पहले ये नतीजे उन्हें बहुत खराब नजर आए लेकिन बाद में उसी में उन्हें फायदा नजर आने लगा. झारखंड में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने लोकसभा चुनावों में लगभग सभी का सूपड़ा साफ क्या किया कि राज्य में अपना अस्तित्व बचाए रखने को जूझ् रही हेमंत सोरेन सरकार को नया जीवनदान मिल गया.
राज्य की कुल 14 लोकसभा सीटों में से 12 बीजेपी को मिलीं तो विधानसभा में मुख्यमंत्री सोरेन के विरोधी और असंतुष्ट सहयोगियों ने अपने पांव फौरन पीछे खींच लिए. ऐसे माहौल में विधानसभा चुनावों में जाने की मुसीबत भला कौन मोल लेगा!
एक कांग्रेसी नेता कहते हैं, ''सरकार गिरने का मतलब है कि झारखंड थाली में रखकर बीजेपी को सौंप देना. '' इस तरह बीजेपी की अप्रत्याशित जीत सोरेन सरकार के असंतुष्ट सहयोगियों और दूसरी विरोधी पार्टियों के लिए पैर आगे न बढ़ाने की वजह बन गई है. वरना वे अब तक गठबंधन सरकार गिराने की कोशिश में जुट गए होते. इससे झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के हेमंत सोरेन को अपनी साख बहाली के लिए छह माह और मिल गए हैं. झारखंड में इसी साल दिसंबर में चुनाव होने हैं.
सरकार में जेएमएम के सहयोगी दलों—कांग्रेस और आरजेडी का लोकसभा चुनावों में खाता भी नहीं खुल पाया. हेमंत सरकार का विरोध कर रहे जेवीएम, एजेएसयू और जनता दल (यूनाइटेड) की भी चुनावों में यही गति हुई. बाबूलाल मरांडी और सुदेश महतो जैसे बड़े नेता भी क्रमश: दुमका और रांची में तीसरे नंबर पर पहुंच गए. प्रदेश में लगभग सभी पार्टियों के सियासी क्षत्रप मोदी हवा में उड़ गए. इसलिए फिलहाल कोई भी नेता जल्दी चुनाव नहीं चाहता है.
आरजेडी के एक नेता का कहना है, ''अगर झारखंड में फिलहाल विधानसभा चुनाव हुए तो उत्साहित बीजेपी सबका सूपड़ा साफ कर देगी. कुछ समय बीतने पर ही यह माहौल कुछ शांत होगा. नरेंद्र मोदी को लेकर लोगों में उत्साह कुछ माह में कम हो जाएगा. इसलिए बेहतर है कि चुनाव तय समय पर ही हों. ''
पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुदेश महतो की अगुआई वाले एजेएसयू के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''जनाधार पुख्ता करने के लिए हमें कुछ वक्त चाहिए. '' कांग्रेस की तरह एजेएसयू ने भी लोकसभा चुनावों में नौ सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. उसके नेता कहते हैं, ''यह कार्यकर्ताओं को व्यस्त और उत्साहित रखने की रणनीति थी. अगर हम नहीं लड़ते तो हमारे कार्यकर्ता और समर्थक हमें छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले जाते. इसका घाटा हमें विधानसभा चुनावों के दौरान होता. ''
झारखंड में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय, दोनों तरह की पार्टियों को आशंका है कि हेमंत सरकार के गिरने से बीजेपी को खुला मैदान मिल जाएगा. सुखदेव भगत के नेतृत्व में राज्य कांग्रेस पहले ही साफ कर चुकी है कि वह विधानसभा चुनावों में जेएमएम के साथ गठजोड़ नहीं करेगी और अकेले ही चुनाव में उतरेगी. कांग्रेस भी फिलहाल हेमंत सरकार से समर्थन खींचने पर मौन हो गई है.
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने दो निर्दलीयों चमरा लिंडा और बंधु तिर्की को पार्टी की सदस्यता लोकसभा चुनावों के ऐन पहले दी और तब से वह भी अपनी ताकत दिखाने लगी थी. लेकिन उसने भी अब हाथ वापस खींच लिए हैं. सरकार को दोनों विधायकों का समर्थन जारी रहेगा.
लोकसभा चुनावों के पहले 82 सदस्यीय राज्य विधानसभा में मामूली बहुमत से टिकी सोरेन सरकार पार्टी के दो विधायकों हेमलाल मुर्मू और बिद्युत बरन महतो के इस्तीफे के बाद अब-तब की स्थिति में थी. पार्टी के एक और विधायक साइमन मरांडी बागी हो गए. उधर, कांग्रेस ने भी अपने एक विधायक चंद्रशेखर दुबे को गंवा दिया. वे मंत्री पद छोड़कर तृणमूल के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े और हार भी गए.
हालांकि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और आरजेडी के साथ गठजोड़ में चार सीटों पर उतरा जेएमएम दो सीटें जीतने में कामयाब रहा लेकिन ये चुनाव हेमंत सरकार की हार माने जा रहे हैं. कांग्रेस नौ सीटों पर लड़ी थी और आरजेडी एक सीट पर. उधर, बीजेपी सत्ता की लालची नहीं दिखना चाहती. बीजेपी नेता अर्जुन मुंडा कहते हैं, ''हम अलोकप्रिय सरकार को गिराने की कोई कोशिश नहीं करेंगे. ''
झारखंड विधानसभा की कुल संख्या तो 82 है लेकिन दो जेएमएम और एक कांग्रेस विधायक के इस्तीफे और बीजेपी विधायक लक्ष्मण गुलिया के सिंहभूम से लोकसभा का चुनाव जीत जाने की वजह से फिलहाल यह संख्या 78 रह गई है. सोरेन सरकार को अभी 40 विधायकों का समर्थन प्राप्त है. जिसमें जेएमएम के 16, कांग्रेस के 12, आरजेडी के 5, तृणमूल के 2 और 5 निर्दलीय हैं. इससे सरकार बहुमत में है. जो भी हो, कई बार बुरे दिन भी अच्छे हो जाते हैं और हेमंत के चेहरे पर वाकई खुशी होगी.
राज्य की कुल 14 लोकसभा सीटों में से 12 बीजेपी को मिलीं तो विधानसभा में मुख्यमंत्री सोरेन के विरोधी और असंतुष्ट सहयोगियों ने अपने पांव फौरन पीछे खींच लिए. ऐसे माहौल में विधानसभा चुनावों में जाने की मुसीबत भला कौन मोल लेगा!
एक कांग्रेसी नेता कहते हैं, ''सरकार गिरने का मतलब है कि झारखंड थाली में रखकर बीजेपी को सौंप देना. '' इस तरह बीजेपी की अप्रत्याशित जीत सोरेन सरकार के असंतुष्ट सहयोगियों और दूसरी विरोधी पार्टियों के लिए पैर आगे न बढ़ाने की वजह बन गई है. वरना वे अब तक गठबंधन सरकार गिराने की कोशिश में जुट गए होते. इससे झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के हेमंत सोरेन को अपनी साख बहाली के लिए छह माह और मिल गए हैं. झारखंड में इसी साल दिसंबर में चुनाव होने हैं.
सरकार में जेएमएम के सहयोगी दलों—कांग्रेस और आरजेडी का लोकसभा चुनावों में खाता भी नहीं खुल पाया. हेमंत सरकार का विरोध कर रहे जेवीएम, एजेएसयू और जनता दल (यूनाइटेड) की भी चुनावों में यही गति हुई. बाबूलाल मरांडी और सुदेश महतो जैसे बड़े नेता भी क्रमश: दुमका और रांची में तीसरे नंबर पर पहुंच गए. प्रदेश में लगभग सभी पार्टियों के सियासी क्षत्रप मोदी हवा में उड़ गए. इसलिए फिलहाल कोई भी नेता जल्दी चुनाव नहीं चाहता है.
आरजेडी के एक नेता का कहना है, ''अगर झारखंड में फिलहाल विधानसभा चुनाव हुए तो उत्साहित बीजेपी सबका सूपड़ा साफ कर देगी. कुछ समय बीतने पर ही यह माहौल कुछ शांत होगा. नरेंद्र मोदी को लेकर लोगों में उत्साह कुछ माह में कम हो जाएगा. इसलिए बेहतर है कि चुनाव तय समय पर ही हों. ''
पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुदेश महतो की अगुआई वाले एजेएसयू के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''जनाधार पुख्ता करने के लिए हमें कुछ वक्त चाहिए. '' कांग्रेस की तरह एजेएसयू ने भी लोकसभा चुनावों में नौ सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. उसके नेता कहते हैं, ''यह कार्यकर्ताओं को व्यस्त और उत्साहित रखने की रणनीति थी. अगर हम नहीं लड़ते तो हमारे कार्यकर्ता और समर्थक हमें छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले जाते. इसका घाटा हमें विधानसभा चुनावों के दौरान होता. ''
झारखंड में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय, दोनों तरह की पार्टियों को आशंका है कि हेमंत सरकार के गिरने से बीजेपी को खुला मैदान मिल जाएगा. सुखदेव भगत के नेतृत्व में राज्य कांग्रेस पहले ही साफ कर चुकी है कि वह विधानसभा चुनावों में जेएमएम के साथ गठजोड़ नहीं करेगी और अकेले ही चुनाव में उतरेगी. कांग्रेस भी फिलहाल हेमंत सरकार से समर्थन खींचने पर मौन हो गई है.
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने दो निर्दलीयों चमरा लिंडा और बंधु तिर्की को पार्टी की सदस्यता लोकसभा चुनावों के ऐन पहले दी और तब से वह भी अपनी ताकत दिखाने लगी थी. लेकिन उसने भी अब हाथ वापस खींच लिए हैं. सरकार को दोनों विधायकों का समर्थन जारी रहेगा.
लोकसभा चुनावों के पहले 82 सदस्यीय राज्य विधानसभा में मामूली बहुमत से टिकी सोरेन सरकार पार्टी के दो विधायकों हेमलाल मुर्मू और बिद्युत बरन महतो के इस्तीफे के बाद अब-तब की स्थिति में थी. पार्टी के एक और विधायक साइमन मरांडी बागी हो गए. उधर, कांग्रेस ने भी अपने एक विधायक चंद्रशेखर दुबे को गंवा दिया. वे मंत्री पद छोड़कर तृणमूल के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े और हार भी गए.
हालांकि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और आरजेडी के साथ गठजोड़ में चार सीटों पर उतरा जेएमएम दो सीटें जीतने में कामयाब रहा लेकिन ये चुनाव हेमंत सरकार की हार माने जा रहे हैं. कांग्रेस नौ सीटों पर लड़ी थी और आरजेडी एक सीट पर. उधर, बीजेपी सत्ता की लालची नहीं दिखना चाहती. बीजेपी नेता अर्जुन मुंडा कहते हैं, ''हम अलोकप्रिय सरकार को गिराने की कोई कोशिश नहीं करेंगे. ''
झारखंड विधानसभा की कुल संख्या तो 82 है लेकिन दो जेएमएम और एक कांग्रेस विधायक के इस्तीफे और बीजेपी विधायक लक्ष्मण गुलिया के सिंहभूम से लोकसभा का चुनाव जीत जाने की वजह से फिलहाल यह संख्या 78 रह गई है. सोरेन सरकार को अभी 40 विधायकों का समर्थन प्राप्त है. जिसमें जेएमएम के 16, कांग्रेस के 12, आरजेडी के 5, तृणमूल के 2 और 5 निर्दलीय हैं. इससे सरकार बहुमत में है. जो भी हो, कई बार बुरे दिन भी अच्छे हो जाते हैं और हेमंत के चेहरे पर वाकई खुशी होगी.

