐक्टिव इनोवेशन सेंटर
अनुशासन और क्लास में छात्र की उपस्थिति पर विशेष जोर. यूपीपीसीएस और गे्रजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग में इस साल यहां के छात्रों ने पहले पांच में जगह बनाई.
अगला पड़ाव: छात्रों के एक्सचेंज प्रोग्राम का दायरा बढ़ाना.
''हमारे छात्र हर तरह की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं. इसीलिए ये यूपीपीसीएस, गेट जैसी परीक्षाओं की मेरिट में दिखते हैं.” —सतपाल गुलाटी, वाइस चेयरमैन
प्रवीर सिंह इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (पीएसआइटी), कानपुर
कोर्स: बीटेक, बीफार्मा, एमफार्मा, एमबीए, एमसीए, एमटेक
खूबियां: 100 एकड़ में फैला वाइ-फाइ सुविधा वाला कैंपस, 1,000 कंप्यूटर वाली कंप्यूटर लैब
छात्रों की ट्रेनिंग के लिए अलग से सेल, टीचर और छात्रों को ट्रेनिंग देने के लिए आइटी कंपनी इन्फोसिस कॉलेज की कैंपस कनेक्ट पार्टनर. आइबीएम ने पीएसआइटी को सेंटर ऑफ एक्सिलेंस घोषित किया है.
अगला पड़ाव: छात्रों की ट्रेनिंग के लिए देश और विदेश की सभी प्रतिष्ठित कंपनियों से अनुबंध.
''हम छात्रों को अनुशासित और हरफनमौला बनाते हैं. इससे वे कहीं ज्यादा उत्साही और आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं.”
—प्रवीर सिंह, चेयरमैन
श्री राममूर्ति स्मारक कालेज ऑफ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलोजी, बरेली
कोर्स: बीटेक, एमटेक, एमबीए, एमसीए, एम.फार्मा और अन्य कोर्सेज
खूबियां: 300 ई-जर्नल की सुविधा वाली सेंट्रल लाइब्रेरी, वाइ-फाइ कैंपस, अंतरराष्ट्रीय मानकों वाली लैब, स्पोर्ट्स पर खास ध्यान.
लैब में छात्रों की गतिविधियों पर खास ध्यान. 150 से अधिक लैब माड्ïयूल की व्यवस्था. अगला पड़ाव: छात्रों को ज्यादा से ज्यादा 'इनोवेशन’ के लिए प्रेरित करना.
''छात्र के साथ टीचर ट्रेनिंग पर भी ध्यान देते हैं, इंडस्ट्री में छात्रों की यही यूएसपी है.”—देवमूर्ति अग्रवाल, चेयरमैन
बाबू बनारसी दास यूनिवर्सिटी, लखनऊ
कोर्स: बीटेक, एमटेक, एमसीए बीफार्मा
खूबियां: विदेशी यूनिवर्सिटी के सहयोग से डुअल डिग्री प्रोग्राम की सुविधा, आइआइटी और एमएनआइटी से जुड़ी फैकल्टी
फैलोशिप की व्यवस्था, शिक्षकों, छात्रों के अलावा संस्थान के टेक्निकल स्टाफ को अपग्रेड करने के लिए समय-समय पर नेशनल और इंटरनेशनल स्तर के सेमिनार.
''हमारे छात्रों को इंडस्ट्री की चुनौतियों के हिसाब से ट्रेनिंग मिलती है. पर्सनेलिटी डेवलपमेंट पर फोकस से निखार आता है.”—डॉ. अखिलेश दास, चांसलर
अंबालिका इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ऐंड टेक्नोलॉजी, लखनऊ
कोर्स: बीटेक, एमबीए, डिप्लोमा इन इंजीनियरिंग
खूबियां: एंटरप्राइज रिलेटेड प्रोग्रामिंग के जरिए संस्थान से जुड़ी हर जानकारी वेबसाइट पर मौजूद, 'इनोवेशन’ पर सबसे ज्यादा जोर
ईआरपी के जरिए अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई पर नजर रख सकेंगे. फैकल्टी मेंबर से संवाद की व्यवस्था. माइक्रोसॉफ्ट ने संस्थान को सेंटर ऑफ एक्सिलेंस के लिए चुना है.
अगला पड़ाव: कॉलेज के पोर्टल पर ऑडियो-वीडियो के जरिए इंग्लिश लर्निंग क्लास की शुरुआत करना.
