आप मंत्रियों की किसी टीम के कामकाज को कैसे आंकेंगे? जाहिर है, इसे उसके लक्ष्यों की तुलना करके ही जांचा जा सकता है. नरेंद्र मोदी को लक्ष्य ऊंचा रखने की आदत है. सो, यह सरकार लंबी और ऊंची छलांग की तैयार कर रही है. कुछ अच्छी खबरों के अलावा देश एक ऐसी छोटी और छरहरी सरकार की ही उम्मीद कर रहा है, जहां छोटी का अर्थ बेहतर तालमेल के काबिल समझा जाएगा और छरहरी इसलिए ताकि कठोर मगर जरूरी फैसले किए जा सकें.
तो, उनकी नई टीम को ये विशेषण कैसे लगेंगे? पहली समस्या तो यही है कि अभी टीम पूरी तरह से आकार ही नहीं ले पाई है. इसमें रक्षा मंत्री गायब हैं और अरुण शौरी, मनोहर पर्रीकर और भुवनचंद्र खंडूड़ी जैसी प्रतिभाओं को शामिल नहीं किया गया है. लेकिन ये मामूली समस्याएं हैं. मुश्किल मसले आश्चर्यजनक रूप से मुट्ठी भर सुपर मंत्री, प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की भूमिका और नौसिखिए मंत्रियों के जिम्मे विविध और एक-दूसरे से एकदम अलग तरह के मंत्रालय हैं.
अरुण जेटली के पास वित्त और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालयों का मेल तो सही है, लेकिन मेनका गांधी के तहत महिला और बाल विकास मंत्रालय डॉ. हर्षवर्द्धन के स्वास्थ्य से अलग है. जहाजरानी और सड़क परिवहन मंत्रालय आपस में जोड़कर नितिन गडकरी को दिया गया है, लेकिन रेलवे को अलग रखकर डी.वी. सदानंद गौड़ा को सौंप दिया गया है. राव इंद्रजीत सिंह के पास योजना और सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन, दोनों मंत्रालयों का स्वतंत्र प्रभार है.
इसके अलावा रक्षा राज्यमंत्री के नाते उन्हें रक्षा मंत्री को रिपोर्ट करना होगा. फिर, किसी भी नए मंत्री को ले लीजिए, आप पाएंगे कि उस पर या तो भारी बोझ है या उसे अपने महकमे का कोई तजुर्बा नहीं है या फिर अगले कुछ महीने में उसे उसके राज्य रवाना कर दिया जाएगा.
बीजेपी के रणनीतिकार आपको यकीन दिलाने की कोशिश करेंगे कि कोई सुपर मंत्री नहीं होगा. जेटली अगले कुछ महीने मुद्रास्फीति की बढ़ती दर से निबटने के लिए अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से डूब जाएंगे. गडकरी जहाजरानी और भूतल परिवहन को दुरुस्त करने के झमेले से जूझ रहे होंगे. सुषमा स्वराज विदेश मामलों के अपने दिए गए काम में रम जाएंगी. यानी बड़े नाम दूसरे मंत्रियों की मदद नहीं कर पाएंगे.
यह कोई जांचा-परखा तरीका है या महज तुक्का? असल में इसमें एक तरीका है. अगर यह कामयाब रहा तो लोग इसे ही आगे चलकर मोदी प्रभाव के नाम से जानेंगे. यह विशेष मोदी तड़का है जिसकी खुशबू जल्दी ही फैलने लगेगी. एक बात तो तय है कि नरेंद्र मोदी एक सुपर प्रधानमंत्री होंगे जिनका अपना सुपर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) साथ होगा. इसके तौर-तरीके अभी खुले नहीं हैं लेकिन कई तरह के संकेत हैं.
