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मजबूत नेता के पीछे चला देश का वोटर

बीजेपी को 3 फीसदी अतिरिक्त वोट और 50-60 सीटें ज्यादा मिलीं. लोग सबको साथ लेने की बजाए निर्णायक नेता के पीछे जाने का मन बना चुके थे.

अपडेटेड 2 जून , 2014
हाल ही में संपन्न आम चुनावों का मुख्य विषय था नेतृत्व का मुद्दा. बीजेपी के चुनाव प्रचार का जोर यह था कि सत्ताधारी नेतृत्व कमजोर और ढुलमुल है, जिसमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है. नरेंद्र मोदी ने खुद को एक दृढ़ और निर्णय लेने वाले नेता के तौर पर पेश किया. बीजेपी ने भी खुद को उम्मीद और बदलाव लाने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया, एक ऐसी पार्टी जो युवाओं की उम्मीदों को पूरा कर सकती है.

राहुल गांधी और कांग्रेस ने इस आक्रामक हमले के जवाब में खुद को सबको साथ लेकर चलने वाली और गरीबों, अल्पसंख्यकों और समाज के दबे-कुचले लोगों के प्रति संवेदनशील पार्टी बताने की कोशिश की. कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगी दलों ने यह दिखाने की कोशिश की कि मोदी समाज को बांटने की राजनीति करते हैं, इसलिए वे राष्ट्रीय नेता नहीं बन सकते.

हमारी राय में यह चुनाव भारत की जनता के सामने रखे गए इन्हीं दो विकल्पों पर केंद्रित था. बीजेपी ने खुद को बदलाव लाने वाली पार्टी के तौर पर पेश किया. मोदी ने खुद को एक ऐसे राष्ट्रीय नेता के तौर पर पेश किया, जो पूरे भारत में वैसा ही विकास ला सकता है जैसा उन्होंने गुजरात में किया है, यानी आर्थिक विकास करना. केवल मोदी जैसा निर्णायक नेता ही इस तरह का विकास ला सकता है.

कांग्रेस पार्टी ने जो चुनाव प्रचार चलाया, वह ज्यादा नकारात्मक था. उसने अपने प्रचार में मोदी की विभाजनकारी राजनीति और अपनी समावेशी नीति पर जोर देने की कोशिश की. कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने भी गुजरात के आर्थिक विकास के मॉडल पर सवाल खड़ा करते हुए यह बताने की कोशिश की कि यह विकास गरीबों और किसानों की कीमत पर किया गया है.

बीजेपी की ओर से एक दृढ़ नेता के जरिए उम्मीद और सुनहरे भविष्य की तस्वीर दिखाने का सकारात्मक संदेश दिया गया, जिसके कारण वह वोटरों को अपनी ओर खींचने में सफल रही, जबकि कांग्रेस का नकारात्मक चुनाव प्रचार मतदाताओं को रिझाने में नाकाम रहा. एक निर्णायक नेतृत्व के प्रभाव को दिखाने के लिए हमने इंडिया टुडे ग्रुप-सिसेरो नेशनल पोस्ट पोल सर्वे के आंकड़ों का इस्तेमाल किया.

यह जनमत सर्वेक्षण बानगी सर्वेक्षण प्रयोग (विवरण के लिए देखें विधि का बॉक्स) पर आधारित था. यह भारत में मीडिया-प्रायोजित जनमत सर्वेक्षणों में अपनी तरह का एक नया प्रयोग है. एक कारक का दूसरे कारक पर असर जानने के लिए हमने बानगी के तौर पर चुने गए उत्तरदाताओं से दो में से किसी एक सवाल का जवाब देने को कहा-क्या नेता को झटपट फैसले करने वाला होना चाहिए या उसे सबको साथ लेकर चलने वाला होना चाहिए, भले ही निर्णय लेने की गति कुछ धीमी हो?

हमने पाया कि ज्यादातर भारतीय एक दृढ़ और निर्णय लेने वाला नेता पसंद करते हैं. 83  फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि देश को निर्णय लेने वाले नेता की जरूरत है, जबकि केवल 69 फीसदी का मानना था कि देश को सबको साथ लेकर चलने वाले नेता की जरूरत है. यह आंकड़ा चौंकाने वाला है क्योंकि विभिन्न जाति-समुदायों, स्थानों, या महिला-पुरुषों में जवाब की यही प्रवृत्ति देखने को मिली. एक निर्णायक नेता को पसंद करने वालों का अनुपात समावेशी नेता चाहने वाले लोगों के अनुपात से कहीं ज्यादा था (देखें पहला ग्राफिक).

यहां तक कि ज्यादातर राज्य भी समावेशी नेता के मुकाबले एक निर्णयशील नेता चाहते हैं (देखें सूची 1). इस तरह की राय व्यक्त करने वाले राज्य हैं उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, तमिलनाडु, झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल और हरियाणा. असम, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और पंजाब चाहते हैं कि उनका नेता निर्णयशील और समावेशी हो, लेकिन उन्होंने ज्यादा समावेशी नेता को प्राथमिकता नहीं दी. ओडिसा और आंध्र प्रदेश चाहते हैं कि उनका नेता निर्णयशील के मुकाबले ज्यादा समावेशी हो. कुल-मिलाकर देश ने इस बार आर या पार का मूड बनाया था.