''विश्वस्तरीय माहौल के जरिए अपने छात्र को ग्लोबल चुनौतियों का सामना करने को तैयार करते हैं. नए तौर-तरीके हमारी पहचान हैं.” —अंबिका मिश्र, एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर
एसआर ग्रुप ऑफ इंस्टीट्ïयूशंस, झांसी
कोर्स: बीटेक, एमटेक, एमबीए, एमसीए, बीबीए, बीसीए, बीएससी—बायोटेक्नोलॉजी
खूबियां: बुंदेलखंड में टेक्निकल एजुकेशन का पहला और अग्रणी केंद्र, मेधावी छात्रों के लिए नगद पुरस्कार की व्यवस्था. क्वालिटी टीचिंग पर सबसे ज्यादा जोर, टीचर के चयन के लिए आइआइटी, एनआइटी के विशेषज्ञों के पैनल की मदद, नोएडा, कानपुर, दिल्ली जैसे 'एजुकेशन हब’ में इंटरव्यू.
अगला पड़ाव: प्लेसमेंट के लिए अधिक से अधिक कंपनियों से करार.
''हमारा कॉलेज मेधावी छात्रों की हर संभव मदद करता है. हम पैसे की कमी से प्रतिभा को मुरझने नहीं देते.” —सुरेंद्र राय, चेयरमैन
एसएमएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, वाराणसी
कोर्स: बीटेक, बीसीए, एमबीए, एमसीए
खूबियां: निजी क्षेत्र में यूपी का सबसे पुराना तकनीकी शिक्षण संस्थान, अध्ययन-अध्यापन में आध्यात्मिक तरीकों का समावेश.
नए प्रायोगिक तरीकों से छात्रों को अपडेट करना. कॉलेज के लखनऊ कैंपस के डायरेक्टर डॉ. भरतराज सिंह ने हवा से चलने वाली मोटरसाइकिल बनाकर 'लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ में जगह बनाई.
अगला पड़ाव: रिसर्च में तेजी लाना, प्लेसमेंट सेल को मजबूती देना.
''हमारे छात्र न सिर्फ टेक्निकल एजुकेशन में अग्रणी बल्कि भारतीय संस्कारों से भी ओत-प्रोत होते हैं.” —डॉ. एम. पी. सिंह, कार्यकारी सचिव
अंग्रेजी वर्णमाला के 'एच’ आकार में पीवीसी पाइप को जोड़कर इससे रॉकेट लॉन्चर सरीखा काम लिया जा रहा है. मिसाइलनुमा बोतल में आधा लीटर पानी भरकर इसे पीवीसी पाइप से बने रॉकेट लान्चर के ऊपर जोड़ा गया है. एक तरफ वॉल्व लगे पीवीसी पाइप के जरिए बोतल में पंप से हवा भरी जा रही है. अंदर जाकर हवा बोतल में भरे पानी पर पीछे की ओर दबाव डालती है और जैसे ही बोतल के नीचे वॉल्व को ढीला किया, मिसाइल न्यूटन के तीसरे सिद्घांत 'हर क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है’ को हकीकत में बदलते हुए पानी की तेज धार के साथ हवा में आगे बढ़ जाती है.
100 मीटर की दूरी तय कर जैसे ही यह मिसाइल जमीन पर गिरती है, लखनऊ के श्रीराम स्वरूप ग्रुप ऑफ प्रोफेशनल कॉलेजेज में बीटेक सेकंड ईयर की छात्रा अपूर्वा चित्रांशी खुशी से उछल पड़ती है क्योंकि उसकी मिसाइल की रेंज ने साथी छात्रों के साथ 5 जुलाई की दोपहर मैदान में हो रहे 'इनोवेशन कंपीटिशन’ में सबको पछाड़ दिया है.
लखनऊ से 400 किलोमीटर दूर मथुरा जिले के गोवर्धन रोड पर शिक्षा विभाग में संयुक्त निदेशक पद से रिटायर हुए 62 वर्षीय एस.पी. शर्मा रहते हैं. रिटायरमेंट के बाद मिले पैसे से शर्मा ने तीन कमरे का मकान बनवाया. पिछले साल पहली बारिश में उनके मकान की दीवारों पर सीलन ने कब्जा कर लिया. कई कोशिशों के बाद भी यह समस्या ठीक नहीं हुई. सिविल इंजीनियर्स ने जांच की तो पता चला कि शर्मा के मकान में जो ईंटें लगी हैं, उनमें खारे पानी का उपयोग हुआ है और इसीलिए वे कमजोर हैं.
मथुरा का पानी खारा है और भट्ठों में इसका उपयोग कर बनाई जा रही ईंटें घटिया साबित हो रही हैं. दूसरी ओर मीठे पानी की ईंटें काफी दूर से लाने की वजह से महंगी पड़ती हैं लेकिन अब जल्द ही मथुरावासियों की खारे पानी की वजह से भवन निर्माण में होने वाली दिक्कतें दूर हो जाएंगी. मथुरा की जीएलए यूनिवर्सिटी के सिविल इंजीनियरिंग के छात्र केंद्रीय योजना आयोग की 'कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल’ के साथ मिलकर मथुरा के खारे पानी से मजबूत ईंटें तैयार करने की रिसर्च में जुट गए हैं.