इन संकेतों को समय रहते डिकोड करना बहुत जरूरी है. मोदी ने एक बेहद अहम विभाग-कार्मिक, जन शिकायत और पेंशन-पीएमओ में रखा है. यह उन्हें विभिन्न विभागों के 94 सचिवों पर सीधा नियंत्रण रखने के लिए जरूरी होगा. इससे बाहर सिर्फ राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति को रिपोर्ट करने वाले दो सचिव ही रह जाएंगे. इसमें शक नहीं कि इन 94 में कई स्वतंत्र विभाग गैर-जरूरी हैं, लेकिन उन्हें घटाने से भी सुपर पीएमओ में काम का बोझ नहीं घटने वाला है.
यह शेषनाग के फन पर धरती को उठाने जैसा या भगवान कृष्ण की उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाने जैसा चमत्कारी काम होगा. पीएमओ का सीधा हस्तक्षेप मंत्रालयों के बीच तालमेल की जरूरत खत्म कर देगा. खुद मंत्री भी (कुछ को छोड़कर) महज राजनैतिक और लोगों से संपर्क बनाए रखने का ही काम करेंगे, कम-से-कम शुरुआती महीनों में. उधर, उनके सचिव सुपर पीएमओ से आ रही योजनाओं और कार्यक्रमों पर अमल करने के लिए जिम्मेदार होंगे.

तो क्या इसका मतलब यह है कि मंत्री शोभा की वस्तु बनकर रह जाएंगे? इसका अर्थ यह नहीं है कि मंत्री बेमानी हो जाएंगे. यूपीए का अनुभव बताता है कि बदलाव विभिन्न प्रेशर ग्रुप्स से लगातार संपर्क के बिना संभव नहीं है और नए मंत्रियों की टीम के पास यही काम होगा. टीम के हर सदस्य का भारतीय समाज के हर अहम वर्ग से विशेष संपर्क होगा, चाहे उद्योगपति हों या व्यापारी, या निर्माण क्षेत्र के बिल्डर अथवा संघ परिवार के संगठन, बुद्धिजीवी वर्ग, सिविल सोसाइटी, अफसरशाही या फौज के लोग. इस टीम में व्यापक विविधता है.
यह विविधता प्रधानमंत्री की ताकत बढ़ाएगी. जितने बेहतर तरीके से वे लोगों को अपने पक्ष में कर पाएंगे, उतने ही बेहतर तरीके से वे मोदी का संदेश पहुंचा पाएंगे, और उतना ही वे अवार्ड पाएंगे. ओजस्वी निर्मला सीतारमन, करिश्माई स्मृति ईरानी और भरपूर रसूख व मीठे बोल वाले पीयूष गोयल इस अवार्ड सिस्टम के कुछ उदाहरण हैं.
तो, नरेंद्र मोदी जिस गाड़ी को चलाएंगे, उसका रूप कुछ-कुछ ऐसा है. लेकिन क्या कोई व्यक्ति 94 घोड़ों वाला रथ अकेले हांक सकता है? अभी संपर्क कायम करने का तरीका नहीं दिखता है, क्योंकि वे सीधे तो 94 सचिवों से काम नहीं ले सकते. उन्हें सुपर पीएमओ को चलाने के लिए तीन समूहों की दरकार होगी. पहला समूह अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञों और टेक्नोक्रेटों का होगा जो उनकी लंबे समय की नीतियों का खाका तैयार करने में मदद करेगा.
इन विशेषज्ञों की मदद के लिए कुछ रिटायर और मौजूदा अफसरों की दरकार होगी. फिर, इन अफसरों को कुछ नेता राजनैतिक समर्थन मुहैया कराएंगे, जो नाजुक मौकों पर जरूरी फोन कॉल का जवाब देंगे. इसके अलावा नरेंद्र मोदी को भी इस समूचे तामझाम को ठीक से चलाने के लिए एक सहायक, शायद एक समर्पित सहायक की जरूरत होगी. संभवतः ऐसे सहायक पहले से ही प्रधानमंत्री की नजर में होंगे.
