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दिल्ली में असंतोष की लहर पर सवार बीजेपी

जिस शहर के लोगों में गुस्सा भरा हो वहां निवर्तमान सांसदों को टिकट देने की कांग्रेस की रणनीति रंग लाती नजर नहीं आती. दिल्ली में कुछ ऐसा ही हाल है.

अपडेटेड 14 अप्रैल , 2014
समय सुबह के 11 बजे का है और कपिल सिब्बल की पदयात्रा बल्लीमारान की तंग गलियों से होकर गुजर रही है. अजीम शायर मिर्जा गालिब की हवेली के लिए चर्चित इस इलाके में दुकानें अभी खुलनी शुरू हुई हैं. खुद भी शायरी का शौक रखने वाले सिब्बल पुरानी-घनी इमारतों की छोटी-छोटी खिड़कियों से झांकते और लकड़ी की बालकनियों में खड़े लोगों की ओर हाथ हिलाते हैं.

आज शायरी का मौका नहीं है. सिब्बल भावुक भाषण देने के लिए रुकते हैं. वे कहते हैं, ‘‘मैं हमेशा गुजरात दंगों के पीड़ितों के साथ खड़ा रहा हूं. मोदी से लोहा लिया है. हम यहां पाकिस्तान से आए और आज मैं इस मुकाम पर मेहनत से पहुंचा हूं. कोई मुझ पर रिश्वत का एक पैसा लेने का आरोप नहीं लगा सकता.’’
राजमोहन गांधी
(पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र में प्रचार करते आप उम्मीदवार राजमोहन गांधी)
केंद्रीय कानून और न्याय तथा संचार और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री सिब्बल चांदनी चौक से 2004 से दो बार जीत चुके हैं और तीसरी बार मैदान में हैं. राजधानी के इसी क्षेत्र में 10 अप्रैल को मतदान के दिन सबसे तगड़ी लड़ाई लड़ी जानी है. इसी इलाके में रहने वाले युवक कांग्रेस के नेता मुहम्मद नौशाद कहते हैं, ‘‘अल्पसंख्यकों को यह एहसास है कि वे भ्रष्ट नहीं हैं और जो भी उनके पास जाता है, उसकी मदद करते हैं.’’

 फिर भी सिब्बल के खिलाफ इलाके में एक तरह की नाराजगी है, जिसे उनके प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के डॉ. हर्षवर्धन और आम आदमी पार्टी (आप) के आशुतोष भुनाने की आस में हैं. आशुतोष कहते हैं, ‘‘लोग भ्रष्टाचार और झूठे वादों से आजिज आ चुके हैं. वे विकल्प तलाश रहे हैं. मैं ही सिर्फ ऐसा प्रत्याशी हूं जिसे सभी समुदायों का समर्थन मिल रहा है.’’

पिछले साल के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को सत्ता दिलाने में नाकाम रहे हर्षवर्धन को भी उस समुदाय के महत्व का एहसास है जिस पर उनके दोनों प्रतिद्वंद्वी डोरे डाल रहे हैं. यहां मुसलमान वोटर 14 फीसदी हैं. उन्होंने अपने प्रचार अभियान की शुरुआत मुस्लिम बहुल तुर्कमान गेट के फाटक तेलियां इलाके में उस मकान से की जहां उनका जन्म हुआ था. वे मतदाताओं से कहते हैं, ‘‘मैं अकेले यहां का स्थानीय हूं, बाकी सब बाहरी हैं.’’

दिल्ली में 2014 के लोकसभा चुनावों की चांदनी चौक सीट अहम मिसाल है. एक करोड़ वोटरों वाली राजधानी की सातों संसदीय सीटों पर तिकोना मुकाबला तय है क्योंकि आप पिछले दिसंबर में विधानसभा चुनावों की अपनी कामयाबी दोहराने की तैयारी में है. हालांकि थोड़े समय में ही सरकार से हट जाने पर उठे गुबार से मध्यवर्ग उससे नाराज हो गया है. दक्षिण दिल्ली के मध्यवर्गीय मुहल्ले मस्जिद मोठ के लोग आप को वोट देकर पछता रहे हैं.

चार्टर्ड एकाउंटेंट 46 वर्षीय पवन खेत्रपाल कहते हैं, ‘‘आप हमारी उम्मीदों पर पूरी तरह नाकाम रही. इस बार हम मोदी को वोट देंगे.’’ हालांकि राजधानी के लोगों की निराशा से उपजे आप से इस मोहभंग की भरपाई झुग्गी-झोंपड़ी वालों, मजदूरों और अल्पसंख्यकों में उसकी पैठ से हो सकती है, जो कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक रहा है.