यूपी के इंजीनियरिंग कॉलेजों में टेक्निकल एजुकेशन के तौर-तरीकों में यह नया बदलाव है. उत्तर प्रदेश टेक्निकल यूनिवर्सिटी (यूपीटीयू) के इंजीनियरिंग कॉलेज बाजार में लगातार बढ़ रहे कंपीटिशन से निबटने और छात्रों को दिलचस्प ढंग से टेक्निकल एजुकेशन देने के लिए न सिर्फ इनोवेशन से जुड़े तौर तरीकों को अपना रहे हैं बल्कि उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ रिसर्च को भी आत्मसात कर लिया है. यह क्वालिटी एजुकेशन देने की दिशा में बड़ा कदम है.

(टेक्नीकल लैब में अध्यापक के साथ काम करते छात्र)
नई इबारत
यूपीटीयू ने भी अपनी कार्य प्रणाली में बदलाव कर एक नई इबारत लिखने की शुरुआत की है. तकरीबन 800 निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों से जुड़े यूपीटीयू के इतिहास में यह पहला मौका था जब 2014 की प्रवेश परीक्षा में एक भी 'मुन्ना भाई’ दूसरे छात्र की जगह परीक्षा देते नहीं पकड़ा गया. इस साल पहली बार यूपीटीयू की प्रवेश परीक्षा की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन रही. बायोमीट्रिक तकनीकी से प्रवेश परीक्षा देने वाले छात्रों की पहचान की गई और 'मुन्ना भाइयों’ पर नजर रखने के लिए तीन चरणों में निगरानी की व्यवस्था की गई थी.
सुधार के लिए यूपीटीयू प्रशासन में बड़ा बदलाव हुआ है. तकरीबन 10 साल बाद सरकार ने प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) अधिकारी पवन गंगवार को यूपीटीयू का नया रजिस्ट्रार नियुक्त किया है. गंगवार बताते हैं, ''काउंसिलिंग में सीट लॉक करने का चरणबद्ध तरीका अपनाने का फायदा यह है कि हर चरण के बाद छात्र को यूपीटीयू के इंजीनियरिंग कॉलेज में सीटों की पोजिशन पता चलती रहेगी.”
अभी तक यूपीटीयू आउटपुट आधारित टेक्निकल एजुकेशन मुहैया करा रही थी. शिक्षा की इस रणनीति को समझ्ते हुए यूपीटीयू के कुलपति प्रो. आर.के. खंडाल बताते हैं कि किसी भी इंडस्ट्री में एक इनपुट होता है जिसे 'प्रॉसेस’ करके आउटपुट पाया जाता है. टेक्निकल एजुकेशन में छात्र को इनपुट के रूप में समझा जा सकता है. टीचिंग टेक्नीक, प्रैक्टिकल, लैब, क्लास रूम फैकल्टी और टीचर्स छात्र को 'प्रॉसेस’ करते हैं और इसका आउटपुट हुआ डिग्री.
अभी तक आउटपुट आधारित टेक्निकल एजुकेशन में यूपीटीयू सिर्फ डिग्री दे रही थी. डिग्री लेने के बाद किसी छात्र में बाजार की मांग के अनुरूप काम करने की कैसी क्षमता है? यही उसका 'आउटकम’ है जो पिछले कुछ वर्षों के दौरान टेक्निकल एजुकेशन से गायब था.
अब 'आउटकम’ आधारित एजुकेशन में स्टुडेंट को शुरुआत से इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से ढाला जाता है. एजुकेशन में हुए इसी बदलाव ने 22 वर्षीय पलाश अग्रवाल को जापानी कंपनी में 22 लाख रु. सालाना के पैकेज पर नौकरी दिलवाई. उन्होंने इसी साल मथुरा की जीएलए यूनिवर्सिटी से बीटेक की परीक्षा 59 प्रतिशत अंकों के साथ पास की लेकिन नौकरी के मामले में अपने साथियों से काफी आगे निकल गए. पलाश बताते हैं, ''मैं कई विषयों में कमजोर था लेकिन मुझे कंप्यूटर लैंग्वेज काफी भाती थी. कॉलेज में माहौल मिलने के बाद मैंने लैंग्वेज पर और मेहनत की और अब नतीजा सामने है.”
