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कैसा होगा हिंदुस्तान के नए कंट्रोल रूम का नक्शा

दस साल के अंतराल के बाद इस देश को चलाने के लिए एक नया पीएमओ आकार लेने की तैयारी में जुटा है. गुजरात में नरेंद्र मोदी की कार्यशैली इस पीएमओ की रूपरेखा तय कर सकती है.

अपडेटेड 9 जून , 2014
काम के प्रति दीवानगी की हद तक पहुंचे प्रधानमंत्री का नया दफ्तर किस तरह का होगा? हालांकि अभी नरेंद्र मोदी के पीएमओ के पुनर्गठन का काम चल ही रहा है. लेकिन चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे मोदी के गांधीनगर स्थित कार्यालय पर एक नजर डालें तो काफी हद तक इस सवाल का जवाब मिल सकता है.

शुरुआत यहां से होती है. सबसे पहले उच्च स्तर पर तीन नियुक्तियां तो बिल्कुल तय हैं- 1967 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी नृपेंद्र मिश्र प्रधानमंत्री के नए प्रधान सचिव होंगे. इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक ए.के. डोभाल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनेंगे. मोदी के सबसे भरोसेमंद 1988 बैच के आइएएस अधिकारी ए.के. शर्मा उनके विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) होंगे.

शर्मा गुजरात में मोदी के अतिरिक्त प्रधान सचिव थे. मोदी के दो निजी सहायक ओम प्रकाश सिंह चंदेल और दिनेश ठाकुर अब पीएमओ में पहुंच गए हैं. ये दोनों 2001 में पहली बार मोदी के मुख्यमंत्री बनने के समय से ही उनके साथ जुड़े रहे हैं. इसके अलावा गुजरात में मोदी के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) जगदीश ठक्कर, को मुख्य जनसंपर्क अधिकारी बनाए जाने की भी उम्मीद है. ठक्कर मोदी का प्रेस नोट तैयार करने में माहिर हैं.

दो पूर्व मुख्य सचिवों समेत कई वरिष्ठ नौकरशाहों का यह मानना है कि प्रधानमंत्री पीएमओ में फटाफट नियुक्तियां करने की हड़बड़ी में बिल्कुल नहीं हैं. इन दोनों वरिष्ठ अधिकारियों ने 2001 से गुजरात में मोदी के काम करने के तरीके को करीब से देखा है. उनका मानना है कि पहले वे दिल्ली में नौकरशाही और उसकी कार्यशैली को समझने की कोशिश करेंगे. फिर कहीं जाकर मोदी उन अधिकारियों की पहचान करेंगे, जिन्हें वे पीएमओ में लेना चाहेंगे.

गुजरात कैडर के एक आइएएस अधिकारी कहते हैं, ‘‘मोदी के काम करने के खास अंदाज को देखते हुए यह साफ जाहिर है कि वे पीएमओ में सही नियुक्तियां करेंगे. भले ही इस काम में उन्हें कुछ समय लग जाए. मोदी की कार्यशैली कुछ ऐसी है कि वे चाहते हैं कि नौकरशाही उनकी सोच को समझे और फिर उसे प्रभावी ढंग से लागू करे. जल्दी ही अपने-अपने विभागों के प्रजेंटेशन देने का काम शुरू होने वाला है. वे इस मौके का इस्तेमाल सही आदमी को चुनने के लिए कर सकते हैं.’’

गुजरात के पूर्व मुख्य सचिव डी. राजगोपालन वाइब्रेंट गुजरात, निवेश सम्मेलन और कन्या शिक्षा तथा ई-ग्राम जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों पर काम कर चुके हैं. राजगोपालन कहते हैं कि नए प्रधानमंत्री यह चाहेंगे कि उनका दफ्तर सभी राज्यों के साथ पूरा तालमेल बनाकर रखे. खास तौर पर अगर उन्हें देश भर में अपने गुजरात मॉडल की नकल करनी है तो इसके लिए यह तालमेल और भी जरूरी है.

राजगोपालन कहते हैं कि पीएमओ में नियुक्तियों के लिए वे रोजगार पैदा करने के अपने मॉडल और शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को भी ध्यान में रख सकते हैं. वे कहते हैं, ‘‘निवेश को आकर्षित करने और बुनियादी ढांचा खड़ा करने के लिए वे व्यवस्था बनाएंगे और  फिर उसे अपने आप काम करने के लिए मुक्त कर देंगे.

लेकिन नए रोजगार पैदा करने और स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के लिए उन्हें ऐसे अधिकारियों की जरूरत होगी, जो उनके मन को पढ़ सकें. ऐसे अधिकारी, जो मंत्रालयों के कामकाज पर नियमित रूप से नजर रखते हुए उन्हें लक्ष्य को हासिल करने में मदद कर सकें.’’

गांधीनगर में मोदी के पुराने मुख्यमंत्री कार्यालय पर नजर डालें तो वहां अलग-अलग तरह के अधिकारी दिखाई देते थे. अब पीएमओ में भी यही मिश्रण देखा जा सकता है. गांधीनगर का उनका पुराना दफ्तर कठोर परिश्रम का प्रतीक था. चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी से लेकर आइएएस अधिकारी तक सभी सुबह 10 बजे से लेकर रात 8 बजे तक काम करते थे.