शायद इसी वजह से पार्टी ने अपनी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में मोदी की मुखालफत भी जोड़ ली है. उसे उम्मीद है कि यह रणनीति उसे मुस्लिम वोट दिला देगी. उम्मीद बेमानी भी नहीं है. अल्पसंख्यक समुदाय के लोग कहते हैं कि वे उसे ही वोट देंगे जो बीजेपी को हराने की बेहतर स्थिति में होगा. चांदनी चौक में गालिब की हवेली के पास रेहड़ी लगाने वाले 28 वर्षीय मुजाहिद अली कहते हैं, ‘‘कुछ और इंतजार कीजिए. हम आखिरी मौके पर ही तय करेंगे.’’

वोटों का यह बंटवारा बीजेपी के लिए मुफीद है. इंडिया टुडे ग्रुप-सिसेरो ओपिनियन पोल राजधानी में बीजेपी की लहर की भविष्यवाणी करता है. पार्टी को 41 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है जो पांच सीटों पर जीत दिला सकता है और शायद 1999 की तरह सभी सीटों पर असर डाल सकता है. सर्वेक्षण में करीब 44 फीसदी लोगों ने कहा कि वे मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं जबकि केजरीवाल के लिए यह आंकड़ा 24 फीसदी और राहुल गांधी के लिए 19 फीसदी है.

नए चेहरों को मैदान में उतारने से बीजेपी की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं. उसने सिर्फ एक प्रत्याशी दक्षिण दिल्ली से रमेश कुमार बिधूड़ी को दोबारा उतारा है. यही नहीं, बाकी पार्टियों की तरह ही बीजेपी ने जातिगत समीकरणों की अनदेखी नहीं की है. यह गणित नई दिल्ली और पूर्वी दिल्ली को छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों में आजमाया गया है. चांदनी चौक में बनिया और पंजाबी व्यापारियों के वोट 35 फीसदी हैं इसलिए बीजेपी ने बनिया बिरादरी के डॉ. हर्षवर्धन और आप ने आशुतोष को प्रत्याशी बनाया है.

पश्चिमी दिल्ली में बीजेपी ने 2009 की गलती को सुधारने के लिए जाट नेता, पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा को टिकट दिया है. वे कहते हैं, ‘‘मेरे पिता भी मोदीजी की तरह काम करके दिखाने वाले थे. मैं उनकी विरासत आगे बढ़ाना चाहता हूं.’’ उन्हें आप के जरनैल सिंह कड़ी टक्कर दे रहे हैं जो 2009 में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिंदबरम पर जूता उछाल कर चर्चा में आए थे. आप को उम्मीद है कि 1984 के दंगा पीड़ितों की आवाज उठाने वाले जनरैल को क्षेत्र के 18 फीसदी सिख वोटरों के वोट मिलेंगे. प्रवेश और जरनैल दोनों ही कांग्रेस सांसद महाबल मिश्र को चुनौती दे रहे हैं.

 कांग्रेस ने अपने सभी सात सांसदों को दोबारा मैदान में उतारकर सत्ता-विरोधी नाराजगी का खतरा मोल लिया है. उत्तर-पूर्वी दिल्ली और नई दिल्ली में क्रमशः सांसद जयप्रकाश अग्रवाल और अजय माकन तो पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच हुए प्राइमरीज में जीतकर आए हैं लेकिन बाकी के मामले में जातिगत गणित ने पार्टी के हाथ बांध दिए. पार्टी नेतृत्व उत्तर-पश्चिम से मौजूदा सांसद कृष्णा तीरथ को बदलना चाहता था लेकिन इस आरक्षित सीट पर कोई उपयुक्त दलित महिला प्रत्याशी नहीं मिल पाई.

यहां 21 फीसदी वोटर दलित हैं. इसलिए जैसे ही बीजेपी ने दलित नेता उदित राज और आप ने मंगोलपुरी की विधायक राखी बिडलान को उतारा, कृष्णा तीरथ को टिकट दे दिया गया. लेकिन इससे पार्टी को राहत मिलती नहीं दिखती क्योंकि तीरथ के दावों के विपरीत उनका प्रचार अभियान बेदम दिखता है.

