दस साल की उम्र तक आनंदीबेन पटेल मेहसाणा जिले के खरोड़ गांव में स्थित अपने खेतों में पिता का हाथ बंटाया करती थीं. खेतों में काम करने से उन्हें कठोर मेहनत और लगन से काम करते रहने की कीमत समझ में आई. ऐसे सबक, जो इस अनुभवी नेता के अब आगे काम आएंगे, अब, जब वे गुजरात को नरेंद्र मोदी के बाद वाले युग में आगे बढ़ाने जा रही हैं.
गुजरात में मोदी की खाली की गई जगह को भरना आसान काम नहीं है. लेकिन 72 साल की आनंदीबेन में मोदी की उपयुक्त उत्तराधिकारी बनने की पूरी योग्यता है. अपने पूरे जीवन में उन्होंने हमेशा विभिन्न विपरीत परिस्थितियों का सामना किया और उन पर जीत हासिल की है. जब वे पांचवीं कक्षा में थीं, तभी उनके पिता जेठाभाई कालिदास पटेल ने सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ते हुए उनका दाखिला लड़कों के स्कूल में कराया था. इससे उनके समुदाय के लोगों की त्योरियां चढ़ गईं, लेकिन आनंदीबेन ने अपनी पढ़ाई जारी रखी. दो साल तक वे पूरे स्कूल में अकेली लड़की थीं. कुछ साल बाद जब उनकी बहन सरिताबेन (अब 95 वर्ष) ने अपनी ही जाति लेउवा पटेल के अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ली तो समुदाय ने पांच साल तक उनके परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया. परिवार के लिए यह बहुत कठिन समय था, लेकिन आनंदीबेन मजबूती से डटी रहीं और अपनी शिक्षा पूरी की. एक सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल में उन्हें शिक्षक की नौकरी मिल गई. 1970 के दशक के शुरुआती वर्षों में अध्यापन के दौरान ही उन्होंने एमएससी (गोल्ड मैडलिस्ट) और एमएड की पढ़ाई भी पूरी की. वर्ष 1988 में अहमदाबाद के मोहिनिबा गर्ल्स स्कूल की प्रिंसिपल आनंदीबेन को 'गुजरात उद्यम एवं साहस अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया. एक पिकनिक के दौरान उन्होंने अपनी दो छात्राओं को नदी में डूबने से बचाया था. 1992 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से सर्वोत्तम शिक्षक का राष्ट्रीय सम्मान मिला.
उस समय तक बीजेपी में भी आनंदीबेन का कद काफी बढऩे लगा था. पार्टी के युवा राज्य संगठन मंत्री मोदी ने उनकी योग्यता को पहचाना और 1988 में उन्हें पार्टी के साथ जोड़ा था. बीजेपी तब गुजरात में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही थी और उसे नए महत्वाकांक्षी चेहरों की तलाश थी. एक स्कूल की सम्मानित प्रिंसिपल, जो बहादुरी का अवॉर्ड भी जीत चुकी हों, इसके लिए उपयुक्त थीं. आनंदीबेन ने 1988-90 में राज्य के सूखा प्रभावित लोगों के बीच उल्लेखनीय कार्य किया था, जिसे देखते हुए वर्ष 1990 में उन्हें बीजेपी के राज्य महिला मोर्चे की अध्यक्ष बना दिया गया. इसके बाद 1991 के लोकसभा चुनावों के लिए प्रचार अभियान के दौरान आनंदीबेन ने एक कुशल वक्ता और संगठनकर्ता के रूप में अपने आप को स्थापित किया. इसके बाद के वर्षों में उन्होंने गुजरात बीजेपी में अपनी अलग जगह बनाई, लेकिन वे मोदी और उनके विश्वस्त अमित शाह के प्रति वफादार बनीं रहीं. ऐसे माहौल में भी जब मोदी को शंकर सिंह वाघेला या केशुभाई पटेल से लड़ाई लडऩी पड़ रही थी, आनंदीबेन ने मोदी का साथ दिया. मोदी शायद ही कभी दूसरे मंत्रियों को अपने सचिव चुनने की छूट देते हैं. मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की बेहद कठोर कार्यशैली के बावजूद आनंदीबेन उनके साथ लगी रहीं और धीरे-धीरे उनका भरोसा और विश्वास अर्जित किया.
