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भारत में सुशासन से ही निवेश में आएगी तेजी

मोदी के बारे में ब्रिटेन की राय भारतीयों से मिलती-जुलती है. भारत में सबसे बड़ी विदेशी निवेशक ब्रिटिश कंपनियों को उम्मीद है कि सुव्यवस्थित नीतियों से उनको फायदा मिलेगा.

अपडेटेड 9 जून , 2014
नरेंद्र मोदी की जबरदस्त कामयाबी भारत को बदल देगी. पहली बार कांग्रेस की जगह किसी अन्य पार्टी को बहुमत मिला है. पिछले 25 साल में भारत में गठबंधन हावी रहा है-भारत की आर्थिक सफलता और बहुध्रुवीय दुनिया में एक स्तंभ के रूप में उसका उभार गठबंधनों की निगरानी में ही हुआ है, जैसे हाल की आर्थिक मंदी भी.

समन्वित नीति का अभाव और भ्रष्टाचार के बारे में खुलासे के अलावा सहयोगी गठबंधनों का तुष्टिकरण भी आर्थिक मंदी की वजहों में प्रमुखता से रहा है. युवाओं में देखी गई मजबूत और सुसंगत सरकार की आकांक्षा को बीजेपी ने सफलतापूर्वक भुनाया. ऊर्जा या जल आदि के मसलों पर असंगत नीतियों की वजह यह थी कि इन मसलों को ढेर सारे मंत्रालय देख रहे थे, मोदी अब इस स्थिति में हैं कि मंत्रालयों को आसान और कारगर बनाकर सुसंगतता को बढ़ावा दें.

यह बदलाव भारत के लिए अच्छा होना चाहिए और ब्रिटेन जैसे उन देशों के लिए भी जो भारत में व्यापार करना चाहते हैं और यहां निवेश करना चाहते हैं. भारत में सबसे बड़ा विदेशी निवेश ब्रिटिश कंपनियों ने ही किया है. भारतीय अर्थव्यवस्था की बहुत सारी अड़चनें बनी रही हैं क्योंकि पिछली कई सरकारों को लगातार ज्यादा अडिय़ल सुधार विरोधी साथी दलों के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ा है. अगर कुछ मुश्किल फैसले अब नहीं लिए गए तो यह मानना उचित होगा कि वे फिर कभी नहीं लिए जा सकेंगे.

मोदी का फोकस ऐसी व्यवस्था बनाने पर है, जो बेहतर तरीके से काम करे. दूसरा, घरेलू आर्थिक सुधारों की बात करें तो सबकी नजरें इस बात पर लगी हैं कि वे श्रम कानूनों जैसे क्षेत्र में सुधार की कोशिश करते हैं या नहीं. इस बात की उम्मीद कम ही है कि नई सरकार स्वतः आने वाले विदेशी निवेश का स्वागत करेगी. इसकी जगह लगता है कि भारतीय जरूरतों के मुताबिक क्षेत्रवार तरीके से लगातार निवेश को खोलने का काम जारी रहेगा. बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने पर सवालिया निशान है, लेकिन प्रतिरक्षा क्षेत्र में इसकी उम्मीद ज्यादा है.

मुख्य उम्मीदों में से एक यह है कि नई सरकार राजनीति का लहजा बदल देगी. वैसे तो भ्रष्टाचार रातोरात खत्म होना नामुमकिन है, लेकिन मोदी ने अगर अपने आस-पास साफ और सक्षम मंत्री रखे तो इस बात की उम्मीद है कि इससे निचले स्तर पर भी सकारात्मक संदेश जाएगा.

संघीय देश में साफ तौर से केंद्र सरकार के कुछ हासिल कर सकने की भी अपनी सीमाएं हैं. नए प्रशासन के लिए आकांक्षाओं को संभालना चुनौती हो सकती है. चुनौतियां मामूली नहीं हैं-आबादी से जुड़े फायदे भुनाने की खातिर नौकरियों के सृजन के लिए कौशल विकास पर ध्यान देना होगा. यहां भी यह उम्मीद है कि ब्रिटेन के अनुभवों से भारत कुछ सबक ले सकता है.

ब्रिटेन में रहने वाले भारत के गुजराती समुदाय में मोदी और बीजेपी को आम तौर पर व्यापक समर्थन हासिल है. ब्रिटेन तो भारतीय मूल के लोगों और भारत के बीच सेतु बनाने पर काम भी कर रहा है. ब्रिटेन में बहुत से लोगों की सोच इस मामले में सकारात्मक है कि भारत का आर्थिक भविष्य अब उज्ज्वल हो सकता है और उन्हें उम्मीद है कि वे इसमें मदद करने में सक्षम होंगे, लेकिन अब भी कुछ सवाल बने हुए हैं.

पहला, यह साफ लग रहा है कि नई सरकार सबसे पहले और मुख्यतः घरेलू मसलों पर ध्यान देगी. विदेशी नीति के मामले में प्राथमिक तौर पर भारत का फोकस अपने पड़ोसी देशों पर होगा. मोदी का फोकस चीन पर भी होगा, जो आर्थिक मौकों के साथ सामरिक खतरा भी पेश करता है. वह यदि पहली विदेश यात्रा पर जापान जाते हैं तो इससे भारत के लिए एक सामरिक साझेदार और महत्वपूर्ण निवेशक के रूप में उसका बढ़ता महत्व और सुदृढ़ होगा. 

पश्चिमी देशों, खासकर ब्रिटेन के लिए इसका क्या मतलब होगा? ब्रिटिश उच्चायुक्त मोदी से संपर्क करने वाले पहले पश्चिमी प्रतिनिधियों में से थे, लेकिन सामान्यतया तो यही लगता है कि मोदी उन देशों को प्राथमिकता नहीं देंगे, जिन्होंने गुजरात दंगों के बाद उन्हें वीजा देने से इनकार किया था. निश्चित रूप से यह पिछले दशक की कांग्रेस सरकार से काफी अलग दौर हो सकता है, जिसमें शासक वर्ग में ज्यादातर अंग्रेजी माध्यम में पढ़े इंग्लैंड से प्रभावित लोग थे.

दूसरा सवाल बीजेपी की बहुसंख्यक सरकार बनने से होने वाले सामाजिक निहितार्थों का है. उनके हाल के भाषणों में कोई भी दोष नहीं निकाल सकता, लेकिन खासकर सभी भारतीयों के लिए सरकार में बदलाव के आकांक्षी लोगों की उम्मीदों को पूरा करना और साथ ही जो लोग खुलकर हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे का समर्थन करते हैं, उनकी उम्मीदों पर भी खरा उतरना काफी चुनौतीपूर्ण होगा. हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को पूरा करना और सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखना ज्यादा चुनौतीपूर्ण है. 

उनकी इस योग्यता पर सवाल बना रहेगा कि वे गुजरात की केंद्रीयकृत सत्ता संरचना को दिल्ली ला पाते हैं या नहीं, लेकिन निर्णय लेने में मुख्यमंत्रियों की भागीदारी बढ़ाने के उनके प्रस्ताव से ऐसा लगता है कि वे आम सहमति बनाने की जरूरत को समझते हैं. कई दशकों से विदेशी पर्यवेक्षक भारत में गठबंधन सरकारों और निर्णय लेने की धीमी प्रक्रिया के आदी हो चुके थे. अचानक इसमें बदलाव की संभावना खुश करने के साथ ही चिंता भी पैदा करती है.

(लेखक लंदन स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ  चौटहम हाउस के एशिया प्रोग्राम में सीनियर रिसर्च फेलो हैं)
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