सयाना कूटनीतिक कदम उठाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ संकेत दिया है कि वे बेहद सहजता के साथ एक प्रचारक से कुशल राजनेता की भूमिका में आ चुके हैं. उन्होंने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के आठ सदस्य देशों को शपथ ग्रहण समारोह का न्योता भेजा था. जिस उत्साह के साथ पड़ोसी देशों ने निमंत्रण को स्वीकार किया, उसी से पता चलता है कि वे उनकी बात को कितनी ज्यादा तवज्जो देते हैं.
अगला दिन अनाधिकारिक सार्क सम्मेलन में तब्दील हो गया. इस दिन मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ समेत समारोह के लिए आए सभी मेहमानों से मुलाकात की. भारत के पश्चिम में स्थित पड़ोसी से गर्मजोशी भरे संबंधों की खातिर मोदी ने सारी लफ्फाजी से तौबा कर ली, जो चुनाव से पहले तक वे करते आए थे. उस नेता के लिए यह शुरुआत उल्लेखनीय थी, जिसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर असाधारण रूप से तिरस्कार का सामना करना पड़ा हो.
अमेरिका के विदेश विभाग ने गुजरात दंगों के बाद 2005 में मोदी को ब्लैकलिस्ट कर दिया था. नेता को काली सूची में डालने का यह अपनी तरह का संभवतः पहला मामला था. पश्चिमी मीडिया का शत्रुवत रवैया और यूरोपीय संघ के अनाधिकारिक प्रतिबंध के बाद पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया के चीन, जापान और सिंगापुर ही ऐसे देश बचे थे, जहां मोदी जा सकते थे और इन्वेस्टमेंट के लिए कोशिश कर सकते थे.
पश्चिमी दुनिया का मोदी को लेकर नजरिया उस समय तेजी से बदलने लगा जब प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी ने उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित किया क्योंकि इससे वे भारत में कारोबारी माहौल को संभावित रूप से प्रभावित कर सकते थे. अक्तूबर, 2012 में ब्रिटेन के राजदूत मोदी से मुलाकात करने गांधीनगर पहुंचे.
दिसंबर, 2012 में गुजरात में लगातार तीसरी जीत मिलने के बाद मोदी का महत्वपूर्ण भूमिका में आना न सिर्फ तार्किक रूप से सही था, बल्कि सही मायने में अपरिहार्य भी था. जनवरी, 2013 में जर्मनी के दूतावास ने मोदी के लिए भोज का आयोजन किया और इसके साथ ही उन पर से यूरोपीय संघ का अनाधिकारिक प्रतिबंध भी हट गया.
वैश्विक परिदृश्य में मोदी जिस तेजी से छाए हैं, ठीक उतनी ही तेजी से कांग्रेस के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख भी गिरी है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2010 में पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में कहा था, ‘‘जब मनमोहन सिंह बोलते हैं तो दुनिया सुनती है.’’ इस तारीफ के महज दो साल बाद ही उनकी साख में उल्लेखनीय गिरावट आनी शुरू हो गई. उनकी आवाज कमजोर पडऩे लगी. अकर्मण्यता, घोटालों और महंगाई से बुरी तरह से लडख़ड़ा रही और दागदार सरकार पक्षाघात की शिकार हो चुकी थी.
तभी मोदी एक आकर्षक विकल्प के रूप में नजर आने लगेः आर्थिक मोर्चे पर दृढ़ सोच और कारोबारी हितों को साथ लेकर चलने वाला नेता जिसे बीते तीन दशक में पहली बार देश की जनता ने निर्णायक जनादेश दिया था. राष्ट्रपति ओबामा उन्हें वाशिंगटन का बुलावा भेज चुके हैं. चीन के प्रधानमंत्री शिन जिनपिंग जल्द ही दिल्ली आने वाले हैं. जापान चाहता है कि मोदी बतौर प्रधानमंत्री पहले अंतरराष्ट्रीय दौरे पर टोक्यो आएं. दुनिया तक संदेश पहुंच चुका है. भारत कारोबार के लिए पूरी तरह से खुला है.
अगला दिन अनाधिकारिक सार्क सम्मेलन में तब्दील हो गया. इस दिन मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ समेत समारोह के लिए आए सभी मेहमानों से मुलाकात की. भारत के पश्चिम में स्थित पड़ोसी से गर्मजोशी भरे संबंधों की खातिर मोदी ने सारी लफ्फाजी से तौबा कर ली, जो चुनाव से पहले तक वे करते आए थे. उस नेता के लिए यह शुरुआत उल्लेखनीय थी, जिसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर असाधारण रूप से तिरस्कार का सामना करना पड़ा हो.
अमेरिका के विदेश विभाग ने गुजरात दंगों के बाद 2005 में मोदी को ब्लैकलिस्ट कर दिया था. नेता को काली सूची में डालने का यह अपनी तरह का संभवतः पहला मामला था. पश्चिमी मीडिया का शत्रुवत रवैया और यूरोपीय संघ के अनाधिकारिक प्रतिबंध के बाद पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया के चीन, जापान और सिंगापुर ही ऐसे देश बचे थे, जहां मोदी जा सकते थे और इन्वेस्टमेंट के लिए कोशिश कर सकते थे.
पश्चिमी दुनिया का मोदी को लेकर नजरिया उस समय तेजी से बदलने लगा जब प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी ने उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित किया क्योंकि इससे वे भारत में कारोबारी माहौल को संभावित रूप से प्रभावित कर सकते थे. अक्तूबर, 2012 में ब्रिटेन के राजदूत मोदी से मुलाकात करने गांधीनगर पहुंचे.
दिसंबर, 2012 में गुजरात में लगातार तीसरी जीत मिलने के बाद मोदी का महत्वपूर्ण भूमिका में आना न सिर्फ तार्किक रूप से सही था, बल्कि सही मायने में अपरिहार्य भी था. जनवरी, 2013 में जर्मनी के दूतावास ने मोदी के लिए भोज का आयोजन किया और इसके साथ ही उन पर से यूरोपीय संघ का अनाधिकारिक प्रतिबंध भी हट गया.
वैश्विक परिदृश्य में मोदी जिस तेजी से छाए हैं, ठीक उतनी ही तेजी से कांग्रेस के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख भी गिरी है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2010 में पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में कहा था, ‘‘जब मनमोहन सिंह बोलते हैं तो दुनिया सुनती है.’’ इस तारीफ के महज दो साल बाद ही उनकी साख में उल्लेखनीय गिरावट आनी शुरू हो गई. उनकी आवाज कमजोर पडऩे लगी. अकर्मण्यता, घोटालों और महंगाई से बुरी तरह से लडख़ड़ा रही और दागदार सरकार पक्षाघात की शिकार हो चुकी थी.
तभी मोदी एक आकर्षक विकल्प के रूप में नजर आने लगेः आर्थिक मोर्चे पर दृढ़ सोच और कारोबारी हितों को साथ लेकर चलने वाला नेता जिसे बीते तीन दशक में पहली बार देश की जनता ने निर्णायक जनादेश दिया था. राष्ट्रपति ओबामा उन्हें वाशिंगटन का बुलावा भेज चुके हैं. चीन के प्रधानमंत्री शिन जिनपिंग जल्द ही दिल्ली आने वाले हैं. जापान चाहता है कि मोदी बतौर प्रधानमंत्री पहले अंतरराष्ट्रीय दौरे पर टोक्यो आएं. दुनिया तक संदेश पहुंच चुका है. भारत कारोबार के लिए पूरी तरह से खुला है.