भारत का संचालन कभी इस तरीके से नहीं किया गया, यह सैकड़ों गुजरात को चलाने जैसा है. तो, क्या मोदी यह कर पाएंगे? हम यह साल भर के पहले ही जान जाएंगे. अगर वे नहीं चला पाए तो सरकार शायद यूपीए-2 जैसी हालत में पहुंच जाएगी. लेकिन ऐसे हालात के लिए तो उन्हें बहुमत नहीं ही दिया गया है.
(अर्थशास्त्री और इंडिकस एनालिटिक्स के प्रमुख हैं)
तो, उनकी नई टीम को ये विशेषण कैसे लगेंगे? पहली समस्या तो यही है कि अभी टीम पूरी तरह से आकार ही नहीं ले पाई है. इसमें रक्षा मंत्री गायब हैं और अरुण शौरी, मनोहर पर्रीकर और भुवनचंद्र खंडूड़ी जैसी प्रतिभाओं को शामिल नहीं किया गया है. लेकिन ये मामूली समस्याएं हैं. मुश्किल मसले आश्चर्यजनक रूप से मुट्ठी भर सुपर मंत्री, प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की भूमिका और नौसिखिए मंत्रियों के जिम्मे विविध और एक-दूसरे से एकदम अलग तरह के मंत्रालय हैं.
अरुण जेटली के पास वित्त और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालयों का मेल तो सही है, लेकिन मेनका गांधी के तहत महिला और बाल विकास मंत्रालय डॉ. हर्षवर्द्धन के स्वास्थ्य से अलग है. जहाजरानी और सड़क परिवहन मंत्रालय आपस में जोड़कर नितिन गडकरी को दिया गया है, लेकिन रेलवे को अलग रखकर डी.वी. सदानंद गौड़ा को सौंप दिया गया है. राव इंद्रजीत सिंह के पास योजना और सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन, दोनों मंत्रालयों का स्वतंत्र प्रभार है.
इसके अलावा रक्षा राज्यमंत्री के नाते उन्हें रक्षा मंत्री को रिपोर्ट करना होगा. फिर, किसी भी नए मंत्री को ले लीजिए, आप पाएंगे कि उस पर या तो भारी बोझ है या उसे अपने महकमे का कोई तजुर्बा नहीं है या फिर अगले कुछ महीने में उसे उसके राज्य रवाना कर दिया जाएगा.
बीजेपी के रणनीतिकार आपको यकीन दिलाने की कोशिश करेंगे कि कोई सुपर मंत्री नहीं होगा. जेटली अगले कुछ महीने मुद्रास्फीति की बढ़ती दर से निबटने के लिए अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से डूब जाएंगे. गडकरी जहाजरानी और भूतल परिवहन को दुरुस्त करने के झमेले से जूझ रहे होंगे. सुषमा स्वराज विदेश मामलों के अपने दिए गए काम में रम जाएंगी. यानी बड़े नाम दूसरे मंत्रियों की मदद नहीं कर पाएंगे.
यह कोई जांचा-परखा तरीका है या महज तुक्का? असल में इसमें एक तरीका है. अगर यह कामयाब रहा तो लोग इसे ही आगे चलकर मोदी प्रभाव के नाम से जानेंगे. यह विशेष मोदी तड़का है जिसकी खुशबू जल्दी ही फैलने लगेगी. एक बात तो तय है कि नरेंद्र मोदी एक सुपर प्रधानमंत्री होंगे जिनका अपना सुपर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) साथ होगा. इसके तौर-तरीके अभी खुले नहीं हैं लेकिन कई तरह के संकेत हैं.
इन संकेतों को समय रहते डिकोड करना बहुत जरूरी है. मोदी ने एक बेहद अहम विभाग-कार्मिक, जन शिकायत और पेंशन-पीएमओ में रखा है. यह उन्हें विभिन्न विभागों के 94 सचिवों पर सीधा नियंत्रण रखने के लिए जरूरी होगा. इससे बाहर सिर्फ राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति को रिपोर्ट करने वाले दो सचिव ही रह जाएंगे. इसमें शक नहीं कि इन 94 में कई स्वतंत्र विभाग गैर-जरूरी हैं, लेकिन उन्हें घटाने से भी सुपर पीएमओ में काम का बोझ नहीं घटने वाला है.
