भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम अगर आप चीन की राजधानी बीजिंग में किसी भी अधिकारी के सामने लेंगे तो उसके चेहरे पर उत्साह भरी मुस्कान खिल उठेगी. चीन सरकार को भारत के नए प्रधानमंत्री में अपना कुछ अक्स दिखाई देता है-एक मजबूत, निर्णायक नेता जिसका जोर विकास पर है, जो चीन की आर्थिक सफलता से सीखने को उत्सुक है और कभी भी अमेरिका के भुलावे में नहीं आएगा.
चीन के सरकारी दैनिक का पहला पन्ना 27 मई को चीख-चीखकर कह रहा था, ‘‘मोदी चीन के साथ संबंध बढ़ाएंगे.’’ चाइना डेली अखबार का संपादकीय दोनों देशों के बीच अधिक रचनात्मक संबंध जुडऩे की संभावना से उल्लसित था, जो उनकी ‘‘समृद्धि हासिल करने की एक समान अभिलाषाओं’’ से संचालित होंगे.
नरेंद्र मोदी 2011 में जब चीन गए थे तो उन्हें राष्ट्राध्यक्ष जैसा सम्मान मिला था, ग्रेट हॉल ऑफ पीपल में स्वागत समारोह का दुर्लभ सौभाग्य हासिल हुआ था और सत्तारूढ़ पोलितब्यूरो के चार सदस्यों से उनकी मुलाकात कराई गई थी. चाइना डेली बड़े उत्साह से याद करता है कि मोदी ने भी अपने मेजबानों के प्रति उतना ही आदर दिखाया था और उन्हें जो बिजनेस कार्ड भेंट किए थे, उन पर ‘‘लाल रंग में चीनी भाषा में परिचय था जो रंग चीन में संपदा और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है.’’
चीन में सरकार को उम्मीद और यकीन है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत उसी तरह चीन से निवेश चाहेगा और उसे अनुकूल अंदाज में करने देगा जैसा अवसर मोदी के नेतृत्व में गुजरात में दिया गया था.
आज जब म्यांमार में चीन के सबसे बड़े निवेश जन आंदोलनों और मानव अधिकारों के दुरुपयोग के आरोपों की मार झेल रहे हैं, उस समय मोदी बीजिंग में शासक और संपन्न वर्ग को एकदम अलग तरह के साथी के रूप में दिखाई दे रहे हैः एक ऐसा शख्स जो विपक्ष को कुचलकर रख देता है और किसी भी तरह से काम करवा लेने की कला को जानता है. फिर चाहे यह रास्ता उसके समर्थकों की दृष्टि में सही हो या फिर आलोचकों की नजर में गलत हो.
चीन यह भी नहीं भूला है कि जब अमेरिका मोदी को वीजा नहीं दे रहा था उस समय वे चीन का दौरा कर रहे थे. दक्षिण एशियाई मामलों के जानकार क्यिांग फेंग ने राष्ट्रवादी अखबार ग्लोबल टाइम्स में संपादकीय लेख में कहा है कि जब पश्चिमी देश मोदी को अपमानित कर रहे थे और उनका रास्ता रोक रहे थे तब ‘‘चीन ने विचारधारा के आधार पर कोई लक्ष्मण रेखा नहीं खींची थी.’’ उनका कहना है कि यह दोनों नजरिए ‘‘एकदम विपरीत हैं.’’ उनका तर्क है कि अब पश्चिम के लिए भारत को लुभाना और चीन को काबू कर पाना यकीनन मुश्किल होगा.
इसके बावजूद चीन सरकार यह सोचने की भूल नहीं कर सकती कि मोदी उसकी गोद में आ बैठेंगे. वह जानती है कि जिन आर्थिक वजहों के दबाव में मोदी चीन से पींगें बढ़ा रहे थे, वही उन्हें अमेरिका के साथ उन संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए मजबूर करेंगे, जिन्हें पिछली सरकार ने देवयानी खोबरागड़े के नाम पर तार-तार करके रख दिया है.
वाशिंगटन में अभी से ओबामा सरकार को नसीहतें दी जा रही हैं कि वे मौके का फायदा उठाएं और भारत की नई सरकार, खासकर मोदी के साथ नई शुरुआत करें. इस अखबार ने लिखा कि मोदी की आर्थिक योजना बाजार के लिए इतनी आकर्षक है कि इस साल भारतीय शेयर 15 फीसदी उछल गए. भारतीय मुद्रा की कीमत भी सुधरी है.
मोदी 2007 और 2012 में जापान गए और गुजरात में जापानी निवेश लाने में सफल रहे. उम्मीद की जा रही है कि वे चीन के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी इस पूर्वी एशियाई देश के साथ प्रतिरक्षा और सुरक्षा के संबंध मजबूत करेंगे. ऐसा लगता है कि मोदी ने एक और दबंग राष्ट्रवादी नेता जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे से गहरी दोस्ती कर ली है.
यह बात और है कि चीन, आबे को न तो पसंद करता है और न ही उन पर विश्वास करता है. चीन जानता होगा कि आबे ट्विटर पर सिर्फ तीन लोगों को फॉलो करते हैं, जिनमें से एक मोदी भी हैं. इस रिश्ते पर चीन सरकार की नजर औरों जितनी ही गहरी होगी.
चीन में विशेषज्ञों को यह उम्मीद कतई नहीं है कि मोदी भारत के साथ चीन के वर्षों पुराने सीमा विवाद को चमत्कारिक ढंग से सुलझा देंगे. चीन इस मूड में कतई नहीं दिखता कि वह भारत के लिए कुछ इलाकाई रियायतें दे देगा. साथ ही वह दक्षिणी चीन और पूर्वी चीन सागरों में अपने समुद्री दावों को अंतिम हद तक मजबूत करना चाहता है.
प्रचार के दौरान मोदी ने चीन को ‘‘अपनी विस्तारवादी सोच’’ को छोडऩे की सलाह दी थी, लेकिन उससे बीजिंग में कुछ ज्यादा खतरे की घंटियां नहीं बजीं, बल्कि इसे काफी हद तक उस आदमी के लिए प्रचार के हथियार के रूप में देखा गया, जो अपनी राष्ट्रवादी साख मजबूत करने को बेचौन था.
चीन में एक समीक्षक ने मोदी की तुलना अमेरिका के रिपब्लिकन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन से करके सुर्खियां बटोरी हैं. दुनिया जानती है कि माओ के चीन के साथ निक्सन के गहरे रिश्ते थे. फिर भी मोदी की तुलना अटल बिहारी वाजपेयी से करने में अधिक समझदारी है.
उनके नेतृत्व में चीन के साथ भारत के रिश्ते सुधरे थे और व्यापार का दायरा बढ़ा था. चीन का मानना है कि कांग्रेस की तुलना में बीजेपी के कंधों पर इतिहास की घटनाओं का बोझ कम है. 1962 के सीमा युद्ध की यादें कांग्रेस के लिए शायद अधिक निजी, दर्दनाक और शर्मनाक हैं.
चीन सरकार भारत के बेलगाम मीडिया को कभी नहीं समझ पाई और जब भारत के अधिक राष्ट्रवादी टेलीविजन चैनलों ने सीमा पर कथित अतिक्रमणों को लेकर तीखी आलोचना की तो चीन सरकार इसके लिए भारत सरकार को जिम्मेदार मानने लगी.
चीन को मीडिया पर फौलादी शिकंजा रखने की आदत है इसलिए उसे शक होना स्वाभाविक था कि भारत का विदेश मंत्रालय किसी-न-किसी घटना के बहाने उसे निशाने पर रखवा रहा है. अगर ऐसा नहीं था तो भी वह भावनाओं में उफान को थाम सकता था. हालांकि सचाई शायद यह थी कि टेलीविजन ऐंकर यूपीए सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता से उत्पन्न शून्य को ही भरने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि सरकार कोई एजेंडा तय नहीं कर पाई थी.
चीन में विशेषज्ञों की राय में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ‘‘अनिर्णय और अत्यधिक सावधानी’’ में घिरी थी, जबकि मोदी को ‘‘महत्वाकांक्षी और आक्रामक’’ माना जा रहा है, जिसका अर्थ आलोचना होना अनिवार्य नहीं है. चीन कम-से-कम उस व्यक्ति के साथ काम करने को उत्सुक है, जो उसे अपना सा लगता है.
अब चीन यह अपेक्षा तो कर ही सकता है कि भारतीय विदेश नीति की दिशा नरेंद्र मोदी से तय होगी, न कि इसे टेलीविजन ऐंकर अर्णब गोस्वामी तय करेंगे.
(लेखक रग एलिफैंटः हार्नेसिंग द पावर ऑफ इंडियाज अनरूली डेमोक्रेसी के लेखक हैं. वे इस समय बीजिंग में द वाशिंगटन पोस्ट के चीन के ब्यूरो चीफ हैं)
चीन के सरकारी दैनिक का पहला पन्ना 27 मई को चीख-चीखकर कह रहा था, ‘‘मोदी चीन के साथ संबंध बढ़ाएंगे.’’ चाइना डेली अखबार का संपादकीय दोनों देशों के बीच अधिक रचनात्मक संबंध जुडऩे की संभावना से उल्लसित था, जो उनकी ‘‘समृद्धि हासिल करने की एक समान अभिलाषाओं’’ से संचालित होंगे.
नरेंद्र मोदी 2011 में जब चीन गए थे तो उन्हें राष्ट्राध्यक्ष जैसा सम्मान मिला था, ग्रेट हॉल ऑफ पीपल में स्वागत समारोह का दुर्लभ सौभाग्य हासिल हुआ था और सत्तारूढ़ पोलितब्यूरो के चार सदस्यों से उनकी मुलाकात कराई गई थी. चाइना डेली बड़े उत्साह से याद करता है कि मोदी ने भी अपने मेजबानों के प्रति उतना ही आदर दिखाया था और उन्हें जो बिजनेस कार्ड भेंट किए थे, उन पर ‘‘लाल रंग में चीनी भाषा में परिचय था जो रंग चीन में संपदा और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है.’’
चीन में सरकार को उम्मीद और यकीन है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत उसी तरह चीन से निवेश चाहेगा और उसे अनुकूल अंदाज में करने देगा जैसा अवसर मोदी के नेतृत्व में गुजरात में दिया गया था.
आज जब म्यांमार में चीन के सबसे बड़े निवेश जन आंदोलनों और मानव अधिकारों के दुरुपयोग के आरोपों की मार झेल रहे हैं, उस समय मोदी बीजिंग में शासक और संपन्न वर्ग को एकदम अलग तरह के साथी के रूप में दिखाई दे रहे हैः एक ऐसा शख्स जो विपक्ष को कुचलकर रख देता है और किसी भी तरह से काम करवा लेने की कला को जानता है. फिर चाहे यह रास्ता उसके समर्थकों की दृष्टि में सही हो या फिर आलोचकों की नजर में गलत हो.
चीन यह भी नहीं भूला है कि जब अमेरिका मोदी को वीजा नहीं दे रहा था उस समय वे चीन का दौरा कर रहे थे. दक्षिण एशियाई मामलों के जानकार क्यिांग फेंग ने राष्ट्रवादी अखबार ग्लोबल टाइम्स में संपादकीय लेख में कहा है कि जब पश्चिमी देश मोदी को अपमानित कर रहे थे और उनका रास्ता रोक रहे थे तब ‘‘चीन ने विचारधारा के आधार पर कोई लक्ष्मण रेखा नहीं खींची थी.’’ उनका कहना है कि यह दोनों नजरिए ‘‘एकदम विपरीत हैं.’’ उनका तर्क है कि अब पश्चिम के लिए भारत को लुभाना और चीन को काबू कर पाना यकीनन मुश्किल होगा.
इसके बावजूद चीन सरकार यह सोचने की भूल नहीं कर सकती कि मोदी उसकी गोद में आ बैठेंगे. वह जानती है कि जिन आर्थिक वजहों के दबाव में मोदी चीन से पींगें बढ़ा रहे थे, वही उन्हें अमेरिका के साथ उन संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए मजबूर करेंगे, जिन्हें पिछली सरकार ने देवयानी खोबरागड़े के नाम पर तार-तार करके रख दिया है.
वाशिंगटन में अभी से ओबामा सरकार को नसीहतें दी जा रही हैं कि वे मौके का फायदा उठाएं और भारत की नई सरकार, खासकर मोदी के साथ नई शुरुआत करें. इस अखबार ने लिखा कि मोदी की आर्थिक योजना बाजार के लिए इतनी आकर्षक है कि इस साल भारतीय शेयर 15 फीसदी उछल गए. भारतीय मुद्रा की कीमत भी सुधरी है.
मोदी 2007 और 2012 में जापान गए और गुजरात में जापानी निवेश लाने में सफल रहे. उम्मीद की जा रही है कि वे चीन के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी इस पूर्वी एशियाई देश के साथ प्रतिरक्षा और सुरक्षा के संबंध मजबूत करेंगे. ऐसा लगता है कि मोदी ने एक और दबंग राष्ट्रवादी नेता जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे से गहरी दोस्ती कर ली है.
यह बात और है कि चीन, आबे को न तो पसंद करता है और न ही उन पर विश्वास करता है. चीन जानता होगा कि आबे ट्विटर पर सिर्फ तीन लोगों को फॉलो करते हैं, जिनमें से एक मोदी भी हैं. इस रिश्ते पर चीन सरकार की नजर औरों जितनी ही गहरी होगी.
चीन में विशेषज्ञों को यह उम्मीद कतई नहीं है कि मोदी भारत के साथ चीन के वर्षों पुराने सीमा विवाद को चमत्कारिक ढंग से सुलझा देंगे. चीन इस मूड में कतई नहीं दिखता कि वह भारत के लिए कुछ इलाकाई रियायतें दे देगा. साथ ही वह दक्षिणी चीन और पूर्वी चीन सागरों में अपने समुद्री दावों को अंतिम हद तक मजबूत करना चाहता है.
प्रचार के दौरान मोदी ने चीन को ‘‘अपनी विस्तारवादी सोच’’ को छोडऩे की सलाह दी थी, लेकिन उससे बीजिंग में कुछ ज्यादा खतरे की घंटियां नहीं बजीं, बल्कि इसे काफी हद तक उस आदमी के लिए प्रचार के हथियार के रूप में देखा गया, जो अपनी राष्ट्रवादी साख मजबूत करने को बेचौन था.
चीन में एक समीक्षक ने मोदी की तुलना अमेरिका के रिपब्लिकन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन से करके सुर्खियां बटोरी हैं. दुनिया जानती है कि माओ के चीन के साथ निक्सन के गहरे रिश्ते थे. फिर भी मोदी की तुलना अटल बिहारी वाजपेयी से करने में अधिक समझदारी है.
उनके नेतृत्व में चीन के साथ भारत के रिश्ते सुधरे थे और व्यापार का दायरा बढ़ा था. चीन का मानना है कि कांग्रेस की तुलना में बीजेपी के कंधों पर इतिहास की घटनाओं का बोझ कम है. 1962 के सीमा युद्ध की यादें कांग्रेस के लिए शायद अधिक निजी, दर्दनाक और शर्मनाक हैं.
चीन सरकार भारत के बेलगाम मीडिया को कभी नहीं समझ पाई और जब भारत के अधिक राष्ट्रवादी टेलीविजन चैनलों ने सीमा पर कथित अतिक्रमणों को लेकर तीखी आलोचना की तो चीन सरकार इसके लिए भारत सरकार को जिम्मेदार मानने लगी.
चीन को मीडिया पर फौलादी शिकंजा रखने की आदत है इसलिए उसे शक होना स्वाभाविक था कि भारत का विदेश मंत्रालय किसी-न-किसी घटना के बहाने उसे निशाने पर रखवा रहा है. अगर ऐसा नहीं था तो भी वह भावनाओं में उफान को थाम सकता था. हालांकि सचाई शायद यह थी कि टेलीविजन ऐंकर यूपीए सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता से उत्पन्न शून्य को ही भरने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि सरकार कोई एजेंडा तय नहीं कर पाई थी.
चीन में विशेषज्ञों की राय में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ‘‘अनिर्णय और अत्यधिक सावधानी’’ में घिरी थी, जबकि मोदी को ‘‘महत्वाकांक्षी और आक्रामक’’ माना जा रहा है, जिसका अर्थ आलोचना होना अनिवार्य नहीं है. चीन कम-से-कम उस व्यक्ति के साथ काम करने को उत्सुक है, जो उसे अपना सा लगता है.
अब चीन यह अपेक्षा तो कर ही सकता है कि भारतीय विदेश नीति की दिशा नरेंद्र मोदी से तय होगी, न कि इसे टेलीविजन ऐंकर अर्णब गोस्वामी तय करेंगे.
(लेखक रग एलिफैंटः हार्नेसिंग द पावर ऑफ इंडियाज अनरूली डेमोक्रेसी के लेखक हैं. वे इस समय बीजिंग में द वाशिंगटन पोस्ट के चीन के ब्यूरो चीफ हैं)