सरकार में अपनी लंबी पारी के दौरान मौजूदा मुख्यमंत्री आनंदीबेन ने तेजी से निर्णय लेने की क्षमता, बारीकियों पर ध्यान देने और राज्य के गहन आधिकारिक दौरे की वजह से अफसरशाही में काफी सम्मान हासिल किया है. 1998 में जब वे पहली बार केशुभाई पटेल सरकार में मंत्री बनीं, उसके बाद से उन्होंने जितने भी मंत्रालय संभाले, उन सबका कायापलट कर दिया. 1998 से 2007 के बीच शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने शिक्षकों की नियुक्ति और ट्रांसफर के मामलों में भ्रष्टाचार को खत्म किया. उन्होंने 1,00,000 नए शिक्षकों की नियुक्ति की और राज्य की खस्ताहाल प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए 80,000 क्लासरूम का निर्माण कराया. 2007 से वे जिस राजस्व मंत्रालय को संभाल रही थीं, उसमें लालफीताशाही को कम किया और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल शुरू किया. जालसाजी रोकने और किसानों का मालिकाना हक सुरक्षित रखने के लिए ई-जमीन जैसे प्रोजेक्ट शुरू किए. उन्होंने जमीनी स्तर पर प्रशासन को सुधारने के लिए तहसील स्तर पर ई-गवर्नेंस लागू किया. मोदी ने उनकी तारीफ करते हुए कहा था, ''राजस्व विभाग में उन्होंने ऐसे बदलाव कर अपनी अमिट छाप छोड़ी है, जो मैं लंबे समय से चाहता था.”
उन्होंने शहरी विकास मंत्रालय में भी कई दूरगामी परिवर्तन किए. उनके 18 महीने के कार्यकाल के दौरान एक साल में टाउन प्लानिंग की योजनाओं को अंतिम रूप देने की संख्या 30-40 से बढ़कर 100 तक पहुंच गई. शहरी विकास योजनाओं को अंतिम रूप देने की संख्या भी 5-10 से बढ़कर करीब 20 तक पहुंच गई. आरोग्य और परिवार कल्याण राज्यमंत्री शंकरभाई चौधरी ने कहा, ''उन्होंने जो भी विभाग संभाले, अपने कुशल संचालन की बदौलत उनमें कुछ-न-कुछ नया जरूर किया.”
हालांकि आनंदीबेन की कुछ सीमाएं भी हैं. वे बीजेपी के कार्यकर्ताओं के बीच बहुत लोकप्रिय नहीं हैं. बहुत से लोग उन्हें अहंकारी मानते हैं. उन्होंने कभी-कभी गलत लोगों को प्रश्रय दिया है, जिसकी वजह से उनकी सूझबूझ पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं. उनके कहने पर मोदी ने 2012 के विधानसभा चुनावों में दो अलोकप्रिय नेताओं कामाभाई राठौड़ और प्रागजी पटेल को क्रमश: साणंद और विरामगम सीट से टिकट दिलवाए. दोनों हार गए. आरएसएस के साथ भी उनके रिश्ते ठीक-ठीक ही हैं. संघ के साथ उनका रिश्ता मुख्यत: मोदी की वजह से ही है, क्योंकि वे मोदी के करीबी हैं.
एक मुख्यमंत्री के रूप में अब उनकी कड़ी परीक्षा होगी क्योंकि किसी भी तरह की गलती से ऐसी राजनैतिक अनिश्चितता पैदा होने का डर है. 2004 तक मोदी को भी पार्टी के भीतर ही विधायकों की ओर से अनिश्चितता का सामना करना पड़ा था. जैसा कि मोदी के आने के पहले राज्य बीजेपी में थी. हालांकि आनंदीबेन अपनी सफलता को लेकर आत्मविश्वास से भरी हुई हैं. उन्होंने कहा, ''नरेंद्रभाई ने बुनियाद रख दी है, मुझे बस गति को बनाए रखना है. मैं नीति आधारित शासन को बनाए रखूंगी. मेरा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि साधारण से साधारण आदमी को भी न्याय मिले.”
एक राज्य को अच्छे से चलाना आसान काम नहीं है, लेकिन गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री के लिए राहत की बात यह है कि उनके पूर्ववर्ती ने राह दिखा दी है.
गुजरात में कर्मठ आनंदीबेन को मिली कमान
अब नरेंद्र मोदी की जगह गुजरात की नई मुख्यमंत्री बनीं आनंदीबेन पटेल. क्या वे राज्य में मोदी की समृद्ध विरासत को आगे ले जाने में कामयाब हो पाएंगी?

अपडेटेड 3 जून , 2014
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