जातिगत गणित ने दक्षिण दिल्ली में भी कांग्रेस के विकल्प सीमित कर दिए. यहां भी पार्टी अपना उम्मीदवार बदलना चाहती थी. उसे इस पर दोबारा विचार करना पड़ा कि मौजूदा सांसद रमेश कुमार के बड़े भाई सज्जन कुमार का अब भी इलाके के जाटों और गुर्जरों में अच्छा रसूख है. रमेश अपनी सांसद निधि के 19 करोड़ रु. में से सिर्फ 3.08 करोड़ रु. ही खर्च कर पाए और इंडिया टुडे  ग्रुप की सांसदों की रैंकिंग में 290वें स्थान पर रहे. कोई बड़ी उपलब्धि न होने से वे वोटरों को लुभाने के लिए मोदी पर वार का सहारा ले रहे हैं. उनके मुकाबले बीजेपी ने तुगलकाबाद से विधायक रमेश बिधूड़ी को उतारा है. बिधूड़ी गुर्जर हैं जिसके वोटरों की संख्या दक्षिण दिल्ली में दूसरे नंबर पर है. उनका स्थानीय कारोबारियों में भी अच्छा रसूख है.

वे वोटरों से कहते हैं, ‘‘विकास चाहते हो तो मोदी को वोट दो. वे आपकी जिंदगी बदल देंगे.’’ हालांकि बिधूड़ी के लिए टक्कर कड़ी है. आप ने चतुराई से जाट कर्नल देविंदर सहरावत को उतारा है. दक्षिण दिल्ली के 42 गांवों में से 18 जाट बहुल हैं. बेर सराय गांव में रियल एस्टेट डीलर 39 वर्षीय लक्ष्मण पवार कहते हैं, ‘‘मैं बीजेपी को सत्ता में लाना चाहता हूं पर जाट होने के नाते गुर्जर बिधूड़ी को कभी वोट न दूंगा.’’

नई दिल्ली और पूर्वी दिल्ली में अजय माकन और संदीप दीक्षित दोनों ही कड़े मुकाबले में फंसे हैं. माकन की गरीब तबके और शहरी गांवों में अच्छी पैठ है, लेकिन मध्य और उच्च वर्ग के वोटर शायद उनसे बिदक कर बीजेपी की ओर चले गए हैं. बीजेपी ने अपनी मुखर प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी को खड़ा किया है. लेखी को न सिर्फ माकन के जनाधार में सेंध लगाने की उम्मीद है, बल्कि दिसंबर के विधानसभा चुनाव में आप को वोट देने वाले मध्यवर्गीय वोटरों के भी वोट मिल जाने की आस है.

वे लोगों से कहती हैं, ‘‘माकन अपने किए काम के पर्चे बांट रहे हैं. आपको ये पर्चे पढऩे की जरूरत नहीं है. बस उन जगहों पर जाइए और नजारा देख लीजिए. उन्होंने आपका भरोसा तोड़ा है.’’ आप के उम्मीदवार आशीष खेतान को अपनी पार्टी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान पर भरोसा है. दिल्ली छावनी इलाके में झाड़ू चलाओ यात्रा के दौरान वे कहते हैं, ‘‘बीजेपी सिर्फ कांग्रेस के भ्रष्टाचार की बात करती है. दिल्ली नगर निगम में भ्रष्टाचार भरा पड़ा है जिस पर बीजेपी का कब्जा है.’’

संदीप दीक्षित के खिलाफ बीजेपी के महेश गिरी हैं, जो ऑर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर हैं. उनके एनजीओ नव भारत सेवा समिति ने यमुना की सफाई का काम किया और पूर्वी दिल्ली में स्वास्थ्य शिविर चलाता है. आप के राजमोहन गांधी 78 वर्ष की उम्र में सबसे बुजुर्ग उम्मीदवारों में हैं. वे अपनी यूएसपी के बूते हैं. उनके समर्थक यह याद दिलाना नहीं भूलते कि वे महात्मा गांधी के पोते हैं.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में करीब 45 फीसदी वोटर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आए लोग हैं. बीजेपी ने भोजपुरी ऐक्टर मनोज तिवारी को उतारा है जबकि आप ने प्रोफेसर आनंद कुमार को सिर्फ इसलिए उतारा है कि वे बनारस से हैं. तिवारी की लोकप्रियता वोटरों पर जादू का काम कर सकती है पर उनकी पार्टी को मुस्लिम वोट की चिंता है, जो अमूमन कांग्रेस की ओर जाता है. विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली आठ सीटों में से दो इसी संसदीय क्षेत्र की हैं.

सो, इस चुनाव में मौजूदा सांसद जयप्रकाश अग्रवाल ने अपनी पत्नी, दो बेटों और बहुओं को प्रचार में उतार दिया है. इसका लाभ उन्हें शायद ही मिले क्योंकि उनके पास आप के ‘‘झूठे वादों’’ और ‘‘सांप्रदायिक मोदी’’ को सत्ता में आने से रोकने की बातों के अलावा कुछ कहने को है ही नहीं. दिल्ली में कांग्रेस के सभी उम्मीदवारों के लिए भी यही हकीकत है. क्या यह काम करेगी?
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