सीएमओ में विभागों को चार आइएएस अधिकारियों-के. कैलाशनाथन, जी.सी. मुर्मु, ए.के. शर्मा और विजय नेहरा-के बीच बांटा गया था. हर अधिकारी संबंधित विभाग के सचिव को मुख्यमंत्री की सोच और उनके लक्ष्य से परिचित कराता था और उनके कामकाज पर नजर रखता था.  

दिल्ली की नौकरशाही में एक बात नई होगी और वह है विभागों के बीच तालमेल के लिए होने वाली बैठकें. राजगोपालन याद करते हैं कि 2003 में मोदी के समय गुजरात प्रशासन में आपसी समन्वय के लिए ये बैठकें तीन महीने से भी ज्यादा चला करती थीं. इन बैठकों के कारण विभागों का कामकाज सहज ढंग से चलता था. गुजरात में मोदी के साथ काम कर चुके एक अन्य मुख्य सचिव कहते हैं, ‘‘उनका हर कदम बहुत सोचा-समझा होता है. हर कदम का मकसद बेहतरीन नतीजा हासिल करना होता है. वे कभी भी जल्दबाजी और हड़बड़ी में कोई काम नहीं करते.’’

प्रधान सचिव के रूप में नृपेंद्र मिश्र का चुनाव करने में बीजेपी के कुछ वरिष्ठ नेता, अधिकारी और मोदी के निकट सहयोगी अमित शाह की भूमिका काफी अहम थी. मोदी किसी ईमानदार, सक्षम और शारीरिक रूप से फिट व्यक्ति को प्रधान सचिव बनाना चाहते थे. इस पद के लिए रिटायर हो चुके तीन प्रतिष्ठित अधिकारियों के नामों पर विचार किया गया था-पूर्व गृह सचिव अनिल बैजल, दीपक भट्टाचार्य और नृपेंद्र मिश्र. ज्यादातर लोगों का मानना था कि अपनी बुद्धिमत्ता, ईमानदारी और विभिन्न क्षेत्रों में काम के अनुभव के बावजूद बैजल का नाम खारिज किया जाए क्योंकि एक जमाने में वे बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के काफी करीबी हुआ करते थे.

भट्टाचार्य का नाम उनके स्वास्थ्य के कारण खारिज कर दिया गया. मोदी को कठिन परिश्रम करवाने वाला व्यक्ति माना जाता है. पिछले साल उनके एक करीबी सहयोगी के पित्ताशय में पथरी हो गई, क्योंकि उन्हें देर रात तक काम करना पड़ता था.  वे मोदी के सीएमओ में 2001 से काम कर चुके थे. उन्हें तुरंत ऑपरेशन कराना पड़ा और उसके बाद से उन्हें हल्का काम दे दिया गया है.

मिश्र के पक्ष में यह बात महत्वपूर्ण रही कि उन्होंने रिटायर होने के बाद खुद कोई पद पाने की लालसा नहीं दिखाई. टेलीकॉम, वित्त, रसायन और उर्वरक जैसे मंत्रालयों में उनका काम भी बहुत अच्छा माना गया. पेशेवर तरीके से काम करने और अधीनस्थ अधिकारियों से अत्यंत कुशलता से काम लेने की काबिलियत ने मोदी को बहुत प्रभावित किया.

डोभाल की नियुक्ति 16 मई को चुनाव नतीजे आने से पहले ही अपेक्षित थी क्योंकि बीजेपी और संघ परिवार में उनकी अच्छी पहुंच है. हालांकि उनकी औपचारिक नियुक्ति होनी अभी बाकी है, जबकि मिश्र की नियुक्ति के लिए सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर दिया है. राष्ट्रीय सुरक्षा पर डोभाल के विचार न सिर्फ  मोदी, बल्कि पूरे संघ परिवार से मेल खाते हैं. आरएसएस समर्थक थिंक टैंक विवेकानंद फाउंडेशन के निदेशक के तौर पर वे संघ परिवार को राष्ट्रीय और आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों पर जानकारियां देते रहे हैं.

डोभाल आरएसएस के उस विस्तारित कार्यक्रम की देन हैं, जिसे संघ ने 15 साल पहले मोहन भागवत के आरएसएस के सर कार्यवाह बनने के बाद शुरू किया था. यह कार्यक्रम बड़े पदों पर बैठे लोगों को संघ से जोडऩे का काम करता है और उन्हें यह बताने की कोशिश करता है कि आएसएस जात-पात और संप्रदाय के दायरे से उठकर राष्ट्र का विकास करना चाहता है. अब इस कार्यक्रम के प्रमुख और आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव ने डोभाल को संघ परिवार के निकट लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

हालांकि मोदी के पीएमओ का पूरा चेहरा कुछ समय बाद ही पता चलेगा, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि यह अतीत से बिल्कुल अलग होगा. नए प्रधानमंत्री का मिशन साफ है.
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