जीएलए यूनिवर्सिटी के डॉ. अनूप कुमार गुप्ता बताते हैं, ''इंडस्ट्री भी अब आउटकम पर ही ज्यादा ध्यान दे रही है क्योंकि इससे ही छात्रों की असल क्षमता की परख होती है.” उनके आउटकम को निखारने के लिए ही श्रीरामस्वरूप मेमोरियल इंजीनियरिंग कॉलेज ने छात्रों के मूल्यांकन का खास तरीका ईजाद किया है.
इसमें इस पर नजर रखी जाती है कि किसी विषय या क्षेत्र में छात्र कहां ठहर रहा है. कॉलेज के डायरेक्टर पंकज अग्रवाल बताते हैं, ''अगर हम छात्रों को यह बताने में सफल हो जाते हैं कि इंडस्ट्री की मांग के मुताबिक उनकी परफॉर्मेंस में क्या गुंजाइश है तो वे मेहनत करने के लिए प्रेरित होते हैं और इसी से अच्छे नतीजे भी आते हैं.”

(अंबालिका इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी में कूका रोबोटिक्स ट्रेनिंग लैब)
लैब से बन रही पहचान
लखनऊ के श्रीरामस्वरूप मेमोरियल इंजीनियरिंग कॉलेज से इस साल बीटेक फस्र्ट ईयर की परीक्षा पास करने वाली 20 वर्षीया मोनिका शर्मा जब पहली बार अपनी इलेक्ट्रिकल लैब में गई थीं तो यहां पर फैले तारों के मकडज़ाल, बे्रक बोल्ट, फंक्शन जनरेटर और सीआरओ को देखकर घबरा गई थीं.
वे बताती हैं, ''बाजार में बिकने वाली खूबसूरत रेडीमेड किट की जगह लैब में मेरा सामना बिजली के बिखरे सामान से हुआ. धीरे-धीरे इन सामान को जोड़कर हमने खुद से किट तैयार की और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रयोग शुरू किए. इससे हमें इंजीनियरिंग के छोटे से छोटे सिद्धांत बखूबी समझ आ गए हैं.”
असल में आज से दस साल पहले जब यूपी में तेजी से इंजीनियरिंग कॉलेज खुले तो अचानक मांग देखकर कई कंपनियों ने अलग-अलग इंजीनियरिंग लैब की रेडीमेड किट बाजार में उतार दी. इस किट से प्रैक्टिकल करने में छात्र को कुछ भी सीखने को नहीं मिलता.
वाराणसी के एसएमएस गु्रप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन एम.पी. सिंह कहते हैं, ''बगैर स्तरीय लैब के अच्छे इंजीनियर पैदा नहीं किए जा सकते और लैब में बांटे जाने वाले ज्ञान को समय सीमा में नहीं बांधा जा सकता. इसलिए किसी भी कॉलेज में एजुकेशन का स्तर इस बात से तय होता है कि वहां के छात्र लैब में कितना समय गुजारते हैं.”

(जीएलएल यूनिवर्सिटी में लैब में काम करते छात्र)
रिसर्च को लगे पंख
इंजीनियरिंग कॉलेजों ने जैसे ही क्वालिटी एजुकेशन के लिए कम से कम एमटेक डिग्रीधारी शिक्षकों की भर्ती शुरू की रिसर्च के लिए माहौल बनना शुरू हो गया. कॉलेजों को यह समझ् में आ गया है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर में भले भी इनवेस्ट कम किया जाए लेकिन शिक्षकों की गुणवत्ता के लिए पैसे खर्च करना अब फायदे का सौदा है.
टाटा कंसल्टेंसी सर्विस (टीसीएस) के मुख्य सलाहकार जयंत कृष्ण बताते हैं, ''इंजीनियरिंग कॉलेजों के बीच लगातार बढ़ रही प्रतिस्पर्धा ने रिसर्च पर ध्यान केंद्रित कर दिया है. शिक्षकों को पढ़ाने के साथ रिसर्च की सुविधाएं भी दी जा रही हैं तो छात्रों को भी छोटे-छोटे प्रोजेक्ट के जरिए रिसर्च के शुरुआती तौर-तरीकों से वाकिफ कराया जा रहा है.”
प्रवीर सिंह इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (पीएसआइटी) छात्रों को किसी भी विषय में दिए गए प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए आर्थिक मदद मुहैया करा रहा है. इसी तरह मथुरा की जीएलए यूनिवर्सिटी ने अपने यहां 25 लाख रु. का 'रिसर्च फंड’ बनाया है जिससे छात्रों को आर्थिक मदद दी जा रही है. इससे बड़ी संख्या में टीचर और छात्र रिसर्च के लिए प्रेरित हो रहे हैं.
