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मोदी से अमेरिका की उम्मीद, चिंता और जिज्ञासा

मोदी से अमेरिका में उम्मीद, चिंता और जिज्ञासा है. माना जाता है कि सहज सहयोगी भले ही हमेशा सहमत न हों लेकिन अमेरिका भारत के उदय का समर्थन करेगा.

अपडेटेड 9 जून , 2014
भारत की वापसी्य्य, द वॉल स्ट्रीट जर्नल में यह घोषणा तब की गई थी, जब यह जाहिर हो गया था कि भारत के वोटरों ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को लोकसभा में बहुमत दे दिया है. इसने ‘‘अतुल्य भारत’’ के दिनों के साथ-साथ अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के उत्तरार्द्ध और मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल के दौरान चीन के साथ भारत की तुलना के दिनों की सुर्खियों की याद दिला दी.

चुनाव नतीजों की घोषणा होने के बाद अमेरिका में इस बारे में चर्चा होने लगी कि मोदी कैसे नेता हैं, कैसी सरकार बनेगी और वह सरकार किस तरह के भारत का नेतृत्व करेगी. भारत की ही तरह अधिकारियों, कारोबारियों, विशेषज्ञों और मीडिया में होने वाली इन चर्चाओं में जिज्ञासा, उम्मीद और चिंता सब का मिश्रण था.

अप्रैल में कॉमेडियन जॉन ऑलिवर ने भारत के चुनाव को पूरी तरह कवर न करने के लिए अमेरिकी मीडिया की भर्त्सना की थी, फिर भी इस बार अमेरिकी मीडिया की दिलचस्पी पहले से कहीं ज्यादा थी. अमेरिकी अखबारों में संपादकीय और लेखों तथा समाचारों और कॉमेडी शो में भी चुनावों की खूब चर्चा रही.

चुनाव नतीजे, मोदी सहित नामी हस्तियों की उपस्थिति, अमेरिकी शैली में प्रचार, सहज उपलब्ध सूचना, बड़ी संख्या में अमेरिकी संवाददाताओं की भारत में मौजूदगी और सोशल मीडिया ने मिलकर पहले से कहीं अधिक कवरेज कराई. नतीजे आने पर, खासकर बीजेपी की अभूतपूर्व जीत ने लोगों का ध्यान खूब खींचा.

मीडिया में सबसे प्रबल भाव प्रधानमंत्री मोदी के बारे में जिज्ञासा को लेकर रहा है. उनके बारे में चर्चा तो खूब हुई है, लेकिन जानकारी बहुत कम है. सवाल सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है कि मोदी अच्छी वृद्धि और सुशासन के अपने वादे पूरे कर पाएंगे या नहीं, बल्कि लोग यह भी जानना चाहते हैं कि वे कैसे प्रधानमंत्री होंगे, मतलब, व्यावहारिक, सुधारक या अति राष्ट्रवादी बाहुबली होंगे, सहनशील या असहिष्णु होंगे, अमेरिका को संदेह की दृष्टि से देखेंगे या अमेरिका के व्यावहारिक साझीदार होंगे?

कारोबार जगत का भाव काफी हद तक उम्मीदों भरा है. बीजेपी को मिले बहुमत ने यह भाव और प्रबल कर दिया है क्योंकि उम्मीद जगी है कि नई सरकार स्थिर होगी और नीति के मामले में निश्चित दिशा दे सकेगी. उम्मीद यह भी है कि कारोबार का माहौल सुधरेगा और सरकार आर्थिक सुधारों पर जोर देगी, जिससे सोई हुई भारतीय अर्थव्यवस्था हरकत में आएगी. लोग यह भी सोच रहे हैं कि दोनों सरकारों के बीच संबंधों में गर्माहट भले ही न आए, मोदी अमेरिकी कंपनियों पर इसका असर नहीं पडऩे देंगे.

हालांकि इस बात को लेकर चिंता भी है कि सरकार शायद अपेक्षाओं पर खरी न उतर सके. ऐसे सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या मोदी केंद्र में भी आर्थिक मोर्चे पर उतने असरदार साबित होंगे जितने गुजरात में थे, क्या कुछ राजनीति और अफसरशाही से जुड़ी बाधाएं अजेय साबित होंगी, और क्या भारत अपनी क्षमता को साकार कर दिखा सकेगा? कारोबार जगत ने मंत्रिपरिषद के गठन पर बारीकी से नजर रखी है और शुरुआती कदमों तथा आगामी बजट में नीतिगत संकेतों पर भी गौर करता रहेगा.