यह शेषनाग के फन पर धरती को उठाने जैसा या भगवान कृष्ण की उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाने जैसा चमत्कारी काम होगा. पीएमओ का सीधा हस्तक्षेप मंत्रालयों के बीच तालमेल की जरूरत खत्म कर देगा. खुद मंत्री भी (कुछ को छोड़कर) महज राजनैतिक और लोगों से संपर्क बनाए रखने का ही काम करेंगे, कम-से-कम शुरुआती महीनों में. उधर, उनके सचिव सुपर पीएमओ से आ रही योजनाओं और कार्यक्रमों पर अमल करने के लिए जिम्मेदार होंगे.

तो क्या इसका मतलब यह है कि मंत्री शोभा की वस्तु बनकर रह जाएंगे? इसका अर्थ यह नहीं है कि मंत्री बेमानी हो जाएंगे. यूपीए का अनुभव बताता है कि बदलाव विभिन्न प्रेशर ग्रुप्स से लगातार संपर्क के बिना संभव नहीं है और नए मंत्रियों की टीम के पास यही काम होगा. टीम के हर सदस्य का भारतीय समाज के हर अहम वर्ग से विशेष संपर्क होगा, चाहे उद्योगपति हों या व्यापारी, या निर्माण क्षेत्र के बिल्डर अथवा संघ परिवार के संगठन, बुद्धिजीवी वर्ग, सिविल सोसाइटी, अफसरशाही या फौज के लोग. इस टीम में व्यापक विविधता है.
यह विविधता प्रधानमंत्री की ताकत बढ़ाएगी. जितने बेहतर तरीके से वे लोगों को अपने पक्ष में कर पाएंगे, उतने ही बेहतर तरीके से वे मोदी का संदेश पहुंचा पाएंगे, और उतना ही वे अवार्ड पाएंगे. ओजस्वी निर्मला सीतारमन, करिश्माई स्मृति ईरानी और भरपूर रसूख व मीठे बोल वाले पीयूष गोयल इस अवार्ड सिस्टम के कुछ उदाहरण हैं.
तो, नरेंद्र मोदी जिस गाड़ी को चलाएंगे, उसका रूप कुछ-कुछ ऐसा है. लेकिन क्या कोई व्यक्ति 94 घोड़ों वाला रथ अकेले हांक सकता है? अभी संपर्क कायम करने का तरीका नहीं दिखता है, क्योंकि वे सीधे तो 94 सचिवों से काम नहीं ले सकते. उन्हें सुपर पीएमओ को चलाने के लिए तीन समूहों की दरकार होगी. पहला समूह अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञों और टेक्नोक्रेटों का होगा जो उनकी लंबे समय की नीतियों का खाका तैयार करने में मदद करेगा.
इन विशेषज्ञों की मदद के लिए कुछ रिटायर और मौजूदा अफसरों की दरकार होगी. फिर, इन अफसरों को कुछ नेता राजनैतिक समर्थन मुहैया कराएंगे, जो नाजुक मौकों पर जरूरी फोन कॉल का जवाब देंगे. इसके अलावा नरेंद्र मोदी को भी इस समूचे तामझाम को ठीक से चलाने के लिए एक सहायक, शायद एक समर्पित सहायक की जरूरत होगी. संभवतः ऐसे सहायक पहले से ही प्रधानमंत्री की नजर में होंगे.
भारत का संचालन कभी इस तरीके से नहीं किया गया, यह सैकड़ों गुजरात को चलाने जैसा है. तो, क्या मोदी यह कर पाएंगे? हम यह साल भर के पहले ही जान जाएंगे. अगर वे नहीं चला पाए तो सरकार शायद यूपीए-2 जैसी हालत में पहुंच जाएगी. लेकिन ऐसे हालात के लिए तो उन्हें बहुमत नहीं ही दिया गया है.
(अर्थशास्त्री और इंडिकस एनालिटिक्स के प्रमुख हैं)