हालांकि यूपीटीयू का अभी अपना रिसर्च सेंटर नहीं है. छात्र और टीचर यहां रजिस्ट्रेशन कराकर अपने कॉलेज में रिसर्च करते हैं. 2012 में यूपीटीयू में पीएचडी में रजिस्ट्रेशन कराने वाले छात्रों की संख्या 170 के करीब थी जो 2013 में 400 को पार कर गई. रिसर्च के लिए बने महौल को और असरदार बनाने के लिए यूपीटीयू टीचर्स टीचिंग फेलो योजना की शुरुआत करने जा रही है.
इसमें हर साल करीब विभिन्न इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने वाले या रिसर्च करने वाले 100 टीचर्स को यूनिवर्सिटी फेलोशिप देगी. इसकी राशि उतनी ही होगी जितनी एक लेक्चरर या असिस्टेंट प्रोफेसर का वेतन होता है. यह फेलोशिप कम-से-कम तीन साल तक दी जाएगी. इनका चयन एक परीक्षा के जरिए किया जाएगा. यूपीटीयू के रजिस्ट्रार पवन गंगवार बताते हैं, ''अब टीचर्स को यह दुख नहीं होगा कि पढ़ाने के साथ वे रिसर्च नहीं कर पा रहे या फिर रिसर्च कर रहे हैं लेकिन पढ़ाने का अनुभव नहीं मिल पा रहा है.”
इन प्रेरक दशाओं में इस बार यूपीटीयू में रिसर्च करने वालों की संख्या 800 के पार हो जाने की उम्मीद है. इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (आइआइए) के प्रदेश उपाध्यक्ष सुनील वैश्य बताते हैं, ''उत्तर प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेजों में रिसर्च करने वालों की संख्या बीटेक के पांच लाख छात्रों की तुलना में काफी कम है. यह तब बढ़ेगी जब हर कॉलेज में न सिर्फ रिसर्च बल्कि पोस्ट ग्रेजुएशन प्रोग्राम भी तेजी से शुरू होंगे.”
हर तरह के मौके
छात्रों की प्रतिभा निखारने और वैल्यू एडिशन करने में कॉलेजों में होने वाली कोर्स से इतर सांस्कृतिक और दूसरी गतिविधियों की भी बहुत बड़ी भूमिका है. अगर छात्र खुश रहेंगे तो उनमें नई ऊर्जा का संचार होगा. यही सकारात्मक ऊर्जा छात्र के कामकाज को और अधिक प्रभावी बनाने में मदद करती है. करीब सभी बड़े संस्थान नियमित रूप से अब अपने यहां ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देने लगे हैं.
जीएलए ग्रुप ऑफ कॉलेजेज के प्रमुख नारायण दास अग्रवाल बताते हैं, ''इंडस्ट्री की मांग में भी परिवर्तन हुआ है. अब किसी छात्र में सिर्फ अच्छे टीम लीडर के गुण ही नहीं परखे जाते बल्कि यह भी देखा जाता है कि उसमें एक अच्छा टीम मेंबर बनने के गुण हैं कि नहीं.”
श्रीरामस्वरूप मेमोरियल इंजीनियरिंग कॉलेज में यूफिनी और स्टेप म्युजिक क्लब, ड्रामा क्लब ड्रैकुला, फोटोग्रॉफी क्लब, रोबोटिक क्लब जैसी गतिविधियों ने छात्रों में पर्सनेलिटी डेवलपमेंट को नया आयाम दिया है. पंकज अग्रवाल बताते हैं, ''हमारे कॉलेज में सारी व्यावसायिक गतिविधियां छात्रों के जरिए कराई जाती हैं. इनमें बाहर की किसी संस्था की मदद नहीं ली जाती. कई बार छात्रों से गलती हो जाती है लेकिन इसी से वे सीखते भी हैं. यहां छात्रों को अपने उन सारे शौक को पूरे करने की छूट है जो वे इससे पहले पढ़ाई के दबाव के चलते नहीं पूरा कर पाए हैं.”
बरेली के श्री राममूर्ति स्मारक कालेज ऑफ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी के छात्र एरोनॉटिक्स क्लब, सिनर्जी क्लब, रोबोटिक क्लब जैसे दो दर्जन क्लबों का संचालन कर रहे हैं. इन क्लबों की गतिविधियों को कॉलेज को संचालित करने वाले एसआएमएस ट्रस्ट से आर्थिक मदद मिलती है. इसी तरह वाराणसी का एसएमएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस छात्रों में भारतीय संस्कृति के गुण और संस्कार को निखारकर उसकी प्रतिभा को नया आयाम देने की कोशिश में लगा हुआ है. यहां चल रहे स्प्रिचुएलिटी सेंटर फॉर ह्यूमन एनरिचमेंट में छात्रों को पढ़ाई के साथ भारतीय संस्कृति और संस्कारों की भी शिक्षा दी जाती है.
संस्थान के कार्यकारी सचिव डॉ. एम.पी. सिंह बताते हैं, ''टेक्निकल एजुकेशन के साथ अध्यात्म का प्रशिक्षण पाने वाले छात्र दूसरों के मुकाबले कहीं ज्यादा धैर्यवान और संवेदनशील होते हैं. अपनी इस विशेषता के जरिए यह नौकरी के दौरान न केवल दूसरों से काम ले पाते हैं बल्कि खुद भी काफी काम करके मिसाल पेश करते हैं.”

(एसआरएमएस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के कैंपस में छात्र)
प्लेसमेंट की आसान राह
वैश्विक आर्थिक मंदी की वजह से पिछले तीन साल से उत्तर प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेजों में बड़ी कंपनियां प्लेसमेंट के लिए नहीं आ रही थीं. लेकिन इस साल कॉग्निजेंट और एसेंशियल जैसी कंपनियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. लोकसभा चुनाव के बाद शेयर मार्केट में जिस तरह से तेजी दिखाई दी उसने इंडस्ट्री की मनोदशा की ओर इशारा किया.
इसी अनुकूल माहौल में इंडस्ट्री को टेक्निकल एजुकेशन में प्रशिक्षित युवाओं की जरूरत पड़ी और उन्होंने उत्तर प्रदेश की ओर रुख किया. प्लेसमेंट को आकर्षित करने के लिए इंजीनियरिंग कॉलेज कई तरकीब लगा रहे हैं. पीएसआइटी कानपुर, जीएलए यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में आइटी की अग्रणी कंपनी इन्फोसिस कैंपस कनेक्ट पार्टनर जैसा कार्यक्रम चला रही है.
आइबीएम ने पीएसआइटी कानपुर को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस घोषित किया है. आइबीएम समय-समय पर सॉफ्टवेयर कंपीटिशन का आयोजन करती है जिसमें बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग के छात्र हिस्सा लेते हैं. इससे छात्रों को इंडस्ट्री में हो रहे बदलाव की जानकारी हो जाती है. यह कंपनी कैंपस इंटरव्यू करने के लिए इंजीनियरिंग कॉलेज आती है तो छात्रों में किसी प्रकार की घबराहट नहीं होती और वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं.
प्लेसमेंट और इंडस्ट्री की मांग को ध्यान में रखते हुए ही यूपीटीयू ने तीन स्तरों पर कोर्स में बदलाव किया है. पिछले वर्ष यूनिवर्सिटी ने बीटेक फर्स्ट ईयर का कोर्स बदला था. 2014 में सेकंड ईयर का कोर्स बदलने जा रहा है. इंडस्ट्री ट्रेंड के मुताबिक कोर्स में इंटर्नशिप और ट्रेनिंग को महत्व दिया गया है और इसके बाद सबसे ज्यादा जोर स्टुडेंट की 'फिनिशिंग’ पर दिया जा रहा है.
नतीजतन इस साल यूपीटीयू के सभी अच्छे निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में औसतन 60 से 70 फीसदी छात्रों को प्रतिष्ठित कंपनियों में नौकरी मिली है. छात्रों को रोजगार मिलने की संभावनाएं उनके व्यक्तित्व विकास पर भी निर्भर करती हैं और बगैर आकर्षक कम्युनिकेशन स्किल के व्यक्तित्व विकास संभव नहीं है.
कम्युनिकेशन दक्षता के लिए भाषा पर पकड़ जरूरी है और ज्यादातर संस्थानों का ध्यान अब इस बुनियादी जरूरत की तरफ केंद्रित हो चुका है. श्री राममूर्ति स्मारक कालेज ऑफ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी के चेयरमैन देवमूर्ति अग्रवाल बताते हैं, ''छात्रों में कम्युनिकेशन स्किल को बढ़ाने के लिए हमने अपने संस्थान में लैंग्वेज लैब की स्थापना की है.”
इंजीनियरिंग कॉलेजों ने काफी बेहतर मानव संसाधन तैयार कर देश और विदेश की बड़ी कंपनियों के सामने विकल्प प्रस्तुत किया है. अब बारी सरकार की है. राज्य में इंडस्ट्री फ्रेंड्ली माहौल से निजी कंपनियों को आकर्षित कर बड़ी संख्या में प्रदेश के भीतर ही रोजगार बढ़ सकता है. इससे नौकरी की तलाश में यूपी के इंजीनियरों का पलायन रुकेगा और यहीं से यूपी के अच्छे दिनों की शुरुआत भी होगी.
छात्रों के पसंदीदा ठिकाने
टेक्निकल एजुकेशन क्षेत्र के नौ ऐसे संस्थान जो इन्फ्रास्ट्रक्चर और पढ़ाई की वजह से मांग में हैं
श्री रामस्वरूप मेमोरियल ग्रुप ऑफ प्रोफेशनल कॉलेजेज, लखनऊ
कोर्स: बीटेक, बीबीए, बीसीए, एमबीए, एमसीए
खूबियां: शानदार लैब, आइआइटी और एनआइआइटी के पूर्व छात्रों से भरी फैकल्टी, एजुकेशन में इनोवेशन का समावेश
पढ़ाई के साथ-साथ छात्रों में वैल्यू एडिशन के लिए संस्कृति, खेल और रोबोटिक्स से जुड़ी कई तरह की गतिविधियां निरंतर चलती हैं. 'टर्म पेपर’ के माध्यम से छात्रों और शिक्षकों के बीच कंपीटिशन का माहौल तैयार किया जाता है.
अगला पड़ाव: इंटरनेशनल इंडस्ट्री के मुताबिक पढ़ाई, रिसर्च का दायरा बढ़ाना.
''हमारे छात्र पढ़ाई के दौरान सख्त मूल्यांकन प्रक्रिया से गुजरते हैं जिससे वे अपनी प्रतिभा के साथ सौ फीसदी न्याय कर पाते हैं.” —पंकज अग्रवाल, डायरेक्टर
जीएलए यूनिवर्सिटी, मथुरा
कोर्स: बीटेक, एमटेक, बीबीए, एमबीए, बीफार्मा, बायोटेक्नोलॉजी, पीएचडी, अन्य कोर्स
खूबियां: सेल्फ फाइनेंस यूनिवर्सिटी में सबसे बड़ा आवासीय कैंपस, रिसर्च के लिए प्रतिष्ठित संस्थानों से अनुबंध, वाइ-फाइ कैंपस.
यहां की छात्रा संकृप्ति चौधरी ने कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज में महिला अभ्यर्थियों में पहला स्थान प्राप्त किया. रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए 25 लाख रु. के फंड की व्यवस्था.
अगला पड़ाव: छात्रों के वैल्यू एडिशन के लिए कई नए कार्यक्रम की शुरुआत करना.
''हम ग्लोबल इंडस्ट्री की मांग के मुताबिक छात्रों को प्रशिक्षित करते हैं जिससे उनका
अच्छा प्लेसमेंट होता है.” —नारायण दास अग्रवाल, चांसलर
यूनाइटेड ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, इलाहाबाद
कोर्स: बीटेक, एमटेक, एमसीए, बीबीए, बीसीए, बीफार्मा और पीजीडीसीएम
खूबियां: हाइटेक साधनों से शिक्षा, छात्रों के लिए ऐक्टिव इनोवेशन सेंटर
अनुशासन और क्लास में छात्र की उपस्थिति पर विशेष जोर. यूपीपीसीएस और गे्रजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग में इस साल यहां के छात्रों ने पहले पांच में जगह बनाई.
अगला पड़ाव: छात्रों के एक्सचेंज प्रोग्राम का दायरा बढ़ाना.
''हमारे छात्र हर तरह की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं. इसीलिए ये यूपीपीसीएस, गेट जैसी परीक्षाओं की मेरिट में दिखते हैं.” —सतपाल गुलाटी, वाइस चेयरमैन
प्रवीर सिंह इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (पीएसआइटी), कानपुर
कोर्स: बीटेक, बीफार्मा, एमफार्मा, एमबीए, एमसीए, एमटेक
खूबियां: 100 एकड़ में फैला वाइ-फाइ सुविधा वाला कैंपस, 1,000 कंप्यूटर वाली कंप्यूटर लैब
छात्रों की ट्रेनिंग के लिए अलग से सेल, टीचर और छात्रों को ट्रेनिंग देने के लिए आइटी कंपनी इन्फोसिस कॉलेज की कैंपस कनेक्ट पार्टनर. आइबीएम ने पीएसआइटी को सेंटर ऑफ एक्सिलेंस घोषित किया है.
अगला पड़ाव: छात्रों की ट्रेनिंग के लिए देश और विदेश की सभी प्रतिष्ठित कंपनियों से अनुबंध.
''हम छात्रों को अनुशासित और हरफनमौला बनाते हैं. इससे वे कहीं ज्यादा उत्साही और आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं.”
—प्रवीर सिंह, चेयरमैन
श्री राममूर्ति स्मारक कालेज ऑफ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलोजी, बरेली
कोर्स: बीटेक, एमटेक, एमबीए, एमसीए, एम.फार्मा और अन्य कोर्सेज
खूबियां: 300 ई-जर्नल की सुविधा वाली सेंट्रल लाइब्रेरी, वाइ-फाइ कैंपस, अंतरराष्ट्रीय मानकों वाली लैब, स्पोर्ट्स पर खास ध्यान.
लैब में छात्रों की गतिविधियों पर खास ध्यान. 150 से अधिक लैब माड्ïयूल की व्यवस्था. अगला पड़ाव: छात्रों को ज्यादा से ज्यादा 'इनोवेशन’ के लिए प्रेरित करना.
''छात्र के साथ टीचर ट्रेनिंग पर भी ध्यान देते हैं, इंडस्ट्री में छात्रों की यही यूएसपी है.”—देवमूर्ति अग्रवाल, चेयरमैन
बाबू बनारसी दास यूनिवर्सिटी, लखनऊ
कोर्स: बीटेक, एमटेक, एमसीए बीफार्मा
खूबियां: विदेशी यूनिवर्सिटी के सहयोग से डुअल डिग्री प्रोग्राम की सुविधा, आइआइटी और एमएनआइटी से जुड़ी फैकल्टी
फैलोशिप की व्यवस्था, शिक्षकों, छात्रों के अलावा संस्थान के टेक्निकल स्टाफ को अपग्रेड करने के लिए समय-समय पर नेशनल और इंटरनेशनल स्तर के सेमिनार.
''हमारे छात्रों को इंडस्ट्री की चुनौतियों के हिसाब से ट्रेनिंग मिलती है. पर्सनेलिटी डेवलपमेंट पर फोकस से निखार आता है.”—डॉ. अखिलेश दास, चांसलर
अंबालिका इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ऐंड टेक्नोलॉजी, लखनऊ
कोर्स: बीटेक, एमबीए, डिप्लोमा इन इंजीनियरिंग
खूबियां: एंटरप्राइज रिलेटेड प्रोग्रामिंग के जरिए संस्थान से जुड़ी हर जानकारी वेबसाइट पर मौजूद, 'इनोवेशन’ पर सबसे ज्यादा जोर
ईआरपी के जरिए अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई पर नजर रख सकेंगे. फैकल्टी मेंबर से संवाद की व्यवस्था. माइक्रोसॉफ्ट ने संस्थान को सेंटर ऑफ एक्सिलेंस के लिए चुना है.
अगला पड़ाव: कॉलेज के पोर्टल पर ऑडियो-वीडियो के जरिए इंग्लिश लर्निंग क्लास की शुरुआत करना.
''विश्वस्तरीय माहौल के जरिए अपने छात्र को ग्लोबल चुनौतियों का सामना करने को तैयार करते हैं. नए तौर-तरीके हमारी पहचान हैं.” —अंबिका मिश्र, एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर
एसआर ग्रुप ऑफ इंस्टीट्ïयूशंस, झांसी
कोर्स: बीटेक, एमटेक, एमबीए, एमसीए, बीबीए, बीसीए, बीएससी—बायोटेक्नोलॉजी
खूबियां: बुंदेलखंड में टेक्निकल एजुकेशन का पहला और अग्रणी केंद्र, मेधावी छात्रों के लिए नगद पुरस्कार की व्यवस्था. क्वालिटी टीचिंग पर सबसे ज्यादा जोर, टीचर के चयन के लिए आइआइटी, एनआइटी के विशेषज्ञों के पैनल की मदद, नोएडा, कानपुर, दिल्ली जैसे 'एजुकेशन हब’ में इंटरव्यू.
अगला पड़ाव: प्लेसमेंट के लिए अधिक से अधिक कंपनियों से करार.
''हमारा कॉलेज मेधावी छात्रों की हर संभव मदद करता है. हम पैसे की कमी से प्रतिभा को मुरझने नहीं देते.” —सुरेंद्र राय, चेयरमैन
एसएमएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, वाराणसी
कोर्स: बीटेक, बीसीए, एमबीए, एमसीए
खूबियां: निजी क्षेत्र में यूपी का सबसे पुराना तकनीकी शिक्षण संस्थान, अध्ययन-अध्यापन में आध्यात्मिक तरीकों का समावेश.
नए प्रायोगिक तरीकों से छात्रों को अपडेट करना. कॉलेज के लखनऊ कैंपस के डायरेक्टर डॉ. भरतराज सिंह ने हवा से चलने वाली मोटरसाइकिल बनाकर 'लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ में जगह बनाई.
अगला पड़ाव: रिसर्च में तेजी लाना, प्लेसमेंट सेल को मजबूती देना.
''हमारे छात्र न सिर्फ टेक्निकल एजुकेशन में अग्रणी बल्कि भारतीय संस्कारों से भी ओत-प्रोत होते हैं.” —डॉ. एम. पी. सिंह, कार्यकारी सचिव