अमेरिकी अधिकारियों के लिए भी आशंका और चिंता की वजहें हैं. पिछले कुछ महीनों में भारत में कुछ समीक्षकों ने यह झंडा फिर उठा लिया कि अमेरिका भारत का सम्मान नहीं करता और उसे खड़े होने से रोकना चाहता है. लेकिन असल में अमेरिका में अधिकतर लोग भारत को कामयाब होते देखना चाहते हैं और ओबामा सरकार ने यह कहने से मुंह नहीं चुराया है. उसने साफ तौर पर कहा है कि अमेरिका मानता है कि कुल मिलाकर भारत का उदय, ‘‘अमेरिका के हितों के लिए...

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए...विश्व अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है.’’ इस बात को भी समझा जा रहा है कि भारत और अमेरिका हमेशा सहमत नहीं होंगे. फिर भी बार-बार कहा जा रहा है कि चाहे जो हो जाए, अमेरिका भारत के उदय का समर्थन करेगा और सभी दल इस पर एकमत हैं. इसलिए अमेरिकी सरकार एक, ‘‘सशक्त, विकसित और समावेशी भारत को देखना चाहेगी जो विश्व समुदाय के साथ खुलकर मिलता-जुलता है’’ और नरेंद्र मोदी ने इसका वादा किया है.

इस बात को लेकर सवाल और चिंताएं मौजूद हैं कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए मोदी के साथ अमेरिका के सीमित आधिकारिक संपर्क का असर क्या होगा. राष्ट्रपति ओबामा, विदेश मंत्री जॉन केरी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सूजन राइस ने तुरत-फुरत ऐलान कर दिया कि अमेरिका दोनों लोकतंत्रों के बीच मजबूत साझेदारी विकसित करते रहने के लिए नई सरकार के साथ काम करने को उत्सुक है.

सरकारी अधिकारी और बाहरी विशेषज्ञ, दोनों को अमेरिका के लिए मोदी के शुरुआती संकेत अनुकूल नजर आते हैं. मोदी ने हाल ही में ‘‘स्वाभाविक सहयोगी’’ शब्दों का इस्तेमाल किया है और जोर दिया है कि आपसी संबंध दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं. अमेरिका को इस बात में भी आपत्ति नहीं होगी कि भारत अपने अनेक सहयोगियों के साथ बेहतर संबंध विकसित करे और पूर्वी देशों के साथ अधिक ठोस संबंधों की नीति अपनाए. उसने दक्षिण एशियाई नेताओं, खासकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को शपथ ग्रहण समारोह में बुलाए जाने को शुभ संकेत कहा है.

फिर भी अमेरिकी सरकार और संसद में कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें सांप्रदायिक मुद्दों पर मोदी की छवि को लेकर चिंता है. इस तथ्य को न तो अनदेखा करना चाहिए और न ही बहुत ज्यादा महत्व देना चाहिए. अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में मोदी के आलोचक सक्रिय तो रहेंगे, लेकिन उन्हें मिलने वाला समर्थन घटता नजर आ रहा है.

अपेक्षाओं के ज्वार को लेकर भी मोटे तौर पर चिंताएं हैं. कुछ समीक्षकों ने तुलना करने की कोशिश की है कि 2008 के चुनाव में राष्ट्रपति ओबामा भी ऊंची उम्मीदों ‘‘हम कर सकते हैं’’ के वादे और बदलाव की अपेक्षाओं के साथ सत्ता में आए थे, लेकिन वे वादे पूरे नहीं हुए. इसके बावजूद उम्मीद की जा रही है कि मोदी सरकार आर्थिक उद्देश्यों, सुशासन, समावेशी और स्थिर सरकार के वादे पूरे करेगी और भारत यकीनन वापसी करेगा. मोदी कह चुके हैं कि जनादेश इसी उद्देश्य से मिला है.

(लेखिका वाशिंगटन डीसी में ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशंस में द इंडिया प्रोजेक्ट की डायरेक्टर और फॉरेन पॉलिसी प्रोग्राम में फेलो हैं)
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