क्या एक दृढ़ नेता की इस चाह के कारण बीजेपी को चुनावों में कोई फायदा हुआ? इस सवाल का जवाब देने के लिए हमने निर्णायक नेता चाहने वाले लोगों में वोटिंग की संभावना का अनुमान लगाने के लिए सांख्यिकीय मॉडलों का इस्तेमाल किया. एक निर्णायक नेता की वरीयता से बीजेपी का वोट 3 फीसदी बढ़ गया. किसी भी  मानक से यह एक बड़ी संख्या है, क्योंकि 2009 से बीजेपी के पक्ष में झुकाव करीब 12 फीसदी है. राष्ट्रीय चुनाव में 3 फीसदी वोट से 50-60 सीटों का इजाफा हो सकता है.

देश का मूड निश्चित रूप से एक निर्णयशील नेता के पक्ष में था. क्या देश ने इसी तरह उम्मीद, बदलाव और विकास के संदेश को भी वरीयता दी? इंडिया टुडे ग्रुप-सिसेरो नेशनल पोस्ट पोल के आंकडों से पता चलता है कि मतदाता मोदी की छवि से प्रभावित थे. मतदाताओं में उनकी छवि उनके आलोचकों द्वारा बनाई गई छवि से बिल्कुल अलग थी.

जब उत्तरदाताओं से पूछा गया कि क्या मोदी राष्ट्रीय हित और देश की अभिलाषओं का प्रतिनिधित्व करते हैं तो 54 फीसदी लोगों का जवाब हां में था और 52 फीसदी लोगों ने कहा कि मोदी भारत की विकास दर को फिर से तेज कर सकते हैं. पुरुष और महिला, गरीब और अमीर, शहरी और ग्रामीण, सभी के मन में मोदी की अच्छी छवि थी.

करीब 50 फीसदी लोगों ने कहा कि मोदी भारत के लिए अच्छे हैं और वे देश में फिर से वृद्धि को गति दे सकते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी के चुनाव प्रचार के संदेश ने देश में ज्यादातर लोगों को प्रभावित किया, खासकर युवाओं को. इसके बावजूद मोदी के संदेश ने मुसलमानों और दलितों को ज्यादा प्रभावित नहीं किया (देखें दूसरा ग्राफिक).

कांग्रेस के चुनाव प्रचार का क्या प्रभाव रहा? क्या लोगों ने मोदी को विभाजनकारी राजनीति से जोड़ा? देश में आठ में से एक व्यक्ति ने मोदी को विभाजनकारी माना और छह लोगों ने माना कि  मोदी शायद ही विभाजन की राजनीति करते हैं. साफ कहें तो कांग्रेस की ओर से मोदी को विभाजनकारी नेता बताने की कोशिश का उतना असर नहीं पड़ा, जितना कि मोदी की उम्मीद जगाने की कोशिश का असर जनता पर पड़ा.

यानी मोदी की उम्मीद जगाने की कोशिश का असर अपेक्षाकृत ज्यादा रहा. इसका एकमात्र अपवाद मुस्लिम समुदाय था. चार मुस्लिम वोटरों में से एक का मानना था कि मोदी समाज को बांटने की राजनीति करते हैं (देखें तीसरा ग्राफिक).

इन चुनावों पर नेतृत्व का भारी और निर्णायक प्रभाव पड़ा. बीजेपी विजयी रही, क्योंकि उसने उम्मीद और सुनहरा भविष्य देने वाला नेतृत्व पेश किया. इस संदेश का असर उन लोगों में ज्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिन्होंने 2009 में और उससे पहले बीजेपी को वोट नहीं दिया था, लेकिन 2014 में बीजेपी को वोट दिया. इस समूह में नेतृत्व का असर सबसे ज्यादा था. 2014 में दूसरी पार्टी को छोड़कर बीजेपी को वोट देने वालों में करीब 60 फीसदी ने मोदी के सकारात्मक संदेश के कारण बीजेपी को प्राथमिकता दी.

इस सकारात्मक संदेश का सबसे ज्यादा असर युवाओं में देखने को मिला, जिनमें बीजेपी को वोट देने की संभावना करीब एक-तिहाई बढ़ गई. कांग्रेस की ओर से कोई ऐसा नेता नहीं पेश किया गया, जो भारत को सुनहरे भविष्य की ओर ले जा सकता है. इसकी जगह उनके नेता ने मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश की. पार्टी की यह रणनीति देश के ज्यादातर मतदाताओं को रिझने में विफल रही.

उम्मीद और दृढ़ नेतृत्व का संदेश नकारात्मक संदेश पर भारी पड़ा. युवा और महत्वाकांक्षी भारत किसी नायक की ओर देख रहा था. मोदी ने खुद को उसी रूप में पेश किया. ज्यादातर लोग एक निर्णयशील नेता चाहते हैं. बीजेपी को इससे निश्चित रूप से फायदा हुआ. मोदी को अब लोगों की उन उम्मीदों को पूरा करना होगा, जो उन्होंने खुद पैदा की हैं. मोदी अपनी पार्टी या सरकार की संस्थाओं के पीछे नहीं छुप सकते हैं.

प्रदीप छिब्बर चार्ल्स ऐंड लुइस ट्रैवर्स राजनीति विज्ञान विभाग, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले, अमेरिका में प्रोफेसर हैं. धनंजय जोशी सिसेरो एसोसिएट्स ऐंड कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